शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

गुरुजी की व्यस्तता



गुरुजी की व्यस्तता –
अल्मोड़ा में पढ़ाते हुए भी मेरा दिल हमेशा लखनऊ में ही रहा करता था. माँ-पिताजी के साथ रहने का कोई मौक़ा मैं अपने हाथ से जाने नहीं देता था. भला हो इन विश्वविद्यालयों का जहाँ और कोई सुविधा हो न हो पर छुट्टियाँ बे-भाव मिला करती हैं. 1993 में पिताजी के स्वर्गवास से पहले हमारी सारी छुट्टियाँ लखनऊ में ही बीता करती थीं. लखनऊ के घर के सारे बड़े कामों की ज़िम्मेदारी मैंने ओढ़ रक्खी थी.
मेरा एक भक्त किस्म का छात्र था. वह हेड कांस्टेबल था और पुलिस लाइन में नियुक्त था, साथ ही साथ इतिहास में व्यक्तिगत छात्र के रूप में वह एम. ए. भी कर रहा था. अक्सर अपनी शंकाओं के समाधान के लिए वह मेरे पास आ जाया करता था पर बार-बार मेरे लखनऊ जाने से उसके अध्ययन में बाधा पड़ जाती थी. एक दिन उसने मुझसे पूछा –
‘गुरु जी ! आपकी छुट्टियों का कोई हिसाब है?’
मैंने उसे जवाब देने के बजाय एक सवाल दाग दिया?
‘ये बता, तेरी ऊपरी आमदनी का कोई हिसाब है?’
उसने शरमाते हुए जवाब दिया – ‘मेरी ऊपरी आमदनी का हिसाब तो सिर्फ़ भगवान जी के पास होगा गुरु जी. ! ’
अब मैंने अपना सीना फुलाकर उसके सवाल का जवाब दिया – ‘मेरी जायज़, हड़ताली और फ़्रेंच, इन सभी छुट्टियों का हिसाब भी भगवान जी ही रखते हैं.’
खैर, यह तो अल्मोड़ा का किस्सा हुआ, अब लखनऊ के प्रवास की बात पर लौटता हूँ.
1989-90 की बात थी. शरदावकाश और इलेक्शन की छुट्टियाँ मिलाकर लगभग 70 दिन की हमारी छुट्टियाँ थीं. आदतन हम सपरिवार लखनऊ पहुँच गए. हमारी माँ को घर के काम से पूरी और हमारी श्रीमती जी को आधी छुट्टी चाहिए थी इसलिए घर का काम करने के लिए एक नौकर का इंतजाम किया गया. वो कोई बीस-बाईस साल का लड़का होगा, नाम था भोला.
भोला और मैं दोनों ही घर के काम में जुट गए. घर में तीन साल से पुताई नहीं हुई थी इसलिए तुरंत पुताई वाले आ गए. पुताई से पहले घर की मरम्मत भी होनी थी. मिस्त्रियों, पेंटरों द्वारा बताया गया सारा सामान आ गया फिर भी रोज़ाना वो मुझे किसी न किसी सामान के लिए बाज़ार दौड़ाते ही रहते थे. वैसे बाज़ार के चक्कर लगाने में परेशानी किसे थी? सब्ज़ी-फल लाने के लिए अलग से चक्कर भी तो नहीं लगाने पड़ते थे.
एक दिन माँ ने भोला से पूछा – ‘क्यों रे भोला, तेरी शादी हो गयी है क्या?’
भोला ने जवाब दिया – ‘का बात करत हो माता राम ! हमरे दुई ठो बच्चा हैं. बिटिया चार साल की है और बिटवा साल भरे का. ’
माता राम बोलीं –
‘तू खुद अभी बच्चा है और तेरे दो बच्चे हो गए? पहले तू अपने पैरों पर खड़ा हो जाता, फिर शादी करता, बच्चे पैदा करता.’
भोला नाम का ही भोला था पर था बड़ा सयाना. उसने माता राम के इस सवाल पर एक करारा जवाब दाग दिया –
‘माता राम ! ई बात आपको भैयाजी को भी समझाय का चही. हम तो फिरऊ कुछ कमाय लेत हैं पर भैया जी तो घर में ही पड़े-पड़े पुताई-सफाई कराय देत हैं, सौदा-सुल्फा लाय देत हैं, कुछ कमाते-धमाते हैं नाहीं, फिरऊ उनकी सादी भी आप कराय दियो हो और उनकी दुई-दुई बिटियाँ भी हुई गईं हैं.’
भोलेनाथ का जवाब सुनकर माता राम तो चीमटा लेकर उसके पीछे दौड़ पडीं पर मैं और पिताजी हंसने लगे.
पिताजी ने अपनी हंसी रोक कर मुझसे कहा –
‘कुछ तो शर्म करो बरखुरदार ! आगे से जब लम्बी छुट्टियाँ हुआ करें तो कुछ दिन लखनऊ के बाहर भी बिता लिया करो.’           

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

शुभाशीर्वाद

शुभाशीर्वाद -
अपने व्यंग्य-वाण के लिए प्रसिद्द, स्वर्गीय प्रतापनारायण मिश्र के आशीर्वचन याद आ गए और एक किस्सा भी -
एक पंडितजी रास्ते में जा रहे थे, उनके पीछे-पीछे शरारती लड़कों की एक टोली चल रही थी जिसमें से कोई न कोई उनके सर पर पीछे से चपत लगाता जा रहा था या उनकी चुटिया खींच रहा था. बेचारे पंडित जी फिर भी चुपचाप चले जा रहे थे. फिर अचानक वो लड़के उनके सामने आकर बोले -
'पंडित जी, पंडित जी, देओ असीस.'
पंडित जी ने तुरंत आशीर्वाद दिया -
'खुसी रहो जजमान, हिये की दोनों फूटें,
घुटनों के बल गिरो, दांत बत्तीसों टूटें.'
हमको पीछे से चपतियाने वाले, हमारी पीठ में छुरा घोंपने वाले और फिर हमारे सामने आकर हमसे वोट मांगने वाले सभी प्रत्याशियों को हमारा ऐसा ही आशीर्वाद.

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

मतदान के बाद



मतदान के बाद -
जो बीत गई सो बात गई
अगले चुनाव तक बात गयी
जिनकी आँखों का तारा था
जिनको तू बेहद प्यारा था
जिनका तू एक सहारा था
सब तुझे छोड़ कर चले गए
तुझे बीच भंवर में छोड़ गए
तू डूबे या फिर तर जाए
तू स्वर्ग पाय या नर्क जाय
कुछ फ़र्क नहीं पड़ता उनको
अब फिक्र देश की है उनको
तू निष्ठुरता के गीत सुना
तू हरजाई कह शोर मचा
वो कहाँ पलटने वाले हैं
अगले चुनाव तक हे मूरख
वो नहीं लौटने वाले हैं
जो बीत गई सो बात गई
अगले चुनाव तक बात गयी

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

तंज़ के बादशाह अकबर इलाहाबादी

तंज़ के बादशाह अकबर इलाहाबादी  –
अकबर इलाहाबादी हमारे जैसे लाखों-करोड़ों लोगों के सबसे प्रिय शायर हैं. उनकी व्यंग्य रचनाओं ने न जाने कितने कवि और लेखकों को तंज़ की दुनिया में उतरने की प्रेरणा दी होगी. अकबर इलाहाबादी के अशआर ऐसे होते थे कि जिस शख्स को लेकर वो तंज़ (व्यंग्य) कसते थे वो भी उन्हें पढ़कर या सुनकर वाह-वाह कर उठता था और उनका मुरीद बन जाता था.
मेट्रिक पास, अट्ठारह साल का नौजवान अकबर हुसेन रिज़वी (बाद में अकबर इलाहाबादी) अर्ज़ी-नवीस की नौकरी की तलाश में अपनी अर्ज़ी लेकर कलक्टर साहब के पास उनके किसी दोस्त का सिफ़ारिशी ख़त लेकर गया. कलक्टर साहब ने उसकी अर्ज़ी और अपने दोस्त का ख़त लेकर अपने कोट की जेब में रखकर उसे एक हफ़्ते बाद मिलने के लिए कहा. एक हफ़्ते बाद जब अकबर हुसेन ने पहुंचकर कलक्टर साहब को सलाम किया तो वो उसे देखकर बोले –
‘तुम्हारी अर्ज़ी मैंने कोट की जेब में तो रक्खी थी पर वो कहीं गुम हो गयी. ऐसा करो, तुम मुझे दूसरी अर्ज़ी लिखकर दे दो.’
अगले दिन अकबर हुसेन अख़बार के पन्ने की साइज़ की अर्ज़ी लिखकर कलक्टर साहब के पास पहुंचा. कलक्टर साहब ने हैरानी और नाराज़ी के स्वर में पूछा – ‘ये क्या है?’
अकबर हुसेन ने बड़े अदब से जवाब दिया – ‘हुज़ूर, ये अर्ज़ी-नवीस की नौकरी के लिए मेरी अर्ज़ी है. आपकी जेब में यह गुम न हो जाय इसलिए इसको इतने बड़े कागज़ पर लिखकर लाया हूँ.’
कलक्टर साहब अकबर हुसेन के जवाब से इतने खुश हुए कि उन्होंने उसे फ़ौरन अर्ज़ी-नवीस की नौकरी दे दी. बाद में इस नौजवान ने नौकरी करते हुए अपनी तालीम जारी रक्खी और तरक्की के बाद तरक्की करते हुए वह सेशन जज के ओहदे तक पहुंचा.
आइए सबसे पहले उनके राजनीतिक व्यंग्य की धार परखी जाय.
1882 में लार्ड रिपन के शासन काल में पहली बार जनता द्वारा चुने हुए भारतीय सदस्यों को नगर-पालिकाओं और जिला-परिषदों के स्तर पर शासन सँभालने की ज़िम्मेदारी दी गयी लेकिन उनके ज़िम्मे में मुख्य काम यही था कि वो सड़कों, गलियों और नालियों की सफ़ाई की देखरेख करें. अकबर इलाहाबादी ने नगर-पालिकाओं और जिला-परिषदों के इन निर्वाचित सदस्यों के विषय में कहा –
‘मेम्बर अली मुराद हैं, या सुख निधान हैं,
लेकिन मुआयने को, यही नाबदान (नाली के ढक्कन) हैं.’
1885 में बड़ी धूम-धाम से इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई. समाज के प्रतिष्ठित बैरिस्टर, वकील, शिक्षक, उद्योगपति, जागीरदार, ज़मींदार, पत्रकार आदि इसमें देशभक्ति और त्याग के नाम पर शामिल हुए पर उनका मुख्य उद्देश्य था कि वो आला अफसरों की निगाह में आ जायं और समाज में उनका रुतबा बढ़ जाय –
‘कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ,
रंज लीडर को बहुत हैं, मगर, आराम के साथ.’
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा का विकास पश्चिम में ही हुआ था लेकिन अंग्रेजों ने भारत में सरकार की किसी भी नीति की आलोचना करने पर कठोर प्रतिबन्ध लगा रक्खा था. अकबर इलाहाबादी ने ब्रिटिश शासन में भारतीयों को मिली हुई आज़ादी के विषय में कहा है –
‘क्या गनीमत नहीं, ये आज़ादी,
सांस लेते हैं, बात करते हैं.’     
1919 में हुए जलियांवाला बाग़ हत्याकांड का समाचार छापना, उसके विरोध में भाषण देना या जन-सभा का आयोजन करना पूरी तरह निषिद्ध कर दिया गया. अकबर इलाहाबादी का इस सन्दर्भ में प्रसिद्द शेर है-
‘हम आह भी भरते हैं, तो हो जाते हैं बदनाम,
वो क़त्ल भी करते हैं तो, चर्चा नहीं होता.’ 
अकबर इलाहाबादी उन्नीसवीं सदी की पुरातनपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे. प्रगति के नाम पर सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक अथवा वैचारिक परिवर्तन उन्हें स्वीकार्य नहीं था. उनकी दृष्टि में रस्मो-रिवाज, तहज़ीब, मज़हबी तालीम, खवातीनों की खानादारी अर्थात स्त्रियों का कुशल गृह-संचालन, बड़ों का अदब आदि पौर्वात्य संस्कृति का अभिन्न अंग थे पर हमारे अग्रेज़ आक़ा हिन्दोस्तानियों की तरक्की के नाम पर इन सबको मिटाने पर और उनको मनसा, वाचा, कर्मणा काला अंग्रेज़ बनाने पर तुले हुए थे. अकबर इलाहाबादी ने जोशो-ख़रोश के साथ अपने अशआर के ज़रिये इसकी मुखालफ़त (विरोध) की थी.  अकबर इलाहाबादी यह जानते थे कि उनके जैसे परम्परावादी कौम को आगे नहीं ले जा सकते लेकिन उन्हें इस बात का भी इल्म था कि मुल्क को तरक्की की राह पर ले जाने का दावा करने वाले खुद दिशा हीन थे –
‘पुरानी रौशनी में, और नयी में, फ़र्क इतना है,
उन्हें कश्ती नहीं मिलती, इन्हें साहिल नहीं मिलता.’
(कश्ती – नाव, साहिल –किनारा) 
अंगेज़ी तालीम हमको अपने धर्म, संस्कृति और अपनी ख़ास पहचान से दूर कर रही थी. ये वो तालीम थी जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से हमको अपने से बड़ों के साथ बे-अदबी से पेश आना सिखा रही थी –
‘हम ऐसी कुल किताबें, क़ाबिले ज़ब्ती समझते हैं,
जिन्हें पढ़कर के बेटे, बाप को खब्ती समझते हैं.’
(क़ाबिले ज़ब्ती – ज़ब्त किये जाने योग्य)
इस नयी तालीम ने भारतीय युवा पीढ़ी को सिखाए थे तो बस, सूट-बूट पहनना, टेबल मैनर्स, बालरूम डांस करना और अपनों के ही बीच बेगाना बन कर रहना –
हुए इस क़दर मुहज्ज़ब, कभी घर का मुंह न देखा,
कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर.’
(मुहज्ज़ब – सभ्य)                           
अकबर इलाहाबादी स्त्री-शिक्षा के विरोधी नहीं थे लेकिन वो चाहते थे कि पढ़-लिखकर लड़की मज़हब-परस्त बने, कुशल गृहिणी बने, एक अच्छी बीबी बने, एक अच्छी माँ साबित हो न कि फैशन की पुतली और महफ़िलों की रौनक बने –
‘तालीम लड़कियों की, लाज़िम तो है मगर,
खातून-ए-खाना हो, वो सभा की परी न हो.’
(लाज़िम – आवश्यक, खातून-ए-खाना – कुशल गृहिणी)
आज से सौ-सवा सौ साल पहले कोई सोच नहीं सकता था कि सभ्य घरों की महिलाएं और लड़कियां बारात में जाएँगी और सार्वजनिक स्थानों पर खुले-आम नाचेंगी पर नयी तालीम ने हमको यह मंज़र (दृश्य) भी दिखा दिया था –
‘तालीम-ए-दुख्तरां से, ये उम्मीद है ज़रूर,
नाचे खुशी से दुल्हन, खुद अपनी बरात में.’
(तालीम-ए-दुख्तरां – शिक्षित बेटी)        
अकबर इलाहाबादी पर्दा प्रथा के बड़े हिमायती थे लेकिन उन्हें मालूम था कि एक न एक दिन हिंदुस्तान से ये रस्म ज़रूर उठ जाएगी –
गरीब अकबर ने बहस परदे की, बहुत ही खूब की, लेकिन हुआ क्या?
नकाब उलट ही दी उसने कहकर, कि कर लेगा मुआ क्या?’

मैं और मेरे साथ ही तमाम तरक्की पसंद आज अकबर इलाहाबादी को अप्रगतिशील, परम्परावादी, दकियानूसी, स्त्री-स्वातंत्र्य तथा नारी-उत्थान का विरोधी कह सकते हैं लेकिन उनके अशआर को पढ़कर ऐसा हो ही नहीं सकता कि हमको गुदगुदी न हो, हमारे होठों पर मुस्कराहट न आये या हम खिलखिलाकर हंस न पड़ें.                        

रविवार, 29 जनवरी 2017

सूरदास जी से क्षमायाचना के साथ -



सूरदासजी से क्षमा याचना के साथ - 
मैया मोरी, मैं नहिं हिरना मारयो
सबके सनमुख करी खुद्कुसी, बिरथा मोहि फसायो
जो गुलेल तक नाहिं चलावत, गोली कैसे दाग्यो
जैसे ही हिरना स्वर्ग सिधार्यो, रपट लिखावन भाग्यो
बिसनोई सब बैर पड़ें हैं, वहां जाय पछतायो
साबित भई न कोई गवाही, व्यर्थ अदालत लायो
ममता, दया, धरम, करुना सब घुट्टी में ही पायो
‘बीइंग ह्यूमन’ स्थापित कर, दुनिया भर में छायो    
हिरना-रक्सक की उपाधि, पाने को नाम लिखायो          
मैया मोरी, ----
(चेतावनी : ‘हिरना-रक्षक’ को ‘हिरण्यकश्यप’ समझने अथवा पढ़ने वालों का वही हशर होगा जो कि मरहूम हिरना का हुआ है.)    

मंगलवार, 24 जनवरी 2017

सरमद शहीद



सरमद शहीद -
17 वीं शताब्दी के शहीद, सरमद के विचारों और उसके विचारों की तुलना हम संत कबीर के विचारों और उनके चमत्कारी व्यक्तित्व से कर सकते हैं. दोनों ही निर्भय थे, बेबाक थे, उदारवादी विचारधारा के पोषक थे और समन्वयात्मक प्रवृत्ति के थे. दोनों के लिए ‘माया’ महा ठगिनी थी और दोनों ही कर्मकांड को पाखण्ड मानते थे. कबीर के जीवन और उनके विचारों के विषय में तो सबको पता है किन्तु सरमद के विषय में बहुत कम लोग जानते हैं.
सरमद के प्रारंभिक जीवन के विषय में हमको मुख्यतः तीन फ़ारसी ग्रन्थ– ‘मुहसिन फ़ानी की ‘दबिस्तान-मज़ाहिब’, शेर खां लोदी की ‘मिरात-उल-खयाल’ तथा वालेह दागस्तानी की रियाज़-उल-शुअरा’ से जानकारी मिलती है. दिल्ली से प्रकाशित ‘जवाहिरे मंज़ूम’ की भूमिका में मौलाना अबुल कलम आज़ाद ने सरमद पर उपयोगी जानकारी दी है. प्रोफ़ेसर मुजीब अहमद के उर्दू नाटक ‘खानाजंगी  में सरमद और दाराशिकोह की मित्रता को बहुत खूबसूरत अंदाज़ में पेश किया गया है. भाई संतोख सिंह के पंजाबी ग्रन्थ ‘सूरज प्रकास’ में सरमद की शहादत का बड़ा मार्मिक चित्रण किया गया है. एफ़. एम असीरी की विश्व भारती, कलकत्ता से प्रकाशित ‘रुबाईयात-ए-सरमद’ से हमको सरमद और उसके क़लाम की उपयोगी जानकारी मिलती है.       सरमद का जन्म सोलहवीं शताब्दी के अंत अथवा सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ईरान के शहर, काशान के एक यहूदी परिवार में हुआ था. शेर खां लोदी उसे आर्मीनिया का निवासी मानता है. बाद में सरमद ने इस्लाम को स्वीकार कर लिया था. सरमद कहता है –
‘सरमद ब जहाँ बसे निको नाम शुदी,
अज मज़हब-ए-क़ाफ़िर चू सू-ए-इस्लाम शुदी.’
(सरमद तूने बड़ा नाम रौशन किया जो तू क़ाफ़िर से मुसलमान बन गया.)
सरमद के दोनों गुरु – मुल्ला सदरुद्दीन शीराज़ी तथा मिर्ज़ा कासिम फ़िरदंसकी ईरान के प्रसिद्द सूफ़ी विचारक थे. उनकी उदार विचारधारा ने पहले से ही उदार और उन्मुक्त विचारधारा के सरमद को और भी अधिक उदार बना दिया. भारतीय दर्शन के जानकार, मिर्ज़ा फ़िरदंसकी से उसने भारतीय वेदांत के मर्म को सीखा था. अपने भारत आगमन से पूर्व ही वह भर्तृहरि से लेकर कबीर तक की विचारधारा से प्रभावित हो चुका था.   
          सरमद व्यवसाय से व्यापारी था. व्यापार के सिलसिले में वह सिंध प्रान्त के थट्टा शहर पहुंचा जहाँ कि उसकी मुलाक़ात अभयचंद से हुई.   सरमद अभयचंद के प्यार में अपनी सुध-बुध खो बैठा. धन-संपत्ति को त्याग, मान-सम्मान को परे रख वह अपने महबूब की चौखट पर बैठकर कहने लगा –
नमीं दानम दरीं चर्खे कुहन दैर
खुदाए मन, अभयचंद या ग़ैर
(मैं नहीं जानता कि इस आसमान के नीचे मेरा खुदा अभयचंद है या कोई और.)
अभयचंद भी सरमद के व्यक्तित्व, उसके विचारों और उसके अगाध प्रेम से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. अभयचंद ने सरमद को अपना प्रेमी, अपना पीर, अपना मुर्शिद स्वीकार कर लिया. अभयचन्द, सरमद की तरह ही मुसलमान हो गया. किन्तु ये दोनों शागिर्द और उस्ताद धार्मिक कट्टरता से कोसों दूर थे. अभयचंद कहता है -       
          ‘हम मुती-ए-फ़िर्कानम, हम किशीशो रह्बानम
रब्बी यहूदानम, क़ाफ़िरम न मुसलमानम.’
(मैं कुरान को भी मानता हूँ और यहूदियों के तरीके पर भी चलता हूँ. मैं (न तो मैं यहूदी आलिम हूँ, न क़ाफ़िर हूँ, न मुसलमान हूँ.) 
सरमद और अभयचंद का यह लौकिक प्रेम कब आध्यात्मिक प्रेम में परिवर्तित हो गया, यह दोनों को पता ही नहीं चला. थट्टा से यह प्रेमी-युगल लाहौर चला गया और फिर वहां से सिंध प्रान्त के हैदराबाद. शाहजहाँ के शासन काल में 1655 में ये दोनों शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) पहुंचे. एक उन्मुक्त विचारक और फ़ारसी के शायर के रूप में सरमद की ख्याति उसके दिल्ली पहुँचने से पहले ही वहां पहुँच चुकी थी. दिल्ली में सरमद की भेंट, क़ादिरी सिलसिले के ख्वाजा सब्ज़वारी, हरे-भरे शाह से हुई और वह उन्हीं के साथ रहने लगा.
सरमद ने अपने उदार विचार से दिल्ली के ख़ासो-आम को अपनी ओर आकृष्ट किया. उसके मुरीदों में प्रमुख था- शाहज़ादा दाराशिकोह. सरमद और दाराशिकोह, दोनों ही, समन्वय, सद्भाव और सहिष्णुता के पक्षधर थे और घृणा, द्वेष व धर्मान्धता का उनके जीवन में कोई महत्त्व नहीं था.
रुबाइयों की रचना करने में सरमद का नाम खैयाम के बाद लिया जाता है. गजलों में उसने हाफ़िज़ का अनुकरण किया था. सरमद कहता है –
‘बा फ़िक्रो ख़याले कस न बाशद कारम
दर तूरे ग़ज़ल तरीक-ए-हाफ़िज़ दारम
अम्मा बरुबाई अम मुरीदे खैय्याम
न जुर आक्शे बादा-ए-ऊ बिसियारम’
(मुझको किसी के विचार अथवा चिंतन-पद्धति में कोई रूचि नहीं है. मेरी ग़ज़लों पर हाफ़िज़ का प्रभाव है और रुबाइयों में, मैं, खैय्याम का अनुयायी हूँ. किन्तु खैय्याम की रचनाओं में जो मदिरा का सागर बहता है, वह मेरी रचनाओं में नहीं है.)       
‘जवाहिरे मंज़ूम’ में उसकी 321 फ़ारसी रुबाइयाँ संकलित हैं. सरमद की रुबाइयाँ कृत्रिम अलंकार और काव्यात्मक चमत्कार से मुक्त हैं. उसकी रुबाइयाँ सरल हैं, मौलिक विचारों से युक्त हैं और पहाड़ी नदी जैसी प्रवाहपूर्ण हैं. सरमद कहीं से भी और किसी से भी विचारों का कंचन ग्रहण करने के लिए तत्पर रहता था. भर्तृहरि के वैराग्य-शतक का एक प्रसिद्द श्लोक दृष्टव्य है –
‘भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता, स्तपो न तप्तं वयमेव त्यप्तः
कालेन यातोवय मे वयाता स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः.
(हमने विषयों का उपभोग नहीं किया है अपितु विषयों ने ही हमारा उपभोग किया है. हमने तप नहीं किया है अपितु तप ने ही हमको तपा डाला है. काल नहीं बीता है अपितु काल ने ही हमको बिता डाला है. इतना होने पर भी हमारी तृष्णा तो युवा रही रही आई किन्तु हम बूढ़े हो गए.)
सरमद कहता है –
‘राज़ी दिले दीवाना ब तकदीर न शुद
फ़ारिग ज़ख़यालो फ़िक्रो तदबीर न शुद
अय्यामे शबाब रफ़्त व बाक़ीस्त हवस
आ पीर शुदम आरज़ू पीर न शुद.
(दीवाने का दिल अपनी तक़दीर पर राज़ी नहीं हुआ और कोशिश, फ़िक्र से आज़ाद नहीं हुआ. जवानी का अपना ज़माना गुज़र गया मगर दिल में ख्वाहिशें बाकी हैं. हम बूढ़े हो गए लेकिन हमारी आरजूएं अभी भी बूढ़ी नहीं हुई हैं.)
कबीर की बानी है –
‘माला फेरत जुग भया, गया न मनका फेर,
करका मनका डारि के, मनका-मनका फेर.
सरमद कहता है –
‘बा-खिरका माशो तारे ग़लतगीर ग़लत
ईं ज़ोह्दो रिया ज़ियाकारे ग़लतगीर ग़लत
सर-रिश्तए महरे यार दर्दस्त बयार
ईं सबह ओ जुन्नार ग़लतगीर ग़लत.’
(यह गुदड़ी बेकार है, इसका एक-एक सूत बेकार है. यह सब दिखावा है, हानिकारक और बेकार है. ऐ राह भटके हुए ! तू उसके करम से रिश्ता जोड़. यह माला अनुचित है और यह जनेऊ व्यर्थ है.)            
प्रेम में पूर्णतः निमग्न होकर सरमद अपनी सुधबुध भूल गया था. उसने दिगम्बरत्व (लिबास-ए-उरयानी) को अपना लिया था. लोगों ने उसके नंगे रहने की (उरयानी की) वजह पूछी तो उसने जवाब दिया –
‘लिबास-ए-उरयानी में सिलवटें नहीं पड़तीं.’
सरमद ने 1656 से चल रहे गृह-युद्ध (खाना-जंगी) को विनाशकारी बताया. ऐसा कहा जाता है कि उसने दाराशिकोह के बादशाह बनने की भविष्यवाणी की थी पर बादशाह बन बैठा भाइयों को मौत के घाट उतारने वाला और अपने बाप को क़ैद में डालने वाला औरंगज़ेब.
सरमद को न तो औरंगज़ेब की धर्मान्धता स्वीकार थी और न ही उसे शहर कोतवाल मुल्ला कवी के षड्यंत्र. इन सबका परिणाम शीघ्र सामने आ गया. सरमद को दरबार में बुलाया गया. उस पर मुख्यतः तीन  इलज़ाम लगाए गए. पहला था –‘दिगम्बरत्व.’
सरमद ने बादशाह को जवाब दिया –
‘आंकस कि तुरा ताजे जहाँबानी दाद
मारा हमा अस्बाबे परेशानी दाद
पोशाक लिबास हरकिरा एबे दीद
बे-ऐबां रा लिबासे उरयानी दाद
(जिसने तुझे बादशाह का ताज दिया है, उसी ने मुझे फिक्र करने का सामान दिया है. उसने जिसे अवगुणों से भरपूर देखा, उसे वस्त्र प्रदान किए और जो दोष-रहित थे, उन्हें दिगम्बरत्व से सम्मानित किया.)
सरमद पर दूसरा आरोप था –‘मेराजे जिस्मानी से इंकार’ (हज़रत मोहम्मद के स-शरीर स्वर्ग जाने की परिकल्पना में अविश्वास). सरमद का चमत्कारों में विश्वास नहीं था. उसने कहा –
‘हर कस कि सिर्रे हकीक़तश बावर शुद
ऊ पहन तर अज़ सिपहर पहनावर शुद
मुल्ला गोयद कि बार फ़लक शुद अहमद
सरमद गोयद फ़लक ब अहमद दर शुद.’
(हर प्राणी जिसको कि सत्यानुभूति पर विश्वास हो गया, उसका चेतन व्यक्तित्व असीम से भी व्यापक हो गया. मुल्ला कहता है कि हज़रत मोहम्मद आकाश में गए पर सरमद कहता है कि आकाशीय व्यापकता  खुद हज़रत मोहम्मद के वुजूद में समा गयी.)
सरमद सतत सत्य की खोज में लगा रहता था. वह मुसलमान होते हुए भी कलमा (‘ला इलाहा लिल्लिल्लाह, मुहम्मदुर्रसूलिल्लाह’ अर्थात् नहीं है, अल्लाह के सिवा, अन्य कोई और मुहम्मद उसका आखिरी पैगम्बर है) पूरा नहीं पढ़ता था, केवल ‘ला इलाहा’, अर्थात् खुदा नहीं है, तक ही कहता था. उसका कहना था कि वह अभी अनास्तित्व तक ही पहुंचा है, उसे अभी तक ईश्वरानुभूति नहीं हुई है.
सरमद के विरोधियों को उसके इन विचारों पर घोर आपत्ति थी. लिबास-ए-उरयानी, मेराजे-जिस्मानी से इंकार और कलमा पूरा न पढ़ना मज़हबी अदालत द्वारा उसे मृत्य-दंड दिए जाने के ज़ाहिरी कारण बने पर वास्तव में औरंगज़ेब तथा कठमुल्लाओं की उसके प्रति नाराज़गी ही उसको सजा-ए-मौत दिए का कारण थी. मज़हबी अदालत ने उसे तौबा करने का मौक़ा दिया पर उसके जैसा निर्भय व्यक्ति किसी के सामने घुटने टेकना कहाँ जानता था? उसे बादशाह से क्षमा मांगने के लिए कहा गया. पर वह बोला –
‘सुल्ताने खुदम, मिन्नते सुल्तां न कशम’
(मैं खुद सुल्तान हूँ, मैं सुल्तान की मिन्नत नहीं करूँगा)
 उसने खुशी-खुशी मृत्यु का वरण किया. सैकड़ों साल पहले ‘अनल हक़’ की आवाज़ बुलंद करने वाले मंसूर-बिन-अल-हल्लाज ने सत्य की बलि वेदी पर अपने प्राण अर्पित कर दिए थे. सरमद ने कहा –
‘उमरेस्त कि आवाज़-ए-मंसूर कुहन शुद
मन अस्सरे नौ जलवा दहन दारो रसन रा.’
(मंसूर की कहानी को एक मुद्दत हो गयी है. मैं अब नए सिरे से फांसी की रौनक बढ़ाऊंगा.)
1661 में दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर उसका सर कलम किए जाने का इंतज़ाम किया गया. क़त्ल होने से पहले जल्लाद की तलवार में भी उसे अपने महबूब की छवि दिखाई दे रही थी –
फ़िदाए तुशून बया-बया कि तू बहर सुरते
कि मी आईं मंतरा खूब शनासम
(मैं तुझ पे मर मिटा हूँ, आ! आ! तू किसी भी सूरत में आ, मैं तुझे खूब पहचानता हूँ.) 
सरमद का अद्भुत व्यक्तित्व, उसकी उत्कृष्ट काव्य-प्रतिभा, उसका सत्यान्वेषण, उसका प्रेमोन्माद, उसका साहस, अपने कातिलों को क्षमा करने का उसका बड़प्पन, सबके प्रति उसका प्रेम-भाव, उसका शांति तथा सद्भाव का सन्देश, इन सबने उसे इतिहास में अमर कर दिया है. उसकी अनूठी दास्तान हमको बहुत दिलचस्प लगती है किन्तु हम इसके सामने उसके मानवता और प्रेम के सन्देश को भूल जाते हैं. उसे हम सत्रहवीं शताब्दी का कबीर कह सकते हैं. उसने कबीर की ही भांति किताबी ज्ञान से अधिक प्रेमानुभूति को महत्त्व दिया था. ईश्वर से सच्ची प्रीत को ही वह जीवन का लक्ष्य मानता था. कबीर प्रेम की खातिर तन, मन, धन, यहाँ तक कि अपने शीश (अहंकार) देने का सौदा भी फायदेमंद मानते हैं-
‘नेह निबाहे ही बनै, सोचै बने न आन,
तन दै, मन दै. शीश दै, नेह न दीजै जान.’
सरमद कहता है - 
‘दर मुसलके इश्क़ जुज़ निकोरा न कशंद
लागर सिफ्ता ब ज़िश्त खूंरा न कशंद
तू आशिक़े सादकी जू कुश्तन म गुरेज़
मुरदार बुअद हर आं कि ऊरा न कशंद
(प्रेम की बलिवेदी पर केवल सच्चे प्रेमी की ही बलि दी जाती है. भला नीच और तुच्छ प्राणियों की भी कहीं बलि दी जाती है? तू अगर सच्चा आशिक है तो मरने से मत डर. कहीं भला मुर्दों अर्थात मुर्दादिलों की भी कहीं बलि दी जाती है?)
यह शेर हम सबने सुना है –
‘जज़्बए इश्क़ सलामत है तो इंशा अल्ला,
कच्चे धागे में चले आएँगे सरकार बंधे.’
सरमद ने काबा, काशी, मंदिर, मस्जिद, कलीसा में उसे खोजने के बजाय अपने इश्क़ पर भरोसा करते हुए बहुत पहले कहा था –
‘सरमद अगरश वफ़ास्त खुद मी आयद
गर आमदनश खास्त खुद मी आयद
बेहूदा चिरा दर-पए-ऊ मी गर्दी
बे नशीं गर-ऊ खुदास्त खुद मी आयद
(सरमद अगर उसमें वफ़ा है तो वह खुद आएगा. उसका आना अगर वाजिब है तो वह खुद आएगा. तू क्यों उसके लिए मारा-मारा फिरता है? तू बैठ, अगर वह ‘खुद-आ’, अर्थात् स्वयं आने वाला है तो वह स्वयं आएगा.)      
हिंदी के पाठकों के लिए सरमद एक अपरिचित सा नाम है किन्तु यदि हम एक बार सरमद के जीवन और कृतित्व को पढ़ें और समझें तो वह हमको बहुत अपना सा लगेगा. उसकी विचारधारा में वेदों का सार मिलेगा, भगवान महावीर की अहिंसा और गौतम बुद्ध की करुणा की शिक्षा मिलेगी, भर्तृहरि के वैराग्य-शतक की छाया मिलेगी, सूफियों के वह्दतुल-वुजूद और सुलेह्कुल का सन्देश मिलेगा, कबीर की बानी की गूँज सुनाई देगी.
आज नफ़रत और फ़िरकापरस्ती के इस माहौल में हमको फिर एक सरमद चाहिए ताकि फिर से प्रेम और सिर्फ प्रेम की धारा में हम डूबें तो ऐसे डूबें कि उसमें से निकलने का कभी नाम ही न लें.