शनिवार, 23 जुलाई 2016

सुरा-शक्ति

सुरा-शक्ति –
नवम्बर, 1981 में हम 6 मित्रों ने अल्मोड़ा से ट्रैकिंग करते हुए मुक्तेश्वर जाने और वहां से लौटने का प्रोग्राम बनाया. इस दल में हम 5 लगभग हम-उम्र के गुरूजी थे और हमसे कुछ बड़ी उम्र के विजिलेंस डिपार्टमेंट के एक अधिकारी सिंह साहब थे. हमारे दल में एक मैं और एक और गुरूजी चाय पीने में विश्वास करते थे किन्तु बाक़ी मित्र सुरा-पान के लिए समुद्र-मंथन करने तक का जतन करने के लिए तैयार रहते थे. खैर अच्छी बात यह थी कि उन दिनों नैनीताल और एकाद अन्य पर्यटन स्थलों को छोड़कर सर्वत्र शराबबंदी लागू थी इसलिए सबको रास्ते में थकान मिटाने  के लिए मजबूरन चाय-पान पर ही गुज़ारा करना पड़ रहा था. सुरा-पान के लिए तड़पते मित्रों का खून जलाने के लिए मैं महात्मा गाँधी बनकर रास्ते भर उन्हें ‘मद्य-निषेध’ पर लम्बा प्रवचन भी देता जा रहा था.
खैर, जैसे तैसे, 22 किलोमीटर का दुर्गम रास्ता पार करके हम मुक्तेश्वर के पी. डब्लू. डी. के डाक बंगले पहुंचे. सिंह साहब ने पहले से ही वहां हमारे लिए एक कमरा बुक करा रक्खा था, हमको उम्मीद थी कि हमको ठहरने के लिए दो और कमरे मिल जाएंगे. जाड़ों में 7500 फीट ऊंचे मुक्तेश्वर में अधिकारीगण ज़रा कम ही पधारते हैं, पर उस दिन तो वहां मेला जैसा लगा हुआ था. कोई वरिष्ठ आई. ए. एस. अधिकारी अपने दल-बल के साथ वहां आया हुआ था. सिंह साहब ने जब डाक-बंगले के केयर-टेकर हुकुम सिंह से हमारे लिए और कमरे खोलने के लिए कहा तो उसने साफ़ इंकार कर दिया. सिंह साहब के अफ़सरी रौब का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ और न ही हमारे द्वारा मोटी बक्शीश के लालच का.
खैर, तय किया गया कि पहले चाय पी जाय और फिर साथ में लाई पूड़ी-सब्ज़ी गर्म करवा कर खाई जायं. पर यहाँ भी मुश्किल आन पड़ी थी. बड़े साहब और उनके दल-बल की सेवा में डाक-बंगले का पूरा स्टाफ़ ऐसे जुटा हुआ था कि न तो कोई हमारे लिए चाय बनाने को तैयार था और न ही हमारा खाना गरम करने को. चाय की तलब ने मुझे परेशान कर रक्खा था पर मित्र थे कि थकान की दुहाई देकर आधा किलोमीटर नीचे बाज़ार चलकर चाय पीने को तैयार ही नहीं थे.
इस ग़मगीन माहौल में मुस्कुराते हुए सिंह साहब ने अपना बैग खोला और उसमें से एक चमचमाती हुई बोतल निकाली. मेरे एक और होनहार मित्र ने मेरी तरफ खी-खी करते हुए अपने बैग में से एक छोटी बोतल निकाल ली. मेरा ‘मद्य-निषेध’ विषयक प्रवचन फिर शुरू होने ही वाला था कि सिंह साहब ने अपने हाथ से मेरा मुंह बंद कर दिया और फिर मुझसे गुज़ारिश की कि मैं कुछ देर चुपचाप बैठकर नज़ारा देखूं.
सिंह साहब ने हुकुम सिंह को आवाज़ देकर बुलाया तो वो सूजा सा मुंह लेकर हमारे सामने खड़ा हो गया. पर टेबल पर दो बोतलें देखकर उसकी बुझी आँखों में चमक और चेहरे पर मुस्कराहट आ गई. वो दौड़ कर 6 गिलास ले आया. सिंह साहब ने उसे बताया कि उनके दो साथी शराब नहीं पीते हैं तो वो दो गिलास वापस ले जाने लगा पर उन्होंने उससे सिर्फ एक गिलास वापस ले जाने को कहा. अब हुकुम सिंह ने हाथ जोड़कर सिंह साहब से पूछा –
‘साहब, ये पांचवां गिलास किसके लिए?’
साहब ने प्यार से जवाब दिया –
‘तुम्हारे लिए. क्यों क्या तुम पीते नहीं हो?’
सिंह साहब का लगभग चरण-वंदन करते हुए गदगद हुकुम सिंह ने कहा –
‘हुजूर, जिस दिन पीने को नहीं मिलती, मुझे रात भर नींद नहीं आती. पर अगर इतनी मेहरबानी कर रहे हैं तो ये छठा गिलास भी यहीं रहने दीजिए. मेरा एक दोस्त भी मेरे साथ है. अगर आपकी किरपा हो जाय तो --’
सिंह साहब ने दो गिलास में माल डालकर हुकुम सिंह की ख्वाहिश पूरी कर दी.
कुछ देर बाद झूमते हुए हुकुम सिंह हम गांधीवादियों के लिए चाय तैयार करके ले आए. हमारा खाना भी चटपट गरम कर दिया गया और साथ में मटर-पनीर की सब्ज़ी भी हमको उपहार में दी गई.
सिंह साहब मुस्कुराकर मेरी तरफ देख रहे थे पर मैं बेचारा तो बगलें झाँक रहा था.
खाने-पीने के बाद जब हमारे सोने की बारी आई तो सिंह साहब ने हुकुम सिंह को फिर तलब करके पूछा –
‘हुकुम सिंह, हम 6 लोग तो एक डबल बेड पर सो नहीं पाएंगे. फ़र्श पर ही दरी वगैरा बिछाकर सो जाएंगे. तुम्हारे पास एक्स्ट्रा कम्बल तो होंगे?’
हुकुम सिंह ने दहाड़कर कहा –
‘आप राजा लोग फ़र्श पर सोयेंगे? हम क्या मर गए हैं? अभी आपके लिए दो कमरे और खोलता हूँ.’
सिंह साहब ने पूछा –
‘और तुम्हारे बड़े साहब? तुम तो कह रहे थे कि उनकी टीम के लिए बाक़ी सारे कमरे बुक हैं.’
हुकुम सिंह ने बड़े साहब को एक मोटी सी गाली दी और हम लोगों के लिए कुल तीन कमरों का इंतज़ाम कर दिया.
रात चैन से कटनी चाहिए थी पर मेरी किस्मत ऐसी कहाँ थी? कमरे में मेरे साथ सिंह साहब जो थे. घंटों तक उनकी ‘ही-ही, खी-खी’ सुननी पड़ी और अपना खून जलाना पड़ा.

मुक्तेश्वर से अल्मोड़ा लौटने पर सब कुछ बदल चुका था. मौन-व्रत धारी जैसवाल साहब नज़रें नीची किये हुए चले जा रहे थे और सिंह साहब सुरा-शक्ति पर लम्बा प्रवचन दिए जा रहे थे, दिए जा रहे थे.    

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत कुछ समेट कर ले गये हैं आप । निकालते रहिये पोटली से एक एक करके पूरी किताब बन जायेगी ।

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  2. एक पुस्तक का क्या, चार-चार पुस्तकों (व्यंग्य-कविता संग्रह, संस्मरण, व्यंग्य-कहानियां और बाल-व्यंग्य कहानियां) का मसौदा तैयार है पर कोई कद्रदान प्रकाशक तो मिले.

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " रामायण की दो कथाएं.. “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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