रविवार, 17 नवंबर 2019

मौसमी मुर्गा


मौसमी मुर्गा –

1.    क्या विभीषण, मीर जाफ़र या कि हों जयचंद जी,
     सर कढ़ाई में इन्हीं का, उँगलियों में, इनके घी.  

2.    मेरे अफसानों में तेरा, ज़िक्र जब कभी आएगा,

    जहाँ कहीं हो, हर दल-बदलू, सज्दे में, झुक जाएगा.

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

मम्मी का मोल

नेहा की मज़ेदार ज़िन्दगी देखकर उसकी दोनों बेटियों नीतू और प्रीतू को खूब जलन हुआ करती थी. न स्कूल जाने का झंझट, न होम-वर्क का सरदर्द, न एक्ज़ाम्स में कम-ज़्यादा नम्बर्स आने की चिन्ता, न बड़ों की डांट-फटकार का डर. वाह ! क्या चैन की लाइफ़ थी. इधर बच्चियों को अपने पॉकेटमनी में ज़रा सा भी इन्क्रीमेन्ट लगवाना हो तो उन्हें घण्टों मम्मी-पापा की खुशामद करनी पड़ती थी और उधर उनकी मम्मी के खर्चों का हिसाब ही नहीं था. डॉक्टर मेहता का दावा था कि शॉपिंग के लिए तो नेहा हफ़्ते में कम से कम सात बार तो मार्केट जाती ही थी. बेचारे पतिदेव को अपनी श्रीमतीजी की शॉपिंग का हिसाब करने के लिए कैलकुलेटर की मदद लेनी पड़ती थी. नीतू और प्रीतू की तरह उनके पापा भी नेहा की आरामदायक ज़िन्दगी और अपने व्यस्त जीवन की तुलना कर के आहें भरा करते थे. जब डॉक्टर मेहता यूनीवर्सिटी जाने की तैयारी किया करते थे तो नेहा उन्हें चाय-नाश्ता देते वक़्त मज़े से एफ. एम. रेडियो पर बज रहे पुराने गानों के साथ गुनगुनाया करती थी और जब वो क्लास में अपने स्टूडेन्ट्स को साहित्य की बारीकियां सिखा रहे होते थे तो चाय पीने के बाद नेहा की दोपहर, बिस्तर पर लेटकर आराम करने में बीता करती थी. रात के खाने के बाद उसके पतिदेव जब अगले दिन का लेक्चर देने की तैयारी के लिए मोटी-मोटी किताबों में अपना सर खपाया करते थे तब वह या तो टीवी पर अपनी पसन्द का कोई सीरियल देखती थी या फ़ोन पर अपनी फ्रेंड्स के साथ गप्पें मारा करती थी.
परिवार के तीनों दुखीजन को नेहा का यह डायलौग बहुत बुरा लगता था - ‘ मुझे तो घर के कामकाज की वजह से दम मारने की भी फ़ुर्सत नहीं मिलती.’ प्रीतू जब छोटी थी तो वो कहा करती थी कि वो बड़ी होकर मम्मी बनेगी ताकि वो दिन भर आराम करती रहे. नीतू को भी मम्मी की साड़ियां, उनकी ज्वेलरी और कास्मेटिक्स्स के सामान देखकर बड़ी जलन होती थी. नेहा को गिफ़्ट्स भी खूब मिला करते थे. उसके पतिदेव जब मूड में होते थे तो बच्चों को मिला करती थी चाकलेट और उसे मिलती थी साड़ी. हर छोटे-बड़े गृह-युद्ध के बाद रूठी हुई नेहा को मनाने के लिए उसके पतिदेव की तरफ़ से जब शान्ति प्रस्ताव आता था तो उसके साथ उसके के लिए तोहफ़ा ज़रूर हुआ करता था.
नेहा जब घर के काम का रोना रोती थी तो उसके पतिदेव का प्रवचन शुरू हो जाता था -
‘ घर का काम होता ही कितना है? आजकल तो घर का हर काम मशीनें करती हैं. तुम तो गैस पर खाना बनाती हो, मिक्सी पर दाल-मसाले पीसती हो, ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन से कपड़े धोती हो.’
अपने पापा की इस दलील में बच्चों को भी बहुत दम नज़र आता था. घर में बर्तन-झाड़ू करने के लिए एक आमा आती थीं. नेहा अक्सर उन्हें अपनी पुरानी साड़ियां, उनकी बेटियों के लिए बच्चियों के पुराने कपड़े दे दिया करती थी और वो खुश होकर घर के काम में उसका हाथ बटा दिया करती थीं.
बच्चे दिन-रात पढ़ाई में जुटे रहते थे पर अगर वो मौज-मस्ती के नाम पर कभी-कभार टीवी के सामने एकाद घण्टे बैठ गए या साइना नेहवाल बनने की कोशिश में कुछ ज़्यादा ही बैडमिन्टन खेल आए तो फिर उनको अपनी मम्मी का एक लम्बा लेक्चर ज़रूर सुनना पड़ता था. अक्सर बच्चे अपनी मम्मी के सामने अपने पापा का ईजाद किया हुआ ये नारा लगाते थे –
‘ बाकी सबको काम और टेंशन, मम्मी को बस, आराम और पेंशन.’
नीतू-प्रीतू सपना देखते थे कि मम्मी चली गई हैं और वो दिन चढ़ने तक आराम से अपने बिस्तर पर सो रहे हैं. कोई ज़बर्दस्ती उन्हें गरम-गरम लिहाफ़ में अपने ठन्डे-ठन्डे हाथ डाल कर जगा नहीं रहा है. खाने में बच्चों को ज़बर्दस्ती मूंग की दाल और लौकी की सब्ज़ी नहीं खिलाई जा रही है और न ही छुट्टी के दिन भी होम-वर्क के बहाने देर तक उनको टीवी देखने से रोका जा रहा है. पर सपने कभी सच भी हो जाया करते हैं. नेहा को अपने मायके में दो शादियां अटेन्ड करनी थीं. उसको कुल पन्द्रह दिन बाहर रहना था. पर नेहा को बच्चों की पढ़ाई की चिन्ता थी और घर की व्यवस्था की फ़िक्र. पर उसके पतिदेव और बच्चों ने उसे भरोसा दिलाया कि कि उसकी गैर हाज़िरी में सब कुछ ठीक होगा. बच्चों ने उससे वादा किया कि वो जमकर पढ़ाई करेंगे और उसके पतिदेव ने भरोसा दिलाया कि वो घर को चकाचक रखेंगे. नेहा ने डॉक्टर मेहता की और नीतू-प्रीतू की बातों पर भरोसा कर के घर उनके जिम्मे पर छोड़ कर अपने मायके को प्रस्थान किया.
अपनी मम्मी के जाने के बाद नीतू-प्रीतू स्कूल से लौटे तो घर में बिल्कुल शान्ति थी. मम्मी की चीख-पुकार की उन्हें कुछ ऐसी आदत पड़ गई थी कि उनसे डांट खाए बिना उन्हें खाना हज़म ही नहीं होता था. ख़ैर भोजन तो करना ही था. पर खाना था कहां? डायनिंग टेबिल पर उनके पापा के हाथ का एक नोट रखा था जिसमें लिखा था -
‘ प्लीज़ ! इस समय खाने की जगह बिस्किट्स, वैफ़र्स और फलों
का सेवन कीजिए. शाम को आपका डिनर आपके मन-पसन्द रैस्त्रां में होगा.’
बच्चों की तो बाछें खिल गईं. टीवी देखते हुए उन्होंने अपना अनोखा लंच लिया. शाम को बच्चे अपने पापा के साथ अपने मन-पसन्द रैस्त्रां गए. अब तक बेचारे बच्चे रोज़ाना अपनी मम्मी के हाथ का बना खाना ही निगलने के लिए मजबूर थे. पर अब उनकी चांदी होने वाली थी. डॉक्टर मेहता ने बच्चों की पसंद की चटपटी डिशेज़ का ऑर्डर किया.
शाही पनीर की खूबसूरत सब्ज़ी का एक चम्मच ही बच्चों के मुंह में गया था कि वो हाय, हाय करते हुए गिलास पर गिलास पानी पी गए. दाल-मखानी में भी दाल और मिर्च की क्वैन्टिटी लगभग बराबर थी और पुलाव में काली मिर्च का अम्बार लगा हुआ था. जैसे तैसे रायते के साथ कड़ी-कड़ी तन्दूरी रोटियां खाकर बच्चों ने अपना पेट भरा.
बच्चों का होम-वर्क उनके लिए कम और उनकी मम्मी के लिए ज़्यादा बड़ा सरदर्द होता था. बच्चों के स्कूल से लौटते ही उनकी मम्मी उनके सर पर सवार होकर उनसे उनका होम-वर्क कम्प्लीट करवाती थीं और उसके बाद ही उनको टीवी देखने या कोई और मस्ती करने की परमीशन देती थीं. ज़रूरत पड़ने पर वो सब्ज़ी काटते हुए या रोटी बनाते-बनाते हुए उनके होमवर्क में उनकी थोड़ी-बहुत हैल्प भी कर दिया करती थीं. डॉक्टर मेहता हमेशा नेहा को बच्चों पर सख्ती करने के लिए टोकते रहते थे. बच्चों को अपनी मम्मी की तुलना में अपने पापा की हर बात में दम नज़र आता था. पर अब उनकी मम्मी की गैर-हाज़री में उनका होम-वर्क उनके लिए बड़ा सर-दर्द बनकर सामने खड़ा हो गया था. डॉक्टर मेहता यूनीवर्सिटी से लौटकर आते तो उनके पास बच्चों की प्रौब्लम्स सॉल्व करने के लिए न तो टाइम था और न ही इस काम में उनकी कोई दिलचस्पी होती थी. बच्चों की रेडी-रिफ़रेन्स बुक, यानी उनकी मम्मी तो अपने मम्मी-पापा के यहां जाकर मज़े कर रही थीं और यहां बच्चे बेचारे रोज़ाना होम-वर्क कम्प्लीट न करने की वजह से अपने टीचर्स की डांट खा रहे थे.
नेहा के जाने के बाद 4-5 दिनों तक घर में कपड़े नहीं धुले थे. गंदे कपड़ों का एक पहाड़ तैयार हो गया था. आख़िरकार डॉक्टर मेहता ने वाशिंग मशीन से बच्चों के कपड़े धोने का प्लान बनाया. कपड़ों का ढेर वाशिंग मशीन के हवाले कर दिया गया. बस ज़रा सी गड़बड़ ये हुई कि सफ़ेद कपड़ों के साथ कुछ नए रंगीन कपड़े भी वाशिंग मशीन में डाल दिए गए. बुरा हो औरेंज और ग्रीन ड्रेसेज़ का जिन्होंने बच्चों की व्हाइट ड्रेसेज़ को तिरंगा बना दिया. शनिवार को मजबूरन बच्चों को इन तिरंगे कपड़ों को ही पहन कर जाना पड़ा. उनकी प्रिंसिपल उनको देखते ही बोल पड़ीं –
‘ क्यों भाई! अभी इण्डिपेन्डेन्स डे में तो बहुत दिन बाकी हैं तुम दोनों बहने तिरंगे फहराती हुई क्यों आ रही हो?’
बेचारी प्रीतू को एक बार और सबकी मज़ाक का शिकार होना पड़ा. एक दिन उसका स्कर्ट ज़रा सा उधड़ गया था, वो अपने पापा के पास उसे सिलवाने के लिए पहुंच गई पर उसके पापा को सिर्फ़ सूई चुभोना आता था, उससे कुछ सिलना नहीं. उन्होंने स्टैपलर लेकर प्रीतू की उधड़ी स्कर्ट को टिपटॉप बना दिया. प्रीतू स्कूल पहुंची तो सबने उसकी खूब हंसी उड़ाई.
बच्चों के बिना बताए ही पूरी कॉलोनी को और उनके स्कूल वालों को मालूम पड़ गया कि उनकी मम्मी कहीं बाहर चली गई हैं. नेहा के हर काम को हल्का-फुल्का मानने वाले डॉक्टर मेहता को भी अब दाल-आटे का भाव मालूम पड़ रहा था. प्रीतू को अपनी मम्मी से लिपट कर सोने की आदत थी. अब उसका शिकार उसके पापा बने. डॉक्टर मेहता अपनी सोती हुई बिटिया की बाहों के फन्दे से अपनी गर्दन छुड़ाते तो उसकी टांगे उनके पेट पर आ जातीं. आखिरकार पिताश्री ने बिस्तर का त्याग कर सोफ़े पर रात बिताना ठीक समझा और प्रीतू रात भर ‘ मम्मी-मम्मी ’ कहकर सुबकती रही.
अपने पापा से नीतू-प्रीतू के ताल्लुक़ात अब तक काफ़ी खराब हो गए थे. आमा के हाथ का रूखा-सूखा खाना खा-खा कर बच्चे बोर हो गए थे. बच्चों को अब अपनी मम्मी के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. मम्मी की टोका-टोकी और डांट-फटकार की उनको बहुत याद आ रही थी पर अभी उनके अल्मोड़ा लौटने में पूरे सात दिन बाकी थे. पर लगता था कि उनके पापा को उनकी मम्मी की कमी बिलकुल भी महसूस नहीं हो रही थी. पिछली शाम से तो वो मस्ती भरे पुराने गाने भी गुनगुना रहे थे.
अगली शाम को बच्चियां अपना होम-वर्क कर रहे थीं कि दरवाज़े पर कॉल बेल बजी. उन्होंने देखा कि उनकी मम्मी बहुत परेशान सी खड़ी हैं. नेहा ने घबराहट भरी आवाज़ में नीतू से पूछा-
‘ अब प्रीतू का टैम्पे्रचर कितना है?’
मम्मी की आवाज़ सुनकर प्रीतू दौड़ कर उनके पास आ गई. अपने सामने भली-चंगी प्रीतू को देखकर वो खुश होने के बजाय अपनी नज़रें चुराते हुए अपने पतिदेव से भिड़ गईं. उसने उनसे पूछा –
‘ क्योंजी आपने मुझे प्रीतू की बीमारी की झूठी खबर क्यों दी?’
डॉक्टर मेहता ने कोई जवाब नहीं दिया. अब बच्चों को अपने पापा की करतूत पता चल चुकी थी और कल रात से उनके मस्ती भरे गाने गुनगुनाने का राज़ भी मालूम हो चुका था. प्रीतू अपनी मम्मी से लिपट कर बोली –
‘ मम्मी ! पापा ने आपके पीछे हमको बहुत परेशान किया. अब आप हमको छोड़ कर कभी नहीं जाइएगा.’
नीतू को भी मम्मी के गले लगकर रोने में आज कोई शर्म नहीं आ रही थी. दोनों बहनों को अपनी मम्मी का मोल पता चल चुका था. बच्चों के सर पर हाथ फेरते हुए अचानक नेहा अपने पतिदेव को देखकर खिलखिला कर हंस पड़ी. वो बेचारे भी उससे गले लगकर रोने के लिए बच्चों के पीछे लाइन में खड़े थे.

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

इक दिन ऐसा आएगा



मुफ़लिस की बेबसी पर

तू जन-सभा में बोला

संसद-भवन में बोला

टीवी पे जा के बोला

तू रेडियो में बोला  

अखबार में भी बोला

सपनों में झूठ बोला

जागा तो झूठ बोला

मंदिर में झूठ बोला

मस्जिद में झूठ बोला

कितनों को मार खाया

ये सच कभी न बोला  

बन कर गरीब-परवर  

उनके हुकूक बेचे

जो ख्वाब थे सुहाने

वो तोड़-तोड़ बेचे

बचपन था उन से छीना  

फिर बेच दी जवानी

जिस में घना अँधेरा

ऐसी लिखी कहानी

इंसानियत का परचम

फहरा रहा सदा तू

मेहनतकशों के हिस्से

का सब उड़ा रहा तू

तू घर जला के उनके   

बंसी खड़ा बजाए

नीरो नहीं कन्हैया

भक्तों में पर कहाए

जिन जाहिलों ने तुझको

अपना समझ चुना है

सुरसा सा खोल कर मुंह   

उनको समूचा खाए

ये इंद्रजाल तेरा

इक दिन तो टूटना है

पापों का तेरा भांडा

इक दिन तो फूटना है  

थूकेंगे तेरे अपने  

तुझ पर इसी ज़मीं पर

तू जीते जी मरेगा

इक दिन इसी ज़मीं पर

खाए फिर न धोखा 

मासूम इस ज़मीं पर

नीलाम अस्मतों का

फिर हो न इस ज़मीं पर

फिर बाज का ही जलवा  

होगा न आसमां में

इंसाफ़ भेड़ियों का  

होगा न दास्ताँ में

हिर्सो-हवस की ज्वाला  

सुलगे न फिर दिलों में

नफ़रत के नाग सारे

घुस जाएं ख़ुद बिलों में

ज़ालिम शिकस्त पाए   

पर्वत हो या हो घाटी 

आएगा दौर ऐसा

रौंदे कुम्हार माटी

आएगा दौर ऐसा

रौंदे कुम्हार माटी ----

सोमवार, 28 अक्तूबर 2019

मजबूरियां - 2

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा, नहीं होता.
बशीर बद्र 
कुर्सी बिन सब सून - 
दांव पर कुर्सियां, लगी होंगी,
यूँ कोई, बात से नहीं फिरता.    

मजबूरियां - 1


तेरी मजबूरियां दुरुस्त मगर,

तूने वादा किया था, याद तो कर.

नासिर क़ाज़मी

हरयाणा-महाराष्ट्र समाचार –

तेरी मजबूरियां दुरुस्त मगर,

तू वंशवाद मिटाने की बात, याद तो कर.



रविवार, 20 अक्तूबर 2019

खीरगति

मूलतः मारवाड़ी बोहरे जी का परिवार पिछली तीन पीढ़ियों से हाथरस में रह रहा था. बोहरे जी का धंधा ब्याज पर रूपये उधार देना था. उनके ग्राहकों में गरीब तबक़े के लोग ज़्यादा हुआ करते थे. इन बिना-पढ़े मासूम लोगों से बोहरे जी बिना कोई ज़मानत लिए उधार देकर उन से उस पर मोटी ब्याज वसूला करते थे.
हमारे परदादा बोहरे जी के सर-परस्त थे. परदादा जी के कई मुलाज़िम भी बोहरे जी के उधारी के जाल में फंसे हुए थे. हमारे परदादा जी की हवेली पर जग-प्रसिद्द पेटू बोहरे जी को आए दिन दावत पर बुलाया जाता था. इसका कारण था कि हमारे परदादा को पेटूपने में बोहरे जी की रिकॉर्ड-तोड़ परफ़ॉरमेंस देखना बहुत अच्छा लगता था. यह बात और थी कि गोलमटोल बोहरे जी का अपनी हवेली में प्रवेश होते देख परदादी हर बार बड़बड़ाती थीं–
‘आय गयो कम्बखत, नासपीटो, मरभुक्खौ, भोजन-भट्ट !’
हाथरस में बोहरे जी का धंधा थोड़ा मंदा हो चला था लेकिन उनके कुछ रिश्तेदार पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसी धंधे में अच्छा पैसा बना रहे थे. हमारे बाबा उन्हीं दिनों में रूड़की के इंजीनियरिंग कॉलेज से सी. ई. का डिप्लोमा उत्तीर्ण करके गोंडा में डिस्ट्रिक्ट इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए थे. अपने रिश्तेदारों की मौजूदगी और अपने सर-परस्त हमारे परदादा जी के बेटे की गौंडा में नियुक्ति ने बोहरे जी को गौंडा में अपना धंधा चलाने के लिए प्रेरित किया.
शुरू-शुरू में बोहरे जी अपना परिवार हाथरस में छोड़कर अकेले ही गौंडा गए थे. हमारे बाबा ने चैंपियन भोजन-भट्ट बोहरे जी को अपने बंगले में रहने की जगह नहीं दी. बेचारे बोहरे जी ने एक धर्मशाला में टिकने का इंतजाम किया और खाने के लिए पांडे भोजनालय वालों से बात कर ली. सस्ता ज़माना था, पांडे जी ने दो रूपये महीने में दोनों वक़्त का भरपेट खाना खिलाने का उनसे करार कर लिया. बोहरे जी ने अपनी अंटी से चांदी के दो रूपये निकाल कर पांडे जी को एक महीने का एडवांस दे भी दिया.
दिन को और शाम को खाना तैयार होते ही पांडे भोजनालय में पहुँचने वाले पहले ग्राहक बोहरे जी ही हुआ करते थे. दो-तीन दर्जन रोटियां, पतीली भर के दाल, सात-आठ बार सब्ज़ी का ढेर और तीन-चार बार चावल का पहाड़ परोसते-परोसते, परोसने वाले थक जाते थे लेकिन बोहरे जी के मुख से संतुष्टि की डकार नहीं सुनाई पड़ती थी.
बेचारे पांडे जी तो वचन-बद्ध थे, वो अपना क़रार तोड़ भी तो नहीं सकते थे. खैर जैसे-तैसे एक महीना बीता. बोहरे जी ने एक बार फिर अपनी अंटी से चांदी के दो रूपये निकाल कर जब पांडे जी के हाथ में रकम रखनी चाही तो उन्होंने हाथ जोड़ दिए और फिर अपनी संदूकची से दो चांदी के रूपये निकालकर उल्टे उन्हीं के हाथ पर धर कर अपने हाथ जोड़ कर कहा –
‘सेठ जी, आप गौंडा में हमारे मेहमान थे. मुझे खाना खिलाने के आप से रूपये नहीं लेने चाहिए थे. मैं ये दो रूपये आपको लौटा रहा हूँ. अब आप कोई और भोजनालय तलाश कर लीजिए. अगर आप मेरे भोजनालय पर ही खाते रहे तो मुझे सुदामा पांडे की तरह भिक्षा मांगने को मजबूर होना पड़ेगा.’
बोहरे जी को अपने लिए भर-पेट खिलाने वाला कोई दूसरा भोजनालय तलाशने में कोई सफलता नहीं मिली. गौंडा जैसे छोटे शहर में किसी भी भोजनालय में पहुँचने से पहले ही उनके पेटूपने की ख्याति वहां पहुँच जाती थी. इधर धर्मशाला वालों ने भी बोहरे को कमरा खाली करने को कह दिया था.
बोहरे जी को अस्थायी तौर पर हमारे बाबा की शरण में जाना पड़ा. बाबा के बंगले में बोहरे जी के लिए तो बहुत जगह थी लेकिन हमारी अम्मा के दिल में उनके लिए बिल्कुल भी जगह नहीं थी. महाराजिन ने हमारी अम्मा को नोटिस दे दिया था कि वो रोज़ाना बोहरे जी के लिए दो सेर आटे की रोटियां, कढ़ाई भर सब्ज़ी और पतीला भर दाल नहीं बना पाएगी. बोहरे जी की एक और हरक़त अम्मा को क़तई गवारा नहीं थी. उन दिनों बंगले के खेत में मटर लगी हुई थी और बोहरे जी खेत में घुसकर हरी मटर तोड़-तोड़ कर खाने में खुली गाय-भैंस की तरह सारा खेत चरे जा रहे थे. अम्मा के असहयोग आन्दोलन के कारण बाबा ने एक हफ़्ते में ही इस शरणार्थी को कोई और ठिकाना तलाश करने को कह दिया.
अब अगर बोहरे जी को गौंडा में रहकर अपना कारोबार जमाना था तो उन्हें अपने रहने की वहां कोई स्थायी व्यवस्था तो करनी ही थी. हमारे बाबा ने उनके लिए एक सस्ते मकान का जुगाड़ करवा दिया. मकान मिलने के बाद बोहरे जी हाथरस जाकर अपने सामान समेत अपना परिवार गौंडा ले आए.
हमारी अम्मा जैन होने के बावजूद नवरात्रि पर नौ कन्याओं को घर बुलाकर भोजन कराती थीं. बोहरे जी की छोटी बेटी अविवाहित थी. अम्मा ने बोहरे जी से कह कर उसे भी निमंत्रण दे दिया. कन्याओं को भोजन कराने से पहले अम्मा ने उनके सामने केलों की टोकरी रख दी. कुछ देर बाद उनके लिए भोजन आया तो केले की टोकरी खाली पाई गयी. अम्मा ने महाराजिन से पूछा –
‘महाराजिन, इस टोकरी में से केले कहाँ गए? क्या तुमने उठाकर फिर से भंडार-घर में रख दिए?
बोहरे जी की बिटिया ने केले गायब होने का रहस्योद्घाटन किया –
‘भाभी, बे सगरे केला तो हम खाय गए.’
(भाभी, वो सब केले तो हमने खा लिए)
दो दर्जन केले एक नन्हीं सी जान के पेट में पांच मिनट के अन्दर कैसे समा सकते हैं, इस पर विचार करते-करते अम्मा का सर चकराने लगा. फिर उन्होंने संभल कर अपनी इस छोटी सी ननदिया से पूछा –
‘केले तो तुमने खा लिए. अच्छा किया ! पर उनके छिलके कहाँ गए?’
छोटी सी ननदिया ने अपने घर का राज़ खोलते हुए कहा –
‘हमाई अम्मा तो केला छील कै खात ऐं पै हम औ बाबू तो छिलकई सुन्दा हप्प !’
(हमारी माँ तो केला छील कर खाती हैं लेकिन हम और बाबू तो छिलके सहित उनको हप्प कर जाते हैं)
बोहरे जी की बिटिया ने शेष आठ कन्याओं के कुल भोजन से थोडा ज़्यादा ही भोजन कर के अपना आसन छोड़ा. बाबा ने थकी और परेशान अम्मा को सांत्वना देते हुए कहा –
‘भागवान ! बोहरे जी की बिटिया को भोजन कराने से ही तुमको नौ कन्याओं को भोजन कराने का पुण्य मिल गया है. आज तो तुमने सत्रह कन्याओं को भोजन कराने का पुण्य प्राप्त कर लिया है.’
हमारे बाबा को कार खरीदने के लिए गौंडा से लखनऊ जाना था. उनके हर सफ़र में एक खिदमतगार का होना ज़रूरी होता था. बोहरे जी को यह पता चला तो उन्होंने अपनी सेवाएँ देने का प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया. बदले में बाबा को उन्हें अयोध्या जी में हनुमान गढ़ी के और लखनऊ में अलीगंज के मंदिर में भी हनुमान जी के दर्शन कराने थे.
बोहरे जी के साथ लखनऊ में बाबा, चारबाग की जैन धर्मशाला में ठहरे. बाबा ने अगली सुबह बोहरे जी को एक रुपया देकर अपने लिए कचौड़ियाँ और एक कुल्हड़ दूध मंगवाया और बोहरे जी को भी नाश्ता करने के लिए कह दिया. एक घंटे बाद बोहरे जी ने बाबा को दूध का कुल्हड़ और कचौड़ियों के साथ तीन पैसे लौटाते हुए कहा –
‘भैया जी ! जे सारे लखनऊ बारे हलबाई तो भौतई बेइमान ऐं. हमने  हलबाई ते कई कि जो कोऊ मिठाई ताजी हो, बो मोय पाव भर दै दे. कम्बखत ने पाव-पाव भर नौ ताजी मिठाई मोए परोस दईं. अब तुम्हाए औ हमाए नास्ता के सवा पन्द्रह आने है गए. बाक़ी बचे कुल तीन पैसा.’
(भैया जी, ये साले लखनऊ के हलवाई तो बहुत ही बेइमान हैं. हमने हलवाई से कहा कि जो मिठाई ताज़ी हो, हमको पाव भर दे दे. कमबख्त ने मुझे पाव-पाव भर नौ ताज़ी मिठाइयाँ परोस दीं. अब तुम्हारे और हमारे नाश्ते के सवा पन्द्रह आने हो गए. बाक़ी बचे कुल तीन पैसे.)
बाबा को लखनऊ में पांच दिन ठहरना था लेकिन कार खरीदकर दो दिन में ही गौंडा लौटने का उन्होंने फ़ैसला कर लिया. बाबा से जब अपना कार्यक्रम छोटा करने का बोहरे जी ने कारण पूछा तो बाबा ने फ़रमाया –
‘बोहरे जी, लखनऊ में हम पांच दिन रहेंगे तो पांचों दिन हमको तुम्हारी ऐसी ही खातिरदारी करनी पड़ेगी. उसके बाद कार खरीदने के लिए पैसे बचेंगे ही कहाँ? तो बस, समझ लो कि प्रोग्राम इसीलिए छोटा करना पड़ा है.’
माँ-पिताजी की शादी थी, बारात को हाथरस से एटा जाना था. बोहरे जी ने बाबा के साथ ही गौंडा से हाथरस के लिए प्रस्थान किया और फिर सज-धज के बारातियों में शामिल हो गए. बारात के स्वागत में तीन दिनों तक आयोजित हर दावत में बोहरे जी ने पेटूपने के नए कीर्तिमान स्थापित किए. पूरी, कचौड़ी, सब्ज़ी, रायते, वगैरा को उन्होंने हाथ भी नहीं लगाया और अपना पूरा ध्यान उन्होंने मिठाई- रबड़ी पर लगाया. बार-बार कुल्हड़ भरवा कर रबड़ी पीने में बोहरे जी को दिक्कत हो रही थी इसलिए उन्होंने रबड़ी परोसने वाले से कहा कि वह अपने बर्तन से रबड़ी उड़ेलता चला जाए. अब पानी की तरह ओक से गटागट रबड़ी पीना शुरू कर बोहरे जी ने सभी दर्शकों को मन्त्र-मुग्ध कर दिया. एटा के इतिहास में ऐसा चैंपियन भोजन-भट्ट बाराती पहले कभी नहीं आया था. हमारे नानाजी ने तो एक नौकर सिर्फ़ बोहरे जी को खिलाने-पिलाने के लिए तैनात कर दिया था.
पिताजी की शादी के दो साल बाद हमारे बड़े चाचाजी की शादी होना तय हुआ. बोहरे जी बारात में जाने की पूरी तैयारी कर चुके थे लेकिन ऐन वक़्त पर चाचाजी शादी करने से मुकर गए. सबको निराशा हुई लेकिन बरात में जाने को आतुर बोहरे जी का तो दिल ही टूट गया. उन्होंने हमारे बाबा से शादी टूटने का कारण पूछा तो बाबा ने कहा -
'बोहरे जी, लड़की वालों को पता चल गया था कि बारात में तुम भी आ रहे हो. उन्होंने शर्त रक्खी थी कि बारात में इस भोजन-भट्ट को न लाया जाए. अब तुम्हारे बारात में जाए बिना हमारे घर में कोई शादी हो सकती है भला? बस, हमने ये रिश्ता ही तोड़ दिया.’
वृद्धावस्था में बोहरे जी गौंडा से वापस हाथरस चले गए. उनका शरीर जर्जर हो गया था लेकिन दावतों में उनकी परफ़ॉरमेंस पहले की तरह ही विस्फोटक रहती थी. एक बार बोहरे जी एक भव्य दावत में खीर के दौने पर दौने उड़ाए जा रहे थे कि अचानक ही उनके सीने में ज़ोरों का दर्द उठा. डॉक्टर-हकीम-वैद्य आने से पहले ही उनके दिल की धड़कन बंद हो गयी. जब उनके प्राण पखेरू हुए तो उनके श्री मुख पर मधुर-मनोहर मुस्कान थी. शरीर छोड़ते समय उनकी आत्मा पूर्णतया तृप्त थी.
बोहरे जी की शव-यात्रा में पूरा हाथरस उमड़ पड़ा था. और ऐसा होना लाजमी भी था. दावत-ए-जंग का वह पहला बांकुरा था जो कि खीरगति को प्राप्त हुआ था.



शनिवार, 12 अक्तूबर 2019

बुरी नज़र वाले ----



शबनम के आँसू फूल पर, ये तो वही क़िस्सा हुआ,
आँखें मिरी भीगी हुई, चेहरा तिरा उतरा हुआ !
बशीर बद्र
चश्मे-बद्दूर -
विज्ञान-युग में टोटका, ये तो वही किस्सा हुआ,
राफ़ेल के पहियों के आगे, नीबू हो रक्खा हुआ ! 

हमारा संकल्प -
नीबू-मिरची के टोटके, कर के,
विघ्न सब, दूर हम, भगाएंगे,
बुद्धि को, सबसे ऊंची ताक पे रख,
देश फिर, विश्व-गुरु, बनाएंगे.
काले जादू औ तंत्र-मंत्र का हम,
एक गुरुकुल, नया बसाएंगे,
पढ़ के निकलेंगे, उस से जो ओझा,
देश भी अब वही, चलाएंगे.