मंगलवार, 12 फ़रवरी 2019

हमारी राजस्थान यात्रा


मैंने राजस्थान के अनेक नगर देखे हैं. जयपुर, उदयपुर और जैन तीर्थ महावीरजी तथा तिजारा जी तो मैं बहुत बार गया हूँ. चित्तौड़, जोधपुर, आबू, रणकपुर और अजमेर घूमने का लुत्फ़ भी मैं उठा चुका हूँ. लेकिन अपने पूर्वजों की धरती जैसलमेर को मैंने सिर्फ़ तस्वीरों में ही देखा था. सत्यजित रे की पुनर्जन्म पर आधारित फ़िल्म सोनार केला में जैसलमेर की किले की ख़ूबसूरती देखकर बार-बार वहां जाने का मन करता था पर मौक़ा नहीं मिल पा रहा था. इस बार दीपावली पर छोटी बिटिया रागिनी और हमारे दामाद शार्दुल हमारे यहाँ आए तो मैंने उन से अपने दिल की बात कही. 10 मिनट के अन्दर बच्चों ने 13 फ़रवरी से 22 फ़रवरी के लिए हमारे दो अनदेखे शहर – बीकानेर और फिर वहां से जैसलमेर जाने के लिए हमारा ऑन लाइन रेलवे रिजर्वेशन करा दिया और फिर मेरे अनुरोध पर जैसलमेर से दिल्ली लौटने के बजाय वहां से हमारी बुकिंग जोधपुर के लिए करा दी. हमको जोधपुर से रणकपुर और कुम्भलगढ़ होते हुए उदयपुर पहुंचना था. उदयपुर से दिल्ली के लिए भी हमारा ट्रेन में आरक्षण हो गया. भला हो रागिनी और शार्दुल का कि उन्होंने हमारी यात्रा से बहुत पहले ही बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर और उदयपुर के लिए हमारी बढ़िया होटलों में बुकिंग भी करा दी. हम भी कम स्मार्ट नहीं थे. गूगल पर सर्च कर रणकपुर जैन मंदिर का फ़ोन मालूम कर हमने वहां एक दिन अपने ठहरने की व्यवस्था ख़ुद कर ली.
बीकानेर के ख़ूबसूरत महल, शानदार हवेलियाँ, जैसलमेर का रेतीले पत्थर का सोने जैसा क़िला, वहां के सैंड-ड्यून्स और चीन की दीवाल से भी चौड़ी कुम्भलगढ़ के किले की दीवाल देखने का आनंद हमको पहली बार मिलना था. रणकपुर और उदयपुर तो बार-बार देखने से भी मन नहीं भरता है. शायद इसी को जीवन धन्य होना कहा जाता होगा.

हमारे मित्र विवेक जोशी, सपत्नीक, हमको जैसलमेर में मिलने वाले थे. वाह ! यात्रा में मित्रों का साथ मिले तो उसका आनंद दुगुना होना तो निश्चित होता है.  
    
अब इतने महत्वकांक्षी कार्यक्रम में बाधाएं तो आड़े आती ही हैं. हमारी बेटी गीतिका जी ने दुबई में बैठे-बैठे ही हल्ला मचाना शुरू कर दिया कि राजस्थान में स्वाइन फ्लू फैला हुआ है और वो हम दोनों को उसके निदान के लिए इंजेक्शन लगवाए बिना राजस्थान नहीं जाने देंगी.

मरता क्या न करता? झक मार कर महंगे इंजेक्शन लगवाने में अपनी जेब कटवानी पड़ी. अब बच्चों के निर्देशों और हिदायतों की बारी थी. उनके प्रतिष्ठित पेटू पापा को राजस्थानी पकवानों से सख्त परहेज़ रखना था. हाँ, उनकी मम्मी बीकानेरी रसगुल्ले और जोधपुर की मावा की कचौड़ियाँ बेखटके खा सकती थीं. हमारे लिए एक आदेश यह भी था कि हमको बेटियों की नाज़ुक मम्मी को कहीं भी 11 नंबर की बस से यात्रा नहीं करानी थी और उन्हें हर जगह टैक्सी लेकर घुमाना था.

हम कैलकुलेटर लेकर यात्रा का कुल हिसाब लगा ही रहे थे कि श्रीमती जी ने यात्रा के दौरान की जाने वाली विस्तृत ख़रीदारी की लिस्ट हमें थमा दी. अब राजस्थान जाओ और बेटियों, दामादों, नाती-नातिन के लिए वहां की सौगात न लाओ, क्या ऐसा कभी हो सकता है? इस बात से तो हम भी सहमत थे पर श्रीमती जी वहां से अपने लिए क्या-क्या खरीदती हैं, इस मामले में दखल देने की हमको इजाज़त ही नहीं थी. बस, हमको तो इन अतिरिक्त सामानों को ढोने की समुचित व्यवस्था करनी थी.

अब हम पति-पत्नी के बीच होने वाले संवादों की एक बानगी पेश है –
श्रीमती जी – सुनिए जी, आठ-नौ दिन के प्रोगाम में रोज़ घूमना और बार-बार ट्रेन का सफ़र कुछ ज़्यादा थकाने वाला तो नहीं हो जाएगा?
मैं – ये सवाल तुमको कार्यक्रम बनाए जाने से पहले पूछना था.
श्रीमती जी – इस बार ठण्ड तो जाने का नाम ही नहीं ले रही है. हमको कपड़े बहुत ले जाने पड़ेंगे.
मैं – तो ठीक है, हम नहीं जाते हैं, सिर्फ़ हमारा सामान राजस्थान यात्रा कर आएगा.
श्रीमती जी – मुझे पता है, पूरी यात्रा भर आप चिक-चिक करेंगे.
इस प्रेमालाप के बीच रागिनी का बंगलौर से फ़ोन पर कहने लगी –
पापा इस टूर को लेकर मम्मी से कोई बहस मत कीजिएगा. उनके मन में जो आए, वो उन्हें करने दीजिएगा.

इस आदेश के बाद मेरा चुप हो जाना तो तय था पर मैं खामोश होकर सोच रहा था –
हमारी श्रीमती जी कितनी रिसोर्सफ़ुल हैं? इन्होंने अपने सेनापति, बैंगलोर और दुबई तक में तैनात कर रक्खे हैं.

अब यात्रा में मात्र दो दिन बचे हैं. दो बड़े सूटकेस और दो बड़े बैग सामान से लैस हो चुके हैं. अपने घरेलू जैसे हो चुके गुड्डू टैक्सी ड्राईवर को भी परसों रात के लिए बुक करना है.    
सारी तैयारी तो श्रीमती जी ने ही की है. आज साथ ले जाने वाले पकवान बनाने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है. हमारी उपयोगिता ही क्या है?
चलो हम इन्टरनेट पर समाचार ही जान लेते हैं.

हाय ! यह क्या ?हाय, यह क्या? राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर गूजर आन्दोलन हिंसक हो गया?
अरे बाप रे !  दिल्ली-मुंबई रूट की 15 ट्रेन रद्द हो गईं इसमें निज़ामुद्दीन-उदयपुर भी शामिल है?
धौलपुर में कर्फ्यू?
अगर ये आन्दोलन और बढ़ गया तो हम तो राजस्थान में फंसकर मारे जाएंगे.
अभी रागिनी को फ़ोन करता हूँ. पर वो तो अपने ऑफिस के लिए निकल गयी होगी. फिर भी ट्राइ करने में क्या हर्ज़ है?

रागिनी – हाँ, पापा ! मैं ऑफिस जाने के लिए कैब में बैठ चुकी हूँ. कोई ख़ास बात?
मैं – बेटा !  तूने न्यूज़ देखी? राजस्थान में गूजर-आन्दोलन तो वायलेंट हो गया है.
रागिनी – आपलोग सावधान रहिएगा.
एक मिनट पापा ! कहीं आप अपनी ट्रिप कैंसिल तो नहीं करना चाहते हैं?

मैं – अब तू ही बता कि हमको क्या करना चाहिए? तेरी मम्मी भी डरी हुई हैं.

रागिनी – मन में डर है तो आप लोगों को नहीं जाना चाहिए. तो क्या रेलवे रिजर्वेशन और होटल में रिजर्वेशन कैंसिल करवा दूं?

मैं – सब कैंसिल करवा दे बेटा ! जो नुक्सान होना है हो जाए.

शाम को रागिनी का फ़ोन –

पापा ट्रेन टिकट्स कैंसिल हो गए और होटल वालों से भी बात हो गयी. ज़्यादा नुक्सान नहीं होगा.

मैं – खुश रह बिटिया ! नुक्सान हुआ तो हुआ, जान तो बची.

रागिनी – कोई नई बात नहीं है पापा ! ऐसी यात्राएं तो आप हमारे बचपन से ही रद्द कराते आए हैं. अब ये बताइए कि आप अगली यात्रा कब रद्द कराने वाले हैं?

बेटी के ताने तो मैं दिल पर हाथ रख कर किसी तरह सहन कर लूँगा लेकिन अपनी श्रीमती जी की कुटिल मुस्कान को सहन करने की शक्ति मुझमें नहीं है.
सोचता हूँ कि इन सबसे बचने के लिए बिना किसी आरक्षण के मैं राजस्थान भाग जाऊं.                         

16 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. सुशील बाबू, फिर कभी तक घर वालों के ताने कौन सहेगा?

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  2. राजस्थान भ्रमण की योजना और इतनी जगह ..., वो भी एक साथ । आराम आराम से जाइएगा । आन्दोलन बन्द होने के बाद जोधपुर की मावा कचौड़ी की जगह मिर्ची बड़े से काम चला लीजिएगा कुछ खाने का हक तो आपका भी होना ही चाहिए :)

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    1. मीना जी, इतनी अक्ल होती तो प्रोग्राम एक-दो जगह का ही बनाते. कार्यक्रम में सब कुछ निश्चित होने के बाद हम लोग उसके तूफ़ानी स्वरुप को लेकर पछता ही रहे थे कि गुर्जर आन्दोलन का बहाना मिल गया और सब कुछ रद्द हो गया और जान बच गयी. आगे से जवान होने की कोशिश नहीं करेंगे.
      जोधपुर जाकर मिर्ची बड़े ज़रूर खाएंगे. वैसे भी जोधपुर खानपान के लिए बहुत प्रसिद्द है.

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  3. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 14 फरवरी 2019 को प्रकाशनार्थ 1308 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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    1. 'पांच लिंकों का आनंद' में मेरी व्यथा-कथा को सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद रवीन्द्र सिंह यादव जी. मैं आज इस अंक को पढ़ने का भरपूर आनंद उठा रहा हूँ.

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  4. वाकई, राजस्थान भ्रमण का ख्याल आते ही वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता और किले तथा गौरवशाली इतिहास की बरबस याद आ जाती है।
    आपकी जीवन स॔गिनी से वार्तालाप अत्यंत ही रोचक लगी।शुभकामनाएं आदरणीय ।

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    1. धन्यवाद पुरुषोत्तम सिन्हा जी.
      राजस्थान जाकर इतिहास की शौर्यगाथाएं जीवंत हो उठती हैं और कवि प्रदीप के गीत की पंक्ति - 'इस मिट्टी से तिलक करो, यह धरती है, बलिदान की.' कानों में गूंजने लगता है.
      हमारी जीवन-संगिनी घर के अन्दर की बात बाहर वालों तक पहुँचाने से तनिक रुष्ट हो जाती हैं पर हम क्या करें, आदत से मजबूर हैं.

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  5. वाह , बेहतरीन बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर
    वैसे मैं भी इसी आरक्षण की जलती आग से
    निकलकर ग्वालियर से जयपुर बारह तारीख को पहुंच गई। आप की यात्राएं भी पूरी होती
    पर रोमांच ज्यादा होता।खैर शुभकामनाएं आप
    हमारे देश शीघ्र पधारें।

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    1. धन्यवाद अभिलाषा जी.
      हम तो महा-आशावादी व्यक्ति हैं. क्या मालूम, यह आन्दोलन शांत हो तो फिर अपने पूर्वजों की धरती को नमन करने के लिए हम निकल पड़ें.
      आपका देस हमको अपना ही लगता है, ज़रूर हाज़िर होंगे.

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  6. बहुत ही सुन्दर रौचक लिखा है ... लगा कि बस अब निकलने ही वाले हैं ...आरक्षण के कारण जो आरक्षण कैंसिल करने पड़े उसका खेद पाठक के अंतस तक पहुंच रहा है...भगवान करे आप शीघ्र भ्रमण पर जायें और हम यहाँ आपके यात्रा बृतांत का लुप्त उठायें...।

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    1. प्रशंसा के लिए धन्यवाद सुधा जी.
      ऐसी स्थितियों में एक पुराने नग्मे को मैं कुछ बदल कर गुनगुना लेता हूँ -
      'कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे, हँसना आया,
      बात निकली तो, हर-इक बात पे, हंसना आया.'

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  7. सर....जितनी बार आपका यह संस्मरण पढ़ रहे बहुत दुखी हो रहे हैं...ट्रिप कैंसिल करके आपने सबका नुकसान करवा दिया।

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    1. श्वेता ! मौक़ा लगा तो 15 दिन के अन्दर ही जैसलमेर और बीकानेर की ट्रिप बना लेंगे. फिर अपने अनुभव तुम लोगों के साथ साझा करने से कौन मुझे रोकेगा?

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  8. आदरणीय जानकर ख़ुशी हुई आप राजस्थान भर्मण पर निकलने वाले थे ,वाकई
    राजस्थान यादों का झरोखा है, बन नहीं तो फिर कभी आइएगा जरुर |
    आरक्षण को लेकर हो रहे दंगे वाकई विचारणीय विषय है हर साल यही सिलसिला न सरकार सुधारना चाहती |न लोग सुधरना चाहते |
    संस्मरण के माध्यम से अच्छा संदेश जन मानस को |
    सादर

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    1. अनीता जी,
      मेरे परिवार-जन की दृष्टि में कार्यक्रम रद्द करना मेरी नीयत में शामिल है और उन बेचारों की नियति में. 2016 में हम जब यूरोप-भ्रमण के लिए गए थे तो हमारी श्रीमती जी तब तक आश्वस्त नहीं हुईं जब तक कि वो लन्दन जाने वाले हवाई जहाज़ में बैठ नहीं गईं.

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