शुक्रवार, 7 मई 2021

ये स्पेशल भाभीजियां

 ये किस्सा मेरी अपनी तीन भाभीजियों का नहीं है क्योंकि वो सभी सामान्य किस्म की भाभीजियों की केटेगरी में आती हैं. मैं तो इस में सिर्फ़ अविस्मरणीय, हैरतअंगेज़ और स्पेशल किस्म की चार भाभीजियों का ज़िक्र करने जा रहा हूँ.1.     

1. पहला क़िस्सा मेरे लखनऊ प्रवास का है, स्वीट 25 वाला. उन दिनों मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चरर था. लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चरर होते ही मैंने साल भर के अन्दर रेगुलर एक्सरसाइज़, टेनिस और संयमित आहार से अपनी दस-बारह साल पुरानी गोलमटोल गोलगप्पे वाली छवि उतार फेंकी थी. लोगों की दृष्टि में और खुद अपनी दृष्टि में मैं अच्छा-खासा स्मार्ट हो गया था. कुछ मेरे फ़ीचर्स, कुछ मेरे घुंघराले बाल, और कुछ मेरी बड़ी-बड़ी आँखें, लोगों को संजीव कुमार की याद दिला देती थीं और मैं विनम्रतापूर्वक उनके कॉम्प्लीमेंट्स को स्वीकार भी कर लेता था.

उन दिनों हमारे श्रीश भाई साहब आगरा में केन्द्रीय हिंदी संस्थान में पढ़ाते थे और मैं आए दिन आगरा के चक्कर लगाया करता था. भाई साहब और भाभी के मित्रगण मेरे भी दोस्त बन गए थे. इन में एक भाभी जी अक्सर मुझसे कहती थीं

गोपेश भाई, आप तो फ़िल्म स्टार लगते हैं.

अब गोपेश भाई विनम्रता से – ‘हें, हेंकरते हुए इस कॉम्प्लीमेंट को स्वीकार कर लेते थे. एक दिन श्रीश भाई साहब ने उन भाभी जी से पूछ ही लिया

ज़रा बताइए तो हमारा गोपेश आपको किस फ़िल्म स्टार जैसा लगता है?’

भाभी जी बोलीं

'अरे क्या नाम है उसका? ज़ुबान पर नहीं आ रहा है. हाँ, उसका पापा भी फ़िल्म स्टार है.

अब यह सुनकर तो मेरा दिल बैठ गया क्यूंकि मेरे हमशक्ल संजीव कुमार के पापा तो फ़िल्म लाइन में थे नहीं. मेरे दिल में हलचल हो रही थी. पता नहीं भाभी जी अब किस हीरो को मेरा हमशक्ल बताने वाली हैं.

मुगले आज़म पृथ्वी राज कपूर के बेटे राज कपूर से?

या फिर उनके बाग़ी बेटे याहू शम्मी कपूर से?

लेकिन अगले पल ही भाभी ने संस्पेंस खोल दिया. 

भाभी जी एक दम से चहक कर बोलीं

हाँ याद आ गया. अपने गोपेश भाई हूबहू कॉमेडियन आगा के बेटे जलाल आगा जैसे लगते हैं.

 (पाठकगण नोट करें. दिल के अरमां, आंसुओं में बह गएनग्मा फ़िल्म निक़ाहमें आने से पहले मेरे दिल से आह की शक्ल में निकला था.)

2.     2. आतिथ्य सत्कार में अल्मोड़ा प्रसिद्द हमारी एक भाभी जी पापड़ पर शायद मुक्का मार कर उसके पचास टुकड़े कर के आधी-आधी चाय की प्यालियों के साथ अतिथियों का सत्कार करती थीं. इतिहास में पहली बार क्रीम बिस्किट को बीच में से चीरकर एक बिस्किट के दो बिस्किट बनाने का हुनर मैंने उन्हीं के यहाँ देखा था.

हमारी छोटी बिटिया रागिनी उन दिनों चार साल की रही होगी. कंजूस आंटी के यहाँ बीच में से चीरे हुए क्रीम बिस्किट्स पाकर वह बड़ी प्रसन्न हुई. उसने बिस्किट खाए तो नहीं पर उन में लगी क्रीम चाट-चाट कर बिस्किट्स प्लेट में वापस रख दिए. यह नज़ारा देखकर भाभी जी का दिल बैठा जा रहा था हम लोग रागिनी को इस गुनाहे-अज़ीम के लिए डांट ही रहे थे कि भाभी जी ने आह भरते हुए कहा

भाई साहब जो नुक्सान होना था, वो तो हो ही गया, अब आप लोग कुछ और खाने से पहले रागिनी के झूठे बिस्किट्स खाकर उन्हें ख़त्म कीजिए.

3. हमारी एक भाभी जी पूरे अल्मोड़ा में अपनी बेतकल्लुफ़ी के लिए प्रसिद्द थीं. हमारे यहाँ जब कभी आती थीं तो चाय पीते समय मेरी श्रीमती जी से कहती थीं

भाभी जी ये चाय का तक़ल्लुफ़ आपने बेकार किया. आप तो हमको दो-दो चपाती के साथ दाल-सब्जी खिला दीजिए. अब पहाड़ पर इतना चल कर फिर घर लौट कर खाना बनाने की ताक़त किस में बच पाती है?’

सपरिवार चाय, नाश्ते के बाद भोजन कर के जब भाभी जी हमारे घर से निकलतीं तो हम सब से यह वादा लेकर जातीं कि हम अगले रविवार को सपरिवार उनके यहाँ लंच पर पहुंचेंगे.

उन दिनों न तो हमारे यहाँ फोन था और न ही हमारे मित्रगणों के यहाँ. पहले से निश्चित कार्यक्रम के अनुसार ही हम लोग एक दूसरे के यहाँ पहुँच जाते थे. पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जब हम भाभी जी के यहाँ लंचियाने पहुँचे तो मकान के दरवाज़े एक बड़ा सा ताला हमारा स्वागत कर रहा था. हम भूखे और गुस्से से भरे एक रेस्तरां में पहुंचे. पेट की आग तो शांत हुई पर दिल में जो आग लगी थी वो तो भाभी जी और उन के पतिदेव की मरम्मत कर के ही शांत हो सकती थी. पर इस कहानी का क्लाईमेक्स अभी बाक़ी है. इस दुर्घटना के एक सप्ताह बाद हमको अपराधी दंपत्ति बाज़ार में मिल गया. मेरे तानों और उलाहनों की बरसात शुरू होने से पहले ही भाभी जी ने हमको अपने घर से गायब होने का एक ठोस बहाना दिया. हमको मजबूरन उनको माफ़ करना पड़ा. पर भाभी जी ने हाथ जोड़ कर कहा

आप लोगों ने ज़ुबानी तो हमको माफ़ कर दिया पर दिल से नहीं किया. हम अगले रविवार को खुद माफ़ी मांगने आपके घर आएँगे. और हाँ, भाभी जी, आप चाय-वाय का तक़ल्लुफ़ मत कीजिएगा, सीधे ही सादा सा खाना हमको खिला दीजिएगा.

4. अल्मोड़ा में हमारी एक और भाभी जी थीं, स्मार्ट, मॉडर्न और अच्छी खासी स्नॉब. इंग्लिश मीडियम में पढ़ी-लिखी ये भाभी जी हिंदी मीडियम की पढ़ी महिलाओं को काम वाली बाई से ज़्यादा नहीं समझती थीं और आमतौर पर भाभीजियों के बजाय हम भाई साहबों की कंपनी में ही बैठना पसंद करती थीं. इन भाभी जी वाले भाई साहब काफ़ी ठिगने और बेकार से थे. इस दंपत्ति को अपनी रईसी बघारने का बहुत शौक़ था.

हमारे रईस दोस्त अपने बेटे का बर्थ डे बहुत धूम-धाम से मनाते थे एक बार उनके बेटे के जन्मदिन की पार्टी में हम लोग गए. जाड़ों के दिन थे. मैंने अपनी शादी के दिनों वाला सूट निकाला और उसे पहनकर उस पार्टी में पहुंचा. पचास लोगों के बीच भाभी जी ने हमारा स्वागत किया फिर वो मुस्कुराती हुई बोलीं

भाई साहब आप इस सूट में बहुत जंच रहे हैं पर आपको शायद याद न हो, यही सूट आपने हमारे बेटे की पिछली बर्थ डे पार्टी में भी पहना था.

लोगबाग भाभी जी की बात सुनकर चुप रहे, उनको पता था कि यह दुष्ट जैसवाल कोई न कोई क्रांतिकारी जवाब ज़रूर देगा. मैंने हाथ जोड़कर भाभी जी को एक सवालनुमा जवाब दिया

भाभी जी, सबके सामने और ख़ासकर मेरी श्रीमती जी के सामने आप मुझमें इतनी दिलचस्पी मत लिया करिए. आप को अब तक याद है कि आप के बेटे की बर्थ डे में मैंने पिछले साल क्या पहना था, पर क्या आपको पता है कि आज आप के पतिदेव ने क्या पहना है?’

मेरे इस भोले से सवालनुमा जवाब का घातक परिणाम निकला. स्मार्ट भाभी जी ने अगले साल से अपने बेटे की बर्थ डे पार्टी में हमको बुलाना छोड़ दिया.

अभी तो और भी भाभीजियों के किस्से सुनाने बाक़ी हैं पर आज बस इतना ही.

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

स्वर्णिम अवसर

 

1. हमको उन से रहम की है उम्मीद

जो नहीं जानते दया क्या है

कल दवा दस हज़ार में बेची

लाख का रेट अब बुरा क्या है

 2. खुल्लम-खुल्ला छूट है

लूट सके तो लूट

धरम-करम में यदि पड़ा

भाग जाएंगे फूट

 3. सजग पहरेदार की शिक़ायत –

 'गब्बर, तुम रोज़ हाथ मारो और हमको सिर्फ़ हफ़्ता दो.

बहुत नाइंसाफ़ी है !'

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

मीडिया भारत का लेकिन फ़िक्र पाकिस्तान की

 पड़ौसी के यहाँ कौन सी दाल बनी है और कौन सी सब्ज़ी, इसकी फ़िक्र करने वाले अक्सर अपनी रसोई में दाल-सब्ज़ी बनाना भूल जाते हैं.

हमारे जागरूक मीडिया को पाकिस्तान में हो रही हर गलत हरक़त की जानकारी रहती है लेकिन उसे अपनी नाक के नीचे हो रही तमाम गड़बड़ियाँ दिखाई नहीं देतीं.
पाकिस्तान की चरमराती अर्थ-व्यवस्था पर रोज़ाना उपन्यास लिखे जाते हैं.
पाकिस्तान कहाँ भीख मांगने गया, कहाँ ख़ुद को गिरवी रखने गया, कहाँ से उसे रोटी मिली, किधर से उसे कपड़े मिले, कौन-कौन से पाकिस्तानी बैंक डूबने की कगार पर हैं, पाकिस्तान के कौन-कौन से उद्योग-संस्थानों में ताला लगने वाला है, इसकी विस्तृत जानकारी देने वाला हमारा मीडिया भारत की अर्थव्यवस्था को तो जैसे फलते-फूलते ही दिखलाना चाहता है.
हम यह भूल जाते हैं कि राफ़ेल से लेकर टीवी, मोबाइल के छोटे से छोटे पुर्ज़े भी हम आयात करते हैं.
हम को यह भी याद नहीं रहता कि हम अपने देश में पाकिस्तान की कुल आबादी के दस प्रतिशत से ज़्यादा तो हर साल बेरोज़गार बढ़ा देते हैं.
हम रोज़ सुनते हैं कि पाकिस्तान में भुखमरी है और हमारे यहाँ तो जैसे लोग ज़्यादा खाने से मर रहे हैं.
हम रोज़ पढ़ते हैं कि पाकिस्तान में आए दिन लोकतान्त्रिक मूल्यों की बलि चढ़ाई जा रही है तो क्या हमारे देश में लोकतंत्र का आदर्श स्वरूप स्थापित हो गया है?
सब जानते हैं कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के साथ बहुत ज़्यादतियां होती हैं लेकिन हमको इस बात की फ़िक्र करने के बजाय इस बात की फ़िक्र करनी चाहिए कि हमारे देश में अल्पसंख्यकों के साथ या किसी समुदाय विशेष के साथ किसी प्रकार का कोई अन्याय न हो.
हमारे मीडिया विशेषज्ञ पाकिस्तान के विषय में भविष्यवाणी करने के लिए भृगुसंहिता का शायद इस्तेमाल करते हैं.
अगस्त, 2018 में इमरान खान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की ढुलमुल होती हुई कुर्सी संभाली थी.
सबको पता था कि उसकी कुर्सी पाकिस्तान की सेना के रहमो-करम पर टिकी है लेकिन सिर्फ़ हमारे मीडिया को यह पता था कि किस दिन, कितने बज कर, कितने मिनट पर, उसकी गद्दी छिननी है.
पिछले 32 महीनों में हमारे मीडिया ने कम से कम 32 बार इमरान खान का मर्सिया पढ़ लिया है लेकिन वो कमबख्त आज भी वज़ीरे-आज़म की अपनी कुर्सी पर जमा हुआ है.
हमारे मीडिया को इस बात की कोई चिंता नहीं होती कि भारत-पाकिस्तान सम्बन्ध को कैसे सुधारा जाए.
उसे तो इस बात की फ़िक्र होती है कि इमरान खान की नई शादी कब टूटने वाली है और उसकी किसी पूर्व-पत्नी ने उस पर क्या-क्या इल्ज़ाम लगाए हैं.
हमारे मीडिया ने सबसे ज़्यादा अक्लमंदी कोरोना-संकट के विषय में दिखाई है.
पिछले साल हमने व्यापक तालाबंदी कर के न जाने कितनी बार अपनी पीठ ठोकी थी.
कोरोना-दैत्य को तो हमने ताली और थाली बजा कर ही भगा दिया था. और दूसरी तरफ़ मरदूद पाकिस्तान था कि वहां न तो कोरोना से लड़ने वाली दवाइयां थीं और न ही ऐसी समस्या से निपटने के लायक़ शासनतन्त्र.
इस कोरोना-संकट में पाकिस्तान कितना बर्बाद हुआ इसका हिसाब तो बाद में होगा लेकिन यह सबको पता है कि इस संकट की दूसरी लहर में हम पूरी दुनिया के चालीस प्रतिशत से भी अधिक शिकार दे रहे हैं और हमारे यहाँ रोज़ाना मरने वालों का आंकड़ा अब तीन हज़ार के क़रीब हो गया है.
आज हम कहीं से वैक्सीन के लिए कच्चा माल मंगा रहे हैं तो कहीं से वैक्सीन आयात कर रहे हैं.
हम आत्मनिर्भरता की डींग हांकने वाले आज हवाई जहाजों पर लाद कर ऑक्सीजन प्लांट्स ला रहे हैं.
पाकिस्तान की हालत ख़राब है, यह साबित कर के हमको क्या हासिल होने वाला है?
क्या इस से हमारी मुश्किलें हल हो जाएँगी?
धन्य हो तुम भारत के सियासतदानों !
धन्य हो तुम भारत के मीडिया वालो !
हमको इस बात की चिंता नहीं है कि हमारी कमीज़ गंदी है.
हम तो इस बात का जश्न मना रहे हैं कि पड़ौसी की कमीज़ हमारी कमीज़ से कहीं ज़्यादा गन्दी है.
हम अगर गढ्ढे में गिर गए हैं तो उस से निकलने की भला कोशिश क्यों करें?
देखो, देखो ! हमारा दुश्मन पड़ौसी तो खाई में गिर गया है.
भगवान महावीर का संदेश - 'जियो और जीने दो' न तो हम भारतीयों तक पहुंचा है और न ही पाकिस्तानियों तक. एक-दूसरे को डुबाने में ही हमारी सारी ऊर्जा समाप्त हो जाती है.
अंत में इस भ्रष्ट एंटी-पाकिस्तान मीडिया के और विक्षिप्त एंटी-भारत मीडिया के बारे में और हवा में नफ़रत का ज़हर घोलने वाले इन सियासतदानों के विषय में, मैं भगवान से प्रार्थना करना चाहूँगा -
अवतार ले के भगवन, इस सृष्टि को बचा ले,
नफ़रत के बीज बोएं, उनको अभी उठा ले.

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

जीनियस

 मुदर्रिसी के दौरान अल्मोड़ा में एक से एक जीनियस विद्यार्थियों से मेरा पाला पड़ा था.

इन में से कुछ विभूतियाँ तो चाह कर भी भूली नहीं जा सकती हैं.
ऐसी ही एक हस्ती थी एम. ए. के हमारे एक पहलवान विद्यार्थी की.
पहलवान क्लास में मेरे लेक्चर्स के समय थोड़े-थोड़े अंतराल पर कहता रहता था -
'गुरु जी, नोट्स लिखा दीजिए. आपका लेक्चर हमारे पल्ले नहीं पड़ता.'
मेरा जैसा गुस्ताख़ उसकी ऐसे हर फ़रमाइश को अन-सुना करते हुए अपना लेक्चर जारी रखता था.
दो सौ नाली के मालिक, एक बड़े किसान के बेटे, इस पहलवान विद्यार्थी से मुझे सिर्फ़ एक शिक़ायत थी.
वह यह कि वो खेत के बजाय क्लास में नोट-बुक्स में और परीक्षा के दौरान उत्तर-पुस्तिकाओं में गुड़ाई किया करता था.
लेकिन मुझे इस गुड़ाई-एक्सपर्ट विद्यार्थी के भविष्य की कोई चिंता नहीं थी.
मेरी तनख्वाह से ज़्यादा आमदनी तो उसके खेतों में उपजे आलुओं से हो जाती थी.
मैं अक्सर पहलवान को सलाह देता रहता था कि वो पढ़ाई-लिखाई को तिलांजलि देकर अपना पूरा समय खेती को दे.
ऐसा करने से उसका और साथ में हमारे इतिहास विभाग, दोनों का ही, कल्याण हो सकता था.
लेकिन पहलवान की खेती में कोई दिलचस्पी नहीं थी.
पहलवान की दिली तमन्ना थी कि वो इंस्पेक्टर ऑफ़ पुलिस बन कर उत्तराखंड में जुर्म को जड़ से मिटा कर अपना नाम इतिहास में अमर कर दे.
हमारा पहलवान कई बार पुलिसिया परीक्षाओं में गोता लगा चुका था.
अबकी बार आर-पार की यानी कि 'नाउ और नेवर' की लड़ाई थी.
पहलवान ऐसी हर परीक्षा के लिए अगले साल से ओवर-एज होने वाला था.
एक दिन मेरा क्लास शुरू होते ही पहलवान मुस्कुराते हुए मेरे पास आया.
उसने एक ही हाथ से मेरे पैर छुए क्योंकि उसके दूसरे हाथ में मिठाई का डिब्बा था.
पहलवान ने मिठाई का डिब्बा खोला और मुझ से अनुरोध किया कि उस में से एक लड्डू निकाल कर खा लूं.
मैंने इस मिष्ठान-वितरण का सबब पूछा तो पता चला कि पहलवान की भर्ती कांस्टेबल के रूप में उत्तराखंड पुलिस में हो गयी है.
मैंने ख़ुद लड्डू खाते हुए क्लास में लड्डू-ब्रेक की घोषणा कर दी.
लड्डू खाते हुए मैंने और सभी विद्यार्थियों ने पहलवान को उसकी कामयाबी पर मुबारकबाद दी.
क्लास ख़त्म होने पर और विद्यार्थियों की भीड़ छटने पर मैंने पहलवान से पूछा -
'वत्स ! तूने क्या जुगाड़ किया था जो इस बार तुझे खाक़ी वर्दी मिल ही गयी?'
पहलवान ने शर्माते हुए बताया -
'हमारे दरोगा मामा जी ने जुगाड़ लगाया था. चार लाख देकर ही काम हो गया. वैसे आजकल रेट तो दस लाख का चल रहा है.'
मैंने अदृश्य दरोगा मामा जी को प्रणाम करते हुए होने वाले सिपैया से कहा -
'बालक ! तेरी मनोकामना पूरी हुई.
तेरी तोंद निकल आई है. अब तू पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर खेलकूद और कसरत पर ध्यान दे.'
बालक ने जवाब दिया -
'गुरु जी, अभी से पढ़ाई-लिखाई छोड़ दूंगा तो आई. पी. एस. कैसे बनूँगा?
आप आशीर्वाद दीजिए कि अपने अंतिम प्रयास में मैं आई. पी. एस. हो जाऊं.'
'आई. पी. एस.' होने का आशीर्वाद देने की बात सुनते ही मेरे पैर कांपने लगे और मेरी ज़ुबान लड़खड़ाने लगी. मैंने हकलाते हुए बांके सिपैया से पूछा -
'बालक ! तू 'आई. पी. एस.' का फ़ुल फ़ॉर्म जानता है?'
बालक को मेरे सवाल पर आश्चर्य हुआ. फिर उसने जवाब दिया -
'हाँ गुरु जी ! अच्छी तरह जानता हूँ. 'आई. पी. एस.' से मतलब है - इंस्पेक्टर ऑफ़ पुलिस सर्विस'.
इतना सुनना था कि मैंने अपने पर्स में से एक पांच का नोट निकाल कर पहलवान को दिया और फिर हाथ जोड़ते हुए उस से माफ़ी मांगते हुए कहा -
'पहलवान, तेरा लड्डू तो मेरे पेट में चला गया है. वो तो मैं तुझे वापस कर नहीं सकता. उसके बदले में तू ये पांच रूपये रख और मुझे माफ़ कर.
मैं चाह कर भी, अपनी आत्मा का खून कर के भी, तुझको 'आई. पी. एस.' होने का आशीर्वाद नहीं दे पाऊंगा.'

शनिवार, 17 अप्रैल 2021

नीम-करेले का जूस

 रहीम ने कहा है -

'खीरा मुख तें काटिए, मलियत नोन लगाय,
रहिमन कड़वे मुखन को, चहियत इही सजाय.'
मुझे लगता है कि भारत में मेरे जनम से सैकड़ों साल पहले से ही मेरी जान के दुश्मन मौजूद थे.
आज सुबह अपनी कॉलोनी के एक पार्क में टहलने गया तो देखा कि एक साहब वहां दो बड़े-बड़े कुत्तों को बिना कोई चेन बांधे घुमा रहे हैं. ऐसे सभी महानुभावों को टोकना मैं अपना फ़र्ज़ समझता हूँ. मैंने उन सज्जन से कहा कि अव्वल तो उन्हें अपने कुत्तों को पार्क में घुमाने के लिए लाना ही नहीं चाहिए और अगर उन्हें वहां घुमाना भी है तो कम से कम उन्हें चेन से बांधकर लाना चाहिए.
उन सज्जन ने मुझे आश्वस्त किया कि उनके कुत्ते बड़े सज्जन (उन्होंने तो उन्हें जेंटलमैन कहा था) हैं, वो किसी को काटते नहीं हैं.
मुझे उन साहब के आश्वासन पर कोई भरोसा नहीं हुआ और मैंने उन्हें पार्क से जाने की सलाह दे डाली.
उन्होंने आग्नेय नेत्रों से मुझे घूरा फिर उन्होंने मुझसे पूछा –
‘आप जानते हैं मैं कौन हूँ?’
मैंने बुद्धूपन से जवाब दिया –
‘जी मैं आपको नहीं जानता. क्या आप अपना परिचय देंगे?
उन्होंने फ़रमाया – ‘
मैं अपना परिचय दूंगा तो आप हिल जाएंगे.’
मैंने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगते हुए कहा –
'ओह, माफ़ कीजिएगा राष्ट्रपति महोदय, आपने गोल्डन फ्रेम वाला अपना चश्मा नहीं लगाया है, इसलिए मैं आपको पहचान नहीं पाया.’
उन राष्ट्रपति महोदय का चेहरा लाल हो गया पर इस बार गुस्से से नहीं, बल्कि शर्म से.
बाद में उनसे बड़े प्यार से बात हुई. वो सज्जन ग्रेटर नॉएडा डवलपमेंट अथॉरिटी के किसी विभाग में मैनेजर की पोस्ट पर कार्यरत थे और आदतन पूरे ग्रेटर नॉएडा को अपनी जागीर समझते थे.
मेरे इन नए बने मित्र ने मुझे आश्वस्त किया कि अब वो अपने कुत्तों को लेकर पार्क में नहीं आएँगे.
घर जाकर जब मैंने अपनी श्रीमतीजी को अपनी यह उपलब्धि बताई तो उन्होंने मुझसे पूछा –
‘आपकी ब्लड-शुगर कंट्रोल करने के लिए मैं जो आपको रोज़ सवेरे नीम-करेले का जूस देती हूँ वो आप अपने गले के नीचे उतारने के बजाय अपनी ज़ुबान पर ही क्यूँ रक्खे रहते हैं?’
बड़े दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि मेरी श्रीमतीजी ने आगे से मुझे नीम-करेले का जूस न देने का फ़ैसला कर लिया है.

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

आस्था की डुबकी या फिर बुद्धि-विवेक को डुबकी?

फ़िल्म ‘हम दोनों’ का एक नग्मा –
‘कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया’
मुझे याद आ रहा है.
विश्वव्यापी महामारी से जूझने की इस संकट की घड़ी में हमारे हुक्मरानों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि हमको उम्र भर रोने से यह ज़्यादा बेहतर लग रहा है कि हम एक ही झटके में बेवकूफ़ों-जाहिलों से भरी इस दुनिया से निजात पा जाएं.
हरद्वार में महा-कुम्भ का पर्व अपने शबाब पर है और दूसरी तरफ़ कोरोना संक्रमण रोज़ नई बुलंदियों के कीर्तिमान स्थापित कर रहा है.
22 मार्च, 2020 को जब भारत में पहला एक-दिवसीय लॉक डाउन लगाया गया था, तब से अगर आज के हालात का मुक़ाबला किया जाए तो इसकी भयावहता का आकलन करने में बड़े से बड़ा गणितज्ञ अथवा सांख्यिकी विशेषज्ञ अपने हाथ खड़े कर देगा.
हम ऐसी आपदा की घड़ी में महा-कुम्भ का आयोजन कर रहे हैं.
एक कहावत है –
‘जान है तो जहान है’
लेकिन यहाँ तो एक नई कहावत –
‘गधेपन में गधे को भी मात दे फिर भी मेरा भारत महान है’
गढ़ने की आवश्यकता पड़ रही है.
कोरोना-संक्रमण की निर्बाध गति को और उसको बेतहाशा फैलने से रोकने के उपायों को, हम पूर्ण तिलांजलि दे कर महा-कुम्भ का भव्य आयोजन कर रहे हैं.
अब तक के तीनों शाही स्नानों में डुबकी लगाने वालों की संख्या दस-दस लाख से कहीं ऊपर गयी है.
सरकार द्वारा प्रायोजित इस आत्मघाती समारोह के कारण कोरोना-संक्रमण किस भयावहता से देश में अपने पाँव पसारेगा, इसकी तो कल्पना करने का भी किसी का साहस नहीं होता.
पिछले साल दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में तब्लीगी जमात के सैकड़ों जाहिलों ने लॉक डाउन की सावधानियों की जिस तरह से धज्जियाँ उड़ाई थी, उसकी हर जागरूक व्यक्ति ने निंदा की थी और हमारी सरकार ने तथा हमारे मीडिया ने, तो इन्हें विश्व-इतिहास के सबसे बड़े खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया था.
जमाती मानते थे कि क़ुरान की आयतों का पाठ करने वालों को और पांच वक़्त की नमाज़ पढ़ने वालों को, कोरोना छू भी नहीं सकता था.
ज़ाहिर है कि ऐसे जहालत भरे ख़यालात रखने वालों को सरकार का या मीडिया का या फिर समाज का साथ नहीं मिला.
अब एक साल बाद जब कि हालात पहले से सौ गुने से भी ज़्यादा बदतर हो गए हैं हम आस्था की डुबकी के नाम पर अपने विवेक और अपनी बुद्धि को डुबकी लगवा रहे हैं.
पहले हम त्रिपुरा के मुख्यमंत्री श्री बिप्लब देब के विप्लवकारी वक्तव्यों को सुन कर या उन्हें पढ़ कर, कभी-कभी अपना सर धुना करते थे.
लेकिन अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री तीरथ सिंह रावत ने अपने प्रलयंकारी और विस्फोटक उद्गारों से हमको नित्य ही अपना सर फोड़ने के लिए मजबूर किया है.
भारत पर 200 साल तक अमरीकियों से हुकूमत कराने वाले और मन्दिर बना कर मोदी जी की पूजा किए जाने की वक़ालत करने वाले, श्री रावत ने वैज्ञानिक शोध कर यह सिद्ध कर दिया है कि माँ गंगे में स्नान करने से कोरोना-संक्रमण फैलेगा नहीं, बल्कि रुकेगा.
श्री रावत ने हम सबको आगाह किया है कि हम तब्लीगी जमातियों की मूर्खताओं की महा-कुम्भ में आस्था की डुबकी लगाने वालों से तुलना करने की भूल न करें.
वैसे उनकी यह बात सही भी है.
भला संकट की घड़ी में सैकड़ों-हज़ारों जाहिलों के इकठ्ठा होने की तुलना हम आपदा-काल में लाखों-करोड़ों मूर्खों के एकत्र होने से कैसे कर सकते हैं?
डॉक्टर हर्षवर्धन के रूप में हमको एक बहुत ही योग्य और कर्मठ स्वास्थ्य-मंत्री मिला है.
लेकिन महा-कुम्भ के विषय में डॉक्टर हर्षवर्धन श्री रावत के और उनके ही जैसे मौलिक विद्वानों के, वक्तव्यों पर लगाम कस पाने में सर्वथा असमर्थ दिखाई दे रहे हैं.
वो मीडिया जो पिछले साल तब्लीगी जमातियों को दिन-रात कोस रहा था, वह महा-कुम्भ में स्वास्थ्य-संबंधी सावधानियों की नितांत उपेक्षा के अपराधों को बहुत कुछ अनदेखा कर रहा है.
अब यह तय हो गया है कि महा-कुम्भ के आयोजन की अवधि को किसी भी तरह घटाया नहीं जाएगा और न ही आस्था की डुबकी लगाने वालों पर भी कोई रोक लगाई जाएगी.
गंगा-स्नान के समय भक्त-गण न तो आपस में दो गज़ की दूरी बना कर रखते हैं और न ही मास्क लगाने की हिदायत का ध्यान रखते हैं.
आस्था की डुबकी के नाम पर महा-कुम्भ में हो रही इन असावधानियों की दुहाई देते हुए अब बहुत से जाहिल मुल्ला-मौलवी भी रमज़ान के महीने में मस्जिदों में बड़ी तादाद में इकठ्ठा होने की छूट दिए जाने की मांग कर रहे हैं.
हिन्दू आस्था के सामने नतमस्तक सरकार के पास मुल्ला-मौलवियों की इस नाजायज़ मांग को ठुकराने का कोई ठोस कारण नहीं है.
अगर सरकार ने हिदू कुओं में भांग डालने की अनुमति दी है तो फिर वह मुस्लिम कुओं में भांग डाले जाने पर कैसे रोक लगा सकती है?
कहते हैं कि गंगा मैया में हमारे पाप धोने की अद्भुत क्षमता है लेकिन यह तो निश्चित है कि उन में हमारे शासकों-प्रशासकों की मूर्खताओं को धोने की शक्ति नहीं है.
हाँ, कोई चमत्कार हो जाए और बुद्धि-विवेक की संस्थापना के लिए भगवान फिर अवतार लें तो हमारे बिगड़े हुए सारे काज फिर संवर सकते हैं.