शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

बिछड़े सभी बारी-बारी


(1)
मंत्री सुखराम जी – अरे रहने दे गिरधारी ! कब तक पैर दबाएगा?
गिरधारी – मालिक हमको पता है कि पीते ही आपको सुस्ती चढ़ती है और बदन दर्द करने लगता है. उस बखत हमारा चम्पी करना और पैर दबाना आपको कितना चैन देता है, क्या हम जानते नहीं हैं?
सुखराम जी – पहले तो तू हमारे उस दुश्मन अंगनेलाल का खासमखास था. क्या उसके भी ऐसे ही पैर दबाता था?
गिरधारी – राम ! राम ! किस मनहूस का नाम ले लिया आपने मालिक ! अब तो रात का खाना भी नसीब नहीं होगा.
सुखराम जी – तो तेरे हिस्से का मुर्ग-मुसल्लम क्या नौकर-चाकरों में बंटवा दूं?
गिरधारी – हें ! हें ! हें ! हुजूर ! आपके घर का तो मैं जहर तक न छोडूं और फिर मुर्ग-मुसल्लम में तो अमृत होता है.
सुखराम जी – बातें बनाने में तो तू उस्ताद है. अच्छा ये बता तूने उस बंदर अंगनेलाल को गच्चा क्यों दिया था?
गिरधारी – हुजूर, उस पाजी के यहाँ मेरी आत्मा बड़ी बेचैन रहती थी. बड़ा घपलेबाज़ था वो. और ऐसा दारूबाज़ कि --
सुखराम जी – घपले तो बर्खुरदार हम भी करते हैं और सुरा-सुन्दरी में तो हमारे प्राण बसते हैं.
गिरधारी – आप तो राजा इन्दर हो ! आप अपनी इन्दर सभा में जो जी चाहे करें, उस टुटपुन्जिए की आपके सामने क्या औक़ात !
सुख राम जी – ऐसी बात है तो फिर निकाल इसी बात पर हमारी हल्का-हल्का सुरूर वाली शैम्पैन !
गिरधारी – जरूर अन्नदाता ! लेकिन थोड़ा चरनामृत हमको भी मिल जाता तो बड़ी किरपा होती.
सुखराम जी – ले भई, तू भी ले ! चीयर्स !
गिरधारी – वो क्या कहते हैं हुजूर, चेयर्स !   
(2)    
सुखराम जी – गिरधारी ! इलेक्शन सर पर आ गया है और तू है कि हाथ पर हाथ धरे बैठा है !
गिरधारी – हुजूर, गिरधारी का काम दिखाई नहीं देता पर सही बखत पर उसका डंका दुस्मन के कानों में बजता जरूर है.
सुखराम जी – तुझको तीस लाख दिए थे उनका क्या किया तूने?
गिरधारी – उस बेनी प्रसाद के एक दर्जन आदमी खरीद लिए हैं और हाँ, सौ बच्चे पिछले एक महीने से –
जीतेगा, भई जीतेगा, सुक्खी भैया जीतेगा !
और
गली-गली में सोर है, बेनी साला चोर है !
पूरे सहर में घूम—घूम कर चिल्ला रहे हैं. आपने तो सुना होगा.
सुखराम जी – अरे भई शोर होता है सोर नहीं ! 
वैसे तेरा काटा तो पानी भी नहीं मांगता. अच्छा ये बता, तू कहीं हमको भी उस तरह तो नहीं काटेगा जैसे कि तूने अंगनेलाल को काटा था?
गिरधारी – सीना चीर के दिखा सकता हूँ मालिक ! उसके अन्दर आपकी ही छबि होगी. मेरी भक्ती की कहानी तो हुजूर अब तक बच्चों की किताबों में आ जानी चाहिए थी.
सुखराम जी – वाह रे मेरे हनुमान जी !
गिरधारी – आप ही हो मेरे जय श्री राम !
(3)
सुख राम जी – गिरधारी ! बेनी प्रसाद के कैंप की क्या खबर है?
गिरधारी – उसके अड्डे में तो हुजूर मातम पसरा है. रोज़ उसका कोई न कोई बन्दा उसे छोड़कर हमारी सेना में आ रहा है. अब तो चूहे तक उसका घर छोड़कर जाने लगे हैं.
सुखराम जी – हट झूठे ! उसकी जन-सभाओं में तो हज़ारों की भीड़ जुटती है.
गिरधारी – उनमें आधे तो हमारे आदमी होते हैं जो इस मौके की फिराक में रहते हैं कि कब उसकी मीटिंग में पथराव किया जाए और कब कोई धमाका !
सुखराम जी – देख भाई ! कैसी भी हिंसा हो, हमारा नाम नहीं आना चाहिए.
गिरधारी – मेरे रहते आपके नाम पर कभी आंच नहीं आ सकती.
सुखराम जी – तेरे जैसे वफ़ादार हों तो फिर हमारी जीत तो पक्की ही है.
गिरधारी – जीत तो सवा सोलह आने पक्की मालिक ! पर ज़रा लठैतों और कट्टेबाज़ों की रसद-पानी के लिए बीस-पच्चीस लाख और मिल जाता ---
सुखराम जी – रसद-पानी में बोतलें भी तो शामिल होंगी?
गिरधारी – हुजूर बोतलें ही तो उनकी गाड़ियों का डीजल-पेट्रोल हैं. ससुरे बिना दारू पिए कोई गलत काम करते ही नहीं हैं.
सुखराम जी – मुबारकपुर की हमारी कल की रैली में भीड़ बहुत कम थी. तूने तो भीड़ इकठ्ठा करने के लिए अपने आदमियों को पैसे भी दिए थे.
गिरधारी – मुबारकपुर में कल दो-तीन मौतें एक साथ हो गई थीं. लोगबाग़ मातमपुर्सी में चले गए थे. आज स्यामनगर में भीड़ का आप जलवा देखिएगा.
सुखराम जी – तू आज श्यामनगर में हादसों को पकड़कर रखना. अगर आज की रैली में भीड़ नहीं जुटी तो फिर तेरी मौत पक्की !
गिरधारी – हें ! हें ! हें ! राम जी के हाथों मारा जाऊंगा तो स्वर्ग ही तो मिलेगा न हुजूर !
(4)
सुखराम जी की धर्मपत्नी कमला देवी – सुनो जी, तुम अपने इस गिरधारी पर बिल्कुल भरोसा मत करना. हमारा छुटका भैया केसू बता रहा था कि इस ससुरे गिरधारी को बेनी प्रसाद ने खरीद लिया है. इस घर के भेदी ने तुम्हारी लंका न ढाई तो कहना !
सुखराम जी – तुम्हारा छुटका भैया केसू चार बार हमको दगा दे चुका है. हमने तो तय कर लिया है कि वो जिसकी भी बुराई करेगा हम उसे अपने नव-रत्नों में शामिल कर लेंगे.  
कमला देवी जी – पछताओगे मंत्री जी ! अगर ऐसे ही विभीषणों पर विश्वास करते रहोगे तो जल्दी ही तुम मंत्री से मुख्यमंत्री तो नहीं, पर संतरी ज़रूर बन जाओगे.
सुखराम जी –
हम को मिटा सके, ये ज़माने में दम नहीं,
हमसे ज़माना ख़ुद है, ज़माने से हम नहीं.
कमला देवी – तुम तो खुदा से भी दो-चार मंजिल ऊपर पहुँच गए हो. इतनी ऊंचाई से जब औंधे मुंह गिरोगे तो हमसे कहोगे –
तुम्हारा छुटका भैया केसू सही कह रहा था.
सुखराम जी – नामुमकिन ! अच्छा चलो शर्त बदते हैं. अगर हम हारे तो तुम्हारा डायमंड सेट पक्का !
कमला देवी – हारने के चार दिन बाद ही तुम जेल में होगे और फिर मुक़द्दमेबाज़ी में तुम्हारा इतना खर्च होगा कि तुम हमको फूलों का एक गजरा भी दिलाने के क़ाबिल नहीं बचोगे.
सुखराम जी – हे भगवान ! ये बेनी प्रसाद की एजेंट को ही तुम्हें हमारी धर्मपत्नी बनाना था?
(5)
सुखराम जी – गिरधारी आज काउंटिंग है. मेरा तो दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा है. तू सच-सच बताना, मैं कहीं हार तो नहीं जाऊंगा?
गिरधारी – मालिक सूरज भले पच्छिम से उग सकता है पर आप हार नहीं सकते. अपना हिसाब पक्का है. आप पचपन हजार वोटों से उस बेनिया को पटकनी देंगे. आप तो अभी से जसन मनाने के लिए बोतल खोल लो.
सुखराम – अच्छा, अच्छा ! अब चुपचाप बैठ !
अरे ! पहले रुझान में तो मैं 100 वोटों से पिछड़ रहा हूँ.
गिरधारी – मालिक ये तो डाक वाले वोट हैं. अब परदेसियों से आप काहे को अंखिया लड़ाएँगे?
सुखराम जी – हाय ! अब तो उस बेनिए के बच्चे की लीड 500 की हो गयी.
गिरधारी – वही डाक वाला वोट ! करीब दो हजार तो होता ही है मालिक. आप काहे को जी हल्का कर रहे हैं? अगले दौर से ही आपकी जीत का डंका बजने लगेगा.
सुखराम जी – ले बज गया जीत का डंका ! वो बेनिया 2500 वोटों से आगे निकल गया.
गिरधारी – हेलो ! भूपिंदर किस एरिया की काउंटिंग चल रही है? क्या कहा उस्मानपुर की? तब तो ठीक है !
उस्मानपुर तो हुजूर के दुस्मनों का एरिया है. स्यामनगर में तो हम उस बेनिया को आठ-दस हजार वोट से पछाड़ेंगे.
सुखराम जी – भाड़ में गया तेरा उस्मानपुर और श्यामनगर ! कमबख्त ! अब उस गधे की लीड बीस हजार की हो गयी है.
गिरधारी – अन्दर की खबर तो आप तक पहुँची ही नहीं है. भूपिंदर का  अभी-अभी फिर से फ़ोन आया है. अब हम बारह हजार वोट से आगे हो गए हैं.
सुखराम जी – सच कह रहा तू? अगर मैं जीत गया तो अपना श्यामनगर वाला बंगला तेरे नाम कर दूंगा.
गिरधारी – मालिक संझा तक आप बंगले की चाबियाँ मुझे देने के लिए तैयार रहिएगा. मैं अब खुद काउंटिंग देखने जा रहा हूँ. आपको पल-पल की खबर देता रहूँगा.
सुखराम जी – ऑल दि बेस्ट गिरधारी ! अच्छी-अच्छी खबर भेजना वरना तेरी गर्दन तेरे धड़ अलग हो जाएगी.
गिरधारी – आप तो बस बंगले की चाबियाँ मुझे सौंपने की तैयारी कीजिए. मैं लौट कर जीत के जसन की तैयारी करता हूँ.
(6)
सुखराम जी – हे भगवान ! उस बेनिए की लीड चालीस हज़ार की हो गयी है और वो गिरधारी का बच्चा न तो ख़ुद फ़ोन कर रहा है और न ही मेरा उठा रहा है.
कमलादेवी – अब किसी का फ़ोन आएगा भी नहीं ! मंत्री जी ! अब आप पचास हज़ार वोटों से पिछड़ रहे हैं.
सुखराम जी – वो श्यामनगर की काउंटिंग ट्रेंड बदल देगी.
कमलादेवी – शुतुरमुर्ग रेत में कब तक मुंह गड़ाए रहेगा? उसकी मौत तो चारों तरफ़ से मंडरा रही है.
केसू – जीजाजी, जीजाजी ! जरा छत पर चलिए ! देखिए आपका गिरधारी जुलूस के आगे कैसे नाच रहा है !
सुखराम जी – मैं न कहता था ! जीत तो हमारी ही होगी ! चल भाई ! छत पर चलकर अपने जश्न का नज़ारा देखते हैं.
केसू – जीजाजी, आपका गिरधारी जुलूस के आगे-आगे नाच तो रहा है पर ये तो देखिए कि उसके हाथ में झंडा कौन सा है ! और उसके पीछे उसकी वानर-सेना कौन से नारे लगा रही है !
सुखराम जी – हाय मर गया ! ये साला गिरधारी उस बेनिए की पार्टी का झंडा लेकर नाच रहा है और उसके पीछे बच्चे पता नहीं क्या-क्या नारे लगा रहे हैं !
केसू – हमको तो ये नारे साफ़ सुनाई दे रहे हैं –
गली-गली में शोर है, सुक्खी साला चोर है !
जीत गया भई जीत गया, बेनी भैया जीत गया !
सुखराम जी – कमला-केसू ! मेरा दिल बैठा जा रहा है. डॉक्टर महरा को बुलाओ !
केसू – जिज्जी ! जीजाजी पहले भी तीन बार हार चुके हैं. इनकी चमड़ी बहुत मोटी है. इनको एक और हार से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा पर अब भी इनके साथ रहना मुझे बहुत भारी पड़ेगा. मैं भी बेनी भैया के जुलूस में शामिल होकर अपने पुराने पाप धोने जा रहा हूँ.
कमलादेवी – केसू ! हमसे ऐसी गद्दारी?
केसू – मैं तो कहता हूँ जिज्जी कि तुम भी मेरे साथ चलो. जिस नाव में छेद हो गया हो उसे छोड़ना ही अकलमंदी है. मैंने तो बेनी भैया से तुम्हारे बारे में एडवांस में बात भी कर ली है. तुम उनकी पार्टी में आ जाओगी तो वो तुम्हें पार्टी के महिला मोर्चे का जिला-अध्यक्ष बना देंगे.
कमलादेवी – पर भैया ! पति का साथ कैसे छोड़ सकती हूँ?
केसू – आपके इस पति ने तो कितनी औरतों के लिए आपको छोड़ा है. अभी भी मैं इसकी दो-चार गुमनाम महबूबाओं के नाम आपको गिना सकता हूँ.
कमलादेवी – तूने मेरी हिम्मत बढ़ा दी केसू ! इन्होंने मेरी कभी परवाह नहीं की. अब मैं ऐसे हरजाई की नहीं, बल्कि अपने दिल की मानूँगी.
चल केसू !  चलते हैं तेरे बेनी भैया के जुलूस में !
केसू और कमलादेवी एक साथ –
गली-गली में शोर है, सुक्खी साला चोर है !
जीत गया भई जीत गया, बेनी भैया जीत गया !  

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

एक और तमस


(1)
शुक्ल जी अरे लियाक़त भाई, सुना आपने ! हमारे मोहल्ले के शोहदे अख्तर ने शहर के नामी गुंडे अवधेश को चाकू से गोद दिया.
लियाक़त भाई वो कमबख्त अवधेश बचा कि मर गया?
शुक्ल जी अवधेश के शरीर पर चाकू के कुल 16 वार थे. वो पट्ठा तो पोस्ट मार्टम के लिए अस्पताल पहुँचाया भी जा चुका है.
लियाक़त भाई चलो पाप कटा. इस कमबख्त अवधेश ने शहर भर की लड़कियों को छेड़ने का ठेका ले रक्खा था.
वैसे हुआ क्या था? अख्तर और अवधेश का तो आपस में बड़ा याराना था. दोनों मिलकर लड़कियां छेड़ते थे और दुकानदारों से हफ़्ता वसूली भी दोनों मिलकर ही किया करते थे. ज़रूर किसी लड़की को लेकर ही दोनों में झड़प हुई होगी.
शुक्ल जी हाँ, दोनों के बीच झड़प तो एक लड़की को लेकर ही हुई थी. वो रीटा विल्सन नर्स है न ! उसी पर हक़ जमाने का कम्पटीशन था दोनों के बीच !
लियाक़त भाई चलो अच्छा हुआ ! एक पापी चाकू से मारा गया और अब दूसरा फांसी पर लटकेगा.
शुक्ल जी हुज़ूर ग़लतफ़हमी में मत रहिए. दो गुंडों के बीच की इस आपसी जंग को सियासती रंग भी दिया जा सकता है और मज़हबी रंग भी !
लियाक़त भाई दोस्त ! इतना बुरा मत सोचा करो ! मैं दुआ करूंगा कि तुम्हारा ये डर कभी सच्चाई में नहीं बदले !
शुक्ल जी आपकी ही ज़ुबां में मैं कहूँगा. आमीन !
(2)
इंस्पेक्टर बदन सिंह कमला, कमला ! सुनती हो? जगतपुरा में एक क़त्ल हो गया है. मैं फ़ौरन मौक़ा-ए-वारदात पर जा रहा हूँ. अब चाय-वाय थाने में ही कर लूँगा.
कमला अरे, चाय-नाश्ता तैयार होने में बस पांच मिनट और लगेंगे.
बदन सिंह मैडम, ड्यूटी इज़ ड्यूटी ! क्या तुम अपने पति को जानती नहीं हो?
कमला ख़ूब जानती हूँ. मैं तो ये भी जानती हूँ कि तुम जब भी भूखे पेट घर से निकलते हो तो तुम्हारे सामने जो भी आता है उसकी तुम बे-भाव पिटाई कर देते हो.
बदन सिंह अरे भई, क़त्ल का मामला है.
कमला क़त्ल से मुझे क्या लेना-देना? मेरे तो गोभी के पराठे बेकार जाएंगे.
बदन सिंह मैडम, हर क़त्ल के मामले से तुम्हारा लेना-देना होता है. याद नहीं? गोकुल सुनार के क़ातिल बेटे गोपाल को बेदाग छुड़वाने की एवज़ में जो रकम मिली थी, उसी से तुम्हारा हीरे का हार आया था.
कमला ठीक है, जाओ पर इस बार मुझे उसी हार के मैचिंग कंगन चाहिए.
बदन सिंह इसका वादा तो मैं नहीं कर सकता. पहले जाकर देखूं तो कि जाल में फंसी मछली कितनी मोटी है.
(3)
पंडित बृजभूषण शिव ! शिव ! शिव ! हम सब के सामने ही हमारे अपने समुदाय का एक सुशील, होनहार और प्रतिभा-संपन्न युवक, एक पापी म्लेच्छ के चाकू से काल की गोद में समा गया और हम हैं कि हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं !
मौलाना साहब ! आप कोई ग़लतफ़हमी मत पालिएगा. हमारा हिन्दू समुदाय ईंट का जवाब पत्थर से देगा. आपके समुदाय के दो-चार युवकों के शवों को कन्धा देने का अवसर हम आपको अवश्य देंगे.
मौलाना सदरुद्दीन धमकी किसे दे रहे हैं पंडित जी? हमने क्या चूड़ियाँ पहन रक्खी हैं? हमारे किसी एक जवान को अगर खरोंच भी आई तो तो आपके घरों की न जाने कितनी खवातीनों को चूड़ियाँ उतारनी पड़ जाएंगी. हमारा अख्तर बेगुनाह है. उस गुंडे अवधेश ने उस पर क़ातिलाना हमला किया था. अख्तर को अपनी जान बचाने के लिए मजबूरन चाकू चलाना पड़ा था जिसमें यकायक उस बदमाश की मौत हो गयी.
पंडित बृजभूषण क्या अदालत में आप की खाला का राज है? आपके अख्तर को तो हम फांसी दिलाकर रहेंगे और अगर कहीं उसे अदालत ने छोड़ दिया तो वह हमारे कोप से तो जीवित बच ही नहीं सकता.
मौलाना सदरुद्दीन लगता है कि बाबू अवधेश का दोज़ख में अकेले मन नहीं लग रहा है. आप कहें तो उनके तमाम यार-दोस्त भी वहां पहुंचवा दें !
पंडित बृजभूषण एक भोले-भाले, निष्पाप अवधेश को नर्क में भिजवाने की बात कहकर मुसीबत मोल ले ली है आपने मौलाना ! अब तो खून की नदियाँ बहेंगी.
मौलाना सदरुद्दीन हम भी सोच रहे हैं कि काफ़िरों के खून से बनी नदी में नहा ही लिया जाय !
(4)
एम. पी. धर्मावतार हमारी-तुम्हारी उम्र हो गयी है क़ुर्बान अली ! अब वक़्त आ गया है कि हम और तुम अपने-अपने बेटों को अपनी-अपनी कौम की कमान सौंप दें.
क़ुर्बान अली बात तो तुम्हारी सही है धर्मावतार भाई ! पर हमारे और तुम्हारे बेटों को ऐयाशी और आवारागर्दी से फ़ुर्सत तो मिले ! नालायक आए दिन हमारी नाक कटवाते रहते हैं.
धर्मावतार हम और तुम भी तो जवानी में इश्तहारी मुजरिम थे. दोनों जेल गए थे, डाके के मामले में और फिर लौटे तो दोनों ही भारत छोड़ो आन्दोलन के वीर स्वतंत्रता सेनानी बन कर !
क़ुर्बान अली भाई, ज़रा होशियार ! दीवारों के भी कान होते हैं.
अच्छा ये सब छोड़ो. यह बताओ कि इस अवधेश के क़त्ल के मामले का क्या कोई फ़ायदा उठाया जा सकता है?
धर्मावतार बिल्कुल फ़ायदा उठाया जा सकता है. अपने बेटे जमील को तुम मजलिस-ए-इस्लाम की कमान सौंप दो और मैं अपने सपूत देशभूषण को हिन्दू-हितकारिणी सभा का प्रधान सेनापति बनवा देता हूँ.
क़ुर्बान अली - हमारे-तुम्हारे इन दोनों पैदाइशी मक्कार सपूतों से किसी ज़िम्मेदारी के काम की उम्मीद मत रखना.
धर्मावतार अरे भाई, नाम की कमान हमारे इन हरामखोरों पर होगी पर परदे के पीछे तो हम और तुम ही सारा ग़दर काटेंगे.
क़ुर्बान अली अच्छा, प्लान तो बताओ !
धर्मावतार हम अवधेश को हिन्दू धर्म-संस्कृति का संरक्षक बनाकर प्रोजेक्ट करेंगे और तुम अख्तर को अपनी कौम का सबसे बड़ा हिमायती बताओगे. फिर हम पंडित बृजभूषण के गैंग से अवधेश के घर पर, मुसलमानों के नाम से हमला करवाएँगे और तुम मौलाना सदरुद्दीन के गिरोह से अख्तर के घर हम हिन्दुओं के नाम से आग लगवाओगे.
और हाँ, इस खेल को और दिलचस्प बनाने के लिए अख्तर का मारा जाना भी ज़रूरी है.
अब इस हमले में, इस आगजनी में जितने ज़्यादा लोग मरेंगे, जितने बलात्कार होंगे और जितनी लूटपाट होगी, उतना ही ज़्यादा हमको फ़ायदा होगा.
क़ुर्बान अली हमारे लिए अख्तर के घर को आग लगवाना तो आसान है पर उसको मारना मुश्किल है. इंस्पेक्टर बदन सिंह से कहकर उसे फ़ेक एनकाउंटर में मरवाना पड़ेगा. वैसे ऐसे फ़ेक एनकाउंटर की उस पुलिसिए की फ़ीस दस लाख है.
धर्मावतार लो भाई ! मेरे हिस्से के ये पांच लाख मुझ से अभी ले लो और बाक़ी की रक़म तुम डालो.
क़ुर्बान अली बच्चों के मुस्तक़बिल और कौम की खिदमत के लिए इतना रुपया तो मैं हमेशा अपनी जेब में रखता हूँ. वैसे दो-दो लाख एक्स्ट्रा हमको-तुमको दंगे-फ़साद करवाने के लिए भी लगाने पड़ेंगे.
धर्मावतार अपने-अपने नालायक सपूतों के भविष्य को बनाने के लिए इतना इन्वेस्टमेंट तो हमको-तुमको करना ही पड़ेगा.
(5)
राज्य के गृहमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस -
गृहमंत्री मुझको यह घोषणा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि हमने तीन दिन के अन्दर ही सद्भाव नगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर पूरी तरह से काबू पा लिया है.
इन दंगों में आईएसआई का हाथ होने के पुख्ता सुबूत मिले हैं. स्वर्गीय अवधेश के क़ातिल अख्तर के ख़ुद आईएसआई एजेंट होने की बात सामने आई है.
हमारे जाबांज़ इंस्पेक्टर बदन सिंह ने अख्तर के भागने की कोशिश के समय उसका एनकाउंटर कर उसे मार गिराया. श्री बदन सिंह को एक लाख के नक़द इनाम, और गैलेंट्री अवार्ड के साथ-साथ आउट ऑफ़ टर्न प्रोन्नति देकर उन्हें डी. एस. पी. बनाया जाता है. उनके बहादुर सहयोगियों को भी पुरस्कृत और सम्मानित किया जा रहा है.
सद्भाव नगर में कौमी-एकता को पुनर्स्थापित करने में हमारे सांसद धर्मावतार जी और हमारे विधायक क़ुर्बान अली ने, अपनी जान की भी परवाह नहीं की है. इन दोनों के सपूतों - श्री देशभूषण और जनाब जमील अली के भी हम आभारी हैं जिन्होंने कि दिन-रात एक-जुट होकर इस नफ़रत के तूफ़ान के बीच अमन का दिया जलाए रक्खा था.
मैं इन दंगों में मारे गए सभी व्यक्तियों के परिवारों को पांच-पांच लाख रूपये की और सभी घायल हुए लोगों को एक-एक लाख रूपये के अनुदान की घोषणा करता हूँ.
(6)
माइक पर देशभूषण और जमील अली एक साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता मंच की ओर से सभा में उपस्थित सभी महानुभावों के चाय-नाश्ते की व्यवस्था की गयी है. राष्ट्र-गान के बाद आप सभी जलपान कर के ही यहाँ से प्रस्थान कीजिएगा.