सोमवार, 25 जनवरी 2021

विंटर वेकेशंस

 

(यह कहानी मेरे बाल-कथा संग्रह 'कलियों की मुस्कान' से ली गयी है. इस कहानी को मेरी दस वर्षीय बेटी गीतिका सुनाती है. इस कहानी का काल 1990 का दशक है)

हमारे अल्मोड़ा में विन्टर वैकेशन्स खूब लम्बी होती हैं। पापा की यूनीवर्सिटी तो विन्टर्स में पचास से भी ज़्यादा दिनों के लिए बन्द होती है। हम अपनी ज़्यादातर छुट्टियां अम्मा-बाबा के साथ लखनऊ में बिताते हैं। कुछ साल पहले तक हम विन्टर वैकेशन्स में उसी तरह से दिन बिताते थे जैसे कि जेल में कैदियों के बीतते हैं। छुट्टियों में भी हमारा टाइम टेबिल बना दिया जाता था। हमारी मस्ती और उछल-कूद पर भी भारी कन्ट्रोल लगाया जाता था। जाड़ों की गुनगुनी धूप जब लिहाफ़ पर पड़ती है तो उसमें सोने का मज़ा कुछ और ही होता है। पर हमारी किस्मत में सिर्फ़ ये सुनना लिखा था -

गीतिका, रागिनी उठो बेटा ! देखो सात बज गए हैं।

इस फर्स्ट वार्निंग बैल को जब हम अनसुना कर देते थे तो पन्द्रह मिनिट बाद दूसरी घण्टी कुछ ज़ोर से बजती थी और उसमें प्यार भरे शब्दों की चाशनी गायब हो जाती थी। दुनिया भर में तीसरी वार्निंग दिए जाने का रिवाज है पर साढ़े सात बजे मम्मी अपने ठन्डे-ठन्डे हाथों से हमको हिला-हिला कर ज़बर्दस्ती बिस्तर पर से उठा देती थीं। तैयार होकर, नाश्ता करके, हम साढ़े आठ बजे तक तो होमवर्क करने के लिए टेबिल पर बैठ भी जाते थे। अब मम्मी-पापा से कौन पूछ सकता था कि वैकेशन्स में घड़ी जैसी फ़ालतू चीज़ पर बराबर नज़र रखने की क्या ज़रूरत थी? वैकेशन्स में सण्डे और मण्डे में फ़र्क किया जाना कहां का इंसाफ़ था? अब सुबह के आठ बजे या नौ, हम बिस्तर छोड़ कर क्यों उठें? जाड़े की सुबह की मीठी नींद तो रसगुल्लों से भी ज़्यादा मीठी होती है पर हमारी किस्मत में उसका स्वाद चखना कहां लिखा था? हमको पता था कि हमारे ऊपर घोर अत्याचार किया जा रहा था पर मम्मी-पापा के गले में सवालों और एक्सप्लेनेशन्स की घण्टी बांधने की हिम्मत किस चूहे में थी? कभी मम्मी मुझको उठाते हुए इतिहास का अपना ज्ञान डिमोन्स्ट्रेट करते हुए कहतीं -

गीतू उठ ! हाफ़-ईयर्ली एक्ज़ाम्स में मैथ्स में तेरे नाइन्टी पर्सेंट मार्क्स ही आए थे। तू दो और दो का जोड़ पाँच करती है। इन छुट्टियों में तुझको मैथ्स का पूरा कोर्स दो बार कवर करना है।

उधर पापा रागू को हिलाते हुए कहते -

रागू साइंस में तेरी पकड़ ढीली हो रही है। चल, फटाफट उठ और गैलीलियो या न्यॅूटन बनने की तैयारी में जुट जा।

हाय ! सुबह-सुबह नाश्ते के टाइम अच्छी-अच्छी आदतें डालने के बारे में उपदेश , फिर दोपहर के खाने के वक्त ढंग से पढ़ाई न करने पर डांट-फटकार और डिनर टाइम पर दिन भर की शरारतों का हिसाब-किताब करके कान-पकड़ाई की धमकियां। वो तो अम्मा-बाबा के बीच-बचाव करने से हम बच्चे सस्ते में छूट जाते थे नहीं तो हमारे बाल-सुधार गृह तक भेजे जाने की नौबत आ सकती थी।

ये छुट्टी भी कोई छुट्टी हुई ! इससे तो स्कूली जेल अच्छी होती थी। मेरा बस चलता तो मैं बच्चों पर सख्ती करने वालों पर भारी जुर्माना लगाती पर होता इसका उल्टा था। मम्मी-पापा के हिटलरी हुक्मों को न मानने पर हमारे मौज-मस्ती के कार्यक्रम कर्टेल कर दिए जाते थे और हमको खाने में दी जाती थीं मूंग की दाल और कद्दू की सब्ज़ी ।

हम दोनों बहनें, सर झुकाकर, अपनी गल्तियां दोबारा न दोहराने का वादा कर, जब अपने काम में जुट जाती थीं, तभी हमको माफ़ी मिलती थी। पापा का मूड जब हमको सैर कराने का होता था तो मम्मी हमारे पेडिंग होमवर्क का हिसाब उनके सामने रख देती थीं और अगर हम अग्नि-परीक्षाओं में खरे उतरे भी तो मम्मी का व्हाट टु डू एण्ड व्हाट नौट टु डू का रिकॉर्ड चालू हो जाता था।

'आइसक्रीम खाने से गला बैठ जाता है, चाकलेट खाने से चूहे दांत कुतर जाते हैं, जंक-फ़ूड खाने से जोंडिस तक हो सकता है।

ये सब सुन-सुन कर हम परेशान और बोर हो गए थे।

मम्मी इन वैकेशन्स में खूब मस्ती करती थीं। घर का काम और हमारे ऊपर हुक्म चलाने के बाद उनके पास जो टाइम बचता था, उसमें वो भरपूर मज़े उड़ाती थीं। उनके शौपिंग के प्रोग्राम्स की तो हम काउण्टिंग तक नहीं कर सकते थे। लखनऊ में उन्होंने अपनी बहुत सी सहेलियां बना ली थीं और उनके साथ वो आए दिन कुछ न कुछ कार्यक्रम बनाती रहती थीं। कभी वो किसी आंटी के घर पहुँच जाती थीं तो कभी कोई आंटी उनसे मिलने हमारे घर आ धमकती थीं। उनकी गपशप, ताश की बाजि़यों और हा, हा, हू, हू के शोर के बीच हम बेचारी दोनों बहनों को मैथ्स, साइंस की पेचीदगियों को सुलझाने में और हिन्दी, इंग्लिश, सोशल स्टडीज़ वगैरा की बारीकियों को समझने में अपना सर खपाना पड़ता था। पापा भी वैकेशन्स के दौरान सभी रूल्स और रेग्युलेशन्स की भी छुट्टी कर देते थे। बिस्तर पर बिना ब्रश किए मोर्निंग टी, फिर बिस्तर पर ही पसर कर अखबार पढ़ना और साथ में टीवी पर ऐसे प्रोग्राम्स देखना जिनको अम्मा-बाबा की कम्पनी में देखने में मज़ा न आता हो। बस हर सुबह पापा का यही रूटीन होता था। अल्मोड़ा में सूर्योदय से बहुत पहले उठने वाले हमारे पापा लखनऊ में तभी बिस्तर पर से उठते थे जब कि हमको उठाने के लिए मम्मी को उनकी सेवाओं की ज़रूरत होती थी।

मम्मी-पापा के अत्याचारों को हम चुपचाप बर्दाश्त कर लेते थे क्योंकि उनसे टकराने का अंजाम हम अच्छी तरह से जानते थे। पर भला हो सोशल स्टडीज़ की मेरी बुक में गांधीजी वाले लैसन का, जिसने हमको सत्याग्रह करना सिखा दिया। इसी सत्याग्रह के बल पर गांधीजी ने हमारे निहत्थे परदादा-परदादियों को ताकतवर अंग्रेज़ों की तोपों और बन्दूकों से लैस फ़ौज से लड़ना सिखाया था। बेचारे पापा ने खुद हमको डिटेल में गांधीजी की स्ट्रैटिजी के बारे में बताया था। उनको क्या पता था कि उनकी बेटियां उन्हीं से प्राप्त ज्ञान का फ़ायदा उठाकर उनके और मम्मी के खिलाफ़ मोर्चा खड़ा कर देंगी। गांधीजी ने गोरों और कालों के लिए अलग-अलग कानून होने के खिलाफ़ जंग छेड़ी थी और हमने घर में बच्चों और बड़ों के लिए एक से कानून बनाए जाने के पक्ष में अपना सत्याग्रह शुरू किया था। जाति-भेद और रंग-भेद के खिलाफ़ लड़ाई को गांधीजी ने जीता था और अब हम उनकी दो नई चेलियां उम्र-भेद के खिलाफ़ किला फ़तह करने वाली थीं।

हमने अपना सत्याग्रह शुरू कर दिया। हमारी मांग थी कि घर में रूल्स और रेग्युलेशन्स सबके लिए एक जैसे होने चाहिए। ये नहीं कि बच्चों के लिए तो कायदे-कानून की सख्त कैद हो और मम्मी-पापा के लिए वैकेशन्स में मौज ही मौज हो। मम्मी-पापा ने हमारे सत्याग्रह पर शुरू में कोई ध्यान नहीं दिया पर जब हमने खाना-पीना तक छोड़ दिया तो उनको हमारी बातों पर गौर करना पड़ा। हमारे बाबा रिटायर्ड चीफ़ जुडीशियल मैजिस्ट्रेट हैं। उन्होंने ही हमारी घरेलू अदालत में जज का रोल निभाया। बाबा का फ़ैसला हमारे पक्ष में गया। अब वैकेशन्स के दौरान हमारे मम्मी-पापा को भी उन नियमों का पालन करना था जो कि उन्होंने हम पर लादे थे।

अगली सुबह हम मम्मी-पापा के जगाने से काफ़ी पहले खुद ही उठ कर तैयार हो गए। मम्मी जब पापा को बैड-टी देने पहुँचीं तो हम उनके सर पर सवार थे। जब तक पापा मम्मी के हाथ से चाय का कप लें, उससे पहले ही रागू ने चाय का कप मम्मी से झटक लिया और वो पापा से बोली -

कान में तिनका, नाक में उंगली मत कर, मत कर, मत कर।

आँख में अन्जन, दांत में मन्जन, नित कर, नित कर, नित कर।।

मैं पापा के टूथब्रश में पेस्ट लगाकर तैयार खड़ी थी। बेचारे पापा को बैड-टी तभी नसीब हुई जब कि उन्होंने अपने बिस्तर पर से उठकर बाकायदा ब्रश किया और अम्मा-बाबा को जाकर नमस्ते कहा। अपनी बेड-टी लेकर पापा बिस्तर पर बैठकर, तकियों के सहारे टिक कर, जब टीवी देखने और अखबार पढ़ने का कम्बाइन्ड प्रोग्राम करने लगे तो हमने उन्हें लाइफ़ में मोर्निंग वाक और एक्सरसाइज़ की इम्पोर्टेंस पर एक अच्छा-खासा लेक्चर पिला डाला। पापा के प्रोटेस्ट करने पर मम्मी ने हमारी साइड लेते हुए उनको उनका ट्रैक-सूट और जूते थमा दिए। एक घण्टे की परेड के बाद जाड़े के दिनों में भी पसीने से लथपथ हमारे पापा को कपड़े चेन्ज करने के बाद नाश्ता नसीब हुआ वह भी बिस्तर पर नहीं बल्कि डायनिंग टेबिल पर।

अम्मा-बाबा की फ़रमाइश पर मम्मी आए दिन नाश्ते और खाने में स्पेशल आइटम्स बनाती रहती थीं। आलू के कटलेट्स, कचौडि़यां और पकौड़ियों पर पापा जमकर टूटते थे। पर अब उनके लिए मुश्किल खड़ी हो गई थी। रागू उनकी कमर नापने के लिए मेज़रिंग टेप और मैं वेइंग मशीन लेकर डायनिंग टेबिल के पास खड़े रहते थे। अगर आइसक्रीम खाने से हमारा गला चौपट हो सकता था और चाकलेट खाने से चूहे हमारे दांत कुतर सकते थे तो क्या पापा को जंक-फ़ूड का पहाड़ हज़म करना सूट कर सकता था? पापा को अपना वेट कन्ट्रोल करने के लिए डॉक्टर्स ने बार-बार कहा था। उनकी दुलारी और रिस्पान्सिबिल हम दोनों बेटियां उनको बदपरहेज़ी कैसी करने दे सकती थीं? विन्टर वैकेशन्स के दौरान अक्सर पापा नहाने से और शेव करने से बचने का बहाना ढूढ़ लेते थे पर अब हमने एक डिसिप्लिन्ड सोल्जर की तरह रोज़ाना टिपटॉप रहने के लिए मजबूर कर दिया था। पापा को नहाने के लिए ज़बर्दस्ती बाथरूम में ढकेलना हमने अपनी ड्यूटी में शामिल कर लिया था।

मम्मी को भी हम बक्शने वाले नहीं थे। अम्मा-बाबा कुछ दिनों के लिए दिल्ली गए हुए थे। पापा भी दो-चार घण्टों के लिए घर से बाहर थे। इस सिचुएशन का फ़ायदा उठाकर दोपहर में मम्मी की कई दोस्त उनके साथ ताश खेलने आ गईं। मम्मी और आंटी लोगों ने हा हा हू हू करके सारा घर आसमान पर उठा लिया था। ताश की बाजी घण्टों चलने वाली थी पर हम दो दारोगा रंग में भंग डालने के लिए वहां पहुँच गए। मम्मी के हाथ से मैंने ताश की गड्डी छीन ली और उनके साथ कमरे में मौजूद सभी आंटियों को ताश खेलने की गन्दी आदत पर एक छोटा सा लेक्चर पिला डाला। मम्मी मुझे आँखें तरेरती रहीं पर मुझ पर इसका कोई असर नहीं हुआ। ताश की गड्डी मेरे ही कब्ज़े में रही। मम्मी और सभी आंटियों को मैंने खाली समय में अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ने की सलाह दी। आण्टियां पैर पटकते हुए हमारे घर से चली गईं और बेचारी मम्मी अपना सर पकड़ कर बैठ गईं।

मम्मी की फ़ोन पर चिपके रहने की बहुत आदत थी। मौसी या अपनी फ्रेंड्स से फ़ोन पर बातें करते वक्त वो घड़ी देखना भूल जाती थीं। पर अब हमने उनकी फ़ोन-वार्ता के दौरान उनको बार-बार घड़ी दिखाना और ज़ोर-ज़ोर से टाइम बताना शुरू कर दिया। मम्मी को कई बार अपनी बात बीच में ही बन्द करके फ़ोन पटक कर भागना पड़ा पर हम अपनी इस ड्यूटी पर पहले की तरह ही मुस्तैद रहे। हमने मम्मी-पापा के लेट-नाइट टीवी देखने के शौक पर भी पाबन्दी लगवा दी।

अर्ली टु बैड एण्ड अर्ली टु राइज़ वाला फ़ार्मूला अपना कर हम अपने मम्मी-पापा को हैल्दी और वाइज़ बनाने में जुट गए।

एक हफ़्ते में ही मम्मी-पापा ने सरेण्डर कर दिया। उनके शान्ति प्रस्ताव को हमने यूं ही नहीं मान लिया। पापा विन्टर वैकेशन्स के दौरान अपनी मर्ज़ी से जि़न्दगी बिताने के बदले में हमारी हर शर्त मानने को तैयार थे पर मम्मी कुछ शर्तों के साथ समझौता करना चाहती थीं। हमको मालूम था कि हम कहां तक अपनी शर्तें मनवा सकते थे इधर हमारे अम्मा-बाबा भी दोनों पार्टियों के बीच दोस्ती कराने की कोशिश में लगे हुए थे। हमने भी मम्मी-पापा से समझौता करने में अपनी खैर समझी। पिछले सात दिनों से मम्मी-पापा को डिसिप्लिन्ड नागरिक बनाने के चक्कर में हम अपना बचपन बिल्कुल भूल ही गए थे।

मम्मी-पापा ने विन्टर वैकेशन्स के दौरान हमारा पढ़ाई का कोटा काफ़ी कम कर दिया। अब रोज़ाना दाल, सब्ज़ी और रोटी खाने की कैद से हम आज़ाद कर दिए गए। छुट्टियों के दौरान हमारी पिकनिक्स और चाट-आइसक्रीम पार्टियों का नम्बर बढ़ा दिया गया। अब हम पापा से कार्टून फि़ल्म दिखाने की फ़रमाइश भी कर सकते थे। हमारी छुट्टियां पहले से ज़्यादा चटपटी और मज़ेदार हो गईं।

सबसे हैरानी की बात ये थी कि अब हमारा होमवर्क पहले से ज़्यादा अच्छी तरह से होने लगा। पापा को फिर से बैड-टी मिलने लगी और मम्मी की किटी पार्टी और ताश की बैठकों में फिर से जान पड़ गई। उनकी लम्बी-लम्बी टेली-कान्फ्रेन्सिंग फिर से चालू हो गईं। अब मम्मी-पापा के बैड पर उन्हीं के साथ अपनी टांगे पसार कर हम टीवी दर्शन और पकौड़ी आहार की जुगलबन्दी का आनन्द लेते हैं।

गांधीजी के सत्याग्रह की कृपा से हमारी छुट्टियों में जान पड़ गई है। अब हम हर साल बेसब्र होकर विन्टर वैकेशन्स में मनमाने ढंग से धमाचौकड़ी करने का इन्तज़ार करते हैं।

 

 

रविवार, 17 जनवरी 2021

जातक कथाएँ

 जातक कथाएं प्राचीन नीतिसाहित्य की अनुपम रचनाएं हैं. इनमें बोधिसत्व के जीवन की अर्थात् भगवान बुद्ध के बुद्धत्व प्राप्त करने से पूर्व के तथा उनके पूर्व जन्मों से सम्बन्धित 547 कहानियां संग्रहीत हैं. जातक कथाओं का पहली बार उल्लेख 380 वर्ष ईसा पूर्व हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के तुरन्त बाद ही उनके भक्तों द्वारा उन्हें लोकगाथाओं के नायक के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा था. इन्हीं लोकगाथाओं ने जातक कथाओं का रूप ले लिया. जातक कथाएं पाली भाषा में हैं जोकि बौद्ध धर्म की मूल भाषा है.

प्रत्येक जातक कथा में मुख्य पात्र बोधिसत्व होता है. बुद्ध होने से पूर्व भगवान बुद्ध, राजकुमार सिद्धार्थ के रूप में तथा अपने समस्त पूर्व जन्मों में बोधिसत्व कहलाते हैं. र्तमान में हुई किसी घटना के सन्दर्भ में स्वयं भगवान बुद्ध अपने भक्तों को अपने पूर्व जन्म से सम्बद्ध कोई कथा सुनाते हैं फिर उस कथा के आधार पर वह कोई न कोई उपदेश देते हैं. सभी कथाएं गद्य में हैं परन्तु उनका अन्त पद्य से होता है जो कि स्वयं भगवान बुद्ध का उद्गार होता है. कथा कहते हुए मुख्य पात्रों को उनके पूर्व जन्म और वर्तमान काल के उनके जन्म से जोड़ा जाता है.

जातक कथाओं ने पंचतन्त्र और ईसप की नीतिगाथाओं को काफ़ी हद तक प्रभावित किया है. अनेक जातक कथाएं ज्यों की त्यों इनमें शामिल कर ली गई हैं. जातक कथाओं में कर्म तथा पुनर्जन्म सिद्धान्त का पोषण किया गया है. अनेक कथाओं में बोधिसत्व मात्र दर्शक होते हैं पर उनको किसी न किसी रूप में कथा में शामिल कर इन कथाओं को जातक कथाओं का स्वरूप दे दिया जाता है. जातक कथाओं का प्रसार उन सभी देशों में हुआ जहाँ कि बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ. जातक कथाओं का संस्कृत में अनुवाद हुआ और बाद में इनका अनुवाद प्राचीन फ़ारसी में भी हुआ. इन दोनों भाषाओं के ज़रिये जातक कथाओं का प्रसार यूरोप में भी हुआ. जातक कथाओं का अनुवाद चीनी भाषा में भी हुआ है. प्राचीन काल में ही तिब्बती भाषा में जातक कथाओं का अनुवाद हो चुका था.

अन्तिम दस जातक कथाएं विस्तृत प्रेमकथाएं हैं. इनमें सबसे अन्तिम जातक कथा - 'वेसान्तर जातक' को म्यामार में नाट्य रूप में दिखाया जाता है.

जातक कथाओं को चित्रात्मक रूप में प्रस्तुत करने की परम्परा बहुत पुरानी है. ईसा पूर्व तीसरी तथा दूसरी शताब्दी में हमें जातक कथाओं की चित्रात्मक प्रस्तुति मिलती है. भरहुत के स्तूप में जातक कथाओं का चित्रण इसका प्रमाण है. दीवालों को उकेर कर मूर्तियों के रूप में तथा चित्र बनाकर जातक कथाओं को प्रस्तुत किया गया है. अजंता की गुफ़ाओं में अनेक जातक कथाओं को चित्रित किया गया है.

अजंता की गुफ़ा-1 में शिवि जातक की कथा का चित्रांकन किया गया है.

राजा शिवि के दान की कथा का वर्णन सर्वप्रथम महाभारत में मिलता है.

राजा शिवि की दानशीलता प्रसिद्ध थी. अग्नि और इन्द्र ने उनकी दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए कपोत का रूप धारण किया. एक बाज उनका पीछा कर रहा था. दोनों कपोत जान बचाकर राजा शिवि की गोद में जा छुपे. बाज भी उनका पीछा करता हुआ राजा के पास पहुँच गया. बाज ने जब राजा से अपना शिकार वापस माँगा तो राजा ने शरणागत कपोतों के बदले उनके वज़न के बराबर अपना माँस देने का प्रस्ताव रक्खा जो कि बाज ने स्वीकार कर लिया. दोनों कपोतों को तराजू के एक पलड़े में बिठाया गया और दूसरे पलड़े में राजा शिवि अपनी जाँघ से माँस काट-काट कर रखते रहे पर कपोतों वाला पलड़ा झुका ही रहा. अन्त में राजा शिवि खुद ही तराजू के पलड़े में बैठ गए. कपोतों की जान बचाने के लिए राजा शिवि का यह त्याग देखकर अग्नि और इन्द्र अपने असली रूप में आ गए और उन्होंने राजा को पहले जैसा बना कर उनकी दानशीलता की भूरि-भूरि प्रशंसा की.

चंपेय्य जातक की कथा बड़ी रोचक है. नागराज चंपेय्य के रूप में बोधिसत्व अपने विलासी जीवन से ऊब कर तप करने की इच्छा से मनुष्य लोक में जाकर एक बांबी में रहने लगे. एक संपेरे ने उन्हें पकड़ लिया और वह उन्हें नचा-नचा कर अपनी जीविका चलाने लगा. नागराज चंपेय्य की रानी सुमना अपने स्वामी नागराज चंपेय्य के विरह में दिन-रात रोती रहती थी. एक बार जब वाराणसी के राजा उग्रसेन के दरबार में संपेरा बोधिसत्व नागराज चंपेेय्य को को नचा रहा था तो नागरानी सुमना ने राजा से प्रार्थना करके नागराज चंपेय्य को मुक्त करा लिया. कृतज्ञ चंपेय्य राजा उग्रसेन को नागलोक ले गया और वहाँ एक सप्ताह तक उनका खूब सत्कार किया और उन्हें विदा करते समय उसने उन्हें उपहार में प्रचुर मात्रा में धन-सम्पत्ति देकर विदा किया.

आर्यशूल की जातक माला में हस्ति जातक की कथा दी गई है. एक जन्म में बोधिसत्व शक्तिशाली हाथी थे. वो जंगल में अकेले रहते थे. एक दिन बोधिसत्व ने किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी तो उन्होंने रुदन की आवाज़ की ओर प्रस्थान किया. वहाँ जाकर उन्होंने देखा सात सौ यात्रियों का समूह भूख और प्यास से तड़प रहा है. विशाल हाथी को अपनी ओर आते देखकर यात्री भयभीत हो गए पर हाथी-योनि वाले बोधिसत्व ने उनका भय दूर करके उनके कष्ट का कारण जानना चाहा. यात्रियों ने उन्हें बताया कि वे अपने राजा द्वारा निष्कासित एक हज़ार लोगों में से जीवित बचे हुए हैं पर जल्द ही वो भी भूख से मरने वाले हैं. बोधिसत्व ने यात्रियों से कहा कि यदि वो झील के पास पर्वत की ओर जाएंगे तो उन्हें एक मृत हाथी मिलेगा. इस हाथी का माँस खाकर वे अपनी भूख मिटा कर अपनी शेष यात्रा पूरी कर सकते हैं. यात्रियों को पर्वत की ओर रवाना करके बोधिसत्व दूसरे रास्ते से उनसे पहले ही वहाँ पहुँच गए और उन्होंने पर्वत से कूदकर अपनी जान दे दी. यात्री जब पर्वत के पास पहुँचे तो उन्होंने उस मृत हाथी को पहचान लिया. हाथी के त्याग के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए यात्रियों ने उसका माँस खाकर अपनी भूख मिटाई और झील का पानी पीकर अपनी शेष यात्रा पूरी की.

विश्वंतर जातक कथा राजा हरिश्चन्द्र के त्याग पर आधारित है. एक बार बोधिसत्व राजा विश्वंतर के रूप में जन्मे थे. विश्वंतर बड़े दानी थे. उनकी दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए इन्द्र ने लीला रची. एक बार विश्वंतर ने अपने राज्य के हाथी को दान में दे दिया. इस हाथी की विशेषता यह थी कि वह अपनी इच्छानुसार वर्षा करा सकता था. इस कारण राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था पर इस हाथी को राजा द्वारा दान में दिए जाने के बाद राज्य में वर्षा नहीं हुई और उस हाथी के अभाव में यह अनावृष्टि शीघ्र ही अकाल में बदल गई. क्रुद्ध जनता ने राजा को सपरिवार राज्य से निष्कासित कर दिया. राजा को अपनी दानशीलता की परीक्षा देते हुए अपने धन से हाथ धोना पड़ा और उन्हें अपने बच्चे और अपनी पत्नी सभी को बेचना पड़ा. पर वह अपनी दानशीलता की हर परीक्षा में खरे उतरे और इन्द्र ने उनकी दानशीलता से प्रसन्न होकर उनका परिवार, उनका खोया हुआ वैभव और उनका राज्य उन्हें वापस कर दिया.

शरभ जातक की कथा अत्यन्त मार्मिक है. बोधिसत्व एक जन्म में शरभ नामक हरिण थे. वह जंगल में रहते थे । एक बार वाराणसी का राजा उनका शिकार करने के उनका पीछा करता हुआ एक गहरे गड्ढे में जा गिरा. शरभ हरिण को शिकारी राजा की दशा देखकर उस पर दया आ गई.उसने पहले अपनी पीठ पर पत्थर ढो-ढो कर वज़न उठाने का अभ्यास किया फिर उसने राजा को गड्ढे में से निकाला और उसे अपनी पीठ पर लादकर उसे सुरक्षित उसके घर तक पहुँचा दिया.

क्रक्ष जातक में एक रीछ के रूप में जन्मे बोधिसत्व एक शिकारी के जाल में फँसे मृग की रक्षा करने में अपने प्राणों की आहुति दे दी.

भगवान बुद्ध के महाभिनिष्क्रमण ( गृहत्याग) की कथा भी जातक कथा के रूप में दी गई है -

राजा शुद्धोधन ने बोधिसत्व राजकुमार सिद्धार्थ की वैराग्य की भावना को देखकर उनके मन में विलास की भावना जगाने के लिए उन्हें सुन्दरियों से घेर दिया. ये सुन्दरियां रात-दिन राजकुमार को अपनी कला से लुभाती रहती थीं. राजकुमार भी उनके रूप और उनकी कला के प्रशंसक होने लगे थे. पर एक रात राजकुमार ने अपने पास असावधान रूप से सो रही सुन्दरियों को देखा तो उनका बिना सजा-सँवरा रूप देखकर उन्हें बड़ी विरक्ति हुई. उनके मन में विलासिता के प्रति घृणा उत्पन्न हुई और उन्होंने गृहत्याग का निश्चय किया. उन्होंने अपने सारथी छन्न को जगाकर रथ तैयार करने के लिए कहा. गृहत्याग से पहले उन्होंने अपने पुत्र राहुल और पत्नी यशोधरा को अन्तिम बार देखना चाहा. सोते हुए राहुल और यशोधरा को द्वार के बाहर से बोधिसत्व ने देखा, पुत्र को देखकर एक क्षण के लिए उनके मन में मोह जागा पर उन्होंने अपने मन की इस दुर्बलता पर विजय प्राप्त की और फिर शान्त मन से गृहत्याग करके उन्होंने छन्न के साथ वन के लिए प्रस्थान किया.

जातक कथाओं ने हमारे भारतीय साहित्य और संस्कृति को तो प्रभावित किया ही है, साथ ही साथ इसने विश्व के अन्य देशों के साहित्य और आख्यान कथाओं को भी काफ़ी हद तक प्रभावित किया है.

जातक कथाओं को चित्रों और मूर्तियों में भी प्रस्तुत किया गया है. अजंता के अधिकांश चित्र जातक कथाओं पर ही आधारित हैं.

कथाओं के माध्यम से पाठकों को उपदेश देने की प्रथा बड़ी प्राचीन है परन्तु जातक कथाओं ने इस परम्परा को और भी अधिक विकसित किया.

जातक कथाएं पाली गद्य साहित्य की सर्वश्रेष्ठ और सबसे अधिक लोकप्रिय रचनाएं हैं. ये कथाएं हमारे जीवन में रच-बस गई हैं और हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई हैं. जातक कथाएं प्राचीन भारत के साहित्यिक उत्कर्ष का प्रमाण हैं.