सोमवार, 20 जनवरी 2020

नेताओं की मत बात सुनौ



अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं,
तहाँ साँचे चलैं तजि आपनपौ, झिझकैं, कपटी, जे निसाँक नहीं.
घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ, यहाँ एक ते दूसरो, आँक नहीं,
तुम कौन धौं पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं.
घनानंद से क्षमा-याचना के साथ -
अति टेढ़ो सियासत-मारग है, जहाँ नेकु सराफत, बांक नहीं,
छल-कपट बिना इस धंधे में, मिलिहै सत्ता की फांक नहीं.
नेताओं की मति बात सुनौ, इन तें तो, डाकू-चोर भले,   
इन में तोला भर लाज नहीं, अरु आतमा, एक छटांक नहीं.       

बुधवार, 15 जनवरी 2020

मोहिनीअट्टम

1987 में रचित मेरी एक कविता
मोहिनी अट्टम -
पद-धारी साहित्यकार की लीला, अपरम्पार है,
अपनी छवि पर स्वयम् मुग्ध है, बाकी सब बेकार है.
तुलसी को कविता सिखलाता, प्रेमचन्द को अफ़साना,
वर्तमान साहित्य सृजन का, अनुपम ठेकेदार है.
चाहे जिसका गीत चुरा ले, उसको यह अधिकार है,
बासे, सतही, कथा-सृजन से, भी तो कब इन्कार है.
प्रतिभा का संहारक है, भक्तों का तारनहार है,
नेता, अफ़सर के कहने पर, करता सब व्यापार है.
ज्ञानदीप को बुझा, तिमिर का, करता सदा प्रसार है,
शिव के वर से, सत्ता का, उसको, चढ़ गया बुखार है.
पुनर्जन्म लो आज मोहिनी, अपनी लीला दोहरा दो,
नवलेखन के भस्मासुर का, एक यही उपचार है.

शनिवार, 4 जनवरी 2020

डील ही डील

लखनऊ में हमारे पड़ौसी, हमारे हम-उम्र, हमारे पक्के दोस्त, बिहारी बाबू एक केन्द्रीय शोध संस्थान में वैज्ञानिक थे. उनका वर्तमान और भविष्य दोनों ही उज्जवल थे. उनके अपने ही शब्दों में –
‘मैं शहरे-लखनऊ में अपनी बिरादरी का मोस्ट एलिजिबिल बिहारी बैचलर हूँ.’
हमारे मित्र का शादी के बाज़ार में आज से चालीस साल पहले भी लाखों में भाव था. चुंगी नाके के मुंशी के रूप में कार्यरत उनके बाबूजी एक अदद मोटी मुर्गी टाइप सुकन्या की तलाश में पिछले एक साल से लगे थे लेकिन लाख जतन करने पर भी उनके सारे सपने साकार करने वाली बहू उनको मिल नहीं रही थी.
एक ओर जहाँ बिहारी बाबू के बाबूजी को अपने सुपुत्र के दहेज में मिली रकम से अपनी एकमात्र कन्या का विवाह करना था तो वहां दूसरी ओर हमारे बिहारी बाबू ने अपने ही संस्थान की एक पंजाबी स्टेनोग्राफ़र से प्रेम की पींगे इतनी बढ़ा ली थीं कि बात शादी तक पहुँचने लग गयी थी. हमारे दूरदर्शी मित्र ने अपनी कमाई और अपनी भावी श्रीमती जी की कमाई का जोड़ कर के एक से एक ऊंचे सपने बुन लिए थे लेकिन गरीब घर की इस स्टेनो-बाला के बाप के पास शादी में खर्च करने के लिए धेला भी नहीं था. इधर बिहारी बाबू के बाबूजी को खाली हाथ आने वाली कमाऊ बहू तक स्वीकार नहीं थी क्योंकि सिर्फ़ उसकी तनख्वाह के भरोसे तो उनकी बिटिया की शादी बरसों तक टल जानी थी.
हमारे दोस्त के बाबूजी ने अपने सपूत के लिए आख़िरकार एक मोटी मुर्गी फाँस ही ली. अपने सपूत से बिना पूछे उन्होंने अपनी ही बिरादरी के एक महा-रिश्वतखोर इंजीनियर की कन्या से उनका रिश्ता पक्का कर दिया. बिहारी बाबू ने मेरे घर आकर अपने बाबूजी की इस तानाशाही के ख़िलाफ़ बग़ावत करने का ऐलान कर दिया. उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि वो और उनकी प्रेमिका आर्य समाज मंदिर जाकर शादी कर लेंगे.
मेरी शुभकामनाएँ अपने दोस्त के साथ थीं लेकिन मुझे तब उनका यह ऐलान बड़ा ढुलमुल सा लगा जब उन्होंने इस क्रांतिकारी क़दम को उठाने से पहले अपने बाबूजी को इस अनोखी शादी में शामिल होने का निमंत्रण देने की बात कही. मैं तो ख़ुद अपने दोस्त की शादी में उनके बाप का रोल करने को तैयार था पर लगता था कि अपने हम-उम्र इंसान का बाप बनना मेरे नसीब में नहीं था.
फिर क्या हुआ?
फिर वही हुआ जो कि क़िस्सा-ए-बेवफ़ाई में हुआ करता है. हमारे बिहारी बाबू चुपचाप बिहार जाकर शादी कर आए और हमको इसकी खबर उनके द्वारा लाए गए मिठाई के डिब्बे और साथ में आई उनकी नई-नवेली दुल्हन से मिली.
हमारी भाभी जी सूरत क़ुबूल थीं लेकिन कुछ ज़्यादा सांवली थीं और ऐसे दोहरे बदन वाली थीं जिसमें कि बड़ी आसानी दो बिहारी बाबू तो निकल ही सकते थे. बातचीत में पता चला कि वो पढ़ाई में पैदल हैं और दो साल बी. ए. में अपना डब्बा गोल करने के बाद उन्होंने पढ़ाई से सदा-सदा के लिए सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है.
नए जोड़े से पहली मुलाक़ात में तो मैं दोनों के सामने शराफ़त का पुतला बना रहा लेकिन अगली ही मुलाक़ात में मैं अपने ज़ुबान-पलट दोस्त की छाती पर चढ़कर उन से इस सेमी-अनपढ़ मुर्रा भैंस के लिए अपनी क़ाबिल स्टेनोग्राफ़र प्रेमिका के साथ की गयी बेवफ़ाई का सबब पूछ रहा था.
दो-चार मुक्कों के बाद दोस्त ने क़ुबूला कि उनके ससुर ने उनके बाबूजी को नक़द तीन लाख रूपये भेंट किये थे ताकि उनकी बिटिया की शादी धूम-धाम से हो जाए. लेकिन मुझे पता था कि बहन की शादी की खातिर बिहारी बाबू अपने प्यार की क़ुर्बानी देने वाले नहीं थे. मुझ से दो-चार अतिरिक्त धौल खाकर उन्होंने यह भी क़ुबूला कि उनके ससुर ने इस रिश्ते को क़ुबूल करने के लिए उन्हें अलग से दो लाख रूपये भी दिए थे.
इस तरह जब एक डील दोनों समधियों के बीच और दूसरी डील ससुर-दामाद के बीच हुई तब जाकर यह शादी संपन्न हुई.
एक और बात मेरे समझ में नहीं आ रही थी कि हमारी भाभी जी ने हमारे बिहारी बाबू में ऐसा क्या देखा जो उन्होंने उनसे शादी करने के लिए अपनी रज़ामंदी दे दी. हमारे बिहारी बाबू शक्लो-सूरत और पर्सनैलिटी से ऐसे लगते थे कि उन्हें देख कर कोई कह उठे –
‘आगे बढ़ो बाबा !’
अब बिहारी बाबू की ऐसी कबाड़ा शख्सियत और ऊपर से उनके परिवार की मुफ़लिसी, फिर बाप की ऊपरी आमदनी पर ऐश करने वाली कोई लड़की कैसे इस शादी के लिए राज़ी हो सकती थी?
जल्दी ही इस सवाल का जवाब भी मिल गया और इसका जवाब ख़ुद भाभी जी ने अपनी शादी के किस्से सुनाते वक़्त दिया था –
‘हम तो इनको देखते ही रो पड़े थे. जितने लद्धड़ ये अब लगते हैं तब ये उस से भी लद्धड़ लग रहे थे और फिर इनकी फॅमिली का दलिद्दर तो इन सबके कपड़ों से भी दिखाई दे रहा था. हम तो फ़ौरन मना कर दिए लेकिन पापा को हमारी सादी का बहुत जल्दी था. कई लड़का लोग हमको मोटा और सांवला कह के रिजेक्ट भी कर चुका था. आखिर पापा का रिक्वेस्ट हम मान लिये, इन से सादी के लिए हाँ कर दिए लेकिन जब हमारे और पापा के बीच एक डील हुआ तब ! हमारे कहने पर पापा ने तीन लाख रुपया हमारे नाम कर दिया और हमको दो हजार रुपया महीना पॉकेट मनी देने का वो प्रॉमिस भी किये हैं.’
इधर भाभी जी अपनी दास्तान सुनाए चली जा रही थीं उधर बिहारी बाबू थे कि ज़मीन में गड़े ही जा रहे थे और मैं था जो अपनी उँगलियों पर हिसाब लगा रहा था कि इस शुभ विवाह में किस-किस के बीच डील हुई हैं और दोनों परिवारों में ऐसा कौन अभागा या अभागी है जो कि ऐसी किसी भी डील में शामिल नहीं है.

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

तेरे दर पर आया हूँ

आने वाला साल, न अबके जैसा हो, हे प्रभु,
रहे सदा गुलज़ार, अमन का बाग़, हे प्रभु,
नफ़रत की ना चले बयार, हमारे आँगन हे प्रभु ,
गंगा-जमुनी मौज बहे, हर दिल में, हे प्रभु !

शनिवार, 28 दिसंबर 2019

2019 का आख़िरी तराना

मज़हब नहीं सिखाता, दूजे का, खून पीना,
कांटे भी जानते हैं, फूलों के संग, जीना.

कथनी में हम बताते, आपस में मेल करना,
करनी में सिर्फ़ भाता, लड़ना हो या कि डरना.
सारे जहाँ में होता, चर्चा यही, हमारा,
नाथू के फ़लसफ़े से, गांधी-संदेस, हारा.
दंगल का है अखाड़ा, हिन्दोस्तां, हमारा,
क्यों जन्म लें यहाँ पर, हम भूल कर, दुबारा.
सारे जहाँ से ------

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

दरियादिल

लखनऊ यूनिवर्सिटी में एम. ए. में एडमिशन लेते ही मैं लाल बहादुर शास्त्री हॉस्टल में शिफ्ट हो गया. मेरे साथ ही एक एमएस. सी (विषय नहीं बताऊँगा) के छात्र को हॉस्टल के उसी विंग में कमरा मिला था. हमारे संकाय एक-दूसरे से अलग ज़रूर थे लेकिन हम दोनों हम-उम्र थे, दोनों फ़िल्में देखने के और क्रिकेट के शौकीन थे, दोनों ही चाट के शौकीन थे और दोनों ही शाकाहारी भी थे. अब मेरा और उनका मेल होना तो बनता था. हम दोनों तुरंत मित्र बन गए और फिर धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गाढ़ी भी होती चली गयी.
मेरे नए मित्र ज़हीन थे, शरीर से महीन थे लेकिन पेटूपने में नामचीन थे, गुणों की खान थे और एक नहीं, बल्कि कई मामलों में भूतो न भविष्यत् थे.
इस कहानी में आत्मरक्षा के मद्दे-नज़र मैं अपने मित्र के नाम का खुलासा नहीं कर सकता हूँ. उनके वाराणसी का वासी होने के कारण मैं इस कहानी में उनका नाम बनारसी बाबू रख देता हूँ.
हमारे बनारसी बाबू ‘चमड़ी जाए लेकिन दमड़ी न जाए’ के सिद्धांत में विश्वास रखते थे और – ‘राम नाम जपना, पराया माल अपना’ मन्त्र में भी उनकी गहरी आस्था थी. अपने रईस लेकिन कंजूस बाप से उन्हें ऐसे ही संस्कार मिले थे.
बनारसी बाबू हमारे हॉस्टल के उन पैदल सैनिकों में से थे जिन्हें कि अपने साइकिल रखने वाले मित्रों की कृपा पर निर्भर रहने में कभी कोई तकल्लुफ़ नहीं होता था. मेरी साइकिल पर मेरे साथ वो पिलियन राइडर की हैसियत से सैकड़ों बार बैठे होंगे और इन से क़रीब आधी बार वो मुझ से उधार मांग कर उसे ले गए होगे. मेरे यह समझ में नहीं आता था कि खुद हॉस्टल में रहते हुए बैंक में अपने नाम से मोटी-मोटी रकमों के फिक्स्ड डिपाज़िट्स करने वाला 400-500 रुपयों की मामूली साइकिल खुद अपने लिए खरीद क्यों नहीं सकता था.
बनारसी बाबू का मेरी साइकिल से जुड़ा एक किस्सा है –
आदतन बनारसी बाबू एक बार मेरी साइकिल मांग कर ले गए. जब वो लौटे तो साइकिल के पिछले पहिये में पंचर था. मैंने जब नए टायर-ट्यूब वाली अपनी साइकिल की यह हालत देखी तो मैं आगबबूला हो गया. बनारसी बाबू का कहना था कि साइकिल में पंचर ठीक कराने का उनका कोई दायित्व नहीं था क्योंकि मेरे और उनके बीच ऐसा कोई समझौता नहीं हुआ था. इधर मैं था कि इस मामले में अपने हक़ पर अड़ा हुआ था. अंततः दोस्ती तोड़ने और जीवन में फिर कभी उन्हें साइकिल न देने की धमकी काम कर गयी. बनारसी बाबू को मेरे साथ साइकिल का पंचर ठीक करवाने के लिए जाना पड़ा. पंचर बनाने के लिए जब टायर-ट्यूब खोले गए तो पता चला कि टायर भी बेकार हो गया है क्योंकि पहिये में पंचर होने के बावजूद बनारसी बाबू साइकिल पर सवार ही रहे थे. इस दुर्घटना का खुलासा होने पर बनारसी बाबू पंचर जुडवाने का एक रुपया खर्च करने से तो बच गए लेकिन उन्हें टायर-ट्यूब बदलवाने के 25 रूपये ज़रूर देने पड़े.
बनारसी बाबू ब्रेकफ़ास्ट में सिर्फ़ घर से लाई गयी मठरियों और लड्डुओं का प्रयोग करते थे. हॉस्टल की कैंटीन के चाय, ब्रेड, बन, मक्खन आदि उनके मेन्यू में कभी भी शामिल नहीं होते थे. वो सज्जन जो कि किसी अपरिचित का माल भी हड़पने के लिए तैयार रहते थे अपने माल पर किसी का साया भी नहीं पड़ने देते थे. और तो और जो शख्स मेरी माँ की बनाई मिठाइयों और नमकीन का मुरीद था, वो मेरे जैसे अभिन्न मित्र को भी अपने घर से लाए पकवानों को हाथ भी नहीं लगाने देता था.
आई. टी. कॉलेज के चौराहे पर पांडे मिष्ठान भंडार में बनारसी बाबू रोज़ रात को जब दूध पीने जाते थे तो मेरी साइकिल से तो उनकी दोस्ती रहती थी लेकिन मुझ से क़तई नहीं.
भोजन से जुड़ा एक और किस्सा है. एक बार हमारे हॉस्टल का मेस बंद हो गया. हम सबको बाहर के ढाबों में खाने का प्रबंध करना पड़ा. बाक़ी हॉस्टलर्स तो कहीं भी जाकर खा लेते थे लेकिन हमारे बनारसी बाबू सिर्फ़ डालीगंज के प्रकाश ढाबे में खाते थे, वो भी दिन में एक बार दो बजे. हमने इस प्रकाश ढाबे के प्रति उनके प्रेम की वजह पूछी तो उन्होंने फ़रमाया –
‘प्रकाश ढाबे वाला एक रूपये की थाली में (आज से 47-48 साल पहले एक रुपया भी मायने रखता था) अनलिमिटेड खिलाता है. दो पहर के टाइम में जाओ तो खाने वालों की भीड़ भी कम होती है फिर लंच और डिनर एक साथ हो जाता है.’
हमारे मित्र को प्रकाश ढाबे को जल्द ही ब्लैक लिस्ट करना पड़ा क्योंकि उसके दुष्ट मालिक ने बांग्लादेश की मुक्ति के बाद बढ़ी हुई महंगाई के कारण थाली में मिलने वाली अनलिमिटेड रोटी, सब्जी, दाल और चावल को लिमिटेड की कैटेगरी में डाल दिया था.
हम दोनों मित्र मौज-मस्ती करने के साथ-साथ पढ़ाई भी कर लेते थे. मैंने एम. ए. में और बनारसी बाबू ने एम एस. सी. में टॉप किया. हम दोनों ने रिसर्च स्कॉलर के रूप में यूजीसी फ़ेलोशिप के लिए आवेदन किया और वह हम दोनों को मिल भी गयी.
हम दोनों ने यह पहले ही तय कर लिया था कि जिस किसी को भी फ़ेलोशिप मिलेगी वह दूसरे को ट्रीट देगा. अब चूंकि हम दोनों को ही फ़ेलोशिप मिल गयी थी तो एक क्या, डबल जश्न मनाना तो बनता ही था.
मैं अपनी ओर से दी जाने वाली ट्रीट का प्रोग्राम बना रहा था –
'पहले हम मेफ़ेयर सिनेमा में बालकनी की टिकट लेकर फ़िल्म देखेंगे (हम लोग एक रूपये पिचहत्तर पैसे वाले स्टूडेंट क्लास में फ़िल्म देखते थे जिसमें आइडेंटिटी कार्ड दिखाने पर पच्चीस पैसे और कम हो जाते थे) फ़िल्म देखेंगे फिर रंजना रेस्टोरेंट में शानदार भोजन करेंगे और अंत में क्वालिटी में आइसक्रीम खाएँगे.'
बनारसी बाबू को पता था कि दो-तीन बाद ऐसी ही ट्रीट, मैं उन से लेने वाला हूँ. संभावित 30 रुपयों के खर्चे की सोच कर उनकी जान निकल रही थी. उन्होंने मेरे सामने एक अनोखा प्रस्ताव रखते हुए कहा –
‘गोपेश, सिनेमा हॉल में बालकनी की टिकट खरीदकर फ़िल्म देखने में रंजना रेस्टोरेंट में खाने में और क्वालिटी में आइसक्रीम खाने में तो तुम्हें बहुत चूना लग जाएगा और फिर मेरी जेब भी ऐसे ही कटेगी. क्यों न हम इस डबल ट्रीट को सिंगल कर दें, मेफ़ेयर में बालकनी की जगह अलंकार सिनेमा में फ़िल्म देखें (अलंकार सिनेमा हॉल में अन्य सिनेमा हॉल्स से उतरी हुई या पुरानी फ़िल्में लगती थीं और वहां की टिकट दर दूसरे सिनेमा हॉल्स की तुलना में आधी हुआ करती थी) और रंजना रेस्टोरेंट की जगह आई टी. चौराहे वाले पांडे स्वीट हाउस में दो-दो रसगुल्ले और दो-दो समोसे खा लें. इस ट्रीट का खर्चा हम आपस में बराबर-बराबर बाँट लेंगे.’
मैंने उनके इस प्रस्ताव को सुन कर उनकी पीठ पर दो मुक्के मार कर दाद दी और जश्न मनाने का इरादा पूरी तरह से कैंसिल कर दिया.
बनारसी बाबू की रिक्शे की सवारी का एक किस्सा भी मुझे याद आ रहा है.
उन्हें चारबाग स्टेशन जाना था. एक रिक्शे वाले से उन्होंने पूछा –
‘भैया, चारबाग स्टेशन तक आधी सवारी का क्या लोगे?’
नादान रिक्शे वाला इस आधी सवारी का मतलब नहीं समझा. लेकिन मैं समझ गया. बनारस में दो लोग शेयर्ड रिक्शा कर आपस में भाड़ा बाँट सकते हैं लेकिन लखनऊ में ऐसा चलन नहीं है. मैंने रिक्शे वाले को समझाते हुए कहा –
‘आधी सवारी से इनका मतलब यह है कि रिक्शे में तुम पीछे बैठोगे और रिक्शा ये चलाएंगे.’
मेरी समझ ने यह आज तक नहीं आया है कि रिक्शे वाला क्यूं हँसते-हँसते चला गया और बनारसी बाबू क्यूँ दांत पीसते हुए मेरा क़त्ल करने के लिए मेरे पीछे दौड़े.
हम दोनों ही लखनऊ विश्वविद्यालय में लगभग एक ही साथ लेक्चरर हुए. बनारसी बाबू की किस्मत मुझ से अच्छी थी. वो यूनिवर्सिटी में परमानेंट हो गए लेकिन मुझे पांच साल बाद रोजी-रोटी के तलाश में कुमाऊँ यूनिवर्सिटी में जाना पड़ा. लेकिन लखनऊ में अपना घर होने की वजह से मेरा वहां आना-जाना तो लगा ही रहता था.
बनारसी बाबू की शादी भी मेरी शादी से पहले हो गयी. अब वो हमारे पड़ौस के निराला नगर में किराए का मकान लेकर रहने लगे थे. हॉस्टल-कालीन पैदल सवार को अब उनके ससुर ने एक चमचमाती फ़िएट कार भेंट कर दी थी.
इस तरह नौकरी, बीबी, और कार के मामले में बनारसी बाबू मुझसे आगे निकल गए. इतना ही नहीं, मैं जब तक हवाई जहाज में बैठा भी नहीं था तब तक वो दो बार कांफ्रेंस के सिलसिले में विदेश का चक्कर भी लगा आए.
हम दोनों की स्थिति में बहुत अंतर आ गया था लेकिन हमारी दोस्ती पहले की तरह गाढ़ी ही रही. मैं छुट्टियों में जब भी लखनऊ पहुँचता था, बनारसी बाबू मेरा इंतज़ार करते हुए मिलते थे. मेरी शादी के बाद मेरी श्रीमती जी और बनारसी भाभी की भी आपस में दोस्ती हो गयी थी. बनारसी बाबू की कार में हम लोग अक्सर सैर-सपाटे के लिए जाते थे लेकिन इस तरह की सैरों में अक्सर उनकी कार में पेट्रोल मुझे ही भरवाना पड़ता था.
बनारसी बाबू की कंजूसी पहले की तरह बरक़रार थी. हमारे घर आकर माल उड़ाने में उनको कभी कोई संकोच नहीं होता था लेकिन अपने घर में कुछ भी खिलाने-पिलाने में उनकी जान निकलती थी.
आज प्रदूषण की गति थामने के लिए पोलीथीन की थैलियों का प्रयोग वर्जित हो रहा है. लेकिन हमारे बनारसी बाबू आज से 40 साल पहले भी दुकानदारों से ब्रेड, सब्ज़ी, फल आदि कोई भी सामान खरीदते वक़्त पोलीथीन की या कागज़ की थैली नहीं लिया करते थे और सारा सामान अपने थैले में रखवा लिया करते थे. इसका कारण उनका पर्यावरण-संरक्षण के प्रति प्रेम नहीं था बल्कि वो दुकान वाले से पोलीथीन की या कागज़ की थैली के दाम अपने बिल में से कम करवा लेते थे और सब्ज़ी वाले से थैली के बदले धनिया-हरी मिर्च मुफ़्त में डलवा लेते थे.
एक बार रक्षाबंधन पर हमारी बहन जी, दोनों बच्चों के साथ, बम्बई से आई थीं. बनारसी बाबू तो बहनजी के किस्से सुनकर पहली मुलाक़ात में ही उन के मुरीद हो गए. तुरंत वो उनके छोटे भाई बन गए.
रक्षा बंधन पर इस नए छोटे भाई को बहनजी ने राखी बांधी, उसके माथे पर टीका लगाया, एक लड्डू खिलाया और फिर एक मिठाई का डिब्बा भी उसे प्रदान किया. इस नए छोटे भाई ने श्रद्धा के साथ अपनी नई दीदी के चरण छुए और उन्हें नक़द 11 रूपये प्रदान किए.
मैंने बनारसी बाबू की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा –
‘कंजूसड़े ! पचास रूपये का मिठाई का डिब्बा लेकर तू बड़ी बहन को 11 रूपये दे रहा है?’
बहन जी ने सेंवई का कटोरा अपने नए भाई को थमाया और फिर मुझे डांटते हुए कहा –
‘नालायक ! तू इसका प्यार और इसकी श्रद्धा देख, इसकी भेंट के रूपये मत गिन !’
बनारसी बाबू और बनारसी भाभी दोनों ही बहन जी के पीछे पड़ गए कि वो उनके घर ज़रूर आएं. आख़िरकार हम दोनों मिया-बीबी के साथ बहन जी, मेरा भांजा और मेरी भांजी, बनारसी बाबू के घर पहुँच ही गए. चाय-पानी हुआ फिर देश-विदेश के किस्से चले लेकिन भोजन का कोई नामो-निशान नहीं. 10 साल की मेरी भांजी श्रुति ने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा –
‘मामा, भूख लगी है.’
मैंने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा –
‘सब्र कर, अभी खाना आ जाएगा.’
रात के नौ बजने को आए लेकिन खाने का तो किसी ने नाम ही नहीं लिया. अब हम सब उठ खड़े हुए. बनारसी बाबू ने उठ कर खड़ी हो रही अपनी नई दीदी से कहा –
‘दीदी ! आप लोग नौ बजे तक रुक जाइए, फिर चले जाइएगा.’
मैंने इस नौ बजे तक रोके जाने का कारण पूछा तो पता चला कि वो स्विट्ज़रलैंड से लाई अपनी कुक्कू क्लॉक की चिड़िया को नौ बजे वाली कूकू करते हुए दिखाना चाहते थे.
मेरे भांजे और भांजी ने अपने इस नए दरियादिल मामा के आतिथ्य-सत्कार के इनाम में अपने असली मामा की क्या गत बनाई, इसे शब्दों में बयान किया जाना असंभव है.
कुछ दिनों बाद बनारसी बाबू का चयन बी. एच. यू. में हो गया. मेरे लखनऊ छोड़ने से पहले ही उन्होंने लखनऊ छोड़ दिया.
हम दोनों दोस्त इस बार बिछड़े तो फिर मिल नहीं पाए. कुछ दिन तक हमारा पत्र-व्यवहार चला, फिर दो-चार बार फ़ोन पर बात हुई और फिर संपर्क ही टूट गया. शायद दोस्ती के नाम पर चिट्ठी-पत्री और फ़ोन पर खर्च करना उन्हें मंज़ूर नहीं था.
पिछले पच्चीस साल से बनारसी बाबू की मुझे कोई खबर नहीं मिली है. लेकिन वो मेरे दिल से कभी नहीं निकले और न ही उनकी दरियादिली के किस्से मेरे ज़हन से उतरे हैं. आज भी हर रात नौ बजे उनकी कुक्कू क्लॉक की कूकू हमारे कानों में गूंजती रहती है.

मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने के औचित्य-अनौचित्य पर बहस

समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है.
'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है' की हुंकार भरने वाले लोकमान्य तिलक, मांडले से लौटकर पहले जितने जोशीले नहीं रह जाते हैं.
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ' लिखने वाले अल्लामा इक़बाल, पाकिस्तान की मांग करने लगते हैं.
1916 के लखनऊ समझौते में हिन्दू-मुस्लिम एकता को महत्त्व देने वाले जिन्ना, मुस्लिम साप्रदायिकता का नेतृत्व करने लगते हैं और अंततः पाकिस्तान लेकर ही मानते हैं.
क्रांतिकारी अरबिंदो घोष, महर्षि हो जाते हैं.
देशबंधु चितरंजन दास और महात्मा गाँधी के अहिंसक आन्दोलन में भाग लेने वाले सुभाष, आज़ाद हिन्द फ़ौज के सुप्रीम कमांडर बन जाते हैं
आज़ादी की लड़ाई में बड़ी से बड़ी कुर्बानी देने वाले अधिकतर नेता, देश के आज़ाद होते ही कुर्सी हथियाने की दौड़ में एक-दूसरे से होड़ लगाने लगते हैं.
वीर सावरकर ने 1857 के विद्रोह को सैनिक विद्रोह बताए जाने का विरोध करते हुए उसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रतिष्ठित कर के राष्ट्रीय आन्दोलन को सशक्त किया था. काले पानी की सज़ा और अंग्रेज़ों की क़ैद से भाग निकलने की उनकी हैरतअंगेज़ कोशिश भी उनकी दिलेरी का प्रमाण है.
लेकिन अगर बाद में सावरकर उतने वीर नहीं रहे तो कांग्रेस वाले इतना शोर क्यों मचाते हैं? क्या उन्होंने अपने गिरेबान में झाँक कर देखा है?
सावरकर को गाँधी जी की हत्या की साज़िश में शामिल होने या न होने की बात पर उन्हें भारत रत्न दिया जाना या न दिया जाना तो समझ में आता है लेकिन सावरकर के माफ़ीनामे को लेकर जो शोर मचाया जाता है. उसकी पृष्ठभूमि जानना बहुत ज़रूरी है. सावरकर यह मान रहे थे कि वो जेल में पड़े-पड़े देश के लिए कुछ भी नहीं कर पाएंगे. उन्होंने अपने माफ़ीेनामे के पीछे अपना उद्देश्य यह बताया था कि वो राजनीतिक गतिविधयों से सन्यास लेकर भारत-जागरण अभियान को सफल बनाएँगे. 1924 में जेल से छूटने के बाद वो सक्रिय य राजनीति से दूर ही रहे. लेकिन उनके माफ़ीनामे को लेकर उन्हें कायर सिद्ध करना किसी को शोभा नहीं देता है. 

यह बात सबको पता नहीं है कि शिवाजी (तब तक वो छत्रपति नहीं हुए थे) ने भी आगरे के किले में क़ैद किए जाने के बाद औरंगज़ेब को माफ़ीनामा भेज कर उस से रिहाई की प्रार्थना की थी.