शनिवार, 5 दिसंबर 2020

मेरी पहली रेल-यात्रा

 मैंने अपना होश संभालने से पहले दो-तीन बार ट्रेन में सफ़र किया होगा लेकिन अपने होश में, 5 साल की उम्र में, मेरी पहली रेल-यात्रा जून, 1956 में हुई थी.

पिताजी का ट्रांसफ़र बिजनौर से लखनऊ हो गया था.
लखनऊ जाने के लिए हम लोगों को ट्रेन से अपनी यात्रा संपन्न करनी थी.
हमारे परिवार के अन्य सदस्यों के लिए रेल-यात्रा का यह पहला अनुभव नहीं होता लेकिन मेरे होश संभालने के बाद, मेरी पहली रेल-यात्रा होने की वजह से यह मेरे लिए एक ऐतिहासिक महत्व की घटना होने वाली थी.
मेरे भाइयों ने रेल-यात्रा के बारे में मेरा सामान्य-ज्ञान बढ़ाने में मेरी बड़ी मदद की थी.
स्टेशन मास्टर की हरी झंडी का इशारा मिलते ही कैसे धुआं उड़ाता हुआ एक दैत्याकार काला इंजन, बीसियों डिब्बों वाली ट्रेन को लोहे की दो पटरियों पर –
‘हुश्यिप छिक-छिक, हुश्यिप छिक-छिक, कू’
करते हुए फ़र्राटे से खींचता हुआ ले जाता है और फिर अगले किसी स्टेशन पर कैसे वहां के स्टेशन मास्टर के हाथ में लाल झंडी का इशारा मिलने पर वह पूरी ट्रेन को एक झटका सा देकर रुक जाता है, इस कथा को मैंने आदि से अंत तक कितनी बार सुना, इसका हिसाब दे पाना मेरे लिए मुश्किल है.
मुझे यह भी बताया गया कि पिताजी के एंटाइटलमेंट की बदौलत हम लोग ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास में सफ़र करने वाले हैं.
अब तक मैंने किसी स्कूल में ही फ़र्स्ट क्लास, सेकंड क्लास और थर्ड क्लास का नाम सुना था.
मैंने बड़े भाई साहब से पता किया कि ट्रेन में यह फ़र्स्ट क्लास क्या बला होती है.
बड़े भाई साहब से मुझे मिली जानकारी का सारांश था -
ट्रेन में यात्रियों के लिए कुल तीन क्लास होते हैं – फ़र्स्ट क्लास, सेकंड क्लास और थर्ड क्लास
(उन दिनों शायद ए. सी. फ़र्स्ट क्लास का चलन नहीं हुआ होगा और यह तो तय है कि तब स्लीपर क्लास नहीं होता था).
सबसे कम पैसे की टिकट वाले थर्ड क्लास में भीड़-भड़क्का, धक्कम-मुक्का, चिल्ल-पों का साम्राज्य होता है और यात्रियों को लकड़ी के पटरों से बनी बेंचों पर बैठ कर, एक-दूसरे से सटे-सटे, सफ़र करना होता है.
थर्ड क्लास के विषय में मिली इस भयावह जानकारी पर मेरी कुछ ऐसी थी –
‘राम ! राम ! ऐसी तकलीफ़देह यात्रा करने की तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता !’
(वैसे एक मज़े की बात बताऊं - पिताजी के ट्रांसफ़र के समय होने वाली रेल-यात्रा को छोड़ कर हमारी सभी रेल-यात्राएं इसी तकलीफ़देह थर्ड क्लास में ही हुआ करती थीं.)
थर्ड क्लास से करीब दुगुनी टिकट वाले सेकंड क्लास में सीटों पर गद्दियाँ होती हैं, उनमें भीड़-भाड़ भी कम होती है और सफ़र भी आरामदेह होता है.
लेकिन राजाओं और नवाबों वाले ठाठ तो महा-महंगे फ़र्स्ट क्लास में बैठने वालों के ही होते हैं.
अल्लाताला से वीआईपी किस्मत लिखा कर लाए यात्रियों के लिए उपलब्ध फ़र्स्ट क्लास में बैठने-सोने के लिए ऐसी सोफ़ेनुमा, बेडनुमा, व्यवस्था होती है जो कि हमारे घर के बेंत से बुने सोफ़े की तुलना में या हमारे घर के रुई के गद्दे वाले बिस्तरों की तुलना में, बहुत आरामदायक और शानदार होती है.
फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में छत पर पंखे लगे होते हैं और उसके दोनों ओर बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ होती हैं जिन से कि सफ़र करते हुए बाहर का नज़ारा देखा जा सकता है.
सुना है कि अमीर ख़ुसरो ने कभी काश्मीर के लिए कहा था –
अग़र फ़िरदौस बर-रूए ज़मीं अस्त,
हमीं अस्तो, हमीं अस्तो, हमीं अस्त.
(पृथ्वी पर अगर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है)
अगर 1956 में अमीर ख़ुसरो होते तो किसी ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में बैठ कर भी शायद वो यही शेर कहते.
ट्रेन में सफ़र करने से दो सप्ताह पहले ही मैंने भाइयों से और बहन जी से लड़-झगड़ कर अपने लिए विंडो-सीट रिज़र्व करवा ली थी.
मेरे लिए सबसे ज़्यादा ख़ुशी की बात यह थी कि पिताजी ने भी घर के मुझ सबसे छोटे सदस्य की मांगों पर अपनी संस्तुति की बाक़ायदा मुहर लगा दी थी.
आख़िरकार बहुत दिनों के इंतज़ार के बाद हमारे सुहाने सफ़र की घड़ी आ ही गयी.
डेड़ दर्जन छोटे-बड़े अस्बाब के साथ हम चार भाई, बहन जी, माँ और पिताजी यानी कि कुल 25 अदद, बिजनौर रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए.
हमको छोड़ने के लिए माँ-पिताजी के मित्रों की और पिताजी के मातहतों की भीड़ स्टेशन पर पहले से मौजूद थी.
पिताजी को माला पहनाई गयी, माँ को किसी ने फूलों का गुलदस्ता भेंट किया, और तो और, किसी मेहरबान ने एक छोटी सी माला मेरे गले में भी डाल दी.
स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर एक बदसूरत सी, खटारा सी, हर तरफ़ से बंद डिब्बों वाली, एक भदरंगी ट्रेन खड़ी थी.
मुझे पता चला कि वह एक मालगाड़ी थी जिसमें कि सामान को इधर से उधर पहुँचाया जाता था.
हम लोग इंतज़ार में थे कि कब प्लेटफ़ॉर्म से यह मुई मालगाड़ी हटे, उस पर हमारी ट्रेन आए और फिर हमारा सुहाना सफ़र शुरू हो.
लेकिन कमबख्त मालगाड़ी थी कि प्लेटफ़ॉर्म से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी.
बिजनौर रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर पिताजी को वीआईपी ट्रीटमेंट दे रहे थे.
पुराने ज़माने में बिजनौर जैसे एक छोटे से स्टेशन से किसी ऑफ़िसर की विदाई कभी-कभार ही हुआ करती होगी.
कुछ देर बाद प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी मालगाड़ी के गार्ड भी भीड़ में शामिल हो गए.
स्टेशन मास्टर और मालगाड़ी के गार्ड के बीच में कुछ बातचीत हुई और फिर कुलियों द्वारा हमारा सारा सामान मालगाड़ी के पिछले हिस्से की तरफ़ ले जाया जाने लगा. हम सब भी उसी दिशा में बढ़ने लगे.
ट्रेन के आख़िर में झोंपड़ी जैसा एक डिब्बा आया जो कि उस मालगाड़ी के गार्ड का केबिन था.
मेरी हैरानी की कोई इंतिहा नहीं रही जब मैंने देखा कि मालगाड़ी के गार्ड्स-केबिन में कुलियों द्वारा हमारा कुल डेड़ दर्जन सामान बड़े करीने से सजाया जा रहा है.
जब हमारा सारा सामान गार्ड के केबिन में फ़िट हो गया तो फिर हम लोगों को भी उसी केबिन में बैठने के लिए कहा गया.
खटारा मालगाड़ी के गार्ड्स-केबिन में सफ़र करने की बात सुन कर सुहाने और नवाबी सफ़र के मेरे सारे सपने भुने हुए पापड़ की तरह टूट गए.
हाय ! घुचकुल्ली गार्ड्स-केबिन में हमारा सात लोगों का परिवार और गार्ड को मिला कर कुल जमा आठ लोग, हमारे डेड़ दर्जन सामान के साथ, कैसे फ़िट हुए, इसे समझने के लिए हमको किसी ट्रक में कसाई घर को ठूंस-ठूंस कर ले जाई जा रही गाय-भैंसों को ही देखना पड़ता.
अपनी दुर्दशा देखा कर मेरी आँखों से तो आंसू बहने लगे.
पिताजी ने मुझे पुचकारते हुए समझाया कि बिजनौर स्टेशन से कोई पैसेंजर ट्रेन लखनऊ के लिए नहीं जाती थी (यह 1956 की बात थी) और शाम के वक़्त तो कोई पैसेंजर गाड़ी बिजनौर से नजीबाबाद भी नहीं जाती थी इसलिए हमको मजबूरन बिजनौर से नजीबाबाद तक इसी कष्टकारी मालगाड़ी में सफ़र करना था.
लेकिन अच्छी बात यह थी कि नजीबाबाद से लखनऊ तक का बाक़ी सफ़र हमको एक पैसेंजर ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट में, आराम के साथ, बैठ कर या फिर शेषशायी भगवान विष्णु की तरह लेट कर, मज़े से पूरा करना था.
मालगाड़ी में लद-फंद कर, सिर्फ़ तीस किलोमीटर का सफ़र, हमने ढाई-तीन घंटे में पूरा किया.
हमारा अंग-अंग दुःख रहा था.
नजीबाबाद पहुँचते-पहुँचते रात हो चुकी थी और अभी तो हमको नजीबाबाद स्टेशन पर नजीबाबाद से लखनऊ जाने वाली ट्रेन का दो घंटे इंतज़ार भी करना था.
बिजनौर से नजीबाबाद तक के दुखदायी सफ़र से बुरी तरह से थका हुआ, लखनऊ जाने वाली ट्रेन के आने का इंतज़ार करते-करते, मैं कब सो गया, मुझे पता ही नहीं चला.
बहन जी के अचानक ज़ोर-ज़ोर से झकझोरने से मेरी नींद टूटी.
मैंने आँख खोल कर देखा कि मैं पैसेंजर ट्रेन के शानदार फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट की लोअर बर्थ पर लेटा हूँ लेकिन जब तक मैं इस नवाबी ठाठ का लुत्फ़ उठा पाता, बहन जी ने मेरा हाथ खींच्रते हुए मुझे ट्रेन से निकाल कर परिवार के अन्य सदस्यों के साथ लखनऊ स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा कर दिया.
नजीबाबाद से लखनऊ तक के सफ़र में, ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट की शाही गद्दे वाली लोअर बर्थ पर मैं सोया ज़रूर था लेकिन इसका पता तो मुझे तब चला जब सफ़र रूपी फ़िल्म की आख़री रील का आख़री सीन चल रहा था.
भाइयों और बहन जी को जलाते हुए फ़र्स्ट क्लास कम्पार्टमेंट की विंडो-सीट पर बैठ कर सफ़र का आनंद उठाने का और वहां से बाहर का नज़ारा देखने का मेरा ख़्वाब तो चकनाचूर हो ही गया था.
प्रैक्टिकली मेरी स्मृति में मेरी पहली रेल-यात्रा बिजनौर से सिर्फ़ नजीबाबाद तक ही सीमित रही थी.
इस तरह से मेरी पहली रेल-यात्रा – भगवतीचरण वर्मा की कविता - ‘चूं-चरर-मरर, चूं-चरर-मरर, जा रही चली भैंसागाड़ी’ के अंदाज़ में संपन्न हुई.
इस यात्रा की करेले-नीम जैसी कड़वी यादें आज भी मेरा पीछा नहीं छोड़ती हैं.
मेरी तो भगवान से बस, यही प्रार्थना है कि वो किसी और के सुहाने सफ़र के सपने कभी भी ऐसे चूर-चूर न करें जैसे कि उन्होंने मेरे किए.
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सोमवार, 23 नवंबर 2020

तब और अब

 विवाह के अवसर पर पुराने ज़माने का निमंत्रण पत्र -

भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
तुम मानस के राजहंस हो, भूल न जाना आने को.

समाचार : दिल्ली में शादी में मेहमानों की अधिकतम संख्या पचास तक सीमित!
नया निमंत्रण पत्र -

भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
तुम इक्यावन नंबर पर हो, भूल ही जाना आने को.

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

बहन की विदाई

 आज से ठीक 56 साल पहले हमारी स्वर्गीया बहनजी की शादी हुई थी. बहनजी हम चारों भाइयों से बड़ी थीं और हमारे लगभग पूर्ण-निर्दोष बड़े भाई साहब को छोड़ कर हम तीन भाइयों पर रौब-दाब के गांठने के मामले में वो हमारे परिवार में सबसे आगे रहा करती थीं.

घर का सबसे छोटा और वो भी सबसे उपद्रवी सदस्य होने के कारण बहन जी का कान-खिंचाई का प्रसाद प्राप्त किये बिना मेरा कोई सवेरा जाता हो, ऐसा मुझे तो याद नहीं पड़ता.
हम भाइयों की तो छोड़िए, हमारे धीर-गंभीर, संयत, पिताजी तक बहनजी के तुरंत-न्याय, तुरंत दंड, की प्रक्रिया से परेशान रहा करते थे. मजिस्ट्रेट के रूप में अपने 31 साल के कैरियर में पिताजी कभी भी बहन जी की त्वरित-न्याय व्यवस्था का मुक़ाबला नहीं कर पाए.
हम भाई लोग जब आपस में गुत्थम-गुत्था होते थे तो बहनजी पता नहीं, कहाँ से, बीच-बचाव के लिए आ जाती थीं और योद्धाओं की पीठों पर शाबाशियों के इतने धौल जमाती थीं कि अक्सर हम भाई लोग आपसी लड़ाई भूल कर बहन जी को ही अपना दुश्मन नंबर वन मानने लगते थे.
हमारे घर में चपरासी, महरी सहित काम करने वाले काफ़ी हुआ करते थे लेकिन बहनजी के काम, सुबह से शाम तक हुआ करते थे. अपनी पढ़ाई के साथ-साथ वो इतना काम कैसे कर लिया करती थीं, यह समझ में नहीं आता था.
खाना बनाना, कपड़े सिलना, स्वेटर बुनना और न जाने क्या-क्या !
इन कामों के अलावा बहन जी को जिस काम में सबसे ज़्यादा आनंद आता था, वो था, मुझे ज़बर्दस्ती पकड़ कर मेरे सर पर सरसों का तेल चुपड़ना ताकि न चाहते हुए भी मुझे नहाने के लिए जाना पड़े.
मुझ जैसे कृतघ्न छोटे भाई को उनके ऐसे कामों से महा-एलर्जी हुआ करती थी.
बचपन से मैं बहन के हाथों की सिली बुश्शर्ट और उनके सिले हुए नेकर, पाजामे पहन कर दुखी हुआ करता था. बहन जी को पैंट और कमीज़ सिलना नहीं आता था, इसका मुझे बड़ा संतोष था और इस क्षेत्र में दरजी की सेवाएँ मिलना मैं अपनी ख़ुशकिस्मती मानता था.
लेकिन बहन जी की शादी होने तक मैंने अपनी ज़िंदगी में रेडीमेड स्वेटर्स की कभी शक्ल भी नहीं देखी थी. बांह नापती, गला नापती और पेट नापती बहन की छवि मुझे सोते वक़्त भी डरा दिया करती थी. सबसे ज़्यादा तकलीफ़ की बात यह हुआ करती थी कि बहनजी अक्सर मेरे लिए जो स्वेटर बुनती थीं वह घर के किसी बड़े सदस्य के किसी पुराने स्वेटर के भग्नावशेष से ही तैयार किया जाता था.
पुराने ज़माने में पढ़े-लिखे, जागरूक परिवारों में भी लड़की के बड़े होते ही उसकी शादी करने की फ़िक्र की जाने लगती थी.
बहन जी के बी. ए. पास करते ही माँ-पिताजी को उनकी शादी की चिंता सताने लगी थी लेकिन सच कहूं तो परिवार में उनकी शादी की सबसे ज़्यादा जल्दी तो मुझे थी – कब बहन जी की शादी हो, कब वो घर से विदा हों और कब मुझे उनकी ज़बर्दस्त दरोगाई से मुझे छुटकारा मिले.
आख़िरकार भगवान ने मेरी सुन ली. 20 नवम्बर, 1964 को हमारी बहनजी की शादी हुई और 21 नवम्बर को जीजाजी उन्हें हमारे घर से विदा कर के अपने घर के लिए ले जाने लगे.
घर का हर सदस्य घर से बहन जी की विदाई के समय रो रहा था लेकिन मेरी आँखों का पानी न जाने कहाँ खो गया था. पृष्ठभूमि में फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ का गाना –
‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली’
बज रहा था लेकिन मेरे पापी दिमाग में उसी फ़िल्म का यह गीत न जाने कहाँ से बजे चला जा रहा था –
‘दुःख भरे दिन बीते रे भैया,
अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे –‘
भारतीय इतिहास में मैं शायद पहला छोटा भाई रहा हूँगा जिसे अपनी बहन की विदाई की इतनी ख़ुशी हो रही होगी.
बहन जी विदा के लिए बस में बैठीं तो माँ गश खा कर गिर पड़ीं. बस में बैठे-बैठे ही बहन जी ने बताया कि कोरामिन कहाँ रखी है. फिर बहनजी की सासू माँ का शाल निकालने के लिए ऊनी कपड़ों के बॉक्स की चाबी की खोज हुई तो उसका अता-पता भी बहन जी ने ही बताया.
विदा होते-होते अपनी दरोगा बहन की उपयोगिता अब धीरे-धीरे मेरे समझ में भी आने लगी थी.
मेरे जीवन में बहन का जाना एक बड़े परिवर्तन का सूचक था लेकिन सच कहूं तो बहन की डांट खाए बगैर, उसकी कान-पकड़ाई और धौल-धप्पड़ खाए बगैर ज़िंदगी में मज़ा नहीं आ रहा था.
कब से बहन की सिली हुई बुश्शर्ट और उसका बुना हुआ स्वेटर पहनना मुझे अच्छा लगने लगा, मुझे पता ही नहीं चला.

बहन जी हमारे घर से विदा ज़रूर हुई थीं लेकिन हमारी ज़िंदगी का वो एक अहम् हिस्सा पहले की ही तरह बनी रहीं. अपने तीन साल के फ़्रांस प्रवास में भी हम लोगों के स्वेटर्स बुनने का ज़िम्मा वही उठाती रहीं.
बहन जी के जीवन में ही मैं रिटायर हो गया, मेरी दोनों बेटियों की शादी हो गयी और मैं नाना भी बन गया लेकिन उनकी नज़रों में मैं वही शरारती, ऊधमी और नालायक छोटा भाई ही रहा. और इधर मैं था कि जब तक बहन जी को छेड़ कर उनकी डांट न खा लूं, मुझे चैन नहीं आता था.
मेरे जीजाजी और मेरे भांजे-भांजी, भाई-बहन की इस नोंक-झोंक का भरपूर आनंद लेते थे और आज भी उन बातों का विस्तार से ज़िक्र करते रहते हैं.
बहन को हमारे घर से विदा हुए 56 साल हो गए और दुनिया से विदा हुए 5 साल से ऊपर हो गए लेकिन आज भी हमारे दिल से वो विदा नहीं हुई है.
आकाश के किसी भी तारे में मैं अपनी बहन की छवि देख लेता हूँ, उसके रौबीले प्यार को महसूस कर लेता हूँ फिर अचानक ही मैं अपने सर को दोनों हाथों से ढक लेता हूँ ताकि वो कहीं ज़बर्दस्ती उस पर सरसों का तेल न चुपड़ दे.

सोमवार, 9 नवंबर 2020

बालकनी

 बचपन में हमको माँ-पिताजी के साथ साल में या तो एक फ़िल्म या फिर दो फ़िल्में देखने का मौक़ा मिल जाता था.

अपने बचपन में फ़िल्में देखने के लिए हम बालकनी से कभी नीचे उतरे ही नहीं.

किसी सिनेमा हॉल की बालकनी में बैठकर हम ख़ुद को शहज़ादा सलीम से कम नहीं समझते थे.
कितने लोगों को यह पता होगा कि फ़िल्म ‘मुगले आज़म’ में जब अनारकली शीश महल में मुजरा करने वाली थी तो उसे मुजरा करने का हुक्म तख़्त पर बैठे बादशाह अकबर के साथ-साथ बालकनी में बैठे शहज़ादा गोपेश मोहन जैसवाल ने भी दिया था.
जवानी में क़दम रखते ही टीवी विहीन ज़माने में फ़िल्में देखने का हमारा जुनून परवान चढ़ने लगा लेकिन अपने जेब-खर्च से बालकनी की टिकट लेकर महीने में एक-दो फ़िल्में ही देखी जा सकती थीं और हमको तो अपने बचपन में देखे जाने से छोड़ी हुई तमाम फ़िल्मों की भरपाई भी तो करनी थी.
बी. ए. , एम. ए. करते समय हमारा यही सपना हुआ करता था कि सिनेमा हॉल में बालकनी में बैठ कर फ़िल्म देखने का मज़ा लिया जाए और साथ में सस्ती टिकटें लेकर नीचे बैठने वालों की तुलना में ख़ुद को अगर मुगले आज़म, नहीं तो कम से कम नवाब वाजिद अली शाह तो ज़रूर समझा जाए.
लेकिन इस ख़ूबसूरत सपने को साकार कर पाना हमारी जेब के बूते की बात नहीं थी.
झांसी में बी. ए. करने के दौरान चोरी से महीने में औसतन चार फ़िल्में और लखनऊ में एम. ए. करने के दौरान महीने में औसतन आठ फ़िल्में देखने वाला हमारे जैसा कोई त्यागी, संयमी, अनुशासित, वीतरागी और आदर्श विद्यार्थी के पंच-लक्षणों से सुशोभित बन्दा अपने इस रईसी ठाठ वाले सपने को कैसे साकार कर सकता था?
1970 के दशक में हॉस्टल के मेस में एक रुपया प्रति डाइट के ज़माने में पांच रूपये की बालकनी की टिकट खरीद पाना तो धन्ना सेठों की संतानों के ही बस में था.
भला हो मात्र एक रूपये पिचहत्तर पैसे की स्टूडेंट क्लास की टिकट का !
उस पर अगर अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखा दो तो पच्चीस पैसे की छूट अलग से !
इसी लोक-कल्याणकारी, जनता-जनार्दन वाले क्लास में अंधाधुंध फ़िल्में देखने के साथ-साथ हम पार्टटाइम जॉब के रूप में अपनी पढ़ाई भी करते रहे.
वैसे अपनी तंगहाली में भी जेब पर एक्स्ट्रा बोझ डाले बिना बालकनी में फ़िल्में देखने का शौक़ जब-तब पूरा हो जाता था.
झांसी का छोटे स्क्रीन वाला चित्रा सिनेमा हाफ़ रेट्स पर पुरानी या दूसरे सिनेमा हॉल्स से उतारी गयी नयी फ़िल्में दिखाता था और लखनऊ में घटी दरों पर फ़िल्में दिखाने वाले सिनेमा हॉल्स तो क़रीब आधा दर्जन थे.
हमको लखनऊ के ऐसे कड़का स्टूडेंट-फ्रेंडली सिनेमा हॉल्स में सेवेंटी एम. एम. के स्क्रीन वाला, एक रूपये पिचहत्तर पैसे में बालकनी की टिकट वाला, अलंकार सिनेमा सबसे ज़्यादा पसंद था.
लेकिन नई फ़िल्मों को उनके रिलीज़ होने के पहले दो-चार दिनों के अन्दर ही देखने के हम जैसे शौकीनों को मन मसोस कर बार-बार स्टूडेंट क्लास की शरण में जाना ही पड़ता था.
स्टूडेंट क्लास में फ़िल्म देखने में यह बड़ा ख़तरा था कि बालकनी में बैठा कोई दुष्ट हम पर मूंगफली के छिलकों की पुड़िया न फ़ेंक दे.
इस स्टूडेंट क्लास की एक दुखदायी बात यह थी कि इसमें बैठ कर फ़िल्म देखने पर आँखों पर जोर बहुत पड़ता था और ऐसा भी लगता था कि हम ज़मीन में धंसे जा रहे हैं.
लेकिन इस स्टूडेंट क्लास के पाताल लोक में फ़िल्म देखने के अलावा हमारे पास कोई और ऑप्शन होता ही कहाँ था?
इस फटीचर स्टूडेंट क्लास में फ़िल्में देखने की ज़िल्लत और तकलीफ़ से बचने के हमारे पास बस, दो ही विकल्प थे –
पहला विकल्प यह था कि हम फ़िल्मों को देखने की संख्या में क्रांतिकारी सीमा तक कमी कर दें और फिर ठाठ से बालकनी की टिकट लेकर इक्का-दुक्का ही फ़िल्म देखें.
ज़ाहिर था कि इस महा-त्यागी विकल्प पर अमल कर पाना हमारे बस में नहीं था.
दूसरा विकल्प यह था कि हम ख़ुद अपने पैरों पर शीघ्रातिशीघ्र खड़े हो जाएं ताकि हमको मजबूरन कष्टकारी टिकट-बचत योजना की ज़रुरत ही न पड़े.
इस आत्मनिर्भर अभियान को सफल बनाने के लिए हमारा एम. ए. में टॉप कर के यू जी. सी. फ़ेलोशिप हासिल करना ज़रूरी था.
बी. ए. में हम बुंदेलखंड कॉलेज के टॉपर तो थे ही.
एम. ए. करने के दौरान भी हमने टॉप करने का ही विकल्प चुना.
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लखनऊ यूनिवर्सिटी की टैगोर लाइब्रेरी की और विभागीय पुस्तकालय की, एक-एक ज़रूरी किताब हमने चाट डाली.
इस मेहनत का परिणाम सुखद रहा. फ़िल्म देखने में डबल सेंचुरी लगाते हुए भी हमने एम. ए. में टॉप किया और फिर यू. जी. सी. फ़ेलोशिप भी हासिल कर ली.
चार महीने की फ़ेलोशिप जब हमको एक साथ मिली तो एक दर्जन सौ के नोटों की भारी गड्डी (हमारी फ़ेलोशिप पहले 300/ प्रति माह थी फिर वह बढ़ कर 400/- प्रति माह हो गयी थी) हम से उठ ही नहीं रही थी.
अब टाटा, बिरला जैसी रईसी करने से हमको भला कौन रोक सकता था?
गुड बाय स्टूडेंट क्लास ! अब हम अपने बचपन के दिनों की तरह फिर से बालकनी में बैठकर –
‘यलगार हो !’ का नारा बुलंद कर पर्दे पर खड़ी अपनी पसंदीदा फ़ौज को दुश्मन की फ़ौज पर टूट पड़ने का हुक्म दे सकते थे.
हमारे संगी-साथियों को हमारे साथ फ़िल्म देखने के वक़्त मिल-बाँट कर खर्च करने का हमारा डच सिस्टम कभी अच्छा नहीं लगता था.
अब अपने कमाऊ दोस्त की जेब पर डाका डालने से उन्हें भला कौन रोक सकता था?
इधर हम भी कम से कम एक बार दानवीर कर्ण के जैसी दानशीलता या फिर हातिमताई के जैसी दरियादिली दिखाने को बेक़रार थे.
आखिरकार चार चिपकू दोस्तों को पहली बार अपनी जेब से हमने फ़िल्म दिखाने की हामी भर दी.
जश्न मनाने के लिए हम यूनिवर्सिटी के पास वाले तुलसी सिनेमा जा पहुंचे.
टिकट विंडो पर बुकिंग क्लर्क ने मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया.
हमने अपना पर्स निकाला फिर यकायक हमारी नज़र टिकट रेट्स पर गयी – स्टूडेंट क्लास, एक रुपया पिचहत्तर पैसे, ड्रेस सर्किल, तीन रूपये और बालकनी, पांच रूपये.
हाय ! पांच गुणा पांच रूपये यानी कि तीन घंटों के फ़ालतू से मनोरंजन के लिए बैठे-ठाले पच्चीस रूपये की बर्बादी?
यह रकम तो हमारे हॉस्टल के मेस के बारह दिनों के दोनों वक़्त की डाइट के कुल चार्जेज़ से भी एक रुपया ज़्यादा थी!
प्रैक्टिकल दिमाग कह रहा था - भाड़ में जाए दानवीर कर्ण की दानशीलता और हातिमताई की दरियादिली !
लेकिन यह तो हमने तय कर लिया था कि अब से फ़िल्म तो बालकनी में ही देखनी है.
दृढ़ निश्चय के साथ हमने टिकट विंडो में हाथ डाला और फिर बुकिंग क्लर्क को सौ का एक नोट देकर उससे कहा –
‘पांच टिकट बा-बा-बा-बाल, ड्रेस सर्किल !’
बुकिंग क्लर्क ने हमारी – ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं’ जैसी डांवाडोल हालत पर हँसते हुए पिच्यासी रुपयों के साथ हमको पांच टिकट ड्रेस सर्किल के पकड़ा दिए.
हमारे दोस्त भी हमारे इस हकलाने पर अपने-अपने पेट पकड़ कर हँसे चले जा रहे थे.
अपनी ख़ुद की बुलाई हुई इस छीछालेदर पर हम मन ही मन सीता जी की तरह धरती माता की गोद में समा जाने की इच्छा कर रहे थे लेकिन साथ में अपने दस रूपये की बचत की खुशी भी थी.
कमाऊ होने के बाद से हमने सिनेमा हॉल्स में स्टूडेंट क्लास को छोड़ ड्रेस सर्किल में बैठना शुरू कर दिया.
रही बालकनी में ही बैठकर फ़िल्में देखने की बात तो अलंकार सिनेमा में जाने से या किसी और सिनेमा हॉल में बालकनी में बैठ कर घटी दर पर फ़िल्म देखने से हमको भला कौन रोक सकता था?
और अब अगर 2020 की बात की जाए तो जैसवाल साहब चाहें तो ख़ुद अपने लिए और अपने सारे दोस्तों के लिए बालकनी की टिकटें खरीद कर उनके साथ फ़िल्म देख सकते हैं
वैसे भी आज ज़माना बदल गया है और अब बालकनी-रहित मल्टीप्लेक्स का ज़माना आ गया है.
लेकिन अब सिनेमा हॉल्स में जाकर हम फ़िल्में देखते ही कितनी हैं?
इंटरनेट से जुड़े हुए इस जाइंट स्क्रीन वाले स्मार्ट टीवी के दौर में घर-घर थिएटर खुल गए हैं.
उस्ताद मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ के अंदाज़ में अब हम कहेंगे -
कौन जाएगा सिनेमा, घर का टीवी छोड़ कर !
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शनिवार, 7 नवंबर 2020

फिर एक बार - उत्तराखंड की लोरी

 उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान लिखी गयी मेरी 21 साल पुरानी कविता - 'उत्तराखंड की लोरी'

आज उत्तराखंड की स्थापना के 20 साल बाद मेरी कविता की इस पर्वत-वासिनी
माँ की कोई भी आशंका यदि निर्मूल सिद्ध हुई हो तो मैं भारी से भारी जुर्माना देने
को और माफ़ी मांगने को तैयार हूँ.
उत्तराखण्ड की लोरी
बेटे का प्रश्न -
मां ! जब पर्वत प्रान्त बनेगा, सुख सुविधा मिल जाएंगी?
दुःख-दारिद्र मिटेंगे सारे, व्यथा दूर हो जाएंगी?
रोटी, कपड़ा, कुटिया क्या, सब लोगों को मिल पाएंगी?
फिर से वन में कुसुम खिलेंगे, क्या नदियां मुस्काएंगी ?
माँ का उत्तर -
अरे भेड़ के पुत्र, भेडि़ए से क्यों आशा करता है?
दिवा स्वप्न में मग्न भले रह, पर सच से क्यों डरता है?
सीधा रस्ता चलने वाला, तिल-तिल कर ही मरता है,
कोई नृप हो, तुझ सा तो, आजीवन पानी भरता है.
अभी भेड़िया बहुत दूर है, फिर समीप आ जाएगा,
नहीं एक-दो, फिर तो वह, सारा कुनबा खा जाएगा.
चाहे जिसको रक्षक चुनले, वह भक्षक बन जाएगा,
तेरे श्रमकण और लहू से, अपनी प्यास बुझाएगा.
बेगानी शादी में ख़ुश है, किन्तु नहीं गुड़़ पाएगा,
तेरा तो सौभाग्य पुत्र भी, तुझे देख मुड़ जाएगा.
प्रान्त बनेगा, नेता, अफ़सर, का मेला, जुड़ जाएगा,
सरकारी अनुदान समूचा, भत्तों में उड़ जाएगा.
राजनीति की उठा-पटक से, हर पर्वत हिल जाएगा,
देवभूमि का सत्य-धर्म सब, मिट्टी में मिल जाएगा.
वन तो यूं ही जला करेंगे, कुसुम कहां खिल पाएगा?
हम सी लावारिस लाशों का, कफ़न नहीं सिल पाएगा.
रात हो गई, मेहनतकश सब, अपने घर जाते होंगे.
जल से चुपड़ी, सूखी रोटी, नमक डाल, खाते होंगे.
चिन्ता मत कर, मुक्ति कभी तो, हम जैसे पाते होंगे,
सो जा बेटा, मधुशाला से, बापू भी आते होंगे.

रविवार, 1 नवंबर 2020

शेर किसी और का, अंदाज़ अपना

चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें

चूल्हे पे क्या उसूल पकाएँगे शाम को

अदम गौंडवी

प्रगति-मार्ग –

चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें

कुर्सी-तलक यही हमें पहुँचाएं सीढ़ियाँ

इक बार मौक़ा जो मिले इतना बटोर लो

अम्बानी-अडानी सी जियें सात पीढ़ियाँ

 

यहाँ हर शख्स बस ये चाहता है

मिलाएं सब घड़ी मेरी घड़ी से

दानिश ज़ैदी

जनतंत्र के संरक्षकों का सपना –

 ये है जनतन्त्र पर दिल चाहता है

मिलाएं सब घड़ी मेरी घड़ी से

इबादत ही मेरी काफ़ी नहीं है

मुहब्बत भी करें मेरी छड़ी से