बुधवार, 6 जनवरी 2021

डॉक्टर जगन

 पीएच. डी. की डिग्री हासिल करने वाला शख्स समाज में अपना दबदबा कायम करने की तमन्ना रखता है और अगर साथ में किसी विश्वविद्यालय या किसी महाविद्यालय में लेक्चरर की जॉब भी मिल जाय तो फिर सोने में सुहागा वाली कहावत उसके अपने आँगन में सुनाई देने लगती है.

मेरा भक्त छात्र जगन्नाथ उर्फ़ जगन जब बी. ए. में था, तभी से वह मेरे निर्देशन में पीएच. डी. करना चाहता था. पीएच. डी. के लिए विषयों का चुनाव भी वह खुद ही करना चाहता था पर उसके लिए मेरी संस्तुति लेना वह ज़रूरी समझता था. गांधीजी के लाठी-प्रेम पर वह पीएच. डी. और नेहरूजी के जैकेट प्रेम पर वह डी. लिट. करना चाहता था. मैंने उसे जैसे तैसे राजी किया कि वह एम. ए. करने तक अपना पीएच. डी. और डी. लिट. वाला प्लान टाल दे.
जब जगन बी. ए. की परीक्षा में तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ तो मैंने उसे सलाह दी कि वो एम. ए. और पीएच. डी. करने के ख्वाब छोड़कर गाँव जाकर अपने पिताजी के साथ खेती करे पर उसने मेरी बात नहीं मानी और एम. ए. इतिहास में एडमिशन ले ही लिया. इतना ही नहीं दो साल बाद पता नहीं कैसे जोड़तोड़ कर उसने बाकायदा एम. ए. कर भी डाला, वह भी 55 प्रतिशत अंकों के साथ. अब उसका पीएच. डी. गाइड बनना मेरा फ़र्ज़ था पर मैंने अपने ख़राब स्वास्थ्य का बहाना करके उससे पीछा छुड़ा लिया. मेरे उत्साही छात्र जगन ने एक दूसरे गुरूजी की खोज कर ली. ये गुरूजी थोक में पीएच. डी. कराते थे. कराते भी क्या थे बल्कि कोई किसी भी अल्लम गल्लम विषय पर कहीं से भी ढाई-तीन सौ पन्ने भर लाये तो वह थीसिस सबमिट कर सकता था और आवश्यक दान-दक्षिणा चुकाने के बाद डॉक्टर साहब कहलाने का अधिकारी बन सकता था.
हमारे वुड बी डॉक्टर साहब के शोध कार्य की प्रगति की हर जानकारी मुझे मिलती रहती थी. किस तरह दस नाली का खेत बेचकर थीसिस लिखने के लिए एक घोस्ट राइटर का इंतज़ाम हुआ, किस तरह रिकॉर्ड टाइम में थीसिस लेखन का कार्य संपन्न करा थीसिस सबमिट कर दी गयी, ये सब मुझे जुबानी याद हो गया था. अब जगन भैय्या अपने नाम से पहले ‘डॉक्’ लगाने लगे थे. मैंने इसका रहस्य जानना चाहा तो जगन ने मुझे समझाया –
‘गुरूजी, पीएच. डी. थीसिस सबमिट करना आधे पीएच. डी. के बराबर तो है ही इसलिए मैं अपने नाम के साथ कमसे कम ‘डॉक्; तो लगा ही सकता हूँ. मुझे पीएच. डी. अवार्ड होने के बाद तो आप भी मुझे डॉक्टर जगन ही कहोगे.’
पांच नाली का एक और खेत बेचकर ‘डॉक्’ जगन ने अपने पीच. डी. वायवा के सफल आयोजन की व्यवस्था की. वाह्य परीक्षक की उन्होंने वो खातिर की कि वो बेचारे वायवा लेते समय सिर्फ उनकी शान में कसीदे पढ़ते रहे और उन्हें डॉक्टर जगन्नाथ कहकर संबोधित करते रहे.
मिठाई का डिब्बा लेकर डॉक्टर जगन मेरे घर पधारे और फिर मुझे अपने साथ गोलू देवता के दरबार भी ले गए. उन्हें पीएच. डी. अवार्ड होने की मन्नत पूरी होने पर वहां घंटा चढ़ाना था. पूजा-अर्चना और घंटा चढाने के बाद डॉक्टर जगन ने गोलू देवता के दरबार में एक और अर्जी लगा दी –
‘हे गोलू देवता ! आप मुझे यूनिवर्सिटी में या किसी कॉलेज में लेक्चरर बनवा देना.’
मैंने डॉक्टर जगन से पूछा –
‘डॉक्टर साहब, गोलू देवता के मंदिर में कुल कितने घंटे-घंटियाँ हैं?’
गोलू देवता के मन्दिर में लगे हुए कुल घंटे और घंटियों की संख्या कर पाना देश की जनगणना करने से कम गुरुतर कार्य नहीं हो सकता. हमारे डॉक्टर जगन इन घंटियों को देखकर अभिभूत हो गए. अपनी तरफ़ से उन्होंने एक घंटा चढ़ाते हुए डॉक्टर जगन ने जवाब दिया –
‘गुरूजी, मेरे विचार से ये कम से कम दस हज़ार तो होंगे ही.’
मैंने कहा –
‘इसमें से आधे आपकी तरह के डॉक्टर साहबों ने ही चढ़ाये होंगे. अगर गोलू देवता आप जैसे सभी डॉक्टर साहबों की अर्जी पर गौर करने लगे तो यूनिवर्सिटियों और कॉलेजो में गुरुजियों की संख्या छात्रों से ज्यादा हो जाएगी.’
डॉक्टर जगन मेरे महा-निराशावादी दृष्टिकोण के कारण मुझसे काफ़ी दिनों तक नाराज़ रहे पर अगले तीन साल तक खेत बेचने की भरपाई करने के लिए उन्हें टैक्सी चलानी पड़ी.
उनकी टैक्सी पर पीछे की ओर ‘डॉक्टर्स टैक्सी’ और ‘डॉक्टर जगन दी गड्डी’ लिखा रहता था. मुझे भी कई बार रियायती दर पर उनकी टैक्सी में घूमने का मौका मिला.
तीन साल तक सफलता पूर्वक टैक्सी ड्राईवर की भूमिका निभाने के बाद एक बार फिर डॉक्टर जगन मिठाई के डिब्बे के साथ मेरे घर पधारे. मैंने मिठाई लाने का उन से कारण पूछा तो वो मुस्कुराते हुए बोले –
‘गुरूजी, गोलू देवता के दरबार में मेरी अरदास कबूल हो गयी. कृष्ण नगर इन्टर कॉलेज में मेरी नियुक्ति हो गयी है.’
मैंने उन्हें बधाई देते हुए पूछा –
‘इस बार कितने नाली खेत बेचा?’
डॉक्टर जगन ने तपाक से जवाब दिया –
'न खेत बेचा है और न ही टैक्सी, भगवान् की कृपा से सब कुछ यूँ ही हो गया.’
मैनें मुक्का तान उन्हें जान से मारने की धमकी दी तो उन्होंने शरमाते हुए जवाब दिया –
‘ कृष्ण नगर इन्टर कॉलेज मैनेजमेंट के सर्वेसर्वा की बेटी जो कि मुझ से पांच साल बड़ी है और थोड़ी ज़्यादा ही तंदुरुस्त है, उस से अगले महीने मेरी शादी होने जा रही है.’
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शनिवार, 2 जनवरी 2021

पुस्तक-कला की कक्षा

 1962 में पिताजी का इटावा से रायबरेली तबादला हो गया था. रायबरेली में कक्षा 7 में मेरा प्रवेश गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में करा दिया गया था. हमारा कॉलेज अच्छा था, काफ़ी भव्य था और वहां के अध्यापकगण भी आम तौर पर अच्छे थे, खासकर इतिहास, हिंदी और गणित के मास्साब तो लाजवाब थे. हमारे कॉलेज में कक्षा 6 से लेकर कक्षा 8 तक एक वैकल्पिक विषय होता था. हमको पुस्तक-कला, काष्ठ-कला और ज्यामितीय-कला में से कोई एक विषय चुनने की आज़ादी थी.

काष्ठ-कला बड़ा बोरिंग और कठिन विषय माना जाता था और ज्यामितीय-कला चुनना मेरे लिए हानिकारक हो सकता था क्योंकि मेरी ड्राइंग, आर्ट वगैरा उस ज़माने में (और आज भी है) नितांत एब्सट्रैक्ट हुआ करती थी. मजबूरन मुझे पुस्तक-कला विषय चुनना पड़ा.
पुस्तक-कला एक ऐसा विषय था जिसे कोई भी विद्यार्थी गंभीरता से नहीं लेता था. ऊपर से रोज़ाना आठवां अर्थात हमारा आखरी पीरियड इस बोरिंग विषय का हुआ करता था.
गणित, विज्ञान, इंगलिश और संस्कृत जैसे दुरूह विषय पढ़ते-पढ़ते हमारी पहले ही हालत पतली हो चुकी होती थी.
पुस्तक-कला के इस अंतिम पीरियड को हम पीटी के पीरियड की ही तरह मौज-मस्ती का पीरियड मानते थे.
पुस्तक-कला के हमारे मास्साब थे, छोटे नक़वी साहब.
हमारे कॉलेज एक बड़े नक़वी मास्साब भी थे जो कि हाई स्कूल के विद्यार्थियों को गणित पढ़ाते थे.
हमारे छोटे नक़वी मासाब एक नमूना थे, एक अजूबा थे.
उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि कोई चूहा भी उनके सामने खुद को शेर समझ सकता था.
छोटे नक़वी मास्साब हमको डांटते थे तो हमारी हंसी छूट जाती थी और अगर वो हमारी पीठ पर स्केल चलाने की प्रैक्टिस करते थे तो हम क्लास से भाग खड़े होते थे.
छोटे नक़वी मास्साब मेरी ज़िन्दगी के पहले गुरूजी थे जिनका मैंने उपहास उड़ाया था. मास्साब को नजले की शिक़ायत रहती थी. वो एक अंगोछा अपने साथ रखते थे और तरह-तरह की आवाज़ें निकालकर बार-बार उससे अपनी नाक पोंछते रहते थे.
नालायक गुरुभक्त बालक उनकी पीठ पीछे आदर से उन्हें ‘नकबही मास्साब’ कहा करते थे. मुझे इस तरह के बेहूदे नामकरण पर घोर आपत्ति थी पर जब दो-चार बार बिना किसी जुर्म के गुरुदेव ने मेरी पीठ पर ज़ोरदार स्केल जड़ दिए तब से मैं भी उनके पीछे उन्हें ‘नकबही मास्साब’ कहने लगा था.
पुस्तक-कला के पीरियड में हर लड़का नियमतः लघुशंका निवारण के लिए जाना चाहता था और हमारे मास्साब अक्सर इसकी अनुमति देने के स्थान पर प्रार्थी की पीठ पर दो-चार स्केल जड़ दिया करते थे.
लेकिन इस सख्ती का परिणाम अक्सर यह होता था कि घायल लड़का उन्हें ‘नकबही’ कहके क्लास से भाग जाया करता था.
मेरे जैसे तथाकथित शरीफ़ लड़के (जो कि उन्हें ‘नकबही’ कहने की गुस्ताखी केवल उनके पीछे किया करते थे) ऐसे गुस्ताख चोरों को पकड़ने के लिए सिपाही बनाकर भेज दिए जाते थे और फिर हम चोर-सिपाही प्रिंसिपल साहब की नज़रों से छुपकर अपने क्लास के बाहर ही मज़े से कबड्डी खेला करते थे.
हमारे छोटे नक़वी मास्साब की बाज़ार में स्टेशनरी की दुकान थी.
हम जैसे कलाकारों को जिनको कि लिफ़ाफ़ा बनाना भी नहीं आता था, वो यह सलाह दिया करते थे कि हम खुद टेढ़ी-मेढ़ी कलाकृतियाँ बनाने के बजाय उनकी दुकान से लिफ़ाफ़ा, बुक मार्क, फ़ाइल कवर, फ्लावर स्टैंड आदि खरीद कर जमा कर दिया करें.
अच्छे रिमार्क्स की गारंटी के आश्वासन पर हम भोले बालक उनके जाल में अक्सर फँस भी जाया करते थे.
एक बार हमको फ़ाइल कवर बनाने का काम दिया गया. ज़ाहिर था कि मेरे लिए यह काम करना असंभव था.
इंटरमीजिएट में पढ़ रहे हमारे श्रीश भाई साहब ने पुराने ज़माने में एक सुन्दर फ़ाइल कवर बनाया था. मैंने उनसे एक हफ़्ते के लिए उनका वो फ़ाइल कवर उधार मांग लिया. यहाँ यह मैं क्यूँ बताऊँ कि इस उपकार के बदले में उन्होंने मुझसे अपने दो-दो जोड़ी जूतों पर पॉलिश करवाई थी.
नक़वी मास्साब मेरे उधारी किन्तु सुन्दर फ़ाइल कवर को देखकर बड़े खुश हुए. मुझे पहली बार उन्होंने ‘गुड’ दिया. पर इस जमा किए हुए फ़ाइल कवर को मुझे लौटाना वो क़तई भूल गए.
इधर हमारे श्रीश भाई साहब के उपकार की एक हफ़्ते वाली मियाद पूरी हो चुकी थी. भाई साहब फ़ाइल कवर की वापसी के तकाज़े, रोज़ाना मेरी पीठ पर मुक्के मार-मार कर रहे थे और मैं बिचारा पुस्तक-कला की कक्षा में रोज़ाना मास्साब से रोते-बिसूरते हुए फ़ाइल कवर वापस करने की गुहार लगा रहा था.
हमारे नकबही मास्साब की प्रतिष्ठा इतनी थी कि महात्मा गाँधी इंटर कॉलेज में पढ़ने वाले श्रीश भाई साहब को भी यह पता था कि वो अपने विद्यार्थियों से जमा कराई गई अच्छी-अच्छी कलाकृतियाँ अपनी दुकान पर बेचने के लिए रख देते हैं.
श्रीश भाई साहब को पता नहीं अपने उस फ़ाइल कवर से कितना प्यार था कि वो उसकी तलाश में नक़वी मास्साब की दुकान पर चले गए. इतना ही नहीं, वहां बिक्री के लिए डिस्प्ले पर लगे आइटम्स में उन्होंने अपना फ़ाइल कवर खोज भी लिया और उसे वो वहां से एक अठन्नी में ख़रीद भी लाए.
अब अपनी अठन्नी मुझसे वसूल करने के लिए भाई साहब मुझ पर जोर डाल रहे थे और मैं मास्साब से अठन्नी लेने के लिए रोज़ाना हल्ला मचा रहा था.
उन दिनों एक अठन्नी मेरे एक हफ़्ते का पॉकेटमनी हुआ करती थी. मैं इतनी बड़ी चोट को आसानी से कैसे सह सकता था?
पर मास्साब के कानों पर जूं भी नहीं रेंग रही थी.
आज मुझे लगता है कि श्री जयशंकर प्रसाद ने अपने फ़ाइल कवर हज़म करने वाले किसी मास्साब को ध्यान में रख कर ही कहा होगा –
‘रो-रो कर सिसक-सिसक कर, कहता मैं करुण कहानी,
तुम सुमन नोचते सुनते, करते जानी-अनजानी.’
हर ओर से निराश होकर मैंने अपनी व्यथा अपने पिताजी से कही.
हमारे धीर-गंभीर न्यायधीश पिताजी कभी इतना नहीं हँसे होंगे जितना कि इस किस्से को सुनकर हँसे थे.
पिताजी ने श्रीश भाई साहब को बुलाकर उन्हें एक अठन्नी दे दी और मुझसे कहा कि मैं छोटे नक़वी मास्साब की इस लूट को भूल जाऊं.
पर मैं क्या करूँ?
इस लूट को आधी सदी से भी ज़्यादा वक़्त गुज़र गया है पर मैं उसे आज भी भूला नहीं हूँ.
इस घटना को भूल जाने की उदारता मैं आज भी नहीं दिखा पा रहा हूँ और गुरुदेव द्वारा फ़ाइल कवर को चोरी करने की गुस्ताखी को बिना तक़ल्लुफ़ कागज़ पर उतार भी रहा हूँ.
फ़ाइल कवर चोरी-कांड के बाद मेरी शरारतों की डोज़ बढ़ती गयी और मेरी अठन्नी कभी न लौटने वाले बेचारे बेबस मास्साब उसे हज़म करते रहे.
मास्साब की पीठ पीछे क्लास में कागज़ के हवाई जहाज़ बनाकर उड़ाने में एक्सपर्ट होने में और दोस्तों पर चौक मारने की कला में मेरे पारंगत होने में, पुस्तक-कला की क्लास का सबसे बड़ा योगदान था.
मैंने बी. ए. करने के दौरान श्री लाल शुक्ल जी का महान उपन्यास ‘राग दरबारी’ पढ़ा था. उस उपन्यास में आटा चक्की वाले मास्साब का चरित्र मुझे अपने छोटे नक़वी मास्साब के चरित्र जैसा लगा था.
मेरा यह मानना है कि श्री जयशंकर प्रसाद को और श्री लाल शुक्ल जी को भी मेरे छोटे नक़वी मास्साब जैसे गुरु मिले थे. वरना न तो प्रसाद जी –
‘ रो-रो कर सिसक कर --- ‘ लिख पाते और न ही श्रीलाल शुक्ल जी ‘राग दरबारी’ के चक्की वाले मास्साब का चरित्र गढ़ पाते.
अगर ये दो महानुभाव अपने-अपने गुरुजन की कृपा से इतने बड़े साहित्यकार बन सकते हैं तो छोटे नक़वी मास्साब के साये में घाघ बने मुझको महान साहित्यकार बनने से कौन रोक सकता है?
मुझको अगर कभी साहित्य का नोबिल पुरस्कार मिला तो यह तय है कि उसे मैं अपने छोटे नक़वी मास्साब को ही समर्पित करूँगा.
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सोमवार, 21 दिसंबर 2020

लेडीज़ फ़र्स्ट

फ़ेसबुक पर अपने एक आलेख में मेरे मित्र प्रोफ़ेसर हितेंद्र पटेल ने हर जगह महिलाओं-लड़कियों को प्राथमिकता दिए जाने पर आपत्ति की है.
मैं भी उनके इस विचार से सहमत हूँ कि हर जगह ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ का नारा बुलंद किये जाने की ज़रुरत नहीं है.
यह सही है कि स्त्री-दमन और स्त्री-शोषण, विश्व-इतिहास का, ख़ासकर भारतीय इतिहास का, सबसे कलुषित अध्याय है लेकिन इसके खिलाफ़ हम पूरी तरह से उल्टी गंगा बहा कर एक स्त्री-प्रधान समाज को स्थापित कर न तो स्त्रियों को समाज में यथोचित अधिकार दिला सकेंगे और न ही उन्हें निर्बाध उन्नति करने का अवसर प्रदान करा पाएंगे.
मध्यकालीन यूरोप में नाइट्स की शौर्य-गाथाओं में उनकी शिवैलरी (नारी-रक्षण की भावना) की अनगिनत कहानियां प्रचलित थीं.
इन्ही नाइट्स की तरह हमारे आज के बॉलीवुड के हीरोज़ भी खलनायकों के चंगुल में फंसी नायिका का उद्धार करने के लिए कहीं से भी अवतरित हो जाते हैं.
बस में या ट्रेन में किसी महिला को खड़ा देख कर किसी पुरुष द्वारा अपनी सीट उसे देना सभ्यता की निशानी मानी जाती है. किसी टिकट विंडो पर भले ही महिलाओं के लिए अलग पंक्ति की व्यवस्था न हो पर उनको आउट ऑफ़ टर्न टिकट तो मिल ही जाता है.
औरत को मोम की गुड़िया समझना या उसे रुई के फाहे में महफ़ूज़ रखने की कोई कोशिश करना मूर्खता है.
बिना किसी के सहारे चुनौतियों का सामना करने की क्षमता पुरुष का एकाधिकार नहीं है.
स्त्रियाँ भी स्वयं-सिद्धा बन कर कठिन से कठिन मुश्किलों का सफलतापूर्वक सामना कर सकती हैं और उन पर जीत हासिल कर सकती हैं.
आजकल नारी-उत्थान के स्व-घोषित मसीहा हर क्षेत्र में स्त्रियों को आरक्षण दिए जाने की सिफ़ारिश करते हैं.
बकौल लालू प्रसाद यादव, नारी-उत्थान की एक अभूतपूर्व मिसाल उन्होंने तब क़ायम की थी जब बिहार के मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी छिन जाने की स्थिति में उन्होंने अपनी लगभग काला अक्षर भैंस बराबर श्रीमती जी, राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बनवा दिया था.
मेरी दृष्टि में नारी-उत्थान के नाम पर इतना फूहड़ और वीभत्स मज़ाक कोई दूसरा नहीं हो सकता था.
बिना किसी की योग्यता जांचे, बिना उसकी सामर्थ्य का समुचित आकलन किये, किसी की थाली में कोई महत्वपूर्ण पद परोस देना तो अन्याय है.
यह अन्याय सिर्फ़ दूसरों के साथ ही नहीं है, बल्कि उसके साथ भी है जिस पर कि ऐसी कृपा बरसाई गयी है.
बहुत से अभिभावक अपनी बेटियों को कोई भी दुष्कर कार्य नहीं सौंपते हैं. अगर बेटियों को कहीं बाहर जाना हो तो उसके साथ घर के किसी पुरुष का जाना ज़रूरी समझा जाता है.
मेरे अल्मोड़ा-प्रवास में मेरी बड़ी बेटी गीतिका ने दिल्ली में रह कर बीएस. सी. और एमएस. सी किया और छोटी बेटी रागिनी ने पन्त नगर से बी. टेक. और फिर दिल्ली से एम. बी. ए. किया.
मेरी दोनों बेटियां अपने दम पर अल्मोड़ा से दिल्ली तक का सफ़र अकेले ही करती रहीं. उनके पापा को या उनकी मम्मी को कभी भी उनका बॉडी गार्ड बनने की ज़रुरत नहीं पड़ी.
दोनों बेटियों को पता था कि उन्हें ख़ुद को किस तरह सुरक्षित रखना है और इसके लिए क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी हैं.

अपने पैरों पर खड़े होने के बाद अपने रहने की व्यवस्था भी हमेशा उन्होंने ख़ुद ही की. यहाँ तक कि उनकी शादियाँ भी हम पति-पत्नी की टांग अड़ाए बिना ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गईं.
पुरुषों का, लड़कों का, चरित्र बड़ा दो-रंगा होता है.
अपने घर के किसी बच्चे को दो मिनट के लिए भी गोदी में न उठाने वाला कोई मर्द अक्सर किसी सूरतक़ुबूल अपरिचित महिला का पचास किलो बोझा उठाने को भी तैयार मिल सकता है.
इस बोझा उठाने वाली बात पर एक सच्चा किस्सा –
1994 में मैं अपने विद्याथियों का एजुकेशनल टूर लेकर अल्मोड़ा से राजस्थान जा रहा था. टूर में विद्यार्थियों के पास पैसे की किल्लत को देख कर मैंने यह घोषणा कर दी कि हम कहीं भी कुली नहीं करेंगे और हर कोई अपना-अपना सामान ख़ुद उठाएगा.
हमारे कुछ उत्साही लड़के लपक कर लड़कियों का सामान उठाने लगते थे जब कि अपने गुरु जी को ख़ुद का सूटकेस और बैग उठाते देख उन्हें कोई परेशानी नहीं होती थी.
मेरे इस हिटलरी फ़रमान –
‘हर कोई अपना सामान ख़ुद उठाएगा और कोई भी किसी दूसरे का सामान क़तई नहीं उठाएगा. मेरा यह हुक्म न मानने वाले को टूर से बाहर कर दिया जाएगा.’
सभी लड़कियों ने तो रास्ते भर आराम से अपना सामान ख़ुद उठाया लेकिन हमारे उत्साही स्वयंसेवक बालकों की शिवैलरी दिल की दिल में ही रह गयी.
मेट्रोज़ में, बसों में, वरिष्ठ नागरिकों के लिए कुछ सीट्स आरक्षित होती हैं. एक वरिष्ठ नागरिक होने के नाते मैं ऐसी किसी सीट पर बैठना अपना जन्म-सिद्ध अधिकार समझता हूँ.
खचाखच भरी मेट्रो या बस में वरिष्ठ नागरिक के लिए आरक्षित सीट पर अगर कोई लड़का बैठा हो या कोई लड़की भी बैठी हो तो उसे हटा कर उस सीट पर बैठने में मैं कभी संकोच नहीं करता.
अगर हम सच्चे अर्थ में नारी-हितैषी हैं तो हमको स्त्रियों को विशेष अधिकार और अतिरिक्त सुविधाएँ देने के स्थान पर उनकी उन्नति के मार्ग में अनादि काल से डाले जा रहे रोड़े हटाने चाहिए और सभी क्षेत्रों में उन्हें पुरुषों के समान अपनी योग्यता सिद्ध करने का अवसर दिलाना चाहिए.
हमारे देश का यह दुर्भाग्य है कि आज भी समाज में उन पोंगापंथियों का और पुरातनपंथियों का बाहुल्य है जिन्हें अपने समाज की पुरानी सड़ी-गली परम्पराओं के अंध-निर्वाहन में ही सबका कल्याण दिखाई देता है.
किन्तु प्रगतिशीलता के नाम पर इस सामाजिक रोग का निदान स्त्रियों पर अनावश्यक और अप्रत्याश्रित सुविधाएँ लुटा कर नहीं किया जा सकता.
सबको उन्नति का एक समान अवसर प्रदान करना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए.

किसी भी व्यवस्था में, चाहे वह धार्मिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, शैक्षिक हो अथवा सामाजिक हो, भेद-भाव और असमानता का लेशमात्र अंश भी नहीं होना चाहिए और न ही किसी को जाति-धर्म के आधार पर, न ही किसी को क्षेत्र के नाम पर, न ही किसी को स्त्री होने के आधार पर,

आरक्षण का, या विशेष सुविधाओं का या फिर कैसी भी रियायतों का तोहफ़ा मिलना चाहिए. 

रविवार, 13 दिसंबर 2020

माँ-पिताजी और फ़िल्में

फ़िल्मों के प्रति माँ की और मेरी दीवानगी देख कर पिताजी कहा करते थे कि हम दोनों का जन्म घर में या किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि किसी सिनेमा हॉल में होना चाहिए था.
हमारी ननिहाल एटा में थी जहाँ कि पुराने ज़माने में कोई सिनेमा हॉल नहीं था लेकिन हमारी माँ ने अपने बचपन में नुमाइशों और मेलों में टेंट लगा कर काम चलाऊ मोबाइल सिनेमा में फ़िल्में देखने का लुत्फ़ खूब उठाया था.
माँ ने पहली फ़िल्म – ‘राजा भरथरी’ (भर्तहरि) देखी थी.
किस तरह अपनी रानी पिंगला को बेहद प्यार करने वाले, उसे अमृत फल देने वाले, राजा भरथरी उसके प्यार में धोखा खा कर राज-पाट छोड़ कर साधू हो जाते हैं और एक दिन रानी पिंगला के महल के द्वार पर खड़े होकर गा-गा कर उस से भिक्षा मांगते हैं और पश्चाताप की आग में जल रही रानी पिंगला उन्हें भिक्षा देकर किस प्रकार अपने प्राण त्याग देती है, इसका ऐसा वर्णन हमारी माँ करती थीं कि उस फ़िल्म का हर एक दृश्य हमारी आँखों के सामने सजीव हो जाता था.
माँ की एक और मन-पसंद फ़िल्म ‘सत्य हरिश्चंद्र’ हुआ करती थी. इस फ़िल्म का क्लाइमेक्स था –
श्मशान घाट के डोम बने राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी शैव्या से अपने पुत्र रोहिताश्व के शव का अंतिम संस्कार करने के लिए उस से कर मांगते हैं और कर के रूप में रानी अपनी साड़ी का एक हिस्सा फाड़ कर उन्हें देती है.
इस दृश्य का वर्णन हमारी रोती-बिसूरती माँ ऐसे करती थीं कि हम श्रोता भी उनके साथ आंसू बहाने लगते थे.
माँ की कमेंट्री सुन कर मुझको यकीन हो गया था कि हमारी ननिहाल के आदि-पुरुष महाभारत फ़ेम के संजय ही रहे होंगे.
1947 में जुडिशियल मजिस्ट्रेट के रूप में पिताजी की पहली पोस्टिंग आगरा में हुई थी.
धन्य हो शहर-ए-आगरा ! इसलिए नहीं कि वहां ताजमहल था, बल्कि इसलिए कि वहां कई सिनेमा हॉल्स थे. लेकिन परेशानी ये थी कि माँ फ़िल्मों की जैसी दीवानी थीं, पिताजी फ़िल्मों से उतना ही चिढ़ते थे.
फ़िल्मों से पिताजी की एलर्जी का एक किस्सा यहाँ ज़रूरी है –
हर थाने के पुलिसकर्मियों को अपनी कर्मठता दिखाने के लिए महीने में कम से कम एक-दो दर्जन मुल्ज़िमों को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के सामने लाना ज़रूरी हुआ करता था.
रंगे-हाथ मुल्ज़िम पकड़ने के अधिकतर मामले फर्ज़ी हुआ करते थे और इन में दफ़ा 109 (सेंध लगा कर चोरी करने जैसी किसी आपराधिक गतिविधि की तैयारी कर रहे किसी व्यक्ति को अपराध होने से पहले ही पकड़ना) के मामलों का बाहुल्य होता था. इन पकड़े गए मुल्ज़िमों के पास से बरामद सामान की जो लिस्ट मजिस्ट्रेट के सामने पेश की जाती थी, वो हमेशा एक ही जैसी होती थी –
1. एक आलानक़ब (दीवार में सेंध लगाने के लिए लोहे का एक उपकरण)
2. एक बटुआ, जिसमें थोड़ी सी रेजगारी
3. एक बीड़ी का बंडल जिसमें थोड़ी सी बीड़ियाँ
4. एक माचिस की डिब्बी जिसमें कुछ तीलियाँ
5. सुरैया का एक फ़ोटो
संदिग्ध अपराधी से बरामद हुए सामान की इस फ़ेहरिस्त में पिताजी को पहले चार सामानों पर कोई ऐतराज़ नहीं था लेकिन उन्हें यह बर्दाश्त नहीं था कि हर मुल्ज़िम के पास फ़िल्म स्टार सुरैया का ही फ़ोटो बरामद हो. आखिर नर्गिस, मुमताज़ शांति, बेगम पारा, नूरजहाँ, नसीम बानो वगैरा टॉप हीरोइन्स से इन उठाईगीरों की कौन सी दुश्मनी थी?
मुल्ज़िम से बरामद सामान की फ़ेहरिस्त में सुरैया के फ़ोटो का ज़िक्र देख कर पिताजी आमतौर पर उस केस को ख़ारिज ही कर दिया करते थे.
फ़िल्म देखने की माँ की ज़िद से और पिताजी के आदतन इंकार करने से, हमारे घर में बार-बार गाँधी जी का कोई आन्दोलन उठ खड़ा होता था.
कभी असहयोग आन्दोलन, कभी सत्याग्रह तो कभी सिर्फ़ अनशन. और तो और, कभी-कभी भारत छोड़ो की तर्ज़ पर आगरा छोड़ो (और अपने मायके एटा प्रस्थान करो) आन्दोलन भी हो जाया करता था.
इन गांधीवादी आन्दोलनों से त्रस्त होकर पिताजी साल में एकाद फ़िल्म माँ को दिखा ही देते थे.
माँ को फ़िल्म दिखाना पिताजी के लिए उतनी दुखदायी घटना नहीं हुआ करती थी जितनी कि फ़िल्मोपरांत उस पर होने वाली लम्बी चर्चा !
माँ के हिसाब से उनके चालीस-पचास भाई-बहनों (सगे और फ़र्स्ट, सेकंड कज़िन्स मिलाकर) में से अधिकतर किसी न किसी हीरो या किसी न किसी हीरोइन की कॉपी हुआ करते थे और हमारे पिताजी थे कि वो अपने इन सुदर्शन साले-सालियों में बहुत से मुकरी, धूमल, के. एन सिंह, टुनटुन और ललिता पवार खोज लिया करते थे.
फ़िल्मी आकाश में अमिताभ बच्चन रूपी तारे के जगमगाने से पहले माँ दिलीप कुमार की ज़बर्दस्त फ़ैन हुआ करती थीं.
दिलीप कुमार ने ‘अंदाज़’, ‘इंसानियत’, ‘देवदास’ और ‘गंगा जमुना’ जैसी दुखांत फ़िल्मों में उन्हें ख़ूब रुलाया था तो ‘कोहिनूर’ और ‘राम और श्याम’ में ख़ूब हंसाया था.
माँ को दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी बहुत पसंद थी. जब यह जोड़ी मधुबाला के लालची बाप की दखलंदाज़ी की वजह से टूट गयी तो माँ को बहुत दुःख हुआ था.
न तो माँ ने मधुबाला और जोकर किशोर कुमार की शादी को स्वीकार किया और न ही उन्होंने 44 साल के अधेड़ दिलीप कुमार और 22 साल की नवयुवती सायरा बानो की शादी को.
पिताजी ने माँ को आश्वस्त किया कि माँ कोई अच्छा सा वकील कर के 22 साल की सायरा बानो को अगर 11 साल की नाबालिग साबित करवा दें तो पिताजी न सिर्फ़ इस बेमेल शादी को रद्द करवा देंगे, बल्कि दिलीप कुमार को जेल भी भिजवा देंगे.
मेरे बड़े हो जाने पर और ख़ासकर मेरे कमाऊ हो जाने पर, माँ को फ़िल्म दिखाने की ज़िम्मेदारी मेरी हो गयी लेकिन माँ फिर भी पिताजी के साथ फ़िल्म देखने की ज़िद करती रहती थीं.
किसी ख़ास फ़िल्म की मुझ से तारीफ़ सुन कर कभी-कभी पिताजी माँ को ऑबलाइज करने के लिए तैयार भी हो जाते थे.
1978 की बात है. मेरी संस्तुति पर पिताजी ने राजकपूर की एवरग्रीन फ़िल्म ‘आवारा’ देखने की हामी भर दी.
माँ-पिताजी दोनों को फ़िल्म पसंद आई लेकिन इतिहास में कमज़ोर हमारी माँ के यह समझ में नहीं आया कि इस फ़िल्म में शम्मी कपूर, हीरो का यानी कि राज कपूर का बाप क्यों बना है ! (इस फ़िल्म में राज कपूर के पिता की भूमिका पृथ्वीराज कपूर ने निभाई थी जो कि 1952 में 1978 के शम्मी कपूर के जैसे दिखते होंगे)
अपने दांत पीसते हुए पिताजी ने माँ को करेक्ट करते हुए बताया कि ‘आवारा’ में राज कपूर के बाप की भूमिका उन के छोटे भाई शम्मी कपूर ने नहीं, बल्कि उनके बेटे ऋषि कपूर ने निभाई थी.
1978 में हमारे घर में टीवी आ गया. माँ रविवार को आने वाली फ़िल्म का बेसब्री से इंतज़ार करती थीं और पिताजी न जाने क्यों, फ़िल्म के दौरान ही आरामकुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपनी नींद पूरी किया करते थे.
फ़िल्म के दौरान सोने वाले पिताजी का सजग होकर न्यूज़ देखना और क्रिकेट मैच के प्रसारण का भरपूर आनंद उठाते हुए देखना, माँ को क़तई बर्दाश्त नहीं होता था.
1993 में पिताजी के निधन के बाद माँ ने सिनेमा हॉल में जाकर फिर कोई फ़िल्म नहीं देखी.
अब टीवी ही उनके फ़िल्मी मनोरंजन का साधन रह गया था.
1994 से सबके घरों में केबल टीवी आ जाने से घर-घर थिएटर खुल गए थे. हमारी माँ के लिए तो एक एक्सक्लूसिव टीवी हुआ करता था जिस पर दिन में और रात में कोई न कोई फ़िल्म ही चला करती थी.
हमारे घर में मेरी दोनों बेटियां अपनी अम्मा के साथ बैठ कर ख़ूब फ़िल्में देखा करती थीं. फ़िल्म देखते समय अम्मा के कमेंट्स भी चलते रहते थे.
सन 2000 के करीब की बात होगी. टीवी पर 1965 की फ़िल्म – ‘गुमनाम’ का गाना – ‘इस दुनिया में जीना हो तो सुन लो मेरी बात’ चल रहा था जिसमें थिरकती हुई हेलेन माँ को बड़ी अच्छी लग रही थी.
1965 और 2000 में घालमेल करते हुए माँ ने इतिहास की धज्जियाँ उड़ाते हुए टिप्पणी की –
‘ये मुई हेलेन बूढ़ी हो गयी लेकिन आज भी कितना अच्छा नाचती है’
अपने एक संस्मरण में मैं विस्तार से लिख चुका हूँ कि किस तरह अमिताभ बच्चन माँ के सबसे बड़े बेटे और हमारे बड़े भैया घोषित हो गए थे.
टीवी पर जैसे ही अमिताभ बच्चन दिखाई देते थे, मेरी बेटियां दौड़कर अपनी अम्मा को सूचित कर देती थीं कि बड़े ताउजी आ गए हैं.
सन 2000 में ही ‘कौन बनेगा करोड़पति’ का प्रसारण शुरू हुआ था. माँ अपने सबसे बड़े बेटे के अथाह ज्ञान की भूरि-भूरि प्रशंसा करती थीं और यह मानने को क़तई तैयार नहीं होती थीं कि इस कार्यक्रम के पीछे किसी सिद्धार्थ बासु का हाथ है.
आज पिताजी और माँ हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी फ़िल्मी पसंद-नापसंद की यादें अब भी मेरा मनोरंजन करती हैं.
‘मुगले आज़म’ के बागी और बदतमीज़ सलीम को दो बेंत लगाने की हसरत रखने वाले पिताजी और अपनी देखरेख में सलीम-अनारकली की शादी करवाने की तमन्ना रखने वाली माँ की नोंक-झोंक को मैं आज भी मिस करता हूँ.
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