शनिवार, 31 दिसंबर 2016

हम अभिशप्त उल्टे प्रदेश के

हम अभिशप्त उल्टे प्रदेश के –
हमारे उत्तर प्रदेश में जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति ने एक नया कीर्तिमान स्थापित कर अब बिहार को भी पीछे छोड़ दिया है. बिहार में लालू प्रसाद यादव की कुनबा-गिरी ने बिहार की राजनीति को नैतिकता की दृष्टि से रसातल तक पहुँचाया है किन्तु आज मुलायम कुनबा-गिरी के सामने उनका हर कारनामा दूध में धुला लगने लगा है.
अखिलेश के मुख्य मंत्री बनते ही कुनबे की फूट परिलक्षित होने लगी थी. एक तरफ़ बेटा था और उसके चचेरे चाचा थे तो दूसरी तरफ़ पिताजी थे, सगे चाचाजी थे, सौतेली माताजी थीं, सौतेला भाई था और षड्यंत्र-नरेश रास्पुटिन (बोल्शेविक क्रान्ति से पूर्व ज़ार और ज़ारिना को अपने इशारों पर नचाने वाला एक धूर्त साधु) थे.
इस कुनबे की लड़ाई ने पहले से पिछड़े उत्तर प्रदेश के विकास को और पीछे ढकेल दिया है. दिलीप कुमार और कादर खान जैसे डायलौग बोलने वाले एक भैंस-पति नेता सांप्रदायिक दंगो का संचालन करने में सिद्धहस्त हैं पर कुछ नादान उन्हें भी अपने भाग्य-विधाता के रूप में अस्वीकार कर रहे हैं.
इस महा-उत्तर प्रदेश (महाभारत का नवीन संस्करण) में अधिकांश लोगों की सहानुभूति बेटे के साथ है पर इस बेटे ने इन पौने पांच साल के अपने कुशासन में ऐसा क्या किया है जिसकी कि हम प्रशंसा करें? क्या सिर्फ़ इसलिए हम उसका समर्थन करें कि उसकी कमीज़ अपने बाप की कमीज़ से कम काली है?

चलिए हम सर-फुटउअल कर रहे इन बाप-बेटों को नकार देते हैं तो फिर हम किसका दामन थामें, क्या बहनजी का? बहनजी का दंभ, उनका अपना जातिवादी और सांप्रदायिक समीकरण, उनका अपना परिवारवाद, विकास के नाम पर हाथी, अम्बेडकर की मूर्तियाँ और पार्क बनाने पर उनके द्वारा अरबों-खरबों का अपव्यय हैरत-अंगेज़ है. सत्ता में उनकी वापसी से केवल मूर्तिकारों और बिल्डर्स को रोज़गार मिलेगा बाक़ी हम लोग तो फाके और लातें खाकर ही अपना गुज़ारा करेंगे.
देशभक्त कहते हैं कि कल्याण-युग के बाद फिर से कमल खिलने पर ही उत्तर-प्रदेश के भाग जागेंगे. सही बात है अभी काशी विश्वनाथ और मथुरा में श्री कृष्ण-जन्मभूमि के मंदिर-मस्जिद विवादों को भी तो अयोध्या में राम-जन्मभूमि विवाद की भांति सुलझाना है. बस, हमको चुनाव से पहले एक नेता मिल जाए. वैसे लोकतंत्र में चुनावों में जीत के बाद हाई-कमांड से नेता नियुक्त करने की जो स्वस्थ परंपरा है उसको नतमस्तक होकर स्वीकार करना तो अब राष्ट्र-धर्म घोषित हो चुका है.
नोटबंदी के आलोचक कमल-युग की वापसी नहीं चाहते. तो क्या संजीवनी बूटी सुंघाकर कोमा में पड़ी कांग्रेस को फिर से खड़ा कर दें? पर मजबूरी है हमारे पास अब संजीवनी बूटी लाने वाला न तो कोई हनुमान हैं और न अब कहीं संजीवनी बूटी बची है. पप्पू-फैक्टर और पित्ज़ा-फैक्टर भी इस प्राचीनतम खंडहर पार्टी के पुनरुत्थान में बाधक हैं. तो अलविदा पंजा जी.
हे भगवान ! तो फिर हमारे लिए चुनने के लिए बचा क्या? हम क्या करें? अब हमारे पास केवल दो रास्ते हैं - एक है, आने वाले हर खतरे से पहले, इस चुनाव से पहले, हम किसी शुतुरमुर्ग की तरह रेत में अपना सर छुपाकर अपने घर पर ही बैठे रहें और दूसरा रास्ता है - आँख मूंदकर परिणाम की परवाह किए बगैर, अपनी ऊँगली को फिर से दागदार करवा लें.

4 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर प्रदेश में विकल्पहीन राजनीति का होना त्रासदी ही तो है।
    अब इस अवस्था में तो यही कहें कि 'दाग़ अच्छे हैं'।

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    1. नीति जी अब भगवान शंकर, भगवान राम और भगवान श्री कृष्ण की यह पुण्यभूमि कम है और हिरण्यकश्यप तथा कंस की पापभूमि अधिक है. शासक कोई भी हो, हमारी बलि तो नित्य चढ़नी ही है. हम सौ दो सौ दागी चेहरे, दागी कारनामे, वाले तो सहन कर भी लेंगे पर सिर्फ़ और सिर्फ़ कालिख लगे चेहरे, सिर्फ़ कलुषित कारनामों वालों को, कैसे और कब तक सहन करेंगे?

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  2. बहुत सुंदर ...
    नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं !

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    1. प्रशंसा के लिए धन्यवाद कविताजी. नए साल की आपको भी बधाई और हमारी ढेरों शुभकामनाएं भी.

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