गुरुवार, 23 जुलाई 2015

सन्दर्भ सहित व्याख्या

कुछ साहित्य मर्मज्ञों की व्याख्या ऐसी होती है कि आम श्रोता और पाठक ही नहीं बल्कि उनके द्वारा  जिस साहित्यिक रचना की व्याख्या की जा रही है, उसका रचयिता भी अपना सर धुनने को विवश हो जाता है. कुछ प्रचलित (पहली दो व्याख्या) और कुछ नितांत मौलिक व्याख्या (बाद की दो व्याख्या मेरी अपनी हैं) प्रस्तुत हैं –

1. ‘सूरदास तब बिहंसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो’
सूरदास जी ने हंसकर माता यशोदा को गले लगा लिया.

2. ‘जहां सुमति, तहं संपत नाना’
तुलसीदासजी के नाना का नाम संपत और उनकी नानी का नाम सुमति था. श्री संपत अपनी पत्नी को उतना ही प्रेम करते थे जितना कि तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली को करते थे. श्रीमती सुमति जहाँ कहीं भी जाती थीं, श्री संपत उनके पीछे-पीछे पहुँच जाते थे.

3. ‘केशव के सन अस करी, जस अरि हूँ न कराहिं,
चन्द्र बदनि मृग लोचिनी, बाबा कहि कहि जाहिं.’

कवि केशवदास का बेटा मुसलमान हो गया था और मुसलमान बनने के बाद उसका नाम अस्करी हो गया था. वह अपने पिता का दुश्मन बन गया था पर उसकी पुत्रियाँ चन्द्र बदनि और मृगलोचिनी, केशवदास को बहुत प्यार करती थी और उन्हें बाबा-बाबा कहकर बुलाती थीं.

4. ‘हजारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा.’

इस शेर में राज कपूर और नर्गिस के अमर किन्तु असफल प्रेम का उल्लेख किया गया है. नर्गिस की राज कपूर से शादी नहीं हो सकी इसलिए वो हमेशा रोती रही. सुनील दत्त से शादी करने के बाद बहुत मुश्किल से अर्थात बहुत वर्षों बाद उनके एक पुत्र हुआ जिसको उन्होंने ‘दीदावर’ नाम दिया. इसी ‘दीदावर’ को आज हम संजय दत्त के नाम से जानते हैं.

8 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे सही व्याख्याऐं यही होनी चाहिये । जिस तरह दुनियाँ चल रही है दोहे भी तो वैसे ही चलें ।

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    1. अर्थ का अनर्थ न किया जाय तो फिर व्याख्या सुनने और पढ़ने में आनंद ही नहीं आता. दोहे में अर्थ को उसी तरह दुहकर निकालना चाहिए जिस प्रकार हम बकरी, गाय या भैंस को दुहकर उनका दूध निकालते हैं.

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, भारत की ३ महान विभूतियों के नाम है २३ जुलाई , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. मेरी रचना को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाने के लिए धन्यवाद..

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  3. क्या बात है व्याख्या की ।अब व्याख्या किसी रूपसी का नाम हा यह मत कह दीजीयेगा।

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    1. व्याख्या कोई रूपसी हों तो हुआ करें. पराई नार पर नज़र डालना बुरी बात है. व्याख्याजी श्रीमान सन्दर्भ के साथ रहती हैं और अक्सर श्रीमान सन्दर्भ के साथ ही उनका उल्लेख किया जाता है.

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    1. प्रशंसा के लिए धन्यवाद राकेशजी.

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