मंगलवार, 12 जनवरी 2021

भावभीनी श्रद्धांजलि

टंडन - हेलो मेहता जी, मैं टंडन बोल रहा हूँ.

मेहता जी - हाँ भाई, बोल टंडन, तू ने ऐसी कड़ाके की ठण्ड में सुबह सात बजे फ़ोन किया है तो ज़रूर कोई ख़ास बात होगी. बता, क्या बात है?

टंडन - वो अपने दीनानाथ जी हैं न, भूतपूर्व मंत्री और वर्तमान विधायक! उनका कल रात देहांत हो गया.’

मेहता जी –  क्या अनाप शनाप बक रहा है तू?

कल शाम को ही तो मैंने उन्हें टीवी स्टार मनोरमा के फ्लैट से निकलते हुए देखा था.

टंडन - आप क्या अदालत में इस बात की गवाही दोगे?

मेहता जी – मैं गवाही क्यों देने लगा? मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है?

टंडन – ठीक है, तो फिर आप भूल जाइए कि कल आपने उन्हें किसके यहाँ जाते हुए और किसके यहाँ से निकलते हुए देखा था.

मेहता जी – लो भूल गया. बल्कि मैं तो कहूँगा कि दीनानाथ जी को मैंने पिछले एक महीने से नहीं देखा है.

टंडन – अच्छा ये सब छोड़िए. ये बताइए कि दीनानाथ जी के बंगले पर पहुंचना कब है. अब तो न्यूज़ चेनल्स पर भी दीनानाथ जी ही छाए हुए हैं.

मेहताजी – यार ! श्रीमती जी तो आज सुबह हरे धनिए की चटनी के साथ पालक के और गोभी के पकौड़े बनाकर खिलाने वाली थीं.

 

टंडन - मैं स्कूटर से 5 मिनट में आपके घर पहुँच रहा हूँ और फिर अगले 10 मिनट में हम दोनों वहां से दीनानाथ जी के बंगले के लिए निकलेंगे.

मेहता जी – मान्यवर ! इस शोक की वेला में मेरे घर पर दस मिनट रुक कर आप क्या करेंगे?

टंडन – हुज़ूर ! मुझे भी भाभी जी के हाथ के पालक के और गोभी पकौड़े बहुत अच्छे लगते हैं.’

(आधे घंटे के बाद)

मेहता जी – यार टंडन, यहाँ तो पूरा शहर उमड़ा पड़ा है और प्रेस वाले भी मधुमक्खियों के छत्ते जैसे टूटे पड़ रहे हैं.

टंडन – गुरुदेव ! आप की तो बहुत पहुँच है.

इस शोक की वेला में किसी न्यूज़ चेनल वाले फ़ोटोग्राफ़र का कैमरा हमारी तरफ़ भी मुड़वा दो.

खुद का चेहरा न्यूज़ चेनल पर देख लेंगे तो आप को दुआ देंगे.

मेहता जी – पापी ! तू कभी सुधरेगा नहीं. ठहर, वो ‘वर्तमान न्यूज़’ का भाटिया दिखाई दे रहा है. उस से कहता हूँ कि वो हमको भी कवर कर ले.

टंडन - आप धन्य हैं गुरुदेव ! आपकी कृपा से हम भी टीवी स्टार बन जाएँगे.

मेहता जी – बच्चे ! सिर्फ़ ‘धन्य हैं’ , कहने से काम नहीं चलेगा. अगर तेरा चेहरा ‘वर्तमान न्यूज़’ पर दिख गया तो तू अगले सन्डे हमको रम पिलाएगा.

टंडन – ‘पक्का ! रम, वो भी तले हुए काजुओं के साथ.’

मेहता जी – लो तुम्हारी सती मनोरमा दिखाई पड़ गईं.

वाह ! कितना बढ़िया रोती है !

टंडन – किस पार्लर का कमाल है कि आंसुओं से इसका मेकअप ज़रा भी धुलता नहीं?

मेहता जी – श्रीमती दीनानाथ को देखो. कैसे खा जाने वाली नज़रों से सती मनोरमा को देख रही हैं?

टंडन – श्रीमती दीनानाथ का घूरना तो बनता है.

संत दीनानाथ ने अपना एक लक्ज़री फ्लैट और एक पेट्रोल पम्प जो इस सती के नाम कर दिया है.

मेहता जी – दीनानाथ जी के सपूत कहीं नहीं दिखाई दे रहे.

टंडन – वो बेचारा रात में अफ़ीम खाकर सुबह दस बजे तक उठता है. अपने पापा के अंतिम प्रस्थान करने से पहले तो उठ ही जाएगा.

मेहता जी – यार टंडन, बड़ी ठण्ड है. चाय की तलब लग रही है.

टंडन – ‘आप भी गुरुदेव नमूना हो. भाभी जी ने पकौड़ों के साथ हमको चाय भी तो सर्व की थी पर आप मानोगे थोड़ी.

अब चुपके से चलिए, नुक्कड़ वाले गोपाल के यहाँ की स्पेशल चाय पीते हैं.

मेहता जी – दीनानाथ जी के बंगले के अन्दर ये शोर कैसा है? ज़रा जाकर पता करो.

(टंडन बंगले के अन्दर जाकर पता करता है)

टंडन – दीनानाथ जी के सपूत जाग गए हैं और अब वो अपनी माँ तथा माँ समान मनोरमा जी से झगड़ा कर रहे हैं.

मेहता जी – ऐसी दुःख की वेला में झगड़ा?

टंडन – ये कुर्सी के लिए त्रिकोणात्मक संघर्ष है गुरुदेव !

मिलियन डॉलर का सवाल है कि दिवंगत दीनानाथ जी की विधायक वाली सीट किसे मिलेगी?

पिनकची बेटे को, ताड़का स्वरूपा पत्नी को, या फिर उनकी आम्रपाली जैसी प्रेमिका को?

मेहता जी – भई, हमको तो मनोरमा पसंद है.

टंडन – वो तो शहर के आधे नौजवानों की पसंद है. आप पके आम, इस स्वयंवर में कहाँ से आ टपके?

मेहताजी – नालायक कहीं के ! अपने गुरु की टांग खींचते हो?

अच्छा, ये सब छोड़ो. ये बताओ कि ये गुप्ता बिल्डर इतने दहाड़ मार मार कर क्यों रो रहा है?

टंडन – अपनी जनरल नॉलेज अपडेट रक्खा करिए गुरुदेव !

गुप्ता ने अपने होटल में जो पब्लिक पार्क की ज़मीन दबा ली थी, उसको होटल के नाम कराने के लिए उसने दीनानाथ जी को बीस लाख रूपये एडवांस में दिए थे.

अब वो रूपये डूब गए हैं तो क्या बेचारा रोएगा भी नहीं?

मेहता जी – चलो इंतज़ार की घड़ियाँ समाप्त हुईं.

दीनानाथ जी की साज-सज्जा पूरी हुई.

अब श्मशान घाट के लिए चलना है.

टंडन – कौन कमबख्त खटारा स्वर्ग-विमान से जाए?

अपन स्कूटर से ही चलते हैं.

हम थोड़ा पहले पहुँच जाएंगे तो स्कूटर पार्क करने में सहूलियत होगी.

मेहता जी – चल भई, ये ज़िन्दगी हमने तेरे नाम कर दी.

(पंद्रह मिनट बाद)

टंडन – अरे, ये तो रिवोली आ गया. अब बताइए, श्मशान घाट के रास्ते में सिनेमा ! क्या प्लानिंग है इस शहर की?

मेहता जी – हाय ! इसमें तो फ़िल्म ‘गंगा-जमुना’ लगी है.

टंडन - गुरुदेव ! आप ये ‘हाय’ दीनानाथ जी के आकस्मिक निधन पर कर रहे हैं या रिवोली में इस वक़्त फ़िल्म – ‘गंगा-जमुना’ लगाए जाने पर?

मेहता जी – ‘गंगा-जमुना’ मैं दस बार देख चुका हूँ.

टंडन - और आज उसे शायद आप ग्यारहवीं बार देखने वाले हैं.’

मेहता जी – अरे दुष्ट ! क्या तू मुझे दीनानाथ जी के समर्थकों से जूते पड़वाएगा?

टंडन – किसी को भी पता नहीं चलेगा. हम लोग अपनी-अपनी मंकी कैप से अपना-अपना मुंह ढक लेंगे. हमको कोई पहचान ही नहीं पाएगा.

ये ग्यारह से दो का शो है. लोगबाग श्मशान घाट से जब लौट रहे होंगे तो हम भी उस भीड़ में शामिल हो जाएंगे.

पर फ़िल्म की टिकट आपकी तरफ़ से होनी चाहिए.

मेहताजी – ‘गंगा-जमुना’ देखने के लिए तो मैं गंगा में या जमुना में,  किसी में भी डूबने को तैयार हूँ.

तू तो मुझ से सिर्फ़ फ़िल्म की टिकटें खरीदवाना चाहता है. 

टंडन – लेकिन हमको यह गुनाह सबकी नज़रों से बचाकर करना है.

मेहता जी – अगर दीनानाथ जी का कोई और भक्त भी इस वक़्त इस सिनेमा हॉल में दिख गया तो?

टंडन – आप ने क्या वो मसल नहीं सुनी? – ‘चोर चोर, मौसेरे भाई.’

जो हमको फ़िल्म देखते हुए पकड़ेगा, क्या वो ख़ुद वहां भजन-कीर्तन करने आया होगा?

मेहता जी – ‘तुम अपना स्कूटर स्टैंड पर खड़ा करो. मैं फ़िल्म की टिकट लेकर आता हूँ.

वैसे ऐसा पाप करते हुए मुझे बहुत शर्म आ रही है.

टंडन – आप क्यों शर्मिंदा होते हैं गुरुदेव?

इसमें सारा कुसूर तो दिलीप कुमार का है.

हमने उनसे थोड़ी कहा था कि वो इस वक़्त अपनी सबसे अच्छी फ़िल्म श्मशान घाट के रास्ते में पड़ने वाले इस सिनेमा हॉल में लगवा लें.

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

धर्म-मज़हब के नाम पर

बदायूं में हुई अमानुषिक घटना के बारे में सुन कर हम सब का दिल दहल गया है.
पाशविकता की हर सीमा को पार करते हुए इन हत्यारे दरिंदों ने भारतीय धर्म-समाज की प्रतिष्ठा को जैसी चोट पहुंचाई है उसका आकलन कर पाना असंभव है.
मेरा उद्देश्य इस घटना के विषय में विस्तार से चर्चा करना नहीं है बल्कि मैं चाहता हूँ कि इस घटना के बाद हम इस बात पर चर्चा करें कि हमारे देश में, हमारे समाज में, धर्म के नाम पर कैसे-कैसे प्रपंच होते हैं और किस तरह से किसी चमत्कार की आशा में भोले किन्तु मूर्ख लोग, महा-मक्कार, महा-छली, बाबाजियों, तांत्रिकों, मौलवियों, पादरियों, ग्रंथियों, फ़क़ीरों, साधुओं, आदि के जाल में फंस कर अपना सब कुछ लुटवा देते हैं.
हमारी पौराणिक गाथाओं में कपटी साधुओं द्वारा भोली भाली स्त्रियों को छलने की अनेक घटनाओं का उल्लेख मिलता है.
साधु के वेश में सीता जी का छल से हरण करने वाले रावण की कथा तो हम सब जानते ही हैं.
दुःख और चिंता का विषय यह है कि छल-कपट की इन पौराणिक गाथाओं को सुनने और पढ़ने के बाद भी हमारे समाज की स्त्रियाँ और बालिकाएं ऐसे कपटियों के छद्म-जाल में फंस जाती हैं.
नारी-जाति की इस आत्मघाती अज्ञानता का मूल कारण हमारे समाज में, विशेष कर, हमारे स्त्री समाज में, व्याप्त अंध-विश्वास है.
क्या हमने कभी सोचा है कि सफलता का शॉर्टकट खोजने की हमारी कमज़ोरी, कितनी बार हमारी बर्बादी का कारण बन जाती है?
कितनी बार हम तन्त्र-मन्त्र, जादू-टोना, झाड़-फूँक, गंडा-ताबीज़ आदि की चमत्कारी शक्ति का झूठा दावा करने वालों से ठगे जाते हैं?
अनपढ़, जाहिल, गंवार और साधनहीन कहलाने वाले तबक़े में व्याप्त अंध-विश्वास की बात तो जाने दीजिए, हमारे तथाकथित सभ्य, सम्भ्रान्त और शिक्षित समाज के अंग-अंग में भी अंध-विश्वास का यह ज़हर बुरी तरह फैला हुआ है.
मुझे याद नहीं पड़ता कि हमारे देश में किस धर्म के अनुयायियों में ढोंगी और पाखंडी धर्म-गुरु नहीं होते हैं.
हम एक आसाराम बापू या एक राम-रहीम या फिर एक निर्मल बाबा खोजने निकलेंगे तो इन जैसे सैकड़ों-हज़ारों पाखंडी, बगला भगत, भारत के हर गली, हर कूचे में, समाधि लगाए या फिर ताक लगाए, बैठे मिल जाएंगे और अगर इन के अंधभक्तों की हम गणना करने बैठ जाएंगे तो हमको कम से कम एक साल तो लग ही जाएगा.
प्राचीन काल में प्रचलित नियोग प्रथा में बहुधा साधु-महात्माओं को ही यह दायित्व दिया जाता था कि वो निसंतान रानियों के सूने आँगन में नन्हे-नन्हे फूल उगाएं.
अपने पूर्वजों की भांति आज भी यह दायित्व यही साधु समाज निभा रहा है.
बदायूं के ढोंगी महंत और उसके मुस्टंडों की शिकार हुई इस प्रौढ़ा के अज्ञान की और उसके परिवार की जहालत की वक़ालत करने वाले उसका या उसके परिवार का कोई भला नहीं करेंगे, बल्कि उन सब के प्रति अन्याय ही करेंगे.
हमको सत्संग, कीर्तन, मजलिस आदि के नाम पर हो रहे कैसे भी अनाचार को रोकना होगा. किसी भी धर्म-गुरु के चमत्कारी दावों पर क़ानूनन प्रतिबन्ध लगाना होगा.
सिर्फ़ स्त्रियों की सभाओं को संबोधित करने वालों पर और उन सभाओं में श्री कृष्ण द्वारा गोपिकाओं के चीर-हरण की या उनकी रास-लीला की कथा को चटखारे ले-ले कर सुनाए जाने पर भी रोक लगानी होगी.
लच्छेदार बातों के ज़रिये हमको ठगने वाले और हमको भ्रमित करने वाले नेतागण या साधुगण एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं इन –
‘विष कुम्भं, पयो मुखं’ वाले सांपों से हमको हमेशा सावधान रहना चाहिए.
आज का अवसरवादी मीडिया इस दुर्घटना को ज़्यादा सनसनीखेज़ शक्ल में पेश कर इसके ज़रिये अपनी बिक्री और अपनी टीआरपी बढ़ाएगा और हर बात को राजनीतिक मोड़ देने वाले हमारे नेतागण इस अमानवीय घटना को भी धर्म-जाति-सम्प्रदाय से जोड़ कर, अपने-अपने स्वार्थ के लिए उसे भुनाने की कोशिश करेंगे.
चंद दिनों तक धर्म-मजहब के नाम पर हो रहे अनाचार के ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी जाएगी लेकिन यह तय है कि इस हत्यारे महंत जैसे तांत्रिकों और चमत्कारी बाबाजियों की दुकानें, हमारी जहालत की वजह से, हमारी काहिली और हमारे नाकारापन की वजह से, पहले की ही तरह से फलती-फूलती रहेंगी. 

आपने-हमने-सबने, देखा-पढ़ा है कि लोगबाग कितने विस्तार से और कितना रस ले-लेकर इस कुकृत्य का सनसनीख़ेज़ वर्णन कर रहे हैं.
निर्भया-कांड से ऐसे हादसों की ऐसी ही रिपोर्टिंग और ऐसा ही कवरेज हो रहा है.
सिर्फ़ सख्त कानून बना कर हमको कुछ हासिल नहीं होने वाला है. हमको अपनी सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक व्यवस्था के ठेकेदारों को बदलना होगा, तभी हम ऐसी आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगा पाएंगे.
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