शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

ख़त का मजमून भांप लेते हैं -----

भगवान हज़ारों बन्दों में से किसी एक की आँखों को एक्सरे-शक्ति प्रदान करता है.
इस एक्सरे-शक्ति से वह शख्स लिफ़ाफ़े के अन्दर रखे ख़त में लिखे मजमून को बिना लिफ़ाफ़ा खोले पढ़ सकता है.
वह हमारे दिल के अन्दर चल रही खुराफ़ातों को बखूबी जान सकता है और अपने दिव्य-लाइ डिटेक्टर से हमारी ज़ुबान से निकली हर बात के अन्दर छुपे हुए झूठ को बेनक़ाब कर सकता है.
ऐसी दिव्य-शक्ति प्राप्त व्यक्ति के प्रति हम श्रद्धा-भाव व्यक्त करते हैं किन्तु जब घर में ही ऐसी कोई शख्सियत मौजूद हो तो मन में श्रद्धा के साथ भय का संचार भी होता है.
तुलसीदास जी के शब्दों में हम कह उठते हैं–
‘पीपर पात सरिस मन डोला’
एक जुडिशिअल मजिस्ट्रेट की संतान होने के हमको बड़े फ़ायदे थे.
रौब-दाब और आराम के साथ हमारा बचपन बीता.
लोगबाग़ हमारी खुशकिस्मती पर रश्क करते थे पर उन जलने वालों में से किसी ने घर में ख़त को खोले बिना ही उसका मजमून भांपने वाले मजिस्ट्रेट साहब की दिव्य-एक्सरे शक्ति से होने से होने वाली हमारी परेशानियों के बारे में नहीं सोचा था.
किसी और घर में तो लड़का क़त्ल कर के भी आ जाए तो घर वाले उसे अदालत में क़ातिल सिद्ध किए जाने तक भोला मासूम और निर्दोष ही समझते हैं लेकिन हमारे घर में अगर लड़का किसी को चपतिया कर भी आ जाता था या उसकी जेब से कोई अंजाना फ़ाउंटेन पेन भी निकल आता था तो हमारे पिताजी आँखों ही आँखों से उसके ख़िलाफ़ मजिस्ट्रेट इन्क्क्वायरी बिठा दिया करते थे.
बिना ख़त खोले ख़त का मजमून भांप लेने की पिताजी की दिव्य-शक्ति का एक दिलचस्प किस्सा याद आ रहा है -
हमारी मझली बुआ की शादी के लिए एक लड़के से बात लगभग तय हो गयी थी. लड़के ने ओवरसीयर (आज का जूनियर इंजिनियर) की परीक्षा उत्तीर्ण कर इंजिनियर बनने के लिए ए० एम० आई० की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली थी और वह शीघ्र ही उत्तर प्रदेश सरकार के पी० डब्लू० डी० में असिस्टेंट इंजिनियर के पद पर अपनी पहली पोस्टिंग पर जाने वाला था.
पिताजी को पता नहीं क्यों उस लड़के के बताए हुए बयान पर शक हो गया. उन्होंने जब उस से अपने हाकिमी स्टाइल में उसके कॉलेज और उसकी नौकरी के बारे में कुछ सवालात पूछे तो उसने अटकते-भटकते-बहकते से जवाब दिए.
पिताजी ने बाबा को आगाह किया कि कोई भी लड़का अपनी पढ़ाई और नौकरी के बारे में ऐसे अटक-अटक कर तभी जवाब देता है जब कि वह सरासर झूठ बोल रहा हो.
पिताजी के अनुरोध पर बाबा ने रिश्ता पक्का करने की रस्म कुछ समय के लिए टाल दी.
अब पिताजी की विधिवत मजिस्ट्रेट इन्क्वायरी शुरू हो गयी और पंद्रह दिन में ही पता चल गया कि उन साहबज़ादे ने न तो बताए गए
संस्थान से ए० एम० आई० किया था और न ही वो पी० डब्लू० डी० में बताई गयी जगह पर असिस्टेंट इंजिनियर थे.
पिताजी की इन दिव्य-शक्तियुक्त आँखों से उनके चपरासी बड़े भयभीत रहते थे.
बाराबंकी में हमारे यहाँ मिथिलेश पंडित नामक एक चपरासी हुआ करता था. पंडित हमारे घर का सौदा लाने में नियमपूर्वक डंडी मारा करता था. हमारे बंगले में लगे आधा दर्जन जामुन के पेड़ सारे बाराबंकी में मशहूर थे. पिताजी के साथी अफ़सरों में इन जामुनों की बड़ी डिमांड रहा करती थी और एक्सचेंज ऑफ़र के अंतर्गत उनके यहाँ से भी फल-सब्ज़ी इफ़रात में आया करते थे.
पंडित को हमारे जामुनों के पेड़ों से बड़ा प्यार था. पंडित खुद तो पेड़ पर नहीं चढ़ पाता था पर किसी राह चलते मोगली को जामुनों का लालच दे कर वह उस से ढेरों जामुन तुड़वा कर जामुनों का बंदर बाँट कर उनमें से कुछ जामुन उस मोगली को दे कर कुछ हमको दे कर बाक़ी के आधे से ज़्यादा जामुन अपने क़ब्ज़े में कर लेता था.
एक बार पंडित बाज़ार से बड़े अच्छे किस्म के एक सैकड़ा नीबू तीन रूपये में ले आया. माँ तो इतने सस्ते नीबू पा कर मगन हो गईं लेकिन पिताजी को कुछ दाल में काला नज़र आने लगा. उन्होंने बहुत कैज़ुअली पंडित से पूछा –
‘अब्बास साहब कैसे हैं?’ (जामुन-प्रेमी डिप्टी कलेक्टर अब्बास साहब पिताजी के मित्र थे और उनका बंगला नीबू के पेड़ों के लिए मशहूर था)
पंडित ने तपाक से जवाब दिया –
‘अच्छे हैं ! आपको सलाम भेजा है !’
अपने जवाब पर खुद ही फंसे पंडित ने चुपचाप एक सैकड़ा नीबू के वसूले हुए तीन रूपये माँ के चरणों में चढ़ा दिए.
झांसी में बी० ए० करने के दौरान हम महीने में तीन फ़िल्में चोरी से और एक फ़िल्म सीनाज़ोरी से देखा करते थे पर पिताजी तक पता नहीं कैसे, हमारी इन चोरी से देखी गयी फ़िल्मों की ख़बर पहुँच जाया करती थी.
लोकल अखबार में फ़िल्मों के विज्ञापन देख कर पिताजी माँ को हमारे कॉलेज से लौटने से पहले ही बता दिया करते थे कि हम कौन सी फ़िल्म देख कर घर वापस आने वाले हैं.
रिटायर हो कर पिता जी लखनऊ में प्रैक्टिस करने लगे थे.
एक बार हमारी बुआजी का बेटा जिसकी कि कई टैक्सियाँ चलती थीं उन्हें खोजता हुआ कोर्ट पहुँच गया.
भांजे ने मामा श्री के चरणों का स्पर्श किया तो उन्होंने उसे आशीर्वाद देने के बजाय एक सवाल दाग दिया –
‘बर्खुरदार, तुम्हारी टैक्सी किस इल्ज़ाम में ज़ब्त की गयी है?’
भांजे ने हैरत से पूछा –
‘मामा जी, हमारी टैक्सी ज़ब्त हो गयी है, यह आपको कैसे पता चला?’
मामा श्री ने जवाब दिया –
‘तो क्या तुम मेरे पैर छूने के लिए मुझे कोर्ट में खोज रहे थे?’
अब एक पुराना किस्सा -
पिताजी को अपनी ससुराल में वी० आई० पी० ट्रीटमेंट मिलता था.
संयुक्त परिवार के उनके डेड़ दर्जन साले उन्हें अपना हीरो मानते थे. पिताजी भी अपने सालों को बड़ा प्यार करते थे.
हाईस्कूल में पढ़ने वाले हमारे एक मामा को हीरो बनने का चस्का लग गया था.
हर पंद्रह मिनट बाद वो अपनी पैंट की पिछली जेब से कंघा निकाल कर अपनी ज़ुल्फों को संवारा करते थे.
एक बार हमारे हीरो मामा ने पिताजी के सामने ही अपनी ज़ुल्फ़ें सँवारने के लिए अपना कंघा निकाला तो उनकी जेब से कंघे के साथ ताश के पत्ते की पान की बेगम भी निकल पड़ीं.
पिताजी ने उनको घूरते हुए पूछा –
‘क्यों जनाब. क्या ये बेगम साहिबा भी आपके कंघे के साथ आपके पहलू में रहती हैं?’
मामा जनाब ने हें-हें करते हुए हाथ जोड़ कर अपने जीजाजी के सवाल का जवाब गोल कर दिया.
अब इस वाक़ए के दो दिन बाद ही एक हादसा हो गया.
हमारे यही हीरो मामा रोते-बिसूरते हुए बदहवासी की हालत में घर पहुंचे.
घर से दो-तीन मील दूर वो अपनी साइकिल से जंगली रास्ते से गुज़र रहे थे कि एक भेड़िया उनका पीछा करने लगा. मामा अपनी साइकिल छोड़ कर एक पेड़ पर चढ़ गए. अपने शिकार को पेड़ पर चढ़ा देख कर भेड़िया तो कुछ देर बाद दूर चला गया लेकिन जब मामा उतरे तो तब तक उनकी साइकिल गायब हो चुकी थी.
हीरो मामा की दर्द भरी रोमांचक गाथा सुन कर सब बड़े-बूढ़े कह रहे थे –
‘साइकिल गयी तो क्या हुआ, बच्चे की जान तो बच गयी !’
इस करुण गाथा को सुन कर हीरो के मजिस्ट्रेट जीजाजी की प्रतिक्रिया थोड़ी भिन्न थी.
उन्होंने अपने हीरो साले के गाल पर एक झन्नाटेदार झापड़ रसीद करते हुए डपट कर उन से पूछा –
‘इस भेड़िये से जुए में तुम कितने रूपये हारे थे जो उसने तुम्हारी साइकिल ज़ब्त कर ली?’
हीरो मामा ने पिताजी के चरण पकड़ कर रोते-रोते जवाब दिया –
‘पच्चीस रूपये ! जीजाजी !’
आगे की कथा सुखान्त है.
उस भेड़िये रूपी लड़के से बिना कुछ लिए-दिए हीरो मामा की साइकिल छुड़ाई गयी. फिर शिकार और शिकारी दोनों की कान-पकड़ाई और हलकी सी ठुकाई के बाद उनको अगली बार जुआ खेलने पर जेल की हवा खिलाने की धमकी भी दी गयी.
पिताजी के स्वर्गवास को तो अट्ठाईस साल होने आ रहे हैं पर उनकी लाइ डिटेक्टर वाली दिव्य-शक्ति हमारी श्रीमती जी में और हमारी बेटियों में स्थानांतरित हो गयी है.
हम जब भी कोई गड़बड़ वाला काम कर के भोला और नादान होने का अभिनय करते हैं तो फ़ौरन पकड़े जाते हैं.
ख़त का मजमून भांपने वालों के घर में रहते हुए हमको किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता था और आज भी मुल्ज़िम बन कर कितनी बार कठघरे में खड़ा होना पड़ता है, इसका हिसाब लगाने के लिए तो किसी सुपर कंप्यूटर की सेवाएँ लेना ज़रूरी हो जाएगा.

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2021

विजयादशमी के पर्व पर दो अलग मिजाज़ की रचनाएँ

किस की किस पर विजय का पर्व?
पाप बड़ा या पुण्य बड़ा है
प्रश्न अचानक आन खड़ा है
पाप-मूर्ति रावण का पुतला
सदा राम से दिखा बड़ा है
राम तो है दुर्गम वन-वासी
रावण स्वर्ण-नगर का वासी
पर्ण कुटी में व्याप्त उदासी
हर सुख भोगे महा-विलासी
पुण्य बुलबुले सा क्षण-भंगुर
पाप का शासन है स्थायी
पुण्य कंदमूल पर निर्भर
पाप उड़ाता दूध-मलाई
पुण्य है सूने मरघट जैसा
पाप सजे जैसे है मेला
पाप-पुण्य की परिभाषा को
आज बदलने की है वेला
दुखद पुण्य को कौन सहेगा
बुद्धिमान अब यही कहेगा
पुण्य से तुम छुटकारा पाओ
पाप को जीवन में अपनाओ.
(मेरी इस कविता के साथ, कुछ ऐसे ही विचार व्यक्त करती मोहतरमा तबस्सुम आज़मी की एक बहुत ही खूबसूरत और दिल पर असर करने वाली नज़्म पेश है)
कब?
हर साल जलाया जाता है
हर साल मिटाया जाता है
मिट्टी में मिलाया जाता है
और फिर भी वो पाया जाता है
जल कर कर भी कहाँ वो मरता है
बहरूप नया फिर भरता है
इंसान को ऐसे छलता है
इंसान के अन्दर पलता है
इंसान के पैकर (शरीर) में छुप कर
और बैठ के ज़हनों (दिमागों) के अन्दर
बस शोले उगलता रहता है
संसार ये जलता रहता है
दहशत (आतंक) का शरारत का रावन
नफ़रत का अदावत (शत्रुता) का रावन
ये बुग्ज़-ओ-कुदूरत (छुपी हुई शत्रुता) का रावन
इंसां की रिज़ालत (अधमता) का रावन
जिस रोज़ जलेगा ये रावन
नफ़रत का जलेगा जब ज़िन्दन (जिन्न)
जब फूल खिलेंगे घर-आँगन
तब प्यार से महकेगा गुलशन
कब इसको जलाया जाएगा?
कब ऐसा दसहरा आएगा?
कब ऐसा दसहरा आएगा?

शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

तब और अब

 सतयुगी ऋषियों की कामना –

न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।

कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥
(हे प्रभु! मुझे राज्य की कामना नही, स्वर्ग-सुख की चाहना नहीं तथा मुक्ति की भी इच्छा नहीं . मेरी एकमात्र इच्छा यही है कि दुख से संतप्त प्राणियों का कष्ट समाप्त होेजाए.)
कबीर जैसे संतों-फ़कीरों की कामना –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।
(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े)
आज के संतों, बाबाओं और नेताओं की कामना -
दाता इतना दीजिए, सम्बन्धी गश खायं,
मित्र, पड़ौसी, रोज़ ही भीख मांग कर खायं.
खून-पसीना एक कर, दमड़ी भी ना पायं,
जल-भुन कर हमसे सभी, तड़प-तड़प मर जायं.

शनिवार, 2 अक्तूबर 2021

आगे बढ़ो बाबा !

एक हाथ में लाठी ठक-ठक,
और एक में,
सत्य, अहिंसा तथा धर्म का,
टूटा-फूटा, लिए कटोरा.
धोती फटी सी, लटी दुपटी,
अरु पायं उपानहिं की, नहिं सामा,
राजा की नगरी फिर आया,
बिना बुलाए एक सुदामा.
बतलाता वो ख़ुद को, बापू,
जिसे भुला बैठे हैं बेटे,
रात किसी महफ़िल में थे वो,
अब जाकर बिस्तर पर लेटे.
लाठी की कर्कश ठक-ठक से,
नींद को उनके, उड़ जाना था,
गुस्ताख़ी करने वाले पर,
गुस्सा तो, बेशक़ आना था.
टॉमी को, खुलवा मजबूरन,
उसके पीछे, दौड़ाना था,
लेकिन एक भले मानुस को,
जान बचाने आ जाना था.
टॉमी को इक घुड़की दे कर,
बाबा से फिर दूर भगाया,
गिरा हुआ चश्मा उसका फिर,
उसके हाथों में थमवाया.
बाबा लौटा ठक-ठक कर के,
नयन कटोरों में जल भर के,
अपने सब अब हुए बेगाने,
लगा हर कोई पाप गिनाने.
भारत दो टुकड़े करवाया,
शत्रु-देश को धन दिलवाया,
नाथू जैसे देश-रत्न को,
मर कर फांसी पर चढ़वाया.
राष्ट्रपिता कहलाता था वह,
राष्ट्र-शत्रु पर अब कहलाए,
बहुत दिनों गुमराह किया था,
कलई खुल गयी वापस जाए.
विश्व उसे जानता नहीं है,
देश उसे मानता नहीं है,
उसकी राह पे चलने का प्रण,
अब कोई ठानता नहीं है.
बाबा अति प्राचीन हो गया,
पुरातत्व का सीन हो गया,
उसे समझना मुश्किल है अब,
भैंस के आगे बीन हो गया.
नई ऊर्जा मिली राष्ट्र को,
ख़ुशहाली मिल गयी राष्ट्र को,
नव-भारत का उदय हुआ है,
नया पिता मिल गया राष्ट्र को.
नया पिता मिल गया राष्ट्र को.
नया पिता मिल गया राष्ट्र को.

बुधवार, 29 सितंबर 2021

नाम पर मत जाइए

  अवधी के हास्य-कवि रमई काका की प्रसिद्द कविता है - 'ध्वाखा हुई गा' (धोखा हो गया). इस कविता के ग्रामीण नायक को लखनऊ शहर में आ कर एक से एक बड़े धोखे होते हैं. कुछ ऐसे ही धोखे मेरे साथ हुए हैं.

बम्बैया मसाला और घिसे-पिटे फ़ॉर्मूला वाली चालू फ़िल्में देख-देख कर फ़िल्मों का मेरे जैसा जैसा दीवाना भी बोर हो जाता था. आखिर कब तक हीरो-हीरोइन को पेड़ों के चक्कर लगाते हुए, बे-मौसम बारिश में भीगते हुए, बेसुरा, हल्ला-मचाऊ, कान-फोडू गाना गाते हुए कोई बर्दाश्त कर सकता है?

ऐसी फ़िल्मों की कहानियां बेसिर-पैर की ही होती हैं.
अपने बचपन में ही महा-रोमांटिक गीत गाने वाली, एक-दूजे के लिए वफ़ा की कसमें खाने वाली, लेकिन हालात की मारी जोड़ी बिछड़ जाती है.
एक-दूसरे से अंजान प्रेमी फिर मिलते हैं लेकिन तब उन में से कोई एक गरीब हो जाता है तो दूसरा अमीर.
गरीब का प्यार कायम रहता है और अमीर सब कुछ भूल जाता है.
भला हो – ‘क्या हुआ तेरा वादा, वो क़सम वो इरादा’ जैसे गाने का, जिस से दो बिछड़े हुए सितारों का फिर से ज़मीं पर मिलन हो जाता है.
सात समुन्दर पार कोई शेक्सपियर थे जिन्होंने न जाने किस मूड में – ‘कॉमेडी ऑफ़ एरर्स’ लिख मारी थी.
हमारे फ़िल्म निर्माता-निर्देशकों ने इस जुड़वां काण्ड पर दर्जनों फ़िल्में बना डालीं. लेकिन हमारे हीरोज़ को जब जुड़वां भूमिकाएं अपर्याप्त लगीं तो उन्होंने कहानीकारों को ट्रिपल रोल वाली कहानियां लिखने की सलाह दे डाली.
दिलीपकुमार और अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार भी ऐसी मौलिक कहानियों का हिस्सा बने और संजीव कुमार ने तो नौ-नौ भूमिका वाली फ़िल्म – ‘नया दिन नई रात’ ही कर डाली.
काने खलनायक का पीपों और रस्सियों से भरा अड्डा होना और उसकी एक अदद मोना डार्लिंग होना बड़ा ज़रूरी होता है.
हमारा निहत्था हीरो बंदर जैसी कलाबाज़ियाँ खाते हुए खलनायक की और उसके बंदूकधारी गुर्गों की जम कर धुनाई करते हुए अगवा की गयी हीरोइन को छुड़ा लाता है.
हीरोइन के बेरहम बाप का का ह्रदय-परिवर्तन हो जाता है.
आखिरकार हीरो-हीरोइन मिल जाते हैं और फ़िल्म के आख़िरी सीन में फिर से पेड़ों के चक्कर लगाते हुए पहले भी दिखाए गए गाने को गाते हुए वो हम से विदा लेते हैं.
मेरी फ़िल्मी दीवानगी पर ऐसी फ़िल्मों ने ब्रेक लगा दिया.
मैंने तय किया कि अब से मैं सिर्फ़ अच्छी कहानियों पर बनाई गयी फ़िल्में ही देखूँगा.
बिमल रॉय ने शरदचंद्र चट्टोपाध्याय की कहानियों पर कैसी-कैसी शानदार फ़िल्में बनाई थीं !
गुरुदत्त ने जब बिमल मित्र के उपन्यास – ‘साहब बीबी और गुलाम’ पर आधारित उसी टाइटल वाली फ़िल्म बनाई थी तो वह मुझे मूल उपन्यास से भी ज़्यादा अच्छी लगी थी.
रस्किन बांड की कहानी पर श्याम बेनेगल द्वारा निर्देशित फ़िल्म – ‘जूनून’ ने तो मेरा दिल ही जीत लिया था.
सत्यजित रे ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों को किस खूबसूरती से परदे पर उतारा था !
अब असली मुद्दे पर आया जाए. यानी कि नाम बड़े और दर्शन थोड़े वाली बात पर!
धर्मवीर भारती का उपन्यास – ‘गुनाहों का देवता’ एक फ़िल्म निर्देशक को बहुत पसंद आया था.
फ़िल्म-निर्देशक महोदय धर्मवीर भारती के पास पहुँच गए. जब इस प्रसिद्द उपन्यास पर फ़िल्म बनाने की बात चली तो भारती जी फ़िल्म-निर्देशक से उनकी पहले निर्देशित की गयी फ़िल्मों के नाम पूछ डाले. इस सवाल के जवाब में जब आधा दर्जन घटिया फ़िल्मों के नाम सुनाए गए तो भारती जी ने अपने उपन्यास की हत्या करवाने से इनकार कर दिया.
फ़िल्म-निर्देशक ने धर्मवीर भारती को टाटा करते हुए जम्पिंग जैक जीतेंद्र और राजश्री को ले कर ‘गुनाहों का देवता’ टाइटल से ही एक निहायत घटिया फ़िल्म बनाई और हमारे जैसे धर्मवीर भारती के हजारों-लाखों प्रशंसकों के पैसों और वक़्त को बर्बाद करवाया.
टॉलस्टॉय के उपन्यास – ‘वार एंड पीस’ पर अंग्रेज़ी में और रूसी भाषा में एक से एक शानदार फ़िल्में बनी हैं.
हमको रूसी भाषा तो आती नहीं थी और अंग्रेज़ी में हम सेमी-पैदल थे.
फ़िल्म देखने के बाद भी हमारे समझ में नहीं आया था कि लोगबाग आपस में इतना लड़ क्यों रहे थे.
1968 में एक फ़िल्म आई थी – ‘जंग और अमन’. इस फ़िल्म का टाइटल देख कर ही हमारा दिल बाग़-बाग़ हो गया.
वाह ! आख़िरकार ‘वार एंड पीस’ उपन्यास पर हिंदी में फ़िल्म बन ही गयी.
हम फ़िल्म देखने पहुंचे तो कास्टिंग देख कर कर हमारे कान खड़े हो गए. टॉलस्टॉय की कहानी पर बनी फ़िल्म में दारासिंह और मुमताज़ क्या कर रहे थे?
फ़िल्म के अंत में क्या हुआ, हमको पता नहीं क्यों कि हम तो फ़िल्म के इंटरवल में ही सिनेमा हॉल छोड़ कर भाग खड़े हुए थे.
एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन ने इंतकाम लेते-लेते हमको पका दिया था.
एंग्री यंग मैन की इमेज से हट कर उनकी फ़िल्म – ‘अमर अकबर एंथोनी’ देख कर हमको मज़ा तो बहुत आया था लेकिन एक वृद्ध अंधी महिला को एक साथ तीन नौजवानों का खून चढ़ाते देख हमने अपना सर पीट लिया था.
रही-सही क़सर शिर्डी वाले साईं बाबा के दरबार में उसी अंधी वृद्ध महिला की आँखों की रौशनी की वापसी वाले चमत्कार ने पूरी कर दी थी.
ऐसी बेसिर-पैर की कहानियों पर बनी फ़िल्मों में महारत हासिल कर चुके हमारे महानायक की जब फ़िल्म – ‘कुली’ आई तो हमारा ह्रदय प्रसन्न हो गया.
मुल्क राज आनंद के कालजयी उपन्यास – ‘कुली’ पर फ़िल्म बने और उसे जैसवाल साहब न देखें! भला ऐसा कभी हो सकता था?
अच्छा हुआ फ़िल्म ‘कुली’ देखने के लिए मुल्कराज आनंद इस दुनिया में मौजूद नहीं थे वरना हमको अखबारों में पढ़ना पड़ता कि एक विख्यात उपन्यासकार ने आधा दर्जन लोगों का बेरहमी से खून कर दिया.
संजय लीला भंसाली ने शरदचंद्र के उपन्यास – ‘देवदास’ पर जब फ़िल्म बनाने का फैसला किया तो हम सोच रहे थे कि बिमल रॉय के जादुई निर्देशन और दिलीपकुमार के कमाल के अभिनय से भी कुछ अधिक कलात्मक हमको देखने को मिलेगा.
पर हमको मिला क्या?
थोड़ी नींद, थोड़ी बेहोशी, और फिर अधूरी फ़िल्म छोड़ कर सिनेमा हॉल से भाग खड़ा होना.
'यादों की बारात' शायरे-इंक़लाब जोश मलिहाबादी की बहुत ही ख़ूबसूरत आत्मकथा है.
नासिर हुसेन ने 1970 के दशक में इस टाइटल की जो फ़िल्म बनाई, अगर उसे कोई शख्स किसी भी तरह जोश मलिहाबादी की ज़िंदगी से जोड़ कर दिखा दे तो कोहिनूर हीरा इंग्लैंड से वापस आते ही उसे इनाम में दिया जा सकता है.
भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखे गए यशपाल के प्रसिद्द उपन्यास – ‘झूठा सच’ पर आज तक कोई फ़िल्म नहीं बनी है लेकिन इस टाइटल पर बनी फ़िल्म में हम दो-दो धर्मेन्द्र की मारधाड़ देख चुके हैं.
तो मित्रो ! आप सब से प्रार्थना है कि आप फ़िल्म के नाम पर मत जाइए.
उसका बढ़िया टाइटल देख कर ही उसे देखने का फ़ैसला न कर लें.
आप ठोक बजा कर फ़िल्म के कहानीकार और उसके निर्देशक के बारे में भी जब तफ़सील से मालुमात हासिल कर लें तभी सिनेमा हॉल की ओर या फिर अपने टीवी की तरफ क़दम बढ़ाएं.

शनिवार, 25 सितंबर 2021

संगीत-नृत्य प्रेमी आसावरी

10 फ़रवरी, 2020 को जन्मी हमारी नातिन आसावरी उर्फ़ सारा आज साढ़े उन्नीस महीने की हुई हैं.
जन्म लेते ही तो नहीं, लेकिन 3-4 महीने की उम्र से ही उनका संगीत प्रेम हम सबको चकित कर रहा है.
उनका पहला पसंदीदा गाना येसु दास का गाया हुआ फिल्म 'सदमा' का -
'सुरमई अंखियों से, नन्हा-मुन्ना इक सपना दे जा रे’ था.
इस गाने को जब तक वो दो-तीन बार सुन नहीं लेती थीं उन्हें नींद ही नहीं आती थी.
येसु दास के अलावा उन्हें यह गाना अपनी नानी की आवाज़ में सुनना भी बहुत पसंद था.
एक और लोरी – ‘
नन्ही कली, सोने चली, हवा धीरे आना ---‘
भी उन्हें बहुत पसंद थी.
अब कुछ बड़ी होने पर आसावरी जी को नृत्य-संगीत की जुगलबंदी वाले ऐसे गाने बहुत पसंद आ रहे हैं जिनको सुन कर वो उन पर थिरक सकें.
‘उर्वशी, उर्वशी, टेक इट इज़ी उर्वशी –’
पर वो नॉन-स्टॉप डांस करती हैं.
और
‘इक हो गए हम और तुम, तो उड़ गयी नींदे रे’
को वो पहले ध्यान से सुनती हैं लेकिन वो थिरकना तभी शुरू करती हैं जब फिज़ां में – ‘हम्मा, हम्मा, हम्मा’ गूंजने लगता है.
आजकल वीडियो चैट पर वो अपनी नानी से –
‘नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए ----’ गाए जाने की फ़रमाइश भी करती हैं.
इन दिनों मन्ना डे का गाया हुआ फ़िल्म ‘तीसरी क़सम’ का भोजपुरी लोकगीत –
‘चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे, पिंजड़े वाली मुनिया’
उन्हें बहुत पसंद आ रहा है.
आजकल उनके घर की खिड़की पर एक बंदर आ जाता है.
उनकी मम्मी रागिनी जी गाने की एक अधूरी लाइन गाती हैं -
' मेरे सामने वाली खिड़की पे --'
आसावरी जी उस लाइन को पूरा करती हैं -
'एक मोटा मंकी रहता है'
हम सब इंतज़ार में हैं कि आगे चल कर कौन-कौन से गाने उनकी पसंद में आने वाले हैं.
अब तो आसावरी जी इन गानों के बोलों को अपने हिसाब से दोहराने भी लगी हैं.

मंगलवार, 21 सितंबर 2021

सर ए० ओ० ह्यूम का विलाप

 सर ए० ओ० ह्यूम का विलाप –

(सूरदास के पद – ‘तुम पै कौन दुहाबै गैया’ की तर्ज़ पर)

कांग्रेस की डूबत नैया
मात-सपूत जबर जोड़ी जब जाकी बनी खिवैया
दल के नेता संकेतन पै नाचैं ताता थैया
प्रतिभा-भंजक युवा-बिरोधी घर-घर फूट पडैया
आतम बानी बेद-बचन सम और न कछु सुनवैया
लोकमान्य गांधी नेहरु की संचित पुण्य मिटैया
ह्यूमदास प्रभु किरपा कीजो तुमहिं मुक्ति दिलवैया
नोट: ऐसा विलाप किसी भी राजनीतिक दल का संस्थापक कर सकता है. बस, हमको राजनीतिक दल के संस्थापक का नाम, राजनीतिक दल का नाम और उसे संचालित करने वाली जुगल-जोड़ी के नाम बदलने होंगे