शुक्रवार, 14 जून 2019

साम्यवादी मूल्यों की स्थापना


साम्यवादी मूल्यों की स्थापना
पिताजी के हर तीन साल में तबादले की वजह से हम बच्चों को नए परिवेश में खुद को ढालने की चुनौती होती थी. हर बार नए दोस्त और नए दुश्मन बनाने पड़ते थे. 1965 में जब पिताजी का रायबरेली से बाराबंकी तबादला हुआ तो मेरा एडमिशन बाराबंकी के गवर्नमेंट इन्टर कॉलेज के क्लास टेंथ में करा दिया गया. मेरा कॉलेज हमारे घर से क़रीब ढाई किलोमीटर था और वहां तक मुझे पैदल ही जाना होता था क्योंकि मुझे तब तक साइकिल चलाना आता ही नहीं था.
बाराबंकी के हमारे कॉलेज में मुहल्ला कल्चर बहुत थी. पंजाबी रिफ्यूजी कॉलोनी के लड़कों का अपना गैंग था तो शुगर-मिल कॉलोनी वाले लड़कों का अपना दल था. मेरे लिए सबसे चिंता विषय यह था कि मेरी तरह का कोई और ऐसा लड़का था ही नहीं जिसका कि क्लास टेंथ में नया एडमिशन हुआ हो. लेकिन कुछ दिन बाद मेरी तरह से ही एक लड़के ने क्लास टेंथ में एडमिशन लिया. वह लड़का था तो चुच्चू किस्म का सींकिया पहलवान लेकिन उसका दिमाग सातवें आसमान तक पहुंचा हुआ था. मैंने अपनी तरफ़ से उस से दोस्ती करने की पहल करने के लिए उसका परिचय जानना चाहा. उसने बड़ी शान से अपना परिचय देते हुए कहा
‘My self Krishna Kumar Sharma, son of Shri R. D. Sharma, I. P. S., the Superintendent of Police, Barabanki.’
(यहाँ मज़े कि बात बता दूँ कि कृष्ण कुमार शर्मा सिर्फ़ अपना परिचय देते हुए इंग्लिश में ये रटा-रटाया जुमला बोलते थे वरना इस म्लेच्छ-भाषा में वो बिलकुल ही पैदल थे.)
जब कृष्ण कुमार शर्मा जी ने मुझसे मेरे बारे में पूछा तो मैंने अपने बारे में मुई आंग्ल-भाषा का पूर्ण परित्याग कर अपनी प्यारी हिंदी भाषा में सिर्फ़ इतना बताया कि मैंने रायबरेली से नाइन्थ पास करके यहाँ टेंथ में एडमिशन लिया है. शर्मा जी का अगला सवाल था
तुम्हारे पापा क्या करते हैं?’
मैंने जवाब दिया
मेरे पिताजी जुडिशियल मजिस्ट्रेट हैं.
शर्मा जी का अगला वाक्य ऐसा था जिसने मेरे तन-बदन में आग लगा दी -
जुडिशियल मजिस्ट्रेट तो छोटा अफ़सर होता है. उसे न तो सरकारी कार मिलती है और न ही कोई जीप.
अपने गुस्से को क़ाबू में रखते हुए मैंने बड़ी विनम्रता से कहा
'
मेरे पिताजी साइकिल की सवारी करते हैं.
साहबे-आलम ने हें-हें-हें करते हुए पूछा
और तुम?’
संयम की पराकाष्ठा दर्शाते हुए मैंने जवाब दिया
मैं तो पैदल सैनिक हूँ.
ज़ाहिर था कि इन साहबे-आलम और मुझ पैदल सैनिक के बीच की पहली मुलाक़ात ख़ुशगवार नहीं थी लेकिन तोकू और, न मोकू ठौरकी कहावत को चरितार्थ करते हुए हम दोनों के बीच दोस्ती होनी तो ज़रूरी थी क्योंकि क्लास के हम दो नए रंगरूटों से कोई और लड़का जल्दी दोस्ती करने को तैयार ही नहीं था.
कृष्ण कुमार में पता नहीं क्यों पुराने ज़माने के ठाकुरों जैसी बेकार की हेकड़ी हुआ करती थी. उसकी हर बात अपने पापा के रौब-दाब से या तो शुरू होती थी या फिर उस से ख़त्म होती थी. लेकिन उसके लिए सबसे दुःख की बात यह थी कि क्लास में कोई भी ढंग का लड़का उसे वी. आई. पी. स्टेटस देने को तैयार नहीं था.
कृष्ण कुमार अक्सर मुझे फ़ोन करने के लिए कहता रहता था. हालांकि उसे पता था कि हमारे घर में फ़ोन नहीं है. कब उसने बम्बई में अपने चाचा जी से ट्रंक कॉल करके बात की, कब उसके पापा को प्रदेश के गृह-मंत्री का फ़ोन आया और कब-कब उसके पापा और जिलाधीश महोदय की आपस में फ़ोन पर बात हुई, इसकी सारी ख़बर, हमको नियमित रूप से मिलती रहती थी.
बाराबंकी के ऑफिसर्सक्लब में हम दोनों टेबल टेनिस खेलने जाते थे. वहां एक बिलियर्ड्स टेबल भी थी पर उसमें उन दिनों में भी खेलने का प्रति घंटे एक रुपया चार्ज था. हमारे स्मार्ट कृष्ण कुमार ने बिलियर्ड्स टेबल पर चुपके से चाकू लेकर नक्काशी कर दी. उस सस्ते ज़माने में बिलियर्ड्स टेबल पर नया कपड़ा चढ़ाने में दो हज़ार का खर्चा आना था. क्षति-ग्रस्त बिलियर्ड्स टेबल को कामचलाऊ बना कर सब के लिए फ्री में उपलब्ध कर दिया गया. अब कृष्ण कुमार और मैं भी बिलियर्ड्स प्लयेर बन गए. उन दिनों बिलियर्ड्स में हमारे विल्सन जोंस और माइकल फ़रेरा का दुनिया भर में नाम था. अब बाराबंकी के ऑफिसर्सक्लब में दो और बिलियर्ड्स चैंपियन तैयार हो रहे थे. कृष्ण कुमार ने अपनी ज़िंदगी में एक यही ऐसा काम किया था जिसके लिए मैं आज भी उसका शुक्रगुज़ार हूँ.
कृष्ण कुमार पढ़ाई में कद्दू था. घर में उसे दो मास्साब पढ़ाने आते थे लेकिन उनकी मदद से वो सिर्फ़ अपना होम-वर्क कर लेता था. उसके बाक़ी भाई-बहन पढ़ने में बहुत अच्छे थे लेकिन उसकी गणना हमारे क्लास के सबसे फिसड्डी लड़कों में होती थी और दूसरी तरफ़ मेरी गणना क्लास के अच्छे विद्यार्थियों में की जाती थी. त्रैमासिक परीक्षा में मुझे क्लास में सर्वाधिक अंक प्राप्त हुए. भाई कृष्ण कुमार को यह बात बिलकुल हज़म नहीं हुई. मुझसे बदला लेने के लिए उन्होंने नए सिरे से - आला अफ़सर के बेटे और छोटे अफ़सर के बेटे वाला पुराना मुद्दा उठा लिया.
कृष्ण कुमार मुझे बताते
हम लोग जीप से जा रहे थे कि रास्ते में तुम्हारे पापा हमको साइकिल पर जाते हुए दिखाई दिए.
अब ज़ाहिर था कि अगर पिताजी साइकिल से ही यहाँ-वहां जाते थे तो वो किसी को भी साइकिल चलाते हुए दिखाई दे सकते थे.
बाराबंकी वालों को देवा मेला का हर साल इंतज़ार रहता था. हम लोग भी कवि-सम्मलेन, मुशायरा, क़व्वाली और म्यूजिक कांफ्रेंस वाले दिनों में वहां ज़रूर जाते थे. देवा मेले में भी अफ़सरी ठाठ का नक्शा लेने में कृष्ण कुमार पीछे नहीं रहता था. उसका अंदाज़ कुछ ऐसा होता था
म्यूजिक कांफ्रेंस वाले दिन मैंने तुम लोगों को देखा था. हम लोग तो आगे सोफ़े पर बैठे हुए थे और तुम लोग पांचवी लाइन में कुर्सियों पर बैठे थे.
कमला सर्कस में तो मज़ा आ गया. हम वीआईपी लोगों को तो मिठाई भी खाने को मिली. मैंने तो स्टेज पर जाकर जोकर से हाथ भी मिलाया था. तुम लोगों को तो पीछे बैठकर साफ़-साफ़ दिखाई भी नहीं दे रहा होगा.
खून का घूँट पी कर मैंने बताया कि हम लोग कमला सर्कस देखने गए ही नहीं थे.
मेरे सब्र का पैमाना अब छलकने वाला था. आला अफ़सर और छोटा अफ़सर वाला यह खेल मेरे लिए क़ाबिले-बर्दाश्त नहीं रह गया था. दरोगा तो दरोगा, इन दिनों तो कृष्ण कुमार के अनुसार कोतवाल और डी. एस. पी. भी उसे सलाम करने लगे थे. लेकिन कृष्ण कुमार ने जब यह जतलाना शुरू किया कि एक एस. पी. के बेटे का खुद का स्टेटस भी एक जुडिशियल मजिस्ट्रेट से ऊपर होता है तो मुझमें विस्फोट होना लाज़मी था.
कृष्ण कुमार की इन बदतमीज़ियों को ख़त्म करने का एक ही तरीक़ा था कि मैं उसको पटक-पटक कर मारूं लेकिन यहाँ उसका जूडो-कराटे प्रशिक्षण मुझे रोक रहा था. कृष्ण कुमार अपनी नंगी हथेलियों से लकड़ी के मोटे-मोटे पटरे और ईंट तोड़ने के दावे करता था. मेरा जैसा गोलू-मोलू लड़का उस जैसे जूडो के तथाकथित ब्राउन-बेल्ट होल्डर का मुक़ाबला कैसे कर सकता था?
मैंने कृष्ण कुमार से बात करना बंद कर दिया लेकिन मेरे साथ उसकी छेड़ा-छाड़ी रुकी नहीं. एक दिन मैं कॉलेज से वापस घर जा रहा था. पीछे से साइकिल पर आकर उसने मेरे सर पर चपत मारी और मुझे ''प्यादा बाबूकहकर मुझसे आगे निकल गया.
मैंने आव देखा न ताव, दौड़कर उसकी साइकिल का कैरियर पकड़ कर उसकी साइकिल खींच कर पलट दी. हमारे तथा-कथित जूडो चैंपियन साइकिल से छिटक कर दूर जाकर गिर पड़े और मैं हैवी-वेट उनकी छाती पर चढ़ कर उन पर दनादन घूंसे बरसाने लगा.
आठ-दस मुक्के खाकर जूडो-चैंपियन तो बचाओ-बचाओचिल्लाने लगा. लेकिन मैं न तो अपने हाथ चलाना रोक रहा था और न ही अपनी ज़ुबान. एक मुक्का और एक गाली (शुद्ध शाकाहारी वाली) उसकी जीप की सवारी के नाम पर, तो एक मुक्का और एक गाली उसकी फ़ोन वार्ता की ठसक पर, एक मुक्का उसको सैल्यूट करने वालों के नाम पर, तो एक गाली उसके वीआईपी स्टेटस के नाम पर. आखिरकार हमारे दो-चार दोस्तों ने आकर हम दोनों को अलग किया.
धूल-धूसरित, घायल और अपमानित हमारे एस. पी. पुत्र, रोते-रोते, नाक पोंछते-पोंछते, मेरे समूचे खानदान को जेल भिजवाने की धमकी दे रहे थे लेकिन इन धमकियों से अब कोई भी सहम नहीं रहा था. एक तरफ़ मैं पिछले पांच-छह महीनों से अपनी इंतकाम की सुलगती आग को उसके आख़िरी अंजाम तक पहुँचाने पर खुश हो रहा था तो दूसरी तरफ़ हमारे कई साथी इस एक-तरफ़ा कुश्ती को देख कर हंस रहे थे.
अपने कपड़ों की धूल झाड़ते हुए घायल कृष्ण कुमार जाते-जाते मुझे कल से कॉलेज न आने की और आज से ही ऑफिसर्स क्लब में न जाने की हिदायत दे गए क्योंकि इन दोनों जगहों पर पहुँचते ही दो-चार सिपाही डंडों से मेरी आव-भगत करने को नियुक्त किए जाने वाले थे. लेकिन जब ओखली में मैंने अपना सर डाल ही दिया था तो मूसलों से डरने का दौर भी मेरे लिए ऑटोमैटिकली दूर हो गया था. उसी शाम को मैं भयभीत हुए बिना ऑफिसर्स क्लब पहुँच गया. डंडाधारी सिपाही-सेना तब तक वहां नहीं पहुँची थी और तो और, कृष्ण कुमार भी वहां नज़र नहीं आ रहा था. सबसे आश्चर्य की बात तो यह थी कि पिताजी और आला अफ़सर, हमारे एस. पी. साहब यानी कि कृष्ण कुमार के पापा, दोनों टेनिस खेल रहे थे. मैं उन दोनों का खेल देखते हुए कृष्ण कुमार का और उसकी डंडाधारी-सेना का इंतज़ार करने लगा.
कुछ देर बाद डंडाधारी सिपाही-सेना के बिना ही कृष्ण कुमार मुझे साइकिल पर आता हुआ दिखाई दिया. मुझे निषिद्ध-स्थान पर देखकर उसकी हालत पतली हो गयी. ऊपर से मेरे पिताजी और अपने पापा को वहां मौजूद देख कर तो उसके चेहरे से हवाइयां उड़ने लगीं. मैं उसकी डांवाडोल स्थिति को तुरंत भांप गया. मैंने हेकड़ी जताते हुए उस से पूछा
हाँ तो जूडो चैंपियन, एस. पी. पुत्र, कृष्ण कुमार ! तुम्हारी फ़ौज कहाँ है? तुम तो मेरी हड्डियाँ तुड़वाने वाले थे? अब तो छोटे अफ़सर, यानी कि मेरे पिताजी भी यहीं हैं और आला अफ़सर, यानी कि तुम्हारे पापा भी यहीं हैं. बताओ, मेरी कुटम्मस करवा के तुम मुझे कब जेल भिजवा रहे हो?’
साहबे-आलम, आला अफ़सर के शहज़ादे, भाई कृष्ण कुमार ने हाथ जोड़ते हुए मुझ से कहा
'गोपेश, कॉलेज में जो हुआ उसे भूल जाओ. चलो फिर से दोस्ती कर लेते हैं.
मैं पहले ही तय कर चुका था की इस शेखी-खोरे के साए से भी खुद को दूर रक्खूँगा. मैंने सख्ती से कहा
मुझ मामूली लड़के की तुम जैसे शहज़ादे से दोस्ती हो ही नहीं सकती. अभी तो तुम्हारी सारी हरक़तें मैं पिताजी को और तुम्हारे पापा को बताने वाला हूँ.
अपने कान पकड़ते हुए कृष्ण कुमार ने आज़िज़ी से कहा
तुम कॉलेज जैसी तुड़ाई चाहे एक फिर कर दो पर अंकल से और पापा से मेरी शिकायत मत करो. अच्छा, ये सब बातें छोड़ो ! ये बताओ बिलियर्ड्स खेलोगे?’
मैंने कुछ देर सोचा फिर मैं रौब से बोला
नहीं ! आज हम टेबल टेनिस खेलेंगे.
कृष्ण कुमार ने विनम्रता से जवाब दिया
ठीक है ! हम आज टेबल टेनिस ही खेलेंगे. भला मैं कहीं अपने सबसे अच्छे और अपने सबसे पक्के दोस्त की बात टाल सकता हूँ?’
उस दिन के बाद से मैं और कृष्ण कुमार वाक़ई अच्छे और पक्के दोस्त बन गए. फिर न तो कभी कोई छोटा अफ़सर हमारी बातचीत में आया और न ही कभी कोई आला अफ़सर हमारी दोस्ती में बाधक बना. हमारी दोस्ती में छोटे-बड़े का फ़र्क हमेशा-हमेशा के लिए मिट गया. और इस प्रकार सच्चे अर्थों में उसी दिन से भारत में समाजवादी और साम्यवादी मूल्यों की स्थापना हुई.

बुधवार, 12 जून 2019

कठुआ काण्ड और अलीगढ़ काण्ड से जुड़ा एक सवाल

नन्हीं कलियाँ, बिन खिले, मुरझा गईं !
वहशियत है मुल्क में, समझा गईं !

बच्चियां हिन्दू की हों,
मुसलमान की हों
या
किसी अन्य धर्मावलम्बी की !
किसी से बदला लेने के लिए -
या
किसी को सबक सिखाने के लिए -
उन मासूमों का अपहरण,
उन का बलात्कार,
और उन की हत्या
करना ज़रूरी क्यों हो जाता है?

गुरुवार, 6 जून 2019

सांस लेते हुए मुर्दे

उसूलों पर जहाँ आँच आए, टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िंदा हो, तो फिर ज़िंदा नज़र आना, ज़रूरी है.
वसीम बरेलवी
मुर्दा-दिल क्या खाक़ जिया करते हैं -
जो हिम्मत कर के लब खोले, तो जाना, मैं भी ज़िन्दा हूँ,
मैं वरना, सांस लेते, एक मुर्दे के, सिवा क्या था.
एक गुस्ताख़ी और -
दाल-रोटी, चंद कपड़े और सर पर एक छत,
ग़र यही, जीने का मक़सद, फिर तो मैं, मुर्दा भला !  

शुक्रवार, 10 मई 2019

पयाम-ए-आज़ादी

‘पयाम-ए-आज़ादी’ -
1857 के विद्रोह में शायद अंतिम बार धार्मिक और क्षेत्रीय संकीर्णता से परे, हमारे देश में, देशभक्ति की निर्मल धारा बही थी. इस विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में दिल्ली के लीथो प्रेस से फ़रवरी, 1857 से मुग़ल शाही घराने के मिर्ज़ा बीदर बख्त द्वारा उर्दू-हिंदी, दोनों ही भाषाओँ में प्रकाशित पत्र - ‘पयामे आज़ादी’ ने महत्वपूर्ण निभाई थी. सितम्बर, 1857 से इस पत्र का मराठी संस्करण झांसी से भी प्रकाशित किया जाने लगा था. इस पत्र में ही अज़ीमुल्ला खान रचित बाग़ी सैनिकों का यह क़ौमी गीत प्रकाशित हुआ था-
‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा,
पाक (पवित्र) वतन है क़ौम का, जन्नत से भी प्यारा.
ये है हमारी मिल्कियत (सम्पत्ति), हिन्दुस्तान हमारा,
इसकी रूहानी से (आत्मिक प्रकाश) , रौशन है जग सारा.
कितना क़दीम (पुरातन) कितना नईम (दिव्योपहार) , सब दुनिया से न्यारा,
करती है ज़रखेज़ (सिंचित) जिसे, गंग-जमन की धारा.
ऊपर बर्फ़ीला पर्वत, पहरेदार हमारा,
नीचे साहिल (किनारा) पर बजता, सागर का नक्कारा.
इसकी खानें उगल रहीं, सोना, हीरा, पारा,
इसकी शान-शौकत का दुनिया में जयकारा.
आया फिरंगी दूर से, ऐसा मन्तर मारा,
लूटा दोनों हाथ से, प्यारा वतन हमारा.
आज शहीदों ने है तुमको, अहले-वतन (देशवासी) ललकारा,
तोड़ो गुलामी की ज़न्जीरें, बरसाओ अंगारा.
हिन्दु-मुसल्मां, सिक्ख हमारा, भाई प्यारा-प्यारा,
यह है आज़ादी का झण्डा, इसे सलाम हमारा.’
यह गीत बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के 'वंदेमातरम्' देश-गान से लगभग दो दशक पहले लिखा गया था. राष्ट्र-प्रेम, जातीय एकता और साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देने के साथ-साथ इसमें स्वदेशी व स्वराज्य की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी. इसे ब्रिटिशकालीन भारत का पहला क़ौमी तराना कहा जा सकता है. ऐसा कहा जाता है कि 1857 के विद्रोह के बाद जिन-जिन घरों में 'पयाम-ए-आज़ादी' की प्रतियां मिलीं थीं, उन घरों के सभी मर्दों को सार्वजनिक फांसी दे दी गई थी.

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

नेहरु जी की बिटिया और हमारी माँ


नेहरु जी की बिटिया और हमारी माँ -

हमारे घर में इंदिरा गाँधी की पहली पहचान नेहरु जी की बिटिया के रूप में थी. हमारी माँ तो इंदिरा गाँधी की ज़बर्दस्त प्रशंसिका थीं. अख़बारों या पत्रिकाओं में इंदिरा गाँधी की फ़ोटो आती थी तो माँ का एक ही कमेंट होता था –
हाय ! कितनी सुन्दर है !
इंदिरा गाँधी उम्र में माँ से तीन साल से भी ज़्यादा बड़ी थीं लेकिन माँ उन्हें एक  अर्से तक लड़की ही माना करती थीं. इंदिरा गाँधी की प्रशंसिकाओं में माँ से भी ऊंची पायदान पर हमारी नानी विराजमान थीं. उन्हें जब भी इंदिरा गाँधी की कोई फ़ोटो दिखाई जाती थी तो वो ठेठ ब्रज भाषा में कहती थीं –
जे तो बापऊ ते जादा मलूक ऐ !’ (यह तो बाप से भी ज़्यादा सुन्दर है)

फ़ीरोज़ गाँधी बड़े ख़ूबसूरत थे लेकिन नेहरु जी की ही तरह माँ को वो इंदिरा गाँधी के लायक़ नहीं लगते थे. माँ के हिसाब से इंदिरा-फ़ीरोज़ तनाव का मुख्य कारण उनका बेमेल विवाह ही था. एक बड़ी मज़ेदार बात बताऊँ –
माँ को इंदिरा गाँधी और केनेडी की जोड़ी बड़ी प्यारी लगती थी. हमारे घर में अमेरिकन मैगज़ीन स्पैन आया करती थी. उसमें नेहरु जी और इंदिरा गाँधी की अमेरिका यात्रा के समय की तमाम फ़ोटोज़ केनेडी परिवार के साथ आई थीं. माँ ने उन फ़ोटोज़ को देख कर कहा था –
ये मरी जैकलीन केनेडी मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती. जोड़ी तो केनेडी और इंदिरा की अच्छी लगती है. अगर इंदिरा को अपनी बिरादरी से बाहर ही शादी करनी थी तो फिर केनेडी से ही कर लेती.

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की कैबिनेट में इंदिरा गाँधी सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाई गईं. 1965 के भारत-पाक युद्ध में अपने साहस का परिचय देते हुए वो सीमा पर जवानों का साहस बढ़ाने के लिए चली गईं. माँ ने अटल जी से बहुत पहले इंदिरा गाँधी के इस साहस के कारण उन्हें दुर्गा का अवतार मान लिया था.
भारत-पाक युद्ध के समय इंदिरा गाँधी ने अधिक सब्ज़ी-फल, अन्न आदि उगाने के लिए हम भारतीयों को एक अनोखा सुझाव दिया था –
आप लोग अपने घरों में फूल की जगह फूल गोभी लगाएं.’
इस सन्देश पर अमल करते हुए माँ ने घर में गुलाब की क्यारियों में गुलाब हटाकर फूल गोभी के पौधे लगवा दिए थे.
लाल बहादुर शास्त्री का आकस्मिक निधन हमारे परिवार में भी व्यक्तिगत त्रासदी के रूप में देखा गया था. माँ का दुःख तब और भी बढ़ गया था जब उन्हें पता चला कि वो चौदह कैरेट का सोना चलवाने वाला खलनायक मुरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में है. लेकिन जब उनसे लगभग 22 साल छोटी इंदिरा गाँधी ने उन्हें प्रधानमंत्री की दौड़ में पटखनी दी तो माँ की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. शास्त्री जी की मृत्यु के बाद पहली बार उसी दिन हमारे यहाँ पकवान बनाए गए थे.
माँ को वी. वी. गिरि तबसे नापसंद थे जब वो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल थे. लेकिन 1969 में जब इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में उनका समर्थन किया तो वो भी उन्हें अच्छे लगने लगे थे. मुरारजी देसाई, सी. बी. गुप्ता आदि को इंदिरा गाँधी की खिलाफ़त करने के कारण उन्होंने खलनायकों की श्रेणी में डाल दिया था.
1971 के भारत-पाक युद्ध के समय तो हमारे घर में इंदिरा गाँधी की एक तरह से पूजा ही की जाने लगी थी. माँ की दृष्टि में बांगला देश का तो दुनिया में वजूद ही अकेले इंदिरा गाँधी के दम पर मुमकिन हो पाया था.
फिर पता नहीं क्या हुआ कि माँ की दुर्गा के खिलाफ़ फिर से साज़िशें शुरू हो गईं और उसमें सबसे बड़ा हाथ किसी सिर-फिरे जे. पी. का था. माँ के शब्दों में -
भला किसी चाचा को अपनी भतीजी के खिलाफ़ ऐसी ओछी हरक़त करनी चाहिए थी?’
1975 में जब इंदिरा गाँधी के खिलाफ़ इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया तो जस्टिस सिन्हा माँ की दृष्टि में प्राण जैसे खलनायक हो गए. फिर जब जून, 1975 में इमरजेंसी लगाई गयी तो माँ की दलील थी –
और क्या करती बेचारी?’

हम नौजवान माँ की इस बेचारी को जब उसकी हिटलरशाही के लिए कोसते थे तो माँ बाक़ायदा हम से खफ़ा हो जाती थीं. लेकिन एक बात अच्छी थी. हमारी ही तरह माँ को संजय गाँधी नापसंद था.
फिर इमरजेंसी ख़त्म हुई और मार्च, 1977 में चुनाव हुए. माँ को इंदिरा गाँधी की जीत पर पूरा यकीन था. उन दिनों हमारे यहाँ टीवी नहीं था. ताज़ा समाचार के लिए हम ट्रांजिस्टर पर ही निर्भर थे. सवेरे 5 बजे मैंने ट्रांजिस्टर पर समाचार लगाए. मुख्य समाचार था –
रायबरेली से इंदिरा गाँधी चुनाव हार गईं.
मैंने माँ-पिताजी के कमरे में जाकर उन्हें जगा कर यह समाचार सुनाया. माँ ने अविश्वास जताते हुए कहा –
चल झूठे ! खा मेरी क़सम !
मैंने कोई क़सम नहीं खाई बस ट्रांजिस्टर उनके सामने रख दिया. हिंदी समाचार चल रहे थे राजनारायण का जीवन परिचय चल रहा था और यह बताया जा रहा था कि विश्व इतिहास में एम. पी. का चुनाव हारने वाली पहली प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी हैं.
माँ का रुदन दो मील दूर से भी सुना जा सकता था. इस दारुण दुःख देने वाले समाचार को उन तक पहुँचाने वाला मैं गरीब, महा-पापी घोषित कर दिया गया था.
उस दिन हमारे घर में नाश्ता-खाना कुछ नहीं बना. बाज़ार से लाए हुए समोसों, कचौड़ी को माँ ने हाथ भी नहीं लगाया और मेरे लाए हुए लड्डुओं में से एक लड्डू तो उन्होंने मुझ पर यह कहते हुए तान के दे मारा –
दुष्ट ! अब तू इंदिरा गाँधी के हारने पर लड्डू बांटेगा?’

जनता पार्टी की सरकार की हर टूट-फूट पर माँ खुश होती रहीं और जनवरी, 1980 में इंदिरा गाँधी की सत्ता में वापसी का समाचार माँ के लिए किसी जश्न से कम नहीं था.

संजय गाँधी को निहायत नापसंद करते हुए भी हमारी माँ उसकी मृत्यु पर शायद उतना ही रोई होंगी जितना कि इंदिरा गाँधी.
इंदिरा गाँधी की हत्या को तो माँ ने गाँधी जी की हत्या के बाद का सबसे दुखद समाचार माना था. रोते-रोते टीवी पर हर गतिविधि देखना और फिर आह भरते हुए कहना –
छाती ठंडी हो गयी दुश्मनों की. चली गयी देवी भगवान के घर !

माँ को देव-लोक गए हुए क़रीब 12 साल हो गए हैं. मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि देवलोक में मेरी माँ अपनी आराध्या के पड़ौस में ही कहीं रहें और नित्य उनके सानिंध्य का सुख प्राप्त करती रहें.

शनिवार, 20 अप्रैल 2019

राजनीतिक विकृति

जोश मलिहाबादी का एक शेर है -
सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,
जब कोई हमदर्द मिलता है तो, रो देता हूँ मैं.
भारतीय लोकतंत्र के सन्दर्भ में मैंने इस शेर का पुनर्निर्माण कुछ इस तरह किया है -
सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,
वो इसे जनतंत्र कहते हैं तो, रो देता हूँ मैं.
लेकिन बात मज़ाक़ की नहीं है. आज सवाल यह है कि हमारे देश की राजनीति - गटर-पॉलिटिक्स क्यों बन गयी है. आज राजनीतिक प्रदूषण हमारे औद्योगिक प्रदूषण से भी अधिक विषाक्त क्यों हो गया है? आज हम किसी भी राजनीतिज्ञ की बात पर भरोसा क्यों नहीं कर पाते हैं और किसी भी राजनीतिक दल के मैनिफ़ैस्टो को हम चुनावी-जुमला मानने के लिए क्यों विवश हैं?
आज समस्त विश्व के राजनीतिक पटल पर उच्च से उच्च राजनीतिक आदर्शों की अंत्येष्टि की जा रही है. मत्स्य-न्याय, 'सर्वाइवल ऑफ़ दि फ़िटेस्ट' समरथ को नहिं दोस गुसाईं' के सामने समाजवाद, साम्यवाद, लोक-तंत्र, 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' आदि के सिद्धांत फीके पड़ गए हैं.
समृद्ध पाश्चात्य देशो में भी लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा बेमानी होती जा रही है. उन देशों में कोई भूखा नहीं मरता लेकिन वहां भी गरीब हैं और दूसरे देशों के गरीबों को कम पैसे देकर दास-कार्य का दायित्व भी दिया जाता है. वहां भी अपराध माफ़िया का सियासत में दबदबा चलता है.
रूस, चीन ही क्या, सभी साम्यवादी देशों में साम्यवादी विचारधारा की धज्जियाँ उड़ चुकी हैं.
मुस्लिम देशों में मुस्लिम विश्व-बंधुत्व की अथवा समानता की भावना कब की तिरोहित हो चुकी है.
भारत भी शीघ्र ही लोकतंत्र की कब्रगाह बनने वाला है. धर्म निरपेक्षता की नीति तो पहले ही आंखरी साँसें ले चुकी है. नफ़रत की भीषण आग को सद्भाव के अंजुरी भर शीतल जल से बुझाया नहीं जा सकता.
बीजेपी तो कम से कम खुले आम दक्षिण-पंथी और अनुदारवादी दल है, तथाकथित उदारवादी, समाजवादी, बहुजन समाजवादी और प्रगतिशील दल भी अन्दर से खोखले हो चुके है.और उनका भी किसी सिद्धांत से लेना-देना नहीं है. वंशवाद सब दलों में है, बंदर-बाट सब जगह है, काला धन सब दल लेते हैं, सब दलों में प्रभावशाली अपराधियों का और विभीषणों का स्वागत होता है. राजनीति में स्त्रियों की सहभागिता मुख्य रूप से ग्लैमर बढ़ाने के लिए अथवा वंशवाद की परंपरा का निर्वाह करने के लिए होती है.
लोकतंत्र के इस विकृत वातावरण में हम आम लोग, द्रोपदी के समान बेबस होकर अपने सपनों का चीर हरण होते देखते हैं और हमारे सपनों की लाज बचाने के लिए कोई कान्हा भी कभी नहीं आता. भविष्य में राजनीति का और भी अधिक पतन होगा. हमारी आशाओं पर, हमारी आकाँक्षाओं पर, और भी कुठाराघात होगा. राजनीति का और भी अधिक अपराधीकरण होगा.
हमारी बेबसी, हमारी कुंठा और हमारे नपुंसक आक्रोश (impotent rage) के निवारण के लिए यह ज़रूरी है कि हमको इस बनावटी लोकतंत्र के स्वरुप में आमूल परिवर्तन करने के लिए एक देश-व्यापी आन्दोलन करना होगा और झूठे-मक्कारों को किसी भी मूल्य पर अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं करना होगा. हमको स्पॉन्सर्ड जन-सभाओं का बहिष्कार करना होगा. हमको नेताओं का जाप करने वालों का विरोध करना होगा, उनका चालीसा लिखने वालों और उन चालीसाओं का पाठ करने वालों का उपहास उड़ाना होगा.
हम अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी. हमारे लोकतंत्र का महल तो खंडहर हो ही चुका है, फिर तो उसकी नीव भी खोखली हो जाएगी और वह हमारे देखते-देखते भरभराकर धराशायी भी हो जाएगा.
केला तबहिं न चेतिया, जब ढिंग लागी बेर,
अब चेते ते का भया, काँटा लीन्हें घेर.

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

सज़ा-ए-मौन


सज़ा-ए-मौन -'
( 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' गीत की तर्ज़ पर )
पूछो न कैसे, मैंने बैन बिताया,
इक जुग जैसे इक पल बीता, जुग बीते मोहे चैन न आया,
मरघट जैसे सन्नाटे में, रहना हरगिज़ रास न आया.
दाल-ए-सियासत फीकी लागे, गाली का नहिं छौंक लगाया,
मुनि दुर्वासा की संतति को, मधुर बचन, कब कहाँ, सुहाया.
मुंह सिलवाया, कपड़ा ठूंसा, सम्मुख चौकीदार बिठाया,
गाली-गायन रीत पुरानी, मुझ पर ही क्यों सितम है ढाया.
कोयल कुहुक करे तो अच्छा, श्वान जो भोंके, तो वो सच्चा,
मेरी सहज प्रकृति पर बंधन ! ओ निष्ठुर ! तोहे, रहम न आया.
पूछो न कैसे, मैंने बैन बिताया -----