रविवार, 17 जून 2018

जीत लिया है सकल जहान

गोली खाता रहे जवान, सूली चढ़ता रहे किसान,
किन्तु पकौड़े बेच, भाग्य पर, इठलाता देखा इंसान,
सूखी रोटी, चिथड़ा कपड़ा, वृक्ष तले है खुला मकान,
अच्छे दिन आ गए, मगन है, आज समूचा हिंदुस्तान.

शुक्रवार, 15 जून 2018

चंद गुस्ताखियाँ - फ़िराक़ गोरखपुरी से क्षमा-याचना के साथ


1. बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
    तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं.
संशोधित शेर -
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
मुसाहिब, अपने आक़ा की महक, पहचान लेते हैं

2. ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
    वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में.
संशोधित शेर -
ग़रज़ कि काट दिए, ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तलुए चाट के गुजरें, कि दुम हिलाने में.

3.  ऐ दोस्त, हमने तर्के-मोहब्बत के बावजूद,
     महसूस की है तेरी ज़रुरत, कभी-कभी.
संशोधित शेर –
ऐ दोस्त, हमने तर्के-मोहब्बत के बावजूद,
इक नाज़नीं से पेच लड़ाए, अभी-अभी.
(तर्के मुहब्बत - प्रेम का परित्याग)

4.  याद करते हैं किसी को, मगर इतना भी नहीं,
      भूल जाते है किसी को, मगर ऐसा भी नहीं.
नेताजी उवाच –
अपने वादों से मुकरता हूँ, मगर ऐसा भी नहीं,
जूते-चप्पल से नवाज़ो, मुझे, गोली से नहीं.

शनिवार, 9 जून 2018

सत्ता-भक्ति में शक्ति

पानी केरा बुदबुदा, अस भक्तन की जात,
पद छिनते छुप जाएंगे, ज्यों तारा परभात.
आजकल भक्तगण टीवी चैनलों पर और फ़ेसबुक पर छाए हुए हैं. लेकिन ये भक्त कुर्सी पर विराजमान महानुभावों की ही भक्ति करते हैं, न कि किसी मंदिर में स्थापित शिवजी की, रामजी की, कान्हाजी की या हनुमानजी की. इन सत्ता-भक्तों की वाणी अत्यंत मधुर होती है. लगता है कि ये बाबा रामदेव के दन्तकान्ति से नहीं, बल्कि डायनामाइट से दन्त-मंजन करते हैं.
बादशाह अकबर के ज़माने में दर्शनियों की एक जमात होती थी जो बादशाह के दर्शन किये बिना न पानी का एक भी घूँट लेती थी और न मुंह में अन्न का एक भी दाना डालती थी.
इंदिराजी के ज़माने में कोई बरुआ साहब हुआ करते थे जिन्हें इंदिरा जी में ही इंडिया दिखाई देता था.
महा-विद्वान पी. वी. नरसिंह राव मानव संसाधन मंत्री के रूप में कुमाऊँ विश्व विद्यालय के दीक्षांत समारोह में आए तो कह गए -
'हम पुराने लोग नई तकनीक के बारे में कुछ नहीं जानते थे. हम राजीव गाँधी जी के आभारी हैं कि उन्होंने हमको तकनीकी दुनिया में हमारा हाथ पकड़कर चलना सिखाया है.'
बिहार में जब लालू-राज था तो वहां मंदिरों में हनुमान चालीसा की जगह लालू चालीसा पढ़ा जाता था.
और वर्तमान कुर्सी भक्तों की भक्ति का तो बखान ही नहीं किया जा सकता. ये भक्त, पुराने कुर्सी भक्तों की तुलना में अधिक उत्साही हैं, अधिक समर्पित हैं, अधिक आक्रामक हैं, और सबसे बड़ी बात है कि अधिक अंधे हैं.
इन भक्तों को मतभेद स्वीकार्य ही नहीं है. जिस से उनके विचार नहीं मिलते उसको अपने त्रिशूल से भेदना इन्हें खूब आता है.
टीवी चैनल्स पर हो रही बहसों में अपने विरोधियों को ये कच्चा चबा जाने की हर संभव कोशिश करते है.
फ़ेसबुक पर पोस्ट की गयी कोई बात इन्हें अगर नागवार गुज़रे तो ये लाठी भांजते हुए अपने शिकार की ओर दौड़ पड़ते हैं. इनकी भाषा इतनी अशिष्ट होती है कि लोग चिरकीन की शायरी भूल जाएं और इनके विचार तथा तर्क इतने बचकाने होते हैं कि के. जी. में पढ़ने वाला बच्चा भी उस पर हंस पड़े.
अपनी स्पष्टवादिता के कारण अक्सर मुझे इन भक्तों के प्रकोप का भाजन बनना पड़ता है. कल मैंने अपने एक मित्र की पोस्ट पर प्रणव मुुखर्जी के भाषण और उनके राजनीतिक जीवन पर प्रतिकूल टिप्पणी क्या कर दी, एक कुर्सी-भक्त मुझ पर तलवार लेकर टूट पड़े. जैसे तैसे मेरी जान बची.
अपने सभी जागरूक मित्रों से मेरा अनुरोध है कि वो इन अति-उत्साही कुर्सी-भक्तों से ३६ का आंकड़ा रक्खें. अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो मैं समझूंगा कि मेरी मुफ़्त में हज़ामत कराने में उन्हें भी खुशी मिलती है.
वैसे एक बात अच्छी है. इन बरसाती मेढकों की टर-टर सत्ता परिवर्तन होते ही बंद हो जाती है पर जब तक कुर्सी पर विराजमान मूरत नहीं बदलती तब तक तो इनके शोर और इनकी हरक़तों को हमको बर्दाश्त करना ही होगा.

शुक्रवार, 1 जून 2018

एक क्लास की कहानी


राजनीति-शास्त्र की कक्षा में अपने विद्यार्थियों को भारतीय लोकतंत्र की विशेषताएँ पढ़ाते समय गुरु जी उनको इतिहास की एक कथा सुनाने लगे –
बच्चों ! द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने फ़्रांस पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन फ़्रांसीसी अब भी छुप-छुप कर जर्मन सेना पर हमले कर रहे थे. इसके जवाब में जर्मन सैनिक घर-घर जाकर, खोज-खोज कर फ़्रांसीसी नौजवानों को मारने लगे.
पेरिस से बहुत दूर एक निर्जन से कस्बे के एक घर में एक बुढ़िया रहती थी. बुढ़िया के दो बेटे थे पर जर्मन फ़ौज के डर से वो कहीं छुप गए थे. एक रात को बुढ़िया के दरवाज़े को कोई ज़ोर से भड़भड़ाते हुए चिल्लाया –
दरवाज़ा खोलो, नहीं तो हम इसे तोड़ देंगे.'
मजबूरन बुढ़िया को दरवाज़ा खोलना पड़ा. हाथों में रायफ़ल लिए हुए दो जर्मन सैनिक घर के अन्दर दाख़िल हो गए. सैनिकों ने देखा कि बुढ़िया के दोनों फ़रार बेटे खाना खा रहे हैं. जर्मन सैनिकों ने उन दोनों भगोड़ों को एक खम्बे से बाँध दिया और फिर उनकी माँ को हुक्म दिया –
बुढ़िया, हमको भूख लगी है. चल, हमको खाना खिला.'
बुढ़िया ने उन दोनों सैनिकों को अपने हाथों का बना स्वादिष्ट भोजन बड़े ही प्यार से खिलाया और फिर उनके सामने अपने बेटों की जान की भीख मांगने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी.
भरपेट स्वादिष्ट भोजन करके दोनों जर्मन सैनिक दरियादिल हो गए थे. उन्होंने बुढ़िया से कहा –
बुढ़िया, तूने हमको इतना अच्छा खाना खिलाकर हमारा दिल खुश कर दिया. वैसे तो हम किसी की नहीं सुनते पर हम तेरी बात सुनेंगे. अब तू ही बता कि हम तेरे किस बेटे को पहले मारें और किस बेटे को बाद में.’
कथा समाप्त हो गयी. एक छात्र ने आश्चर्य प्रकट करते हुए गुरु जी से पूछा –
गुरु जी द्वितीय विश्व युद्ध के इस प्रसंग का भारतीय लोकतंत्र से क्या सम्बन्ध है?
गुरु जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया –
बिलकुल सम्बन्ध है. क्या तुमने उस बुढ़िया को नहीं पहचाना? वह बुढ़िया ही तो अपना भारतीय लोकतंत्र है.
एक और विद्यार्थी ने पूछा – तो उस बुढ़िया के वो दो बेटे कौन थे?
गुरु जी ने उत्तर दिया – बुढ़िया का बड़ा बेटा – ईमान था और छोटा बेटा – सांप्रदायिक सद्भाव था.
तीसरे विद्यार्थी ने पूछा – तो वो जर्मन सैनिक कौन-कौन थे?
गुरु जी का जवाब था – उनमें से एक देशभक्त पार्टी था और दूसरा था – महा गठबंधन !                         

सोमवार, 28 मई 2018

पुलिस-मित्र


पुलिस वालों को देखकर लोगों की घिग्घी बंध जाती है या उन्हें सांप सूंघ जाता है पर मुझे तो वो अपने दोस्त और मददगार ही लगते हैं. इसका कारण मुख्य रूप से यह है कि उन्हें अपना दोस्त समझने के संस्कार मुझे घुट्टी में मिले हैं.
पिताजी जुडीशियल मजिस्ट्रेट थे इसलिए सिपाहियों और दरोगाओं का हमारे यहाँ छुट्टियों के दिनों में भी, किसी को ज़मानत दिलाये जाने की खातिर या किसी को जेल भिजवाने की खातिर, या ऐसे ही और कामों की वजह से आना जाना लगा ही रहता था. मजिस्ट्रेट साहब को फ़ौजी सलाम के साथ-साथ मुझ भैया जी को भी कभी-कभार खाकी वर्दी-धारियों की मुस्कान भरी सलाम मिल जाया करती थी.
बाराबंकी में हमारी फूस वाली कोठी जामुन के पेड़ों के लिए पूरे शहर में मशहूर थी. हमको ज़मीन पर अपने-आप टपके हुए, पिलपिले जामुन बिलकुल अच्छे नहीं लगते थे पर जामुन के पेड़ों पर चढ़कर ख़ुद जामुन तोड़ने की कला से हम जैसे डरपोक कोसों दूर थे. सभी साहसी जामुन प्रेमियों के लिए हमारा खुला ऑफ़र होता था –
‘जामुन के पेड़ पर चढ़कर, जामुन तोड़कर थैले में भरो. आधे ख़ुद ले जाओ और आधे हमारे हवाले कर दो.’
पिताजी के परम मित्र, डी. एस. पी. तिवारी ताउजी, एक फुर्तीले नौजवान सिपाही के हाथों, हमारे यहाँ अपने बंगले की सब्जियां भिजवाया करते थे और बदले में वो हमारे घर से अपने लिए जामुन मंगवाते थे. नौजवान सिपाही एक पेड़ पर चढ़कर जामुन तोड़ता था, फिर वो दूसरे पर चढ़कर अपना और हमारा थैला, जामुनों से भरता था. यह मोगली अवतार हमारे बंगले के पिछवाड़े लगे बेल के पेड़ों पर चढ़कर भी यही फ़िफ्टी-फ़िफ्टी का खेल दोहराता था और माँ के लिए उनके प्रिय बेल के शर्बत की व्यवस्था करवाता था. हमको खट्टे-मीठे फल मुहैया करने वाले इस मोगली ने पुलिस वालों को मेरी दृष्टि में कितना ऊपर उठा दिया था, इसका शब्दों में बयान करना मुश्किल है.                     
  झाँसी में पिताजी ने एक पुरानी लैंडमास्टर कार खरीदी थी जो कि आम तौर पर धक्के खाने के बाद ही स्टार्ट हुआ करती थी. हमारी कोठी के पास ही बुंदेलखंड कॉलेज का चौराहा था जिस पर ट्रैफिक पुलिस का एक सिपाही तैनात रहता था. जब वो मुझे और पिताजी के दोनों चपरासियों को, पिताजी की कार में धक्का देते हुए देखता था तो वो भी उस में अपना योगदान देने के लिए आ जाता था और हमारे पिताजी थे कि जब कार स्टार्ट हो जाती थी तो उस सिपाही को धन्यवाद देने की ज़हमत भी नहीं उठाते थे, बस उनके चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ जाती थी जिसका कि मतलब होता था - ‘शाबाश’.   
पिताजी जब आज़मगढ़ में चीफ़ जुडिशिअल मजिस्ट्रेट थे तो वो एक बार महावीर जयंती के अवसर पर मुझे और माँ को लेकर कार (अब हमारी कार एम्बेसडर थी और उसे धक्का देकर स्टार्ट करने की कोई ज़रुरत नहीं पड़ती थी) से बनारस गए. जैन मंदिर से थोड़ी दूर पर ही कोतवाली थी. पिताजी ने इत्मीनान से कार कोतवाली के अन्दर पार्क की. टकटकी लगाकर देखने वाले सिपाहियों से और सब-इंस्पेक्टर से न तो उन्होंने कुछ पूछा और न ही किसी को कुछ अपने बारे में बताया. फिर हम सब मंदिर के लिए चल दिए. जब तक हम मंदिर से लौटकर कोतवाली पहुँचे तब तक हमारे खाने का समय हो चुका था. हमारे पास पूड़ियाँ और सब्ज़ी थी पर हम बिना दही के खाना कैसे खा सकते थे? हमलोगों के साथ पिताजी कोतवाली के हॉल में पहुंचे, वहां पड़ी एक बड़ी सी टेबल पर माँ ने हमारा खाना सजाया. पिताजी ने एक सिपाही को बुलाकर 10 रूपये का नोट दिया और फिर फ़रमाया –
‘जल्दी से आधा किलो दही, मेम साहब और भैया के लिए नीबू, अदरक, काला नमक डलवाकर दो गन्ने के गिलास और मेरे लिए एक कम चीनी वाली शिकंजी ले आओ.’ (ये किस्सा 44 साल पुराना है, तब ये सारा सामान कुल 3-4 रुपयों में आ गया होगा.)
पिताजी के मुगले आज़म वाले रौब-दाब के बीच मैंने हतप्रभ सब-इंस्पेक्टर को पिताजी का परिचय दे दिया. फिर क्या था? पुलिस-मित्र हम लोगों की सेवा और भी अधिक तत्परता से करने लगे. हमारे खाना खाने के दौरान हमारी कार भी झाड़-पौंछ कर चमका दी गयी.
पिताजी के अवकाश-ग्रहण के बाद हमारे घर में पुलिस-मित्रों की आवाजाही पूरी तरह से ख़त्म हो गई पर मेरे लिए पुलिस वाले कभी गब्बर सिंह की तरह बच्चों को रातों में डराने वाले नहीं रहे. अल्मोड़ा में मेरे मित्र डॉक्टर अग्रवाल मुझसे पूछा करते थे –
जैसवाल साहब, आप इन पुलिस वालों से इतने कॉन्फिडेंस से कैसे बतिया लेते हैं?’
अल्मोड़ा की ही बात है. एक हेड कांस्टेबल इतिहास में प्राइवेट विद्यार्थी के रूप में एम. ए. कर रहा था. गाइडेंस के लिए वो मेरी शरण में आया और फिर उसके हफ़्ते में दो-तीन चक्कर तो (मेरे घर के) लग ही जाते थे. वो उत्तर प्रदेश के एटा जिले का रहने वाला था. जब से उसे यह पता चला कि एटा, मेरी ननिहाल है तो वो पढ़ाई के अलावा सारी बातें, मुझसे ब्रज भाषा में ही करने लगा था.
निस्वार्थ-भाव से पढ़ाने वाले मुझ गुरु जी को वो किसी न किसी रूप में औब्लाइज करना चाहता था. कभी वो मुझसे कहता –
‘गुरु जी, रीगल सिनेमा बारो मोय जानतो ऐ. (रीगल सिनेमा वाला मुझे जानता है).
फ्री में पिक्चर देखबे कूँ मन करे तो मोय बतइयो.’ (मुफ्त में फ़िल्म देखने का मन करे तो मुझे बताइएगा).
अब गुरु जी ही क्या, कोई भी भला मानस उस बिगड़े प्रोजेक्टर वाले, नरक समान दम-घोंटू  सिनेमा हॉल में जाकर फ़िल्म देखने की कल्पना भी नहीं कर सकता था.
कभी वो मुझसे पूछता – ‘गुरूजी, दारू-शारू?’
ऐसे सवालों पर उसे जवाब के रूप में डांट और जान से मारे जाने की धमकी मिलती थी.
एक बार उसने मुझसे पूछा – ‘गुरूजी, कोऊ तुमकूं परेसान कत्त होय तो बा सारे कूँ पिटवा दूं?’ (आपको अगर कोई परेशान करता हो तो उस साले को पिटवा दूं?)                   
इस बार मैंने उसकी सेवाओं का भरपूर लाभ उठाने के लिए उस से कहा –
‘हाँ, एक आदमी तो मुझे बहुत परेशान करता-रहता है. उसकी पिटाई का इंतज़ाम करवा दो तो मैं खुश हो जाऊंगा.’
भक्त छात्र ने तमतमाकर, मुट्ठी बांधकर, मुझसे पूछा –
‘गुरूजी, नाम बताओ बा सारे का’ (उस साले का नाम बताइए)
मैंने इस सवाल के जवाब में एक सवाल दाग दिया –
‘क्या तू अपना नाम ख़ुद नहीं जानता? अपने ऊटपटांग सवालों से और ऊल-जलूल सेवाओं के अपने प्रस्तावों से एक तू ही तो है जो मुझे सबसे ज़्यादा परेशान करता है.’
एक लखनऊ का किस्सा भी पेशे-ख़िदमत है –
मेरे अल्मोड़ा जाने के बाद मेरा पुराना लम्ब्रेटा स्कूटर लखनऊ में लगभग अनाथ हो गया था. उसके सारे डाक्यूमेंट्स भी इधर से उधर कहीं गायब हो गए और ख़ुद उसकी दशा ऐसी हो गयी कि बिना धक्का दिए उसने स्टार्ट होना ही छोड़ दिया था. छुट्टियों में जब मैं लखनऊ पहुँचता था तो सबसे पहले मुझे अपनी शाही सवारी को मूर्छा से उठाने के लिए संजीवनी बूटी का इंतज़ाम करना पड़ता था.
एक बार आधे घंटे की मशक्क़त करने के बाद स्टार्ट कर के मैं अपने पुष्पक विमान को निशातगंज ले गया. गलती से वन-वे लेन में, मैं उल्टी दिशा से घुस गया. एक ट्रैफिक पुलिस वाले ने मुझे रोक लिया और मुझसे बोला –
‘वन-वे वाला इतना बड़ा बोर्ड आपको दिखाई नहीं दिया क्या? चलिए, अपने पेपर्स दिखाइए.’
मैंने कहा –
‘पेपर्स तो नहीं हैं.’
उसने कहा –
‘तो जाइए, घर से लेकर आइए.’
मैंने दुखी होकर कहा –
‘भैया, पेपर्स तो सब इधर-उधर हो गए हैं. घर में भी नहीं हैं.’
सिपाही महोदय ने दृढ़ता से कहा –
‘तब तो आपका स्कूटर ज़ब्त होगा. पेपर्स लाइए और फिर जुर्माना भर के स्कूटर वापस ले जाइएगा.’
मैंने मुस्कुराते हुए उस से कहा –
‘दोस्त, तुम मेरा स्कूटर ज़ब्त ही कर लो, मैं तो ख़ुद इस से छुटकारा पाना चाहता हूँ. इसे बेचकर मुझे हज़ार-बारह सौ जो मिलने वाले थे, उस से तो तुम्हारा जुर्माना भी ज़्यादा ही होगा.’
मेरी बात सुनकर अब सिपाही ख़ुद चकरा गया. फिर अचानक उसने मुझसे पूछा –
‘आप क्या कहीं टीचर हैं?’
मैंने अपना परिचय दिया तो वो मुझसे हाथ जोड़ कर बोला –
‘गुरूजी, अपना स्कूटर ले जाइए और इसे फ़ौरन बेच दीजिए.’
मैंने अपने इन नए मित्र को धन्यवाद दिया और फिर उसकी मदद से ही स्कूटर को धक्का देकर स्टार्ट कर मैं उसी स्कूटर के लिए खरीदार खोजने के लिए निकल पड़ा.  
ग्रेटर नॉएडा में मेरा मकान बन रहा था. बाथरूम और किचन की फ़िटिंग्स खरीदने के लिए मैं प्लंबर के साथ दिल्ली गया. हमने ढेर सारा सामान ऑटो में भरा और फिर हम ग्रेटर नॉएडा के लिए चल पड़े. ग्रेटर नॉएडा की चौकी पर चेकिंग करने वाले पुलिस दस्ते ने हमको रोक लिया. हमारे पास इतना अधिक सामान ले जाने के लिए आवश्यक कागज़ात नहीं थे. इंस्पेक्टर ने मुझ पर यह आरोप लगाया कि मैं इतना सारा सामान बेचने के इरादे से ले जा रहा हूँ. मैंने जब ये कहा कि ये सारा सामान मेरे निजी मकान के लिए है तो उसने मुझसे पूछा –
‘आपके घर में कितने बाथरूम और कितने किचन हैं?’
मैंने जवाब दिया –
‘दोनों मंज़िलें मिलाकर कुल 5 बाथरूम हैं और 2 किचन.’
इंस्पेक्टर ने ताना मारते हुए पूछा –
‘इतना बड़ा मकान बनवा रहे हैं आप, और चल रहे हैं इस खटारा ऑटो पर?
मैंने जवाब दिया –
‘भैया, ग़नीमत है कि अभी ऑटो से चलने के पैसे मेरे पास बचे हैं. हो सकता है कि मकान पूरा करते-करते, आगे से घर का सारा सामान मुझे सर पर ढोकर लाना पड़े.’
इंस्पेक्टर को मेरा जवाब सुनकर हंसी आ गयी. उसने पूछा –
‘आप करते क्या हैं?’
लखनऊ प्रसंग की ही तरह एक बार फिर मेरा परिचय पाकर पुलिस मित्रों ने प्रेम-पूर्वक मुझे बिना किसी जुर्माने के, सामान सहित विदा कर दिया.
और अब आख़री किस्सा.
2013 में हम पति-पत्नी को, अपनी बड़ी बेटी और दामाद से मिलने दुबई जाना था. पासपोर्ट बनवाने के लिए हम पासपोर्ट ऑफ़िस गए, वहां की औपचारिकताएं पूरी करने के एक हफ़्ते बाद इन्टरनेट पर हमको पुलिस इन्क्वायरी कराने के लिए निर्देश मिले. हमारे जानकार मित्रों ने बाताया कि बिना दान-दक्षिणा के पुलिस इन्क्वायरी संपन्न नहीं होती है.
हम ज़रूरी दस्तावेज़ और न्यौछावर के लिए ज़रूरी रकम के साथ कोतवाली पहुँच गए. वहां मैंने अपना परिचय दिया. हमको पता चला कि पुलिस इन्क्वायरी के लिए हमारे कागज़ात कोतवाली में पहले ही पहुँच चुके हैं.
कोतवाली में किसी कर्मचारी के घर में बेटा हुआ था, उसकी खुशी में हमको भी लड्डू खाने को मिले. मेरे लिए फीकी वाली और मेरी श्रीमती जी के लिए कम चीनी वाली चाय भी आई. हम समझ गए कि बलि की वेदी पर चढ़ाए जाने से पहले बकरे की पूजा की जा रही है.  
एक दीवानजी ने हमारे कागज़ात देखे, एक महिला क्लर्क ने हम दोनों से अलग-अलग फॉर्म्स पर फ़ोटो लगवाए, कुछ और एंट्रीज़ हुईं, फिर हमारे हस्ताक्षर भी हुए. इसके बाद पुलिस रजिस्टर में कुछ दर्ज किया गया. हमको रिफ़रेन्स के लिए दो नम्बर्स दिए गए.
अब मैंने चुपके से अपनी जेब में नोट टटोलते हुए दीवानजी से पूछा –
‘दीवानजी, आप पुलिस इन्क्वायरी के लिए हमारे घर अब कब आएँगे? हमको अब और क्या करना होगा?’
दीवानजी ने मुस्कराते हुए जवाब दिया –
‘गुरु जी, आप दोनों की पुलिस इन्क्वायरी तो यहीं पूरी हो गयी. हमको आप के घर आने की अब क्या ज़रुरत है? हमारे यहाँ से ये कागज़ात नॉएडा के सेक्टर 20 वाले दफ़्तर में जाएंगे और फिर वहां से आपके कागज़ात, पासपोर्ट ऑफ़िस चले जाएंगे. बस, उसके एक हफ़्ते बाद आप दोनों के पासपोर्ट आपके घर पहुँच जाएंगे.’
और ऐसा ही हुआ. बिना कुछ पैसा दिए, मुफ़्त में लड्डू खाकर, मुफ़्त की चाय पीकर, हमारी पुलिस इन्क्वायरी संपन्न हो गयी, फिर 15 दिन में हम दोनों के पासपोर्ट भी हमारे घर आ गए.
तो मित्रों ! यह आदि से लेकर अंत तक की सुखद कथा समाप्त हुई.
मेरी भगवान से यही प्रार्थना है कि ख़ाकी वर्दी-धारियों की मुझ पर यूँ ही कृपा बनी रहे और उनकी मदद से मेरे बिगड़े हुए काम, बिना हींग-फिटकिरी लगाए, यूँ ही चोखे होते रहें, यूँ ही संवरते रहें.

गुरुवार, 24 मई 2018

प्रभो ! कृपा कब बरसेगी?

कृपा कब बरसेगी?

अंधभक्तों पे कृपा, इतनी ज़रा, बरसा दे,
रेवड़ी बाँट का. ठेका तो मुझे , दिलवा दे.

मेरी इस अरदास पर प्रभू के कुछ अंधभक्त मेरे खून के प्यासे हो गए. मेरे जले पर नमक छिड़कते हुए मेरे हितैषी कृष्णा चंदोला भाई साहब ने मुझे सलाह दे डाली कि अपने ऊपर प्रभू की कृपा बरसवाने के लिए मुझे किसी मतिमंद अंधभक्त को अपने पड़ौस में बसा लेना चाहिए.
इस बात पर मुझे संतों की बानी का स्मरण हो आया -

चढ़े करेला, नीम पर, अति कड़वा हो जाय,
अंधभक्त, मतिमंद हो, संग, नरक हो जाय.

तथा

अंधभक्त को राखिए, आँगन कुटी छवाय,
सात जनम के पाप का, फल तुरंत मिल जाय.   

अपने ऊपर कृपा बरसवाने के लिए हम सबको एक सफल अंधभक्त के इन सभी इम्तहानों से ज़रूर गुज़रना होगा -
आपका रहमो-करम, ज़िन्दगी में, पाने को,
मैंने इस रूह की आवाज़ से मुंह मोड़ा है.
किसी शुबहे, किसी ऐतराज़ के, अंदेशे से,
इज्ज़तो-अक्ल को, ख़ुद ताक पे, रख छोड़ा है. 
       

मंगलवार, 22 मई 2018

सती प्रथा का उन्मूलन

राजा राममोहन राय की जयंती पर -


बंगाल प्रान्त के बर्दवान जिले के राधानगर गांव में एक मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार का एक बालक, राममोहन बहुत दुखी था। उसके बड़े भाई की अचानक ही मृत्यु हो गई थी। घर में शोक का वातावरण था पर एक ओर शोर भी था। कुछ महिलाएं ऊँचे स्वर में किसी को भला-बुरा कह रही थीं। राममोहन के कानों में कुछ ऐसी बातें पड़ रही थीं-

अभागी! आते ही पति को खा गई। यह तो हमारे कुल का सर्वनाश कर देगी। वहीं चली जाए जहां इसने हमारा बेटा भेज दिया है। इसके सती होने में ही परिवार और समाज का भला है। इसे सती होना चाहिए! इसे सती हो जाना चाहिए! बोलो सती मैया की जय!

                राममोहन ने देखा कि अभी-अभी विधवा हुई उसकी भाभी को घेर कर महिलाएं यह सब कह रही हैं। भाभी को भला-बुरा कहते-कहते अचानक सती मैया का जय-जयकार क्यों होने लगा,  यह नन्हे राममोहन के समझ में बिल्कुल नहीं आया। उसने अपनी माता श्रीमती फूल थाकुरानी से इन बातों का कारण पूछा तो उन्होंने अपने आंसू पोंछते हुए उसे बताया -

तेरी भाभी के दुर्भाग्य से हमारा बेटा हमको छोड़कर भगवान के पास चला गया है। यह अभागी विधवा हो गई है। इसका घर में रहना इसके लिए और सारे परिवार के लिए अशुभ होगा। पर हां,  अगर यह सती हो जाती है तो इसे स्वर्ग मिलेगा और हमारे कुल का नाम भी समाज में ऊँचा होगा।

राममोहन ने फिर पूछा -

माँ! सती किसे कहते हैं?  मेरी भाभी सती कैसे होंगी?

राममोहन की माँ ने उत्तर दिया – 

जो स्त्री अपने पति को अपना भगवान मानती हो और उसके बिना जीवित रहने को तैयार न हो वह सती कहलाती है। तेरी भाभी तेरे भैया की चिता में बैठ कर उसके शव के साथ ही जल कर सती हो जाएगी।

                बालक राममोहन इस भयानक घटना की कल्पना करके ही कांप गया। उसकी प्यारी सी भाभी, उसके खेल की साथी,  बिना किसी अपराध के जि़न्दा जला दी जाएगी और इस हत्या से पाप लगने के स्थान पर उल्टे कुल का और समाज का भला होगा, यह बात उसकी समझ से बाहर थी। महिलाएं जबर्दस्ती उसकी रोती हुई भाभी का दुल्हन की तरह श्रृंगार कर रही थीं। राममोहन दौड़कर अपनी भाभी के पास पहुंचा और उसने उसका हाथ पकड़ लिया। उसने चिल्लाते हुए कहा-

मैं अपनी भाभी को सती नहीं होने दूंगा। भैया के मरने में भाभी का क्या दोष है?  मैं किसी को इनकी हत्या नहीं करने दूंगा।

                राममोहन का चिल्लाना सुनकर लोग-बाग उसके आस-पास जमा हो गए। उसे लगा कि अब सब उन दुष्ट महिलाओं से उसकी भाभी को बचा लेंगे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ,  उल्टे एक आदमी ने बढ़कर राममोहन को पकड़ लिया और दूसरे ने उसके गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया। राममोहन की माँ दौड़कर उसके पास पहुंचीं पर वह भी उसकी मदद करने के स्थान पर उसे ही डांटकर कहने लगीं -

अभागे ! अधर्म की बात करता है?  सती प्रथा का पालन करने में बाधा पहुंचाएगा तो सीधा नरक जाएगा।

                राममोहन के देखते-देखते धर्म के ठेकेदार उसकी भाभी को घसीटते हुए उसके पति की चिता तक ले गए। वह बेचारी प्राणों की भीख मांगती रही पर वहां शंख,  घडि़याल और ढोल की आवाज़ में उसकी पुकार सुनने वाला कौन था?  दो पल में ही रोती-चीखती, दया की भीख मांगती, राममोहन की बेबस भाभी आग की लपटों में समा गई। सती मैया के जय-जयकार ने राममोहन के दुख को और बढ़ा दिया। बालक राममोहन की आँखों के आंसू अब सूख चुके थे,  उनमें अब अंगारे थे। उसने सती की  चिता की गर्म राख को मुट्ठी में भरकर प्रण किया -

मैं आज यह शपथ खाता हूं कि इस हत्यारी प्रथा का समाज से नामो-निशान मिटा दूंगा। चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान की बाज़ी ही क्यों न लगानी पड़े।

                उस दिन से राममोहन को रीति-रिवाज के नाम पर भांति-भांति की कुरीतियों और अंध-विश्वासों से चिढ़  हो गई। जब उसने पण्डितो और मौलवियों को धर्म के नाम पर भोले-भाले ग्रामवासियों को ठगे जाते देखा तो उसके हृदय में उनके प्रति भी कोई श्रद्धा नहीं रह गई। कुछ दिनों पहले तक सामान्य बालकों की तरह उछल-कूद करने वाला राममोहन अब धीर-गम्भीर हो गया था। वह दिन-रात पुस्तकों का ही अध्ययन करता रहता था। इन पुस्तकों में धार्मिक ग्रंथ भी होते थे और नीति व दर्शन के भी। इतिहास तथा तर्क-शास्त्र में भी उसकी गहरी रुचि थी और साहित्यिक ग्रंथ पढ़ना तो उसे सबसे अच्छा लगता था। राममोहन के पिता श्री रमाकांत राय एक अनुदारवादी सनातनी  ब्राह्मण थे। उनके पुरखे कई पीढि़यों से बंगाल के नवाब के यहां नौकरी करते थे। राममोहन के लिए भी उसके पिता ने कुछ ऐसा ही सोच रक्खा था। पिता को अपने पुत्र का पुस्तकों से लगाव अच्छा लगता था,  उसके संस्कृत और फ़ारसी भाषाओं के ज्ञान पर गर्व भी होता था पर उसकी हर बात को बुद्धि और विवेक  की कसौटी पर परखने की प्रवृत्ति उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। गांव में शिक्षा प्राप्त करने के बाद राममोहन को अरबी-फ़ारसी और मुस्लिम धर्म-शास्त्र में पारंगत होने के लिए पटना भेजा गया। पटना में मन लगाकर राममोहन ने मुस्लिम धर्म,  दर्शन,  न्यायशास्त्र,  तर्क-शास्त्र और इतिहास का अध्ययन किया। इन्हीं दिनों उसने यूनानी विद्वानों के ग्रंथों के अरबी अनुवादों का भी अध्ययन किया। उसे सूफि़यों की उदारता और समन्वयवादी विचारधारा ने बहुत प्रभावित किया। धर्म के नाम पर खून-खराबा उसे पहले से पसंद नहीं था,  अब सूफ़ी दर्शन के अध्ययन से उसके विचारों में और भी अधिक उदारता आ गई थी। राममोहन ने हिन्दू धर्म के सच्चे स्वरूप को जानने का प्रयास किया। उसने हिन्दू धर्म के आधार ऋग्वेद, सहित चारो वेदों का अध्ययन किया पर यह जानकर उसे आश्चर्य हुआ कि सनातन हिन्दू धर्म वैदिक परम्पराओं से बहुत दूर चला गया है। ऋग्वेद में ईश्वर के एकत्व और उसके निराकार होने पर बल दिया गया है। मूर्तिपूजा, बहुदेव-वाद और अवतारवाद का उसमें कोई स्थान नहीं है। राममोहन ने धर्म के इसी रूप को स्वीकार किया और मूर्तिपूजा से मुंह मोड़ लिया। उसके सनातनी परिवार को उसका धार्मिक विद्रोह सहन नहीं हुआ। उसकी माँ श्रीमती फूल थाकुरानी ने उसको बुलाकर उससे पूछा -

राममोहन तूने मूर्ति-पूजा क्यों छोड़ दी?  क्या तू मुसलमान या क्रिस्तान हो गया है?

राममोहन ने जवाब दिया-

नहीं माँ! मैंने धर्म परिवर्तन नहीं किया है। मैंने तो सच्चे वैदिक धर्म को अपनाकर मूर्ति-पूजा छोड़ी है।

माँ ने नाराज़ होकर कहा-

वेद अपनी जगह पर ठीक कहते होंगे पर हमारे कुल में मूर्ति-पूजा होती आई है और तुझे भी करनी पड़ेगी। नहीं करेगा तो परिवार तेरा बहिष्कार कर देगा।

मां और बेटा दोनों ही अपनी जि़द पर अड़े रहे। राममोहन ने मूर्ति-पूजा नहीं अपनाई तो माँ और परिवार वालों ने बेटे का ही परित्याग कर दिया। अपने सिद्धान्तों की खातिर राममोहन को घर और परिवार से निकाला जाना भी स्वीकार्य था। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी  उसका अध्ययन जारी रहा। सन् 1803 में अपने पिता की मृत्यु के बाद वह मुर्शिदाबाद चला गया। उपनिषद और वेदान्त के ज्ञान के बाद उसने विभिन्न धर्मो व दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन करना प्रारम्भ किया। वैदिक धर्म,  जैन धर्म,  बौद्ध धर्म,  इस्लाम,  ईसाई धर्म,  यहूदी धर्म तथा पारसी धर्म के धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों के अध्ययन से वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि सभी धर्मों का सार एक ही है और धर्म के नाम पर विवाद व झगड़े निरर्थक हैं।
एक विद्वान के रूप में अब तक राममोहन राय पूरे बंगाल में प्रतिष्ठित हो चुके थे। अपने विचार वह बुद्धि और विवेक की कसौटी पर परखने के बाद ही व्यक्त करते थे। इनमें न तो कोई पूर्वाग्रह होता था न किसी प्रकार की हठधर्मिता ही। उनके हृदय में दूसरो के विचारों के प्रति आदर और सहिष्णुता की भावना तो थी पर साथ ही साथ गलत को गलत कहने का साहस भी था। इसीलिए उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधविश्वासों पर खुलकर प्रहार किए। किसी भी बात को रीति-रिवाज,  परम्परा और संस्कार के नाम पर आंख मूंद कर स्वीकार कर लेना उन्हें सहन नहीं था। धर्म के नाम पर ढोंग करना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। पण्डितों के चमत्कारपूर्ण कार्यों में भी उनकी कोई आस्था नहीं थी। जादू-टोना करने वालों को वह पाखण्डी समझते थे और उनके अनुयायिओं को वह मूर्ख मानते थे। राममोहन राय को केवल हिन्दू समाज में ही खराबियां दिखाई देती हों,  ऐसा नहीं था अपितु उन्हें दुनिया भर के धर्मावलम्बियों में,  उनके समाज में,  किसी न किसी रूप में ऐसी ही कुरीतियां,  ऐसी ही मूर्खतापूर्ण मान्यताएं और ऐसे ही पोंगापंथी विचार देखने को मिले। राममोहन राय का कहना था -
चमत्कारों में विश्वास करके मनुष्य खुद को धोखा देता है। चमत्कारी शक्ति की कल्पना करना ही मूर्खता है। ईश्वर से भी आप किसी चमत्कार की आशा मत रखिए। सभी कार्य निश्चित नियमों के अनुरूप होते हैं, उनमें उलट-फेर करने की शक्ति ईश्वर में भी नहीं है।

राममोहन राय की विचारधारा पर यूरोपीय पुनर्जागरण की अमिट छाप पड़ी। उन्होंने बेंथम के उपयोगितावाद की प्रगतिशील विचारधारा ग्रहण की और भारतीय समाज को धार्मिक,  सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से मुक्त करने का प्रयास किया। सन् 1828 में एकेश्वरवाद व ईश्वर के निराकार रूप में आस्था रखने वाले,  कर्मकाण्ड और पुरोहितवाद से रहित ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना कर उन्होंने मानव धर्म की महत्ता का प्रचार किया।
  राममोहन राय ने नारी उत्थान को राष्ट्र के विकास के लिए पहली शर्त माना। स्त्री-शिक्षा पर लगे सामाजिक प्रतिबन्धों को तोड़ने के लिए उन्होंने घर-घर जाकर अभिभावकों को इस बात के लिए तैयार करने का प्रयास किया कि वह अपनी बेटियों को उनके द्वारा स्थापित कन्या पाठशाला में पढ़ने के लिए भेजें। स्त्री-शिक्षा में बाधक पर्दा प्रथा और बाल-विवाह की प्रथा की हानियों पर भी उन्होंने प्रकाश डाला। उन्होंने बंगाल के ब्राह्मण समाज का कलंक कही जाने वाली कुलीन प्रथा पर निर्मम प्रहार किए। कुलीन प्रथा में उच्च कुलीन ब्र्राह्मण अपनी बेटियों का विवाह अपने से ऊँचे कुल में ही कर सकते थे और इस कारण अनेक कन्याएं या तो अविवाहित रह जाती थीं अथवा उनका बेमेल विवाह कर दिया जाता था या एक ही वर को भारी दहेज देकर अनेक कन्याएं ब्याह दी जाती थीं। बाल-विवाह और बाल-वैधव्य की त्रासदी भी इस कुरीति से जुड़ी थी। राममोहन राय ने इस कुरीति के विरुद्ध जन-जागृति अभियान छेड़ा।
उन्होंने कन्या-विक्रय और स्त्रियों को पति और पिता की सम्पत्ति में कोई भी अधिकार न दिए जाने जैसी सामाजिक कुरीतियों पर भी जमकर प्रहार किए।
स्त्रियों के इस उद्धारक ने सती प्रथा के उन्मूलन के लिए तो अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया। उन्होंने सती की घटना को जघन्य हत्या माना। उनके द्वारा स्थापित ‘आत्मीय सभा’ ने सती प्रथा को वैदिक परम्परा के विरुद्ध बताया। ‘धर्म सभा’ के कट्टर पंथियों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी तो उन्होंने उसकी भी परवाह नहीं की। अनुदारवादी पत्र ‘समाचार चन्द्रिका’ में उनकी लगातार निन्दा की जाती रही पर इससे भी सती प्रथा के उन्मूलन हेतु उनका अभियान थमा नहीं। इस प्रथा को कानूनन अपराध घोषित कराने के लिए उन्होंने मैटकाफ और बेंटिंग जैसे उदार ब्रिटिश अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करने का हर सम्भव प्रयास किया। इस काम के लिए उन्होंने एलेक्जे़ण्डर डफ़ जैसे कट्टर ईसाई धर्म प्रचारक की भी मदद ली। कभी वह सरकार को उसकी प्रगतिशीलता का वास्ता देते थे तो कभी जागरूक भारतीयों से अनुरोध करते थे कि वह भारतीय समाज को कलंकित करने वाली इस कुप्रथा को दूर करने में उनका साथ दें। अपने तर्कों से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करते थे कि सती प्रथा एक सामाजिक कुरीति है न कि एक शास्त्र-सम्मत धार्मिक परम्परा। सरकार को वह यह भरोसा दिलाने में भी सफल रहे कि सती प्रथा के उन्मूलन से भारत में किसी प्रकार के सैनिक विद्रोह की सम्भावना नहीं है। अन्ततः उनके भगीरथ प्रयासों से 1829 में गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिग के शासनकाल में रेग्युलेशन 17 के द्वारा सती प्रथा को ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया गया। उस दिन राममोहन राय को अपनी सती भाभी की बहुत याद आ रही थी। वह मन ही मन अपनी मृत भाभी से कह रहे थे -

भाभी! जब तुम्हें लोग जबर्दस्ती चिता में बिठाकर जला रहे थे, तब मैं छोटा था और कानून अंधा था। आज मैं बड़ा हो गया हूं और कानून को आँखे मिल गई हैं। अब सती मैया के जय-जयकार और शंख, ढोल व घडि़याल के शोर के बीच किसी मासूम की हत्या नहीं होने दी जाएगी।