शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें साल के आंसू – भाग – 2

 

इक्कीसवीं सदी के इक्कीसवें साल के आंसू भाग – 2

(श्री जयशंकर प्रसाद से क्षमा-याचना के साथ)

  

ना खाऊँ ना खाने दूं

यह कथन सत्य बिन खटका 

बिन पत्र-पुष्प अर्पण के

हर काम अधर में लटका

 

वाणी में मिसरी घुलती

पर पेट ज़हर का मटका

कुछ तो हलाल-गति पाए

कुछ का कर डाला झटका

 

रुक-रुक कर घिसट-घिसट कर

चलती है प्रगति कहानी

दिन-रात फलें और फूलें 

अम्बानी और अडानी

 

बचपन अभाव में बीता  

फाकों में कटी जवानी

इस लोकतंत्र की सूरत

मर कर हमने पहचानी

बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

अंधविश्वास पच्चीसी - भाग 1

अन्धविश्वास, सड़ी-गली मान्यताओं और दकियानूसी विचारों के खिलाफ़ मैं सतत अभियान छेड़ता रहा हूँ.
मेरी शादी पर मेरे कहने पर हम दोनों की कुंडलियों का मिलान नहीं हुआ था.
मेरी बड़ी बेटी गीतिका की शादी बिना किसी मुहूर्त के शरद पूर्णिमा पर हुई थी. मैंने अपनी बेटियों का ख़ुद अपने रेज़र से मुंडन किया था.
हमारे घर में मेरी माँ दिशा-शूल आदि का बहुत ध्यान रखती थीं पर हम बच्चों ने उनकी ऐसी किसी आज्ञा का कभी पालन नहीं किया.
एक अध्यापक के रूप में मैं हमेशा अपनी विद्यार्थियों को अन्धविश्वास रूपी इस छूत की बीमारी से दूर रहने की सलाह देता था.
नवजागरणकालीन उर्दू पत्रकारिता में अन्धविश्वास के खिलाफ़ एक मुहिम छेड़ी गयी थी.
उर्दू के प्रसिद्द पत्रकार सैयद अहमद देहलवी (इनको सर सैयद अहमद समझने की गलती मत कीजिएगा) अपने समय के एक प्रगतिशील विचारक थे.

अन्धविश्वास के विरुद्ध उनके एक 112 साल पुराने लेख पर आज चर्चा की जा रही है.

अशिक्षित स्त्रियों में अंधविश्वास का बहुत अधिक प्रसार होता है.

जादू, काला जादू, गण्डे, ताबीज़, टोटका, नज़र लगना, जिन्न, भूत, चुड़ैल, मन्नत और न जाने किस-किस में ये विश्वास करती हैं.

स्त्री-समाज में तो अंधविश्वासों का बोलबाला कुछ ज़्यादा ही था.

अंधविश्वास के उन्मूलन के लिए स्त्री-शिक्षा का प्रसार अत्यन्त आवश्यक है.

दिल्ली से प्रकाशित स्त्री-शिक्षा की समर्थक पत्रिका - 'इस्मत' के दिसम्बर, 1908 के अंक में सैयद अहमद देहलवी का लेख -

'औरतों के मनगढ़न्त मसले' प्रकाशित हुआ था.

इस लेख में स्त्री-समाज में व्याप्त कुछ अंधविश्वासों की बानगी दृष्टव्य है

1. पहलौटी के बच्चे को बिजली के सामने न आने दो क्यूँकि जेठे पर अक्सर बिजली गिरती है । पहलौटी बच्चे की बहुत हिफ़ाज़त करो.

2. जिन्न वा प्रेत को यह (पहलौटी बच्चा) प्यारा होता है, भेंट (बलि) इसकी चढ़ाई जाती है, नज़र इसको लगती है.

गरज़ कि सबसे ज़्यादा आफतें इस पर आती हैं.

3. तीतरा बेटा (तीन लड़कियों के बाद पैदा होने वाला) मँगाता (भीख मँगाता) और तीतरी बेटी (तीन लड़कों के बाद पैदा होने वाली) राज कराती है.

4.. बहुत पानी बरसे तो उसके पानी में तेल डाल दो, थम जाएगा.

5. सख़्त आँधी आए तो झाड़ू खड़ी कर दो, रुक जाएगी.

6. शबे बरात को परछाईं देखो, अगर नज़र आए तो जानो कि इस साल ज़िदा रहोगे वरना समझ लो कि हमारी उम्र पूरी हो गई.

7. अगर कोई टोके यानी तारीफ़ करे तो कह दो कि अपनी ऐड़ी देखो, इसमें क्या लगा है, ताकि उसकी टोक और नज़र न लगे. (हमारे घर में बुज़ुर्ग महिलाएं ऐसी स्थिति में - 'तेरी आँख में चटर-पटर' कहती थीं.)

8. नाखुन कुतरो तो पोटली बाँध कर ज़मीन में दबा दो ताकि क़यामत के दिन फ़रिश्ते ढूढ़ते न फिरें और तुमको इसका इज़ाब न हो (स्वीकृति न हो)

9. छिपकली छू जाय तो सोने के पानी से धो डालो.

10. छिपकली का नाम मुरदारी लो (कहो)

11. हाथ की चूडी टूटे तो ठन्डी हुई कहो क्योंकि बेवा होने पर चूड़ियाँ तोड़ी जाती हैं.

12. दुपट्टा कहीं से जल जाय तो दूध से धो डालो.

13. काली खाँसी हो जाए तो काले कुत्ते को दही चटा दो.

14. जब कोई अज़ीज़ सफ़र को जाय तो उसकी पीठ को आइना दिखाओ ताकि जिस तरह जाते की पीठ देखी है, आते का मुँह देखो.

15. जिस वक़्त ज़लज़ला (तूफ़ान) आए तो पुकार कर कहो ज़ल्ले जलाल तू, आई बला को टाल तू'

16.बिल्ली रास्ता काट दे तो आगे न जाओ. बचकर निकल जाओ.

17. तीसरी तारीख़ का चाँद देखना मनहूस है.

18. कोई चीज़ तीन, तेरह लो न दो कि मुफ़ारक़त (विच्छेद) की अलामत (लक्षण) है.

19. गहन के दिन अक्सर बच्चा गहनाया (दोषयुक्त) हुआ पैदा होता है.

20. औरत की दाहिनी, मर्द की बाईं आँख फड़कनी अच्छी है, बिछड़ा हुआ अज़ीज़ मिलता है.

उसके बरख़िलाफ़ हो तो रेज़ व सदमें (बिछोह और शोक) की अलामत है.

21. मूली की पेंदी (जड़) खाने से माँ-बाप मर जाते हैं.

मर्त ब्याही (जिसके बच्चे जीवित न रहते हों) औरत कीपरछाईं से बचो नहीं तो तुम्हारे बच्चे भी नहीं बचेंगे.

22. जिस वक़्त बच्चा पैदा हो, फ़ौरन तवा बजा दो ताकि आवाज़ से मानूस (हिला हुआ) हो जाय.

23. कव्वा बोले तो किसी अज़ीज़ परदेसी के आने का शगुन समझो और नाम लेकर पूछो कि क्या फलाँ शख़्स आता है, अगर उसके नाम पर उड़ जाय तो जानो कि वह आता है.

24. साँप कुवाँरी बाली के (लड़की) साये से अंधा हो जाता है.

25. खाना खाकर हाथ न झटको, इससे नहूसत (मनहूसियत) आती है. 

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

दि किंग ऑफ़ ऑल स्पोर्ट्स

 (यह कहानी मेरे अप्रकाशित बाल-कथा संग्रह – ‘कलियों की मुस्कान’ से ली गयी है जिसमें कि मेरी 12 साल की बेटी गीतिका अपने किस्से सुनाती है. इस कहानी का रचना-काल 1990 का दशक है)

एक शख्स एक साथ कितने खेलों में रिकॉर्ड तोड़ परफॉरमेंस कर सकता है? पुरुषोत्तम तिवारी यानी कि हमारे पी. टी. सर ख़ुद को क्रिकेट में चैंपियन ऑल राउंडर तो कहते ही हैं लेकिन उनके ख़याल में अन्य खेलों में भी उन्होंने ऐसे-ऐसे कीर्तिमान स्थापित किये हैं कि उनको तोड़ने में कई सदियाँ लग सकती हैं.
फ़ुटबॉल का बुखार हमारे पी. टी. सर पर चार साल में एक बार यानी फ़ुटबॉल के वर्ड कप के दौरान ही चढ़़ता है पर उन दिनों उन्हें सपनों में भी पेले, माराडोना और प्लेतिनी ही नज़़र आते हैं.
वैसे तो सेन्टर फ़ारवर्ड की पोज़ीशन पर खेलकर वो राइवल टीम पर आधा दर्जन गोल कर ही सकते हैं पर गोलकीपिंग करना उन्हें सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है.
उनका एंटिसिपेशन ग़ज़ब का है. अपोजि़ट टीम का कोई खिलाड़ी जब उनके गोल की तरफ़ बॉल लेकर बढ़ता है तो उनकी नज़र फुटबॉल पर नहीं होती है बल्कि उनका पूरा ध्यान उसके मनोविज्ञान पर होता है.
अपनी आँखों में उसके दिमाग को पढ़कर वो तुरन्त अन्दाज़ा लगा लेते हैं कि खिलाड़ी गोल में किस एंगिल से और कहाँ पर बॉल डालने वाला है, बस उधर ही डाइव लगा कर वो बॉल को गोल में जाने से रोकने की कोशिश करते हैं. सौ में से नव्वे बार अगर बॉल शैतानी करके चोरी-छुपे गोल-पोस्ट पार कर लेती है तो इसमें उनका क्या कुसूर है?
हो सकता है कि बॉल की बनावट में डिफ़ैक्ट हो या किसी साज़िश के तहत पूरी फ़ुटबॉल फ़ील्ड ही टेढ़ी बनाई गई हो.
पी. टी. सर भारत सरकार से बहुत ख़फ़ा हैं, उन्होंने मिनिस्ट्री ऑफ़ स्पोर्ट्स को कई खत लिखे कि उन्हें भारतीय फ़ुटबॉल टीम का कोच बना दिया जाए ताकि वो उसे ब्राज़ील, अर्जेन्टिना, इटली, जर्मनी और स्पेन की टीमों से भी मज़बूत बना सकें पर सरकार है कि उनके कन्सट्रक्टिव सुझावों पर ध्यान ही नहीं देती.
इसी वजह से दुनिया में भारतीय फ़ुटबॉल टीम कभी एक सौ अड़तालीसवें नम्बर पर रहती है तो कभी एक सौ पचासवें नम्बर पर.
आइए, अब हम जूनियर ध्यानचंद यानी कि हमारे पी. टी. सर के हॉकी के खेल में कमाल की चर्चा करते हैं.
हाय ! कहाँ गया वो सुनहरा दौर जब हमने एक बार ओलम्पिक्स के फ़ाइनल्स में राइवल टीम पर चौबीस गोल दागे थे.
हॉकी में ध्यानचन्द के ज़माने की ग्लोरी को अगर कोई वापस ला सकता है तो वो हैं हमारे पी. टी. सर.
हमारे पी. टी. सर के उपजाऊ दिमाग़ में पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, जर्मनी और हालैण्ड की टीमों को मात देने के लाखों ओरिजिनल आइडियाज़ आते रहते हैं.
असली हॉकी बॉल उनके लिए ज़रा भारी पड़ती है इसलिए उनके सारे ध्यानचंदी रियाज़ कच्चे फलों से बनाई गई बॉल्स पर या फिर टेबल टेनिस की बॉल पर ही होते हैं.
स्कूल के वराण्डे में उन्होंने तरह-तरह के गुर हमको सिखाए हैं पर हम हैं कि उनकी कोचिंग से फ़ायदा उठाने की काबिलियत ही नहीं रखते.
कई टूर्नामेन्ट्स में फ़ुल बैक की पोज़ीशन पर खेलते समय उन्होंने अपनी ही टीम पर रिवर्स फि़्लक से गोल किए हैं.
आँखें मींचकर बॉल पर शॉट लगाने की अनोखी अदा की बदौलत उन्होंने अपनी ही टीम के प्लेयर्स को कई बार घायल भी किया है.
हमारी प्रिंसिपल मैम के सब्र का बाँध अब टूट चुका है.
क्रिकेट की ही तरह आजकल हॉकी के मैदान में भी पी. टी. सर को सिर्फ़ दर्शक ही बने रहने के लिए मजबूर कर दिया गया है.
पी. टी. सर ने इस अन्याय को स्कूल के लिए ही नहीं बल्कि भारतीय हॉकी के लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण बताया है और यह चेतावनी भी दे दी है कि भारतीय हॉकी ने अगर उनकी सेवाएँ नहीं लीं तो फिर उसे ओलम्पिक्स, वर्ड-कप तो क्या, एशिया-कप में भी गोल्ड या सिल्वर को हमेशा-हमेशा के लिए भूलना पड़ेगा.
हमारे स्कूल के जूडो-कराते के कोच भाटिया सर इन दोनों खेलों में अपने ब्लैक ब्लैक-बैल्ट होने पर बहुत इतराते हैं.
नंगे हाथों से ईंटों का ढेर तोड़ना उनके लिए मामूली बात है.
अपनी किक्स से वो अपने दुश्मन को हवा में दो-दो मीटर तक ऊँचा उछाल देते हैं.
हम बच्चे उनके बड़े फ़ैन्स हैं पर हमारे पी. टी. सर को ऐसा करना हमारी नादानी लगती है.
पी. टी. सर हमसे कहते हैं –
‘इन विदेशी बंदरों ने भारतीयों से योग सीख कर जूडो-कराते को डवलप किया है पर तुम्हारे भाटिया सर को तो योग का ‘क, ख, ग’ भी नहीं आता. हाथ से ईंट तोड़ना कौन सा कमाल है? हमने तो योग साधना की है, पूरे शरीर को वज्र की तरह कठोर बना लिया है. कहो तो ईंट-पत्थर को हथेलियों के बीच रखकर उसका पाउडर बना दें और कहो तो इन्हीं हाथों से तुम्हारे भाटिया सर की चटनी बना कर तुम्हें पेश कर दें.’
भाटिया सर तो पी. टी. सर की बातों को हँसकर टाल जाते थे पर हम बच्चों का खून खौल जाता था. आखि़र कब तक हम अपने स्कूल के हीरो की मज़ाक उड़ते हुए देख सकते थे.
हमारी प्रिंसिपल मैम भी पी. टी. सर के दावों का बखान सुनते-सुनते बोर हो चुकी थीं.
इधर पी. टी. सर थे कि भाटिया सर से दो-दो हाथ करने के लिए बेताब हुए जा रहे थे. आखि़रकार हमारी प्रिंसिपल मैम ने इस ऐतिहासिक मुकाबले के लिए अपनी हामी भर ही दी पर एक शर्त के साथ !
उनकी शर्त यह थी कि इस महान मुकाबले को मीडिया कवरेज नहीं मिलेगा. अख़बार, आकाशवाणी और टीवी चैनल्स वालों के सामने एक ब्लैक बैल्ट जूडो चैम्पियन को हरा पाने का गौरव हाथ से छिन जाने की वजह से पी. टी. सर बहुत मायूस थे पर पूरा स्कूल तो इस भव्य दृष्य को देखने के लिए उपस्थित था ही.
मुकाबला शुरू होने से पहले ही हमारी प्रिंसिपल मैम हमारे भाटिया सर के साथ बहुत ज्यादती कर चुकी थीं. उन्होंने मुकाबले से पहले ही उनके हाथों को पीठ की ओर रस्सी से बँधवा दिया था. बेचारे को जान बचाने के लिए सिर्फ़ अपनी टाँगों का इस्तेमाल करना था.
मुकाबला शुरू होने के दो सैकिण्ड बाद ही भाटिया सर एक टाँग पर खड़े होकर अपनी दूसरी टाँग से किक मार-मार कर पी. टी. सर को हवा में कलामण्डिया खिला रहे थे.
एक बार ज़मीन पर पटके जाने बाद पी. टी. सर फ़ौरन उठ कर भाटिया सर पर झपटे पर अगले ही सैकिण्ड वो दुबारा हवा में गोते खा रहे थे.
दो मिनट में दस बार इस मनोरंजक कार्यक्रम का एक्शन रि-प्ले होने के बाद फ़ाइट रोक दी गई.
भाटिया सर को विजेता घोषित कर दिया गया. इस तरह उछाल-उछाल कर पटके जाने से पी. टी. सर रैफ़री से बहुत नाराज़ थे. उसे बहुत पहले ही भाटिया सर को डिस्क्वालीफ़ाई कर देना चाहिए था क्योंकि वो मुकाबले में अपने जूडो-कराते के दाँव आज़माने की जगह पी. टी. सर पर काले जादू का इस्तेमाल कर रहे थे.
बदकिस्मती से कोई भी दर्शक पी. टी. सर का साथ नहीं दे रहा था, बस सब हँसे जा रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाए जा रहे थे.
पी. टी. सर को इस मुकाबले के बाद चार दिन हॉस्पिटल ज़रूर रहना पड़ा पर उनके हिसाब से अब भाटिया सर के होश ठिकाने पर आ गए हैं वरना पी. टी. सर द्वारा अगले मुकाबले के लिए ललकारते ही भाटिया सर उल्टे पाँव क्यों भाग खड़े होते हैं?
सर्गेइ बुबका ने अपने ज़माने में पोलवाल्ट में बार-बार वर्ड रिकॉर्ड बनाकर लोगों की नाक में दम कर दिया था.
पी. टी. सर उससे बहुत ख़फ़ा थे क्यों कि उसका हर नया वर्ड रिकॉर्ड पिछले वर्ड रिकॉर्ड से बस, एकाद सेन्टीमीटर ज़्यादा होता था.
पी. टी. सर का कहना था –
‘ अब रिकॉर्ड तोड़ना है तो ढंग से तोड़ो, ऐसा कि अगले पचास साल तक न टूट पाए. वैसे भी पोलवाल्ट में कोई खास कमाल नहीं करना होता है. साँस रोक कर, पोल लेकर ज़रा तेज़ दौड़ लगाओ फिर पोल की टेक लगाकर हवा में छलांग लगा दो. इस टैक्नीक से छह-सात मीटर की ऊँचाई पार करना कौन सी बड़ी बात है? ’
सर्गेइ बुबका को छह मीटर पार करने में बरसों लगे थे पर हमारे पी. टी. सर एक ही झटके में साढ़े छह मीटर पार करना चाहते थे.
उन्होंने हमारे स्कूल के पाँच फ़ुट ऊँचे गेट को पोल के सहारे क्रास करने की प्रैक्टिस शुरू भी कर दी थी.
भाटिया सर की किक्स की मार का कलंक मिटाने के लिए उनके पास यह सुनहरा मौका था.
प्रिंसिपल मैम के लाख मना करने पर भी उन्होंने अल्मोड़ा के तमाम लोगों को इकट्ठा करके उनके सामने अपनी रिकॉर्ड ब्रेकिंग परफ़ार्मेन्स देने का फ़ैसला किया.
इस बार टीवी चैनल वाले भी इस ऐतिहासिक लम्हे को कैद करने के लिए मौजूद थे.
हम बच्च्चे उनको चीयर-अप करने के लिए तालियाँ बजा रहे थे.
पी. टी. सर पोल लेकर तेज़ी से दौड़े, साढ़े छह मीटर की ऊँचाई पर फ़िक्स बार के पास आते ही उन्होंने पोल को ज़मीन पर टेका फिर आँखें मूंदकर - ‘ जय माता दी ’ कहते हुए छलाँग लगा दी.
अगले ही पल पी. टी. सर नरम मैट्रेस पर पड़े थे.
तालियों और ठहाकों की आवाज़ के बीच उन्होंने अपनी आँखे खोलीं तो देखा कि साढ़े छह मीटर की ऊँचाई पर फ़िक्स बार अपनी जगह पर मौजूद था.
फिर क्या था, पी0 टी0 सर उछल-उछल कर कहने लगे –
‘ मैंने वर्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया. सर्गेइ बुबका हाय हाय ! नया पोलवाल्ट चैम्पियन पुरुषोत्तम तिवारी ज़िन्दाबाद !’
हमारी प्रिंसिपल मैम ने उन्हें डाँटकर चुप करते हुए कहा –
‘ पी. टी. सर ! आपने वर्ड रिकॉर्ड तो नहीं पर हमारा कीमती पोल ज़रूर तोड़ दिया है. आप बार के ऊपर से नहीं बल्कि उसके नीचे से यहाँ गिरे हैं. आपकी परफ़ार्मेन्स को कैमरों में रिकॉर्ड भी कर लिया गया है.’
पी. टी. सर ने टीवी चैनल वालों को लाख मनाया पर उन्होंने इस इवैन्ट का टीवी प्रसारण कर ही डाला और वह भी स्लो मोशन में.
प्रिंसिपल मैम ने इस ऐतिहासिक क्षण की सी. डी. बनवा कर अपने पास रख ली है और अब जब भी कभी पी. टी. सर किसी नए रिकॉर्ड को तोड़ने का दावा करते हैं तो वो इस सी. डी. का डिस्प्ले कर पी. टी. सर को ख़ामोश कर देती हैं.
हमारे पी. टी. सर से स्पोर्ट्स का चार्ज पूरी तरह से वापस ले लिया गया है और हमारे जूडो-कराते कोच भाटिया सर को स्कूल का स्पोर्ट्स इन्चार्ज बना दिया गया है.
अब पी. टी. सर हमको सिर्फ़ सुबह की प्रेयर, परेड और पी. टी. कराते हैं. पी. टी. सर प्रिंसिपल मैम के इस फ़ैसले से बहुत दुखी हैं.
उनका कहना है कि इस अन्यायपूर्ण फ़ैसले की वजह से हमारा स्कूल भविष्य में कोई भी गावस्कर, अजहारुद्दीन, सचिन, ध्यान चंद, पेले या सर्गेइ बुबका नहीं दे पाएगा.
लेकिन इस डिमोशन से हमारे पी. टी. सर निराश नहीं हैं. उन्होंने गुलेल खरीदकर निशाना साधने में महारत हासिल कर ली है और अब वो हमारे स्कूल में दो-चार चैंपियन शूटर्स तैयार करने वाले हैं.
पी. टी. सर की शायद अब वो आयु नहीं रही कि वो ख़ुद अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में स्वर्ण-पदक हासिल कर भारत का झंडा बुलंद करवाएं और हमारा राष्ट्र-गान गुंजवाएं लेकिन वो हम बच्चों को बिना माँगी मुफ़्त कोचिंग दे कर इस काबिल बनाना चाहते हैं कि हम भारत की झोली ओलंपिक गोल्ड मेडल्स से भर दें.

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

ऑल राउंडर पी. टी. सर

 (यह कहानी मेरे अप्रकाशित बाल-कथा संग्रह – ‘कलियों की मुस्कान’ से ली गयी है जिसमें कि मेरी 12 साल की बेटी गीतिका अपने किस्से सुनाती है. इस कहानी का रचना-काल 1990 का दशक है.)

पी. टी. शब्द सुनते ही हम बच्चों में जोश आ जाता है.

अगर हम बच्चों का जनमत संग्रह किया जाय तो साबित हो जाएगा कि उनका सबसे फ़ेवरिट पीरियेड पी. टी. वाला ही होता है.
मैथ्स की गुत्थियों से दूर, साइंस की पेचीदगी से अलग, हिस्ट्री की मारामारी से हटाकर पी. टी. हमको मस्ती और राहत देती है.
‘ एक-दो-एक, लेफ़्ट-राइट-लेफ़्ट, सावधान-विश्राम !’ वाह क्या संगीत है !
इसी पीरियड में हम गावस्कर, विवियन रिचर्ड्स और सचिन जैसा बैट्समैन, डेनिस लिली, कपिल देव या कुम्बले जैसा बॉलर, पेले या माराडोना जैसा फ़ुटबॉलर, पीट सम्प्रास या स्टेफ़ी ग्राफ़ जैसा टेनिस प्लेयर बनने की कोशिश करते हैं और कॉपी--किताब की कैद से आज़ाद होकर खुले आस्मान में अपने सपनों की उड़ान भरते हैं.
लेकिन हमारे लिए पी. टी. का मतलब है हमारे पी. टी. सर.
पी. टी. सर यानी हमारे फि़जि़कल ट्रेनिंग इन्सट्रक्टर ! हमारे पी. टी. सर सिर्फ़ अपने काम से ही पी. टी. नहीं हैं बल्कि अपने नाम से भी पी. टी. हैं. उनका पूरा नाम तो है पुरुषोत्तम तिवारी पर जब से उन्होंने बतौर पी. टी. इन्ट्रक्टर हमारा स्कूल ज्वाइन किया है तब से उन्हें सिर्फ़ पी. टी. सर ही पुकारा जाता है.
उनका असली नाम शायद दो-चार लोग ही जानते होंगे.
अपने नामकरण के बारे में खुद पी. टी. एक बड़ी मज़ेदार बात बताते हैं. जिस समय उनके नामकरण के लिए पण्डितजी को बुलाया गया, उस समय वो पालने में बड़े रिदम के साथ कुछ-कुछ पी. टी. जैसी उछलकूद कर रहे थे.
पण्डितजी के बोलने से पहले ही बालक का नाम उसके पिता ने पी. टी. रख दिया. पुरुषोत्तम तिवारी इसी नाम का विस्तृत रूप है.
पी. टी. सर पढ़ने-लिखने में करीब-करीब पैदल थे.
खेल-कूद में भी उन्होंने बी. ए. फर्स्ट ईयर तक कोई पदक नहीं जीता पर बी. ए. फ़ाइनल में अचानक ही दस हज़ार मीटर की दौड़ में वो कुमाऊँ यूनीवर्सिटी में प्रथम आए और इसमें उन्होंने नया रिकॉर्ड भी कायम किया.
उनकी इसी उपलब्धि के कारण उन्हें पी. टी. आई. की ट्रेनिंग के लिए पटियाला भेजा गया और वहाँ से लौटकर उन्होंने हमारे स्कूल की शोभा बढ़ाई.
उनकी दस हज़ार मीटर की दौड़ में आश्चर्यजनक जीत की कहानी उनके दुश्मनों की ज़ुबानी कुछ इस तरह है –
‘ पी. टी. सर के बड़े भाई जो कि राज्य स्तर के एथलीट रहे थे, उनकी शक्ल अपने छोटे भाई से हू-बहू मिलती थी. दस हजार मीटर्स की रेस के लिए नाम तो लिखाया गया पी. टी. सर का, पर उनकी जगह दौड़े और रेस में फर्स्ट आए उनके बड़े भाई. बाद में ठीक वैसे ही कपड़ों में विक्ट्री स्टैण्ड पर पी. टी. सर को खड़ा कर दिया गया.
इस हेराफेरी में कुछ लोगों को दान-दक्षिणा ज़रूर देनी पड़ी पर फिर पी. टी. सर का कोई बाल भी बाँका नहीं कर सका. ’
पी. टी. सर को ऐसी अफ़वाहें फैलाने वालों की हमेशा तलाश रहती है.
उनका बस चले तो झूठा प्रचार करने वाले ऐसे गपोडि़यों को वो कच्चा चबा जाएँ. पर क्या करें ! बेचारे शाकाहारी हैं इसलिए चाह कर भी वो ऐसा कुछ कर नहीं सकते.
दुनिया में तरह-तरह के बुखार होते हैं, कोई सीज़नल तो कोई वाइरल.
हम हिन्दुस्तानियों को आमतौर पर बारहों महीने क्रिकेट का बुख़ार चढ़ा रहता है.
हमारे पी. टी. सर को भी क्रिकेट का जुनून है. वो हमारे स्कूल की क्रिकेट टीम के परमानेन्ट मेम्बर हैं.
उनकी धर्म पत्नी श्रीमती प्रेमा तिवारी यानी पी. टी. मैडम उनके क्रिकेट प्रेम से बहुत दुखी रहती हैं.
उनके पतिदेव घर के सारे आलू , टमाटरों को अपनी बॉलिंग और बैटिंग प्रैक्टिस में इस्तेमाल कर डालते हैं.
पी. टी. मैडम ने जब से घर के फल, सब्ज़ी अपने पतिदेव से छुपाकर रखने शुरू कर दिए हैं तब से अचानक ही अगल-बगल के घरों के नीबू, अमरूद, आड़ू और खूबानी के पेड़ों पर फल पकने से पहले ही तोड़े जाने की ख़बरें आ रही हैं.
वैसे बॉल बनाने के लिए पाँगड़ के पेड़ का फल पी. टी. सर को सबसे बढि़या लगता है. टेबिल टेनिस की बॉल के साइज़ का काले रंग का यह फल जाड़ों के दिनों में अल्मोड़ा के कैन्टुनमेन्ट एरिया में सड़कों पर बहुतायत से पड़ा मिलता है.
अपनी शाकाहारी बॉलों को लेकर पी. टी. सर अक्सर कैच प्रैक्टिस करते हुए देखे जा सकते हैं.
पी. टी. सर के डाइविंग कैचेज़ देखकर तो एकनाथ सोलकर और अज़हारुद्दीन को भी काम्प्लेक्स हो सकता है क्योंकि इनमें बॉल तो होती ही नहीं है.
इस तरह के काल्पनिक किन्तु महा-कठिन कैच लेने से हमारे पी. टी. सर की एक्सरसाइज़ भी हो जाती है.
पी. टी. सर की बैटिंग तो लाजवाब है. विवियन रिचर्ड्स, सचिन और लारा क्या खाकर उनका मुकाबला करेंगे.
हमारे सर के हुक शॉट्स देखते ही बनते हैं. ऐसे शॉट्स लगाते वक्त उनका बैट भले ही बॉल को न छू पाए पर वो खुद स्टम्प्स पर बिला नागा ज़रूर गिर पड़ते हैं.
बॉलर के सर के ऊपर से साइड स्क्रीन पर सिक्सर मारने का उन्हें बहुत शौक है, इस शौक को पूरा करने के लिए वो क्रीज़ से तीन मीटर तक आगे बढ़कर और अपनी आँखें बन्द कर बैट हवा में ज़ोर से घुमा देते हैं. इसी चक्कर में अभी हाल ही में उन्होंने लगातार सात टूर्नामेन्ट्स में पहली बॉल पर क्लीन बोल्ड होने का रिकॉर्ड कायम किया है.
हमारे सर को किसी भी बॉलर की बॉल से डर नहीं लगता है.
फ़ास्ट बॉलर हो या स्पिनर वो हर एक को सबक सिखाना चाहते हैं पर किस्मत उनका न जाने क्यों, साथ नहीं देती.
बैट और बॉल की अगर मुलाकात हो गई तो उनका कैच ले लिया जाता है वरना उनके हाथ से छूटा हुआ बैट किसी फ़ील्डर, अम्पायर या नान बैटिंग एण्ड पर खड़े बैट्समैन को जाकर लगता है.
आजकल रन आउट के डिसीज़न के लिए अम्पायर्स एक्शन रि-प्ले का सहारा लेते हैं पर हमारे पी. टी. सर के मामले में उन्हें इस तकनीक की मदद की ज़रूरत ही नहीं पड़ सकती क्योंकि ऐसे मौकों पर वो हमेशा पिच के बीचो-बीच खड़े पाए जाते हैं.
नवजोत सिंह सिद्धू और सचिन के सिक्सर लगाने पर भारत में बड़ा जश्न मनाया जाता था.
पी. टी. सर को लगा कि इन खिलाडियों को बेकार में घमण्ड हो गया है। उन्होंने जल्द ही उनका घमण्ड तोड़ दिया.
क्यूँ पड़ गए न चक्कर में?
किस्सा यूँ है कि सचिन द्वारा अब्दुल कादिर की बॉलों पर कई छक्के लगाने के कारनामे के अगले हफ़्ते ही होने वाले इण्टर डिस्ट्रिक्ट स्कूल क्रिकेट टूर्नामेन्ट में हमारे स्कूल की तरफ़ से बॉलिंग करते हुए पी. टी. सर ने एक ओवर में आठ सिक्सर्स खाए.
अब छह बॉल के ओवर में आठ सिक्सर्स कैसे सम्भव हैं?
सम्भव क्यों नहीं हैं? ओवर की छहो वैलिड बॉल्स पर तो सिक्सर पड़े ही पर पी. टी. सर की दो नो बॉल्स पर भी छक्के पड़े.
इस तरह दुनिया के हर बैट्समैन के रिकॉर्ड को हमारे पी. टी. सर ने एक सप्ताह के भीतर ही तुड़वा दिया.
भारत के महान बॉलरों - प्रसन्ना, चंद्रशेखर और बेदी को अपनी फिरकी गेंदों पर बड़ा नाज़ होगा पर इसके जवाब में हमारे पी. टी. सर ने एक नए स्टाइल की फिरकी ‘अजूबा’ की खोज की है.
इस बॉलिंग स्टाइल में बॉल स्टम्प्स की ओर न जाकर फ़ुल टॉस के रूप में स्कावयर लेग पर खड़े अम्पायर के सर पर लगती है.
इस तरह की बॉल्स से पी. टी. सर ने कोई विकेट भले न लिया हो पर एक दर्जन अम्पायरों को घायल कर उन्हें पैवेलियन लौटने के लिए ज़रूर मजबूर किया है.
अब समझदार अम्पायर्स पी. टी. सर की बॉलिंग के समय हैल्मेट लगा कर ही खड़े होते हैं.
पी. टी. सर की फ़ील्डिंग पर कुछ न कहना ही बेहतर होगा.
उनके हिसाब से बैट्समैन का बैट लगते ही बॉल में चार सौ चालीस वाट का करेन्ट आ जाता है, फ़ील्डर को उसे हाथ से कभी नहीं छूना चाहिए इसलिए अपने रबर सोल लगे जूतों से ही वो बॉल को रोकने का प्रयास करते हैं.
बॉल रोकने के अपने दस अटेम्ट्स में कम से कम एक में वो सफल हो जाते हैं पर फिर बॉल को स्टम्प्स तक थ्रो करने में उनकी महारत आड़े आ जाती है.
उनके गलत निशाने और बॉल थ्रो करने की महा धीमी स्पीड की वजह से बैट्समैन दौड़कर हमेशा चार रन तो बना ही लेते हैं.
हमारे सर को क्रिकेट की दुनिया में पी. टी. सरदर्द के नाम से जाना जाता है.
हम लोगों की हज़ार कोशिशों के बावजूद हमारी प्रिंसिपल मैम ने उन्हें बरसों तक हमारी स्कूल की स्टाफ और स्टूडैन्ट्स की कम्बाइन्ड क्रिकेट टीम का कैप्टिन बना रखा था.
हमको याद नहीं पड़ता कि हमारी स्कूल की टीम कोई भी ऐसा मैच जीती हो जिसमें कि पी. टी. सर ने पार्टिसिपेट किया हो.
अब आखि़रकार प्रिंसिपल मैम ने अपने स्कूल की क्रिकेट टीम पर तरस खाकर पी. टी. सर की एक्टिव सेवाओं से उसे मुक्ति दिला दी है.
पी. टी. सर को अब हमारी टीम के कोच का थ्योरिटिकल कोच या सलाहकार नियुक्त कर दिया गया है.
उनको फ़ील्ड पर जाकर कोचिंग देने की इजाज़त तो नहीं है पर हमारी क्रिकेट स्किल इम्प्रूव करने के लिए वो हमारे कोच को जुबानी या लिखित सलाह ज़रूर दे सकते हैं.
पी. टी. सर अपनी इस नई रिस्पान्सिबिलिटी से बहुत खुश हैं.
इधर हमारी टीम ने पी. टी. सर को फ़ील्ड पर उतारे बिना लगातार तीन टूर्नामेन्ट्स जीते हैं.
पी. टी. सर का दावा है कि यह सब हमारे कोच को उनके द्वारा दी गई सलाह और कोचिंग का ही परिणाम है.
आजकल पी. टी. सर सचिन तेन्दुलकर को अपनी बैटिंग की कमियों को दूर करने के लिए करैस्पान्डेन्स कोर्स करा रहे हैं.
उन्होंने यह भी दावा किया है कि कई देशॉ के प्रतिष्ठित बॉलर्स ने कपिल देव का रिकॉर्ड तोड़ने में उन्हें अपनी मदद करने की और अपना कोच बनने की प्रार्थना की है.
यह भी सुनने में आया है कि तमाम भारतीय और विदेशी खिलाड़ी उन से फ़ील्डिंग की कोचिंग लेकर अपनी फ़ील्डिंग स्किल को बेहतर बनाने में जुटे हुए हैं.