बुधवार, 14 नवंबर 2018

उपवास

यह कहानी मेरे अप्रकाशित बाल-कथा संग्रह – ‘कलियों की मुस्कान’ से ली गयी है जो कि 11-12 साल की मेरी बड़ी बेटी गीतिका की ज़ुबानी सुनाई गयी है. इस कहानी का काल 1995-96 का है. 
उपवास
उपवास के नाम से ही मुझे कंपकंपी छूटने लगती है। लोगबाग भूखे-प्यासे रहने का रिकॉर्ड बनाते रहते हैं। हमारे देश में कच्चाहारी बाबा, फलाहारी बाबा, दूधिया माई वगैरा की कमी नहीं है। मेरे पापा बताते हैं कि सन् 1965 में स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री की अपील पर लाखों लोगों ने सोमवार की शाम को अन्न का त्याग करने करने का फ़ैसला कर लिया था। उपवासी देशभक्त आलू के कटलेट्स, खोए की बर्फी और मेवा पड़ा दूध पीकर ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा लगाते थे और भारत माता की जय बोला करते थे। 
हमारे देश में कोई दोनों नवरात्रियों में नौ-नौ दिन लगातार व्रत रखता है तो कोई रमज़ान में एक महीने तक सुबह से शाम तक भूखा-प्यासा रहता है। हमारे परिवार में अम्मा, मम्मी, नानी वगैरा बरसात के दिनों में दस दिन तक दश-लक्षण व्रत रखती हैं। उपवास करने वाले बहुत से लोगों में अनोखी बात ये होती है कि वो इन दिनों में बड़े जोश के साथ पूजा-पाठ भी करते हैं और खूब खुश भी रहते हैं। पर मैं तो उपवासों के मामले में अपने पापा की चेली हूँ। मैं और पापा जब भी उपवास रखते हैं तो वह निर्धारित समय से पहले ही तोड़ दिया जाता है। मेरी मम्मी मुझे सलाह देती रहती हैं कि मैं रात के खाने के बाद सुबह के नाश्ते तक का ही व्रत रखा करूं नहीं तो हर बार मुझ पर व्रत तोड़ने का पाप लगता रहेगा।
हिस्ट्री में हमको गांधीजी के उपवासों के बारे में पढ़ाया जाता है। मैं तो इन उपवासों के बारे में पढ़-पढ़ कर बहुत रोती हूँ। अच्छा है कि अब अंग्रेज़ हमारे देश से निकाल दिए गए हैं वरना हो सकता था कि मुझको भी उनके खिलाफ़ मोर्चा सम्भालने में एकाध बार उपवास रखना पड़ जाता। 
पुराने ज़माने में ऋषि-मुनि वगैरा खूब उपवास रखते थे। पार्वती माता ने शिवजी को पति के रूप में पाने के लिए खूब उपवास किए थे पर इन सबने किसी को परेशान नहीं किया था। ये सब चुपचाप जंगलों में जाकर तप और उपवास करते थे। जो लोग अपने घरों में रहकर उपवास करते हैं उनमें से बहुतों से उनके घरवाले काफ़ी परेशान रहते हैं। पापा के लखनऊ वाले दोस्त माथुर अंकिल की मम्मी यानी हमारी माथुर दादी व्रत-उपवास रखने में महा चैम्पियन हैं पर इससे उनके घर में हमेशा खलबली मची रहती है। हनुमानजी और भगवान श्रीकृष्ण दोनों ने पहाड़ उठाए थे तो उनका बड़ा नाम हुआ था पर उपवास के दिनों में आसमान उठाने वाली हमारी माथुर दादी के कारनामों के बारे में लोग कम ही जानते हैं। माथुर अंकिल के घर में शिवरात्रि, दो-दो नवरात्रियां, जन्माष्टमी ही नहीं, हर एकादशी और हर अमावस्या पर दादी के व्रतों के कारण हंगामा मचा रहता है। हम लोगों की विण्टर वैकेशन्स का ज़्यादातर समय लखनऊ में ही बीतता है और वहां हम दिन में माथुर अंकिल के घर के कम से कम चार चक्कर तो लगा ही लेते हैं। मुझे, रागिनी और माथुर अंकिल के बेटे आलोक को दादीजी के व्रतों का बड़ा इन्तज़ार रहता है। मैं तो कैलेण्डर में दोनों पक्षों में पड़ने वाली एकादशियों की डेट्स पर लाल बाल पैन से सर्किल बना देती हूँ और आलोक अमावस्या का हिसाब रखता है। अब बच्चे तो खुद व्रत रखते नहीं तो फिर दादीजी के धरम-करम में उनकी इतनी दिलचस्पी क्यों? जवाब बिल्कुल सीधा है - दादीजी को व्रत रखने के लिए हम एनकरेज करते हैं इसलिए उनके व्रत रखने के पुण्य का कुछ हिस्सा तो हमको मिल ही जाता है और उस से भी ज़्यादा लाभ हमको उनका प्रसाद पाकर होता है। हम दोनों बहनें और आलोक, दादीजी के ख़ास दोस्त हैं। दादीजी बाल-गोपाल के साथ अपने उपवास की सारी सामग्री शेयर करती हैं। 
दादीजी के उपवास की सूचना माथुर आंटी को एडवांस में दे दी जाती है। इसका फ़ायदा यह होता है कि उपवासी दादीजी के लिए स्पेशल आहार का उत्तम प्रबन्ध हो जाता है। उपवास के दिनों में दादीजी अनाज से बने पकवानों को हाथ भी नहीं लगातीं। वो अपने बेटे और अपनी बहू पर रौब झाड़ते हुए कहती हैं -
‘ मुरारजी भाई ने अनाज खाना छोड़ दिया तो वो देश के प्रधानमन्त्री बन गए। तुम लोग सिर्फ़ तीज-त्यौहार पर भी अगर अनाज खाना छोड़ दो तो कम से कम प्रदेश के मुख्यमन्त्री तो बन ही सकते हो। ’
माथुर दादी व्रत के दिनों में सिर्फ़ फलों, दूध, मेवा और कुछ अन्य पवित्र आइटमों के सहारे अपना पूरा दिन काट लेती हैं पर उपवास की पूर्व संध्या पर वो दबा कर चाट-पकौड़ी और मिठाइयों का भोग लगाती हैं ताकि उपवास के दिन उन्हें कमज़ोरी न आए। हम बच्चों को न चाहते हुए भी दादीजी के इस अभियान में उनका हिस्सेदार बनना पड़ता है। उपवास से पहले की रात को दादीजी टीवी पर अपने पसंदीदा प्रोग्राम भी नहीं देखतीं और जल्दी ही सो जाती हैं। उपवास के दिन दादीजी बड़े सवेरे उठकर, नहा-धोकर पूजा-पाठ में लग जाती हैं । भगवानजी की मूरत के सामने एक चौकी पर विराजी जाप करती और घण्टी बजाती हुई दादीजी और उनके पीछे एक दरी पर हाथ जोड़कर बैठे हुए नहाये-धोये हम तीनों बच्चे घर को मन्दिर जितना पवित्र बना देते हैं पर माथुर आंटी को तो दादीजी का हर उपवास बम के धमाके से कम ख़तरनाक नहीं लगता। जब मम्मी लखनऊ में होती हैं तो हमारी तरह दादीजी के हर उपवास में उनकी अटेन्डेन्स माथुर अंकिल के घर में लगना ज़रूरी है पर उनको तो माथुर आंटी अपनी हेल्प करने के लिए बुलाती हैं। 
सवेरे की पूजा समाप्त होते ही घण्टे और शंख बजाकर दादीजी किचिन में अपनी ड्यूटी पर तैनात बहूरानी और उनकी हैल्पर मम्मी को इशारा कर देती हैं कि उनके फलाहार का समय हो चुका है। माथुर आंटी एक बड़े से थाल में फलों का एक ऊँचा टीला बनाकर ले आती हैं। हमारा हिस्सा हमको मिल जाता है पर बाकी को बेचारी दादीजी को ही खत्म करना पड़ता है। इसके बाद दादीजी के लिए सी0 डी0 प्लेयर पर भजन लगा दिए जाते हैं और वो अपने बिस्तर पर लेट कर, आँखें मूंदकर उन्हें सुनती हैं पर पेट में अन्न का एक भी दाना डाले बिना कोई कैसे ठीक रह सकता है? दादीजी के हाथ-पैर झनझनाने लगते हैं। वो फ़ौरन बच्चों को बुला भेजती हैं और हम बच्चे कभी उनके पैर दबाते हैं तो कभी उनके हाथ और हमारी यह सेवा तब तक चलती रहती है जब तक कि आंटी मेवे की खीर नहीं ले आतीं। दादीजी कमज़ोरी के बावजूद खीर खाकर लेट जाती हैं और हम बच्चों को हमारा मेहनताना उसी समय मिल जाता है। पर व्रत में पता नहीं क्यो, दादीजी को मीठे पकवान ज़्यादा अच्छे नहीं लगते इसलिए घर में आलू और केले के चिप्स का इन्तज़ाम तो रखना ही पड़ता है। हम बच्चे भी व्रत के दिनों में अनाज की बनी हुई चीज़ों को टाटा कर देते हैं। रोटी, दाल और चावल खाकर हम भला पापी क्यों बनें? हम भी दादीजी की तरह फलाहारी और चिप्साहारी बन जाते हैं।
तीसरे पहर पर जब पापी लोग स्नैक्स के साथ चाय पीते हैं तो हमारी त्यागी दादीजी सिर्फ़ मलाई के लड्डू और घर में ही बने हुए पेड़ों का ही भोग लगाकर सो जाती हैं। 
शाम को एक लम्बी आरती का आयोजन होता है पर इससे पहले दादीजी सिंगाड़े के आटे की थोड़ी पकौडि़यां और कूटू के आटे की कुछ कचौडि़यों का आहार ले लेती हैं। भजन और आरती करके और भगवानजी को भोग लगाकर गोंद, नारियल और मेवे की पंजीरी खाकर दादीजी अपना उपवास तोड़ती हैं। सबको प्रसाद मिलता है और इसके बाद मेवे वाला दूध डकारते हुए दादीजी टीवी के सामने डट जाती हैं और पिछले दिन मिस हुए सीरियल्स की पूरी कहानी के बारे में तमाम इन्क्वायरी कर अपनी नॉलेज अपडेट कर लेती हैं। 
अब माथुर दादी कुछ कमज़ोर हो गई हैं क्योंकि हर उपवास के बाद उनका पेट थोड़ा खराब हो जाता है। डॉक्टर्स दादीजी को उपवासों से दूर रहने की सलाह देते हैं पर उनकी भक्ति उन्हें लगातार उपवास करते रहने की हिम्मत सप्लाई करती रहती है। इधर उनके हर उपवास के अगले दिन पता नहीं क्यों माथुर आंटी के सर में ज़ोरों का दर्द शुरू हो जाता है। कभी-कभी इसमें मम्मी भी उनका साथ देती हैं। माथुर दादी परेशान होकर माथुर अंकिल और मेरे पापा से कहती हैं - 
‘ आजकल की बहुओं के तो ढंग ही निराले हैं। दिन भर खा-पीकर भी इनके सर में दर्द हो जाता है और एक हम बूढ़ी हैं कि दिन भर मुहं में अन्न का एक भी दाना डाले बिना भगवान का भजन करती रहती हैं और फिर भी उफ़ तक नहीं करतीं। शिव ! शिव ! ’
आजकल माथुर आंटी और मेरी मम्मी हमको आइसक्रीम और चाकलेट की रिश्वत देने की कोशिश करती रहती हैं। इसके बदले में वो हमसे बस इतना चाहती हैं कि हम दादीजी को आने वाले उपवासों की याद न दिलाएं और उनके साथ उपवास वाले आइटम्स खाना बन्द कर दें। पर आंटी और मम्मी की ऐसी हर कोशिश नाकाम होगी। हम धर्मात्मा टाइप बच्चे न तो दादीजी के उपवासों में विघ्न डालेंगे और न ही उनके उपवास के दिनों में खुद अन्न का एक भी दाना ग्रहण करेंगे। हम मम्मी और आंटी को बहुत प्यार करते हैं पर हमको अपना धर्म उनसे भी ज़्यादा प्यारा है क्योंकि उसके साथ जुड़े हैं बढि़या फल, मेवे की खीर, पेड़े, मलाई के लड्डू और चटपटे चिप्स।

रविवार, 11 नवंबर 2018

उल्झन

उल्झन -
दुबईवासिनी अपनी बड़ी बेटी गीतिका और उनके परिवार से रोज़ाना 'बोटिम' के ज़रिये स्मार्ट फ़ोन पर मुलाक़ात हो जाती है. कल हमारी नातिन इरा का मुंडन हुआ. उनके 5 साल से कुछ दिन कम आयु के बड़े भाई श्री अमेय, इरा को दिखाकर अपनी टूटी-फूटी हिंदी में मुझसे कहने लगे -
'नानू देखो, इरा भी आपके जैसा हो गया है.'
अब मेरी उल्झन यह है कि -
मानहानि का मुक़द्दमा मैं श्री अमेय पर दायर करूं?
या
उनके बगल में बैठी - 'ही, ही-ही-ही' करती हुई उनकी माँ पर?
या
मेरे बगल में बैठी - 'खी-खी-खी' करती हुई उनकी नानी पर?
पुनश्च -
पारिवारिक पंचायत और मित्रों की सभा से मशवरा करने के बाद मैंने घर के खतावारों पर मानहानि का मुक़द्दमा दायर करने का इरादा छोड़ दिया है और अब इसके बदले मैंने भगवान् जी पर -
'बाल-हानि' का मुक़द्दमा दायर करने का फैसला लिया है.

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

उत्तराखंड की लोरी


उत्तराखंड की स्थापना से लगभग दो वर्ष पहले कही गयी मेरी काव्यात्मक भविष्यवाणी -
(अब पाठकगण बतलाएं कि मेरी ज्योतिष की दुकान चल पाएगी या नहीं?)

उत्तराखण्ड की लोरी

बेटे का प्रश्न –

मां ! जब पर्वत प्रान्त बनेगा, सुख सुविधा मिल जाएंगी?
दुःख-दारिद्र मिटेंगे सारे, व्यथा दूर हो जाएंगी?
रोटी,  कपड़ा,  कुटिया क्या,  सब लोगों को मिल पाएंगी?
फिर से वन में कुसुम खिलेंगे,  क्या नदियां मुस्काएंगी?

माँ का उत्तर -

अरे भेड़ के पुत्र,  भेड़िये से क्यों आशा करता है?
दिवा स्वप्न में मग्न भले रह,  पर सच से क्यों डरता है?
सीधा रस्ता चलने वाला,  तिल-तिल कर ही मरता है,
कोई नृप हो, हम जैसा,  आजीवन पानी भरता है.

अभी भेड़िया बहुत दूर है,  फिर समीप आ जाएगा,
नहीं एक-दो,  फिर तो वह,  सारा कुनबा खा जाएगा.
चाहे जिसको रक्षक चुन ले,  वह भक्षक बन जाएगा,
तेरे श्रमकण और लहू से, अपनी प्यास बुझाएगा.

बेगानी शादी में ख़ुश है, किन्तु  नहीं गुड़ पाएगा,
तेरा तो सौभाग्य पुत्र भी,  तुझे देख मुड़ जाएगा.
प्रान्त बनेगा,  नेता-अफ़सर  का मेला,  जुड़ जाएगा,
सरकारी अनुदान समूचा,  भत्तों में उड़ जाएगा.

राजनीति की उठा-पटक से,  हर पर्वत हिल जाएगा,
देव भूमि का सत्य-धर्म सब,  मिट्टी में मिल जाएगा.
वन तो यूं  ही जला करेंगे,  कुसुम कहां खिल पाएगा,
हम सी लावारिस लाशों का,  कफ़न नहीं सिल पाएगा.

रात हो गई,  मेहनतकश सब, अपने घर जाते होंगे,
जल से चुपड़ी,  बासी रोटी, सुख से वो खाते होंगे.
चिन्ता मत कर,  मुक्ति कभी तो,  हम जैसे पाते होंगे,
सो जा बेटा,  मधुशाला से, बापू भी आते होंगे.

शनिवार, 3 नवंबर 2018

एक आदर्श अंध-प्रचारक


आदरणीय राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी जी की वाल से चुराई हुई कहानी -
हज़रत इब्राहीम जब बलख के बादशाह थे, उन्होंने एक गुलाम खरीदा।
हज़रत इब्राहीम उदार थे,उन्होंने गुलाम से पूछा -  तेरा नाम क्या है?
गुलाम बोला  - आप जिस नाम से पुकारें!
हजरत इब्राहीम ने फिर पूछा -  तू क्या खायेगा?
वह बोला - जो आप खिलायें!
तुझे कैसे कपडे पसन्द हैं?
उत्तर था - जो आप पहनने को दें!
इब्राहीम ने फिर पूछा - तू क्या काम करेगा
गुलाम बोला - जो आप हुक्म करें!.
.
हजरत इब्राहीम ने हैरान होकर पूछा - तू चाहता क्या है?
गुलाम ने उत्तर दिया - हुजूर, गुलाम की अपनी चाह क्या हो सकती है?
हजरत इब्राहीम अपनी गद्दी से उतर पडे - अरे,तू तो मेरा उस्ताद है! तैने मुझे सिखा दिया कि परमात्मा के सेवक को कैसा होना चाहिये!
मानवमात्र के जीवन- दर्शन में दासों के चिंतन को पढा जा सकता है!
मेरे द्वारा इस कहानी का बदला हुआ रूप –
एक आदर्श अंध-प्रचारक
हज़रत बड़बोले जब अंधेरनगरी के बादशाह थे, उन्होंने एक व्यक्ति को अपना अंध-प्रचारक नियुक्त किया
हज़रत बड़बोले उदार थे, उन्होंने अंध-प्रचारक से पूछा -  तेरा नाम क्या है?’
अंध-प्रचारक बोला  - आप जिस नाम से पुकारें ! वैसे मेरा नाम लेने की कभी ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी.
हज़रत बड़बोले ने फिर पूछा -  तू क्या खायेगा?’
वह बोला जो आप खिलायें ! वैसे आपके विरोधियों की गालियाँ, लाठियां तो रोज़ाना और कभी-कभी गोलियां भी मुझे खाने को मिलेंगी ही.
तुझे कैसे कपडे पसन्द हैं?’
उत्तर था  आपकी पार्टी का झंडा लपेट लूँगा. वैसे भी आपके विरोधी तो मुझे नंगा कर की ही छोड़ेंगे.
हज़रत बड़बोले ने फिर पूछा तू क्या काम करेगा?’ 
अंध-प्रचारक बोला –आप के विरोधियों के खिलाफ़ प्रचार करूंगा, उनके विरुद्ध साज़िशें रचवाऊंगा, उन्हें किराए के गुंडों से पिटवाऊंगा और अगर ज़रुरत पड़ी तो उनको जहन्नुम भी पहुंचवा दूंगा.
हज़रत बड़बोले ने हैरान होकर पूछा तू चाहता क्या है?’
अंध-प्रचारक ने उत्तर दिया हुजूर, अगले चुनाव में सांसद नहीं तो कम से कम विधायक की टिकट दिए जाने के सिवा एक अंध-प्रचारक की अपनी चाह और क्या हो सकती है?
हजरत बड़बोले अपने सिंहासन से उतर पडे अरे,तू तो मेरा उस्ताद है ! तैने मुझे सिखा दिया कि एक हाकिम के अंध-प्रचारक को कैसा होना चाहिये !
मानवमात्र के चमचा-दर्शन में एक आदर्श अंध-प्रचारक की कार्य-शैली को पढा जा सकता है !

बुधवार, 31 अक्तूबर 2018

श्रद्धांजलि देने का शाही तरीक़ा


प्राचीन मिस्र-सभ्यता में सैकड़ों साल तक देश की अधिकांश सम्पदा शासकों के शवों के ऊपर पिरामिड बनाने में बहा दी जाती थी.
मुस्लिम शासक भारत में मक़बरे बनाने की परम्परा लेकर आए. इनमें शाहजहाँ ने तो प्रजा पर नए-नए करों का बोझ लादकर अपने बेगम मुमताज़ महल की याद में ताजमहल बनवाया था.
कविवर सुमित्रानंदन पन्त की ताजमहल पर पंक्तियाँ हैं –
हाय मृत्यु का ऐसा अमर, अपार्थिव, पूजन,
जब विषण्ण, निर्जीव, पड़ा हो जग का जीवन,
---
शव को दें हम रूप, रंग, आदर मानव का,
मानव को हम कुत्सित रूप, बना दें, शव का.’
 
लार्ड कर्ज़न ने देश-व्यापी अकाल के समय भूख से बिलखते हुए और मरते हुए इंसानों की परवाह न करते हुए करोड़ों रूपये विक्टोरिया मेमोरियल के निर्माण में खर्च कर दिए थे.
बहन मायावती ने तो कमाल ही कर दिया था. उत्तर प्रदेश सरकार के अरबों रूपये उन्होंने प्रेरणा-स्थल के निर्माण में खर्च कर दिए और अपनी तथा अपने कुनबे के सदस्यों की भव्य मूर्तियाँ भी स्थापित करवा दीं.  
मेरी चार पंक्तियाँ हैं –
हर मुर्दे को कफ़न भले ही हो न मयस्सर,
पर हर शासक का स्मारक, बन जाता है.
उजडें बस्ती, गाँव, घरों में जले न चूल्हा,
मूर्ति खड़ी करने में, सारा धन जाता है.’
आज के ज़माने में मूर्ति-निर्माण के मामले में ऐतिहासिक पात्रों ने पौराणिक पात्रों को बहुत पीछे छोड़ दिया है. हर गली, हर मोहल्ले में, कोट पहने, भारतीय संविधान का वृहद् ग्रन्थ हाथ में उठाए, बाबा साहब भीम साहब अम्बेडकर की प्रतिमा आपका मार्ग-दर्शन करने के लिए खड़ी मिलेगी.
आज लौह पुरुष सरदार पटेल की जयंती पर लगभग 3000 करोड़ रुपयों में बनी  उनकी 182 मीटर ऊंची मूर्ति का प्रधानमंत्री द्वारा अनावरण होगा. विश्व की इस सबसे विशाल, सबसे ऊंची प्रतिमा – स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की स्थापना से हमको क्या हासिल होगा, इसको समझना बहुत मुश्किल काम है. निर्विवाद रूप से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण में अभूतपूर्व योगदान दिया था किन्तु क्या इसी कारण से उनकी यह प्रतिमा स्थापित की जा रही है?
कोई बच्चा भी यह समझता है कि इसके पीछे का मुख्य कारण है गुजरात तथा देश के अन्य भागों में बसे हुए महत्वपूर्ण पटेल वोट-बैंक को अपने पक्ष में करना तथा नेहरु-पटेल मतभेद और नेहरु-पटेल प्रतिस्पर्धा को अपने फ़ायदे के लिए भुनाना.
अभी मूर्ति-निर्माण की इस प्रक्रिया पर विराम नहीं लगा है. भविष्य में छत्रपति शिवाजी और बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की भी गगनचुम्बी प्रतिमाएं नए कीर्तिमान स्थापित करने वाली हैं.
वैसे देखा जाए तो ऐतिहासिक पात्रों की तो क्या, देवी-देवताओं और भगवानों की मूर्तियाँ बनाने की भी कोई आवश्यकता नहीं है. हमको सौ-दो सौ फ़ुट ऊंचे भगवान रामचंद्र या उन से भी ऊंचे हनुमान जी क्यों चाहिए?
गोमटेश्वर में बाहुबली स्वामी की एक चट्टान से तराशी गयी 57 फ़ुट ऊंची प्रतिमा हमारी कला की अमूल्य धरोहर है किन्तु आज मांगीतुंगी में अपना सर्वस्व त्यागने वाले भगवान ऋषभदेव की 108 फ़ुट ऊंची प्रतिमा के निर्माण में करोड़ों रूपये खर्च कर हम क्या उनके उपदेशों पर अमल कर रहे हैं? (मैं ये बात जैन मतावलंबी होने के बावजूद कह रहा हूँ.)
हम कब तक स्थानों के नाम बदलते रहेंगे? हम कब तक नेताओं के स्मारक बनाते रहेंगे? कब तक उनकी भव्य मूर्तियाँ बनाते रहेंगे?
आज दिल्ली में आधा यमुना तट नेताओं की समाधियों ने घेर रक्खा है. चेन्नई में विश्व-प्रसिद्द मरीना बीच तमाम नेताओं की समाधियों से सुशोभित है.
इन स्मारकों के, इन समाधियों के, इन मूर्तियों के, रख-रखाव में या तो हमको रोज़ाना लाखों-करोड़ों रूपये खर्च करने होंगे या फिर इन्हें चील-कौओं के विश्राम-स्थल बनाकर राम-भरोसे छोड़ देना होगा. दोनों बातें ग़लत हैं लेकिन इन में से एक तो होकर ही रहेगी.
अपने शौक़ के लिए, अपनी ख्याति के लिए, या गिनीज़ बुक ऑफ़ रिकार्ड्स में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए, देश के संसाधनों का ऐसा अपव्यय कहाँ तक जायज़ है?
इस बात में कोई संदेह नहीं कि आजीवन सादा जीवन व्यतीत करने वाले लौहपुरुष सरदार पटेल की आत्मा अपने सपूतों की इस भव्य श्रद्धांजलि को देखकर और इस पांच सितारा नौटंकी से व्यथित होकर आज खून के आंसू रो रही होगी.   

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

फ़िल्म - 'बधाई हो'


बधाई हो
प्राचीन काल में हर ऐरी-गैरी, नत्थू-खैरी फ़िल्म देखना मेरा फ़र्ज़ होता था. इसका प्रमाण यह है कि मैंने टीवी-विहीन युग में, सिनेमा हॉल्स में जाकर, अपने पैसे और अपना समय बर्बाद कर के, अभिनय सम्राट जीतेंद्र तक की क़रीब चार दर्जन फ़िल्में देख डाली थीं. और तो और, अपनी संवाद-अदायगी के लिए विख्यात – ‘मेरे करन-अर्जुन आएँगे’ उन दिनों मेरी पसंदीदा हीरोइन हुआ करती थीं.  
फिर युग बदले और सतयुग, त्रेता और द्वापर के बीतने के बाद इस कलयुग में फ़िल्मों में मेरी दिलचस्पी कम हो गयी. हमारी श्रीमती जी भी फ़िल्में देखने में बहुत ज़्यादा दिलचस्पी नहीं रखती हैं. अब तो हाल यह है कि हमारी बेटियां ही हमको निर्देश देती हैं कि हम लोग किस मल्टीप्लेक्स में जाकर कौन सी फ़िल्म देखें. कभी-कभी तो वो हमसे बिना पूछे ही हमारे लिए किसी फ़िल्म की ऑन-लाइन टिकट बुक कराकर उसकी सूचना-मात्र हमको दे देती हैं.
हमारी दोनों बेटियों ने फ़िल्म ‘बधाई हो’ को हमारे लिए बड़े ज़बर्दस्त तरीके से रिकमेंड किया. इसका नतीजा यह हुआ कि हम कल इस फ़िल्म को देख आए.
वाह ! क्या शानदार फ़िल्म है ! धन्यवाद बेटियों ! तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हारी पसंद की दाद देते हैं.
फ़िल्म ‘बधाई हो’ जैसी कहानियां हमने अपने जीवन में बहुत देखी हैं. आज से पचास-साठ साल पहले तक माँ-बेटी और सास-बहू, एक ही समय में घर में नया मेहमान आने की खुशियाँ सुनाया करती थीं. स्त्रियाँ 15 साल की उम्र से लेकर 45 साल की उम्र तक, कभी भी और कितनी बार भी, माँ बन सकती थीं. बच्चों को भी चांदी के तारों जैसे बालों वाली माँ और बेंत पकड़ कर झुकी पीठ चलने वाले पिताजी को देख कर कोई ताज्जुब नहीं होता था. लेकिन आज के ज़माने में रिटायरमेंट के क़रीब पहुंचे हुए एक बुज़ुर्गवार और पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंधों को एक गुनाह मानने वाली एक अधेड़ महिला के बीच रोमांस और फिर दो बड़े-बड़े लड़कों की उस माँ के प्रेग्नेंट हो जाने की कहानी बहुत अजीब और बहुत हास्यास्पद लगती है. लेकिन कभी-कभी, हमारे आसपास, आज भी ऐसा होता है.     
        
आयुष्मान खुराना की आजकल चांदी ही चांदी है. पट्ठा हिट पर हिट फ़िल्में दे रहा है. लेकिन इस फ़िल्म में असली हीरो है इसका निर्देशक अमित रवीन्द्रनाथ शर्मा !  कहानीकारों की जोड़ी शांतनु श्रीवास्तव और अक्षत घिल्डियाल ने भी कमाल कर दिया है.
इस फ़िल्म के कलाकारों में मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया है, मेरे लिए अब तक अनजान – गजराज राव ने. आँखें नीचे कर शरमाते हुए वो जैसे अपनी पत्नी प्रियंवदा कश्यप (नीना गुप्ता) से रोमांस करते हैं या बच्चों को उनकी मम्मी के और अपनी माँ को उनकी बहू के, प्रेग्नेंट होने की धमाकेदार ख़बर देते हैं, उसकी तारीफ़ शब्दों में की ही नहीं जा सकती उसे तो बस देख कर महसूस किया जा सकता है.
और प्रियंवदा कश्यप बनी नीना गुप्ता तो कमाल की अभिनेत्री हैं ही. मुझे लगता है कि आंसू बहाती और खम्बे से बंधी – बचाओ-बचाओ’, चिल्लाने वाली फ़िल्मी माओं के सामने, सहज रूप से अपने पति के साथ रोमांस करने वाली पत्नी, अपने बच्चों पर बिना भाषण दिए हुए ममता लुटाने वाली माँ, और अपनी सास की झिडकियां सहते हुए भी उसे अपनी माँ जैसा प्यार देने वाली बहू की भूमिका निभाकर नीना गुप्ता ने यह घोषणा कर दी है कि –
बनावटी फ़िल्मी माओं, संभल जाओ ! अब मैं आ गयी हूँ.’
खुर्रैट सास, ममतामयी माँ और मुहब्बती दादी की भूमिकाएं निभाने में सुरेखा सीकरी ने तो गज़ब ढा दिया है. मुझे तो लगता है कि सुरेखा सीकरी को कोई निर्देशक अभिनय के गुर सिखा ही नहीं सकता, उन्हें तो बस कहानी और दृश्य के बारे में बता दिया जाता होगा और बाक़ी वो ख़ुद सम्हाल लेती होंगी.
आयुष्मान खुराना और सान्या मल्होत्रा की जोड़ी बड़ी प्यारी और ताज़गी भरी लगी है. जो लोग ख़ूबसूरत वादियों में फ़िल्मी जोड़ों को एक दूसरे के पीछे भागते हुए और गाते हुए देख-देख कर पक चुके हैं, उनके लिए इस नई रोमंटिक जोड़ी को देखना बहुत अच्छा लगेगा.
यह फ़िल्म इंटरवल तक तो हंसाते-हंसाते हुए हमको पागल कर देती है. इंटरवल के बाद कहानी मोड़ लेती है, उसमें गंभीरता आ जाती है लेकिन फ़िल्म कहीं भी बिखरती नहीं है. माँ के प्रेग्नेंट हो जाने से बेहद शर्मिंदा और बहुत नाराज़ होने वाले बेटे नकुल की भूमिका निभाने में आयुष्मान खुराना ने बहुत प्रभावित किया है पर जिस दृश्य में नकुल अपनी स्वार्थपरता पर शर्मिंदा होकर अपनी माँ से गले लगता है उसे देखकर मैं तो अपने आंसू नहीं रोक पाया. मैंने कनखियों से अपने बगल की सीट पर विराजमान अपनी श्रीमती जी को देखा तो पता चला कि वो मेरी तरह से छुपकर नहीं, बल्कि खुलेआम रो रही हैं.
फ़िल्मी निर्माता-निर्देशकों को अब यह समझ जाना चाहिए कि किसी फ़िल्म को हिट करने के लिए स्विटज़रलैंड की हसीं वादियों के दृश्य दिखाना, भव्य से भव्य सेट लगाना, और बड़े से बड़े स्टार्स की भीड़ जुटाना ज़रूरी नहीं है. अब अच्छी कहानी, अच्छे कलाकार और अच्छे निर्देशकों के साथ गली-मोहल्ले के साधारण मकानों में शूटिंग करके, कम बजट में, अच्छी से अच्छी और हिट से हिट फ़िल्म बनाई जा सकती है.
अब मैं अपने सभी मित्रों को इस फ़िल्म को देखने की सलाह देता हूँ. आपके पैसे वसूल न हों और आपको ऐसा लगे कि फ़िल्म देखकर आपका वक़्त बर्बाद हुआ है तो आप मुझसे रिफंड की मांग कर सकते हैं.  



Gajraj Rao · 
गोपेश जी नमस्कार ... आपकी हौंसला अफ़्जाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 🙏

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Geetika Jaswal Shared your post on Twitter and one of the writers Shantanu responded -
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