शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

राजनैतिक दोहे

राजनीति के चक्र की, गति समझे नहिं कोय ,
जो भी बोले सच यहां, अपनी गर्दन खोय ।
बुरा जो देखन मैं चल्या, बुरा न मिलिया कोय ,
जांच कमीशन में यहां, कालिख, चूना होय ।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बुरी बात है । कितने दिनों के बाद कुछ दिखा है । रोज आया कीजिये कुछ लेकर तब तो कुछ हम लोगों का कुछ मजा है बाकी दुनियाँ किससे हैंडिल होनी है ?

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    1. धन्यवाद। आपके जैसे कद्रदानों की वजह से ही सृजनात्मक प्रतिभा यदा-कड़ा जागृत हो जाती है. तिरछी नज़र ब्लॉग पर मेरी रचनाएँ डालने का श्रेय, मेरी बेटी गीतिका को है. निकट भविष्य में कुछ राजनीतिक दोहे आप की सेवा में और प्रस्तुत किये जायेंगे।    

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