सोमवार, 5 सितंबर 2016

आधुनिकता


फेसबुक पर यह प्रश्न उठाया गया है कि आधुनिकता क्या है. आमतौर पर आधुनिकता को नास्तिकता, भौतिकतावाद, स्वार्थपरता, उन्मुक्त व्यवहार, संस्कारहीनता, समाज तथा परिवार से पृथक रहकर स्वयं अपने द्वारा स्थापित मूल्यों के साथ जीने की प्रवृत्ति आदि से जोड़कर देखा जाता है. सामान्यतः भारत में आधुनिक वह कहलाता है जो पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण करता हो. आधुनिकता की यह परिभाषा उचित नहीं है. यदि हम इतिहास को देखें तो यूरोप में 15 वीं शताब्दी के प्रथमार्ध तक मध्यकाल और उसके बाद 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से (खासकर 1453 से, जब तुर्कों ने रोमन साम्राज्य के शहर कुंस्तुनतुनिया (पुराने ग्रीस की राजधानी) पर अधिकार कर लिया था और ग्रीक बुद्धिजीवी वहां से भागकर यूरोप के अन्य देशों में जाकर बस गए थे तथा वहां उन्होंने ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित की थी) से आधुनिक युग का प्रारम्भ माना जाता है जिसे हम यूरोपीय पुनर्जागरण भी कहते हैं.

इतिहास में मध्य-युग को हम अंधकार का युग भी मानते हैं. मध्यकाल में धर्म और परंपरा के नाम पर अन्धविश्वास, कूपमंडूकता, अपरिवर्तनशीलता, हठवादिता और असहिष्णुता को अपनाया जा रहा था. राजा का आदेश ईश्वर का आदेश माना जा रहा था. धर्म, शासक, समाज के प्रभुत्व ने व्यक्तिवाद का तो मानों अस्तित्व ही मिटा दिया था. किन्तु जब हर बात को बुद्धि और विवेक की कसौटी पर परखने की प्रवृत्ति बढ़ी, जब ‘क्यों’, ‘कैसे’ से प्रारम्भ होने वाले प्रश्नों ने ‘जो आज्ञा’ से प्रारम्भ होने वाले वाक्यों का स्थान ले लिया तो आधुनिक युग का शुभारम्भ हुआ. इस आधुनिक युग में विज्ञान और तकनीक का अभूतपूर्व विकास हुआ, भौगोलिक खोजें हुईं, भौतिक उन्नति हुई, धर्म के नाम पर हो रहे अनवरत शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई गई, अंधविश्वास, कुरीतियों आदि को नकारा गया, शासक की निरंकुशता को अस्वीकार किया गया, नागरिक अधिकार को महत्ता दी गई, लोकतान्त्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए अनुकूल परिस्थितियां विकसित हुईं और यातायात के साधनों में विकास के कारण, धीरे-धीरे वसुधैव कुटुम्बकम की कल्पना साकार रूप लेने लगी. यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि इस आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में प्राचीन ज्ञान को उदारता के साथ ग्रहण किया गया.

इसलिए हम आधुनिकता को एक अभिशाप न मानकर एक वरदान के रूप में देखें तो अधिक उचित होगा.

भारतीय सन्दर्भ में हम कबीर को आधुनिक कह सकते हैं क्यूंकि उन्होंने अपने समय की धार्मिक, सामाजिक मान्यताओं को बुद्धि-विवेक की कसौटी पर परख कर ही उन्हें स्वीकार अथवा अस्वीकार किया था. इस दृष्टि से हम मीरा बाई को भी आधुनिक कह सकते हैं क्यूंकि उन्होंने अपने आचरण से स्त्री-अस्मिता को एक नयी पहचान दी थी.

राजा राममोहन रॉय आधुनिक भारत के जनक कहे जाते हैं. उन्होंने सती प्रथा के अनौचित्य को दर्शाते हुए जो तर्क दिया था वह यह था कि ऋग्वैदिक काल में सती प्रथा का प्रचलन नहीं था और ‘सती’ से तात्पर्य अपने पतिव्रत धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करने वाली स्त्री से है न कि अपने मृत पति के साथ सहमरण करने वाली स्त्री से. संस्कृत और फ़ारसी के प्रकाण्ड पंडित होते हुए भी उन्होंने अग्रेज़ी शिक्षा के प्रचलन का समर्थन इसलिए किया था क्यूंकि इसी के माध्यम से भारतीय आधुनिक विज्ञान, तकनीक, वाणिज्य, लोकतान्त्रिक प्रणाली आदि से परिचित हो सकते थे. मेरी दृष्टि में ईश्वर चन्द्र विद्यासागर आधुनिक थे जिन्होंने विधवा-विवाह को शास्त्र-सम्मत सिद्ध किया था. मैं जमशेदजी टाटा को आधुनिक कहूँगा जिन्होंने अंग्रेजों द्वारा अपने प्रयास का उपहास उड़ाए जाने के बावजूद भारत में एशिया का सबसे बड़ा इस्पात का कारखाना स्थापित किया था.

आम तौर पर हम लोग आधुनिकता के विषय में अकबर इलाहाबादी का ही दृष्टिकोण रखते हैं. उनकी दृष्टि में आधुनिक तथा आधुनिका का अर्थ है – माँ-बाप को खब्ती समझने वाला, अंग्रेज़ी में गिटपिट करने वाला, कांटे-छुरी से खाना खाने वाला, घर की जगह होटल में रहने वाला, बेपर्दा, अपनी ही बारात में खुद नाचने वाली, शौहर को खाना खिलाने के बजाय सिर्फ़ किस्से सुनाने वाली और सभा की परी. आख़िर हम अकबर इलाहाबादी की सौ, सवा सौ साल पुरानी दकियानूसी मानसिकता से कब उबरेंगे?

गैर ज़िम्मेदार, उद्दण्ड, निरंकुश व्यवहार करने वाले, पश्चिम की जीवन-शैली का अन्धानुकरण करने वाले कैसे आधुनिक कहे जा सकते हैं? हमारे परम्परावादी, तथाकथित भारतीय संस्कृति के संरक्षक बड़े आराम से आधुनिकता के साथ नास्तिकता, भौतिकतावाद, स्वार्थपरता, उन्मुक्त व्यवहार, संस्कारहीनता, समाज तथा परिवार से पृथक रहकर स्वयं अपने द्वारा स्थापित मूल्यों के साथ जीने की प्रवृत्ति आदि को जोड़ देते हैं. पर आधुनिकता को इस रूप में परिभाषित करने का उन्हें किसने अधिकार दिया है? और यहीं दूसरा सवाल उठता है कि हिप्पी संस्कृति के अनुयायियों, माइकल जैक्सन के अंधभक्तों, धरती पर बोझ बने युवक-युवतियों को खुद को आधुनिक कहलाने का अधिकार किसने दिया है?

मेरी दृष्टि में आधुनिक वह है जो धार्मिक वैमनस्य, साम्प्रदायिकता, क्षेत्रवाद, जात-पांत, छुआछूत, लैंगिक असमानता, दहेज़ प्रथा, चमत्कार, भाग्यवाद, कर्मकांड, आडम्बर, तंत्र-मन्त्र आदि में विश्वास नहीं करता और जो केवल उन्हीं बातों पर, उन्हीं विचारों में विश्वास करता है जो बुद्धि-विवेक की कसौटी पर खरे उतरते हैं.

मैं अकबर इलाहाबादी की दकियानूसी विचारधारा का विरोधी हूँ किन्तु परम्परावादियों एवं तथाकथित आधुनिकों पर उनके द्वारा की गई यह टिप्पणी मुझे बहुत-बहुत अच्छी और सटीक लगती है –

‘पुरानी रौशनी में, और नयी में, फ़र्क इतना है,
उन्हें कश्ती नहीं मिलती, इन्हें साहिल नहीं मिलता.’

कबीर के शब्दों में कहें तो –
‘अरे इन दोउन राह न पाई.’

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत सुन्दर । लिखते चलिये बहुत जानदार चयन होता है आपकी भाषा में शब्दों का ।

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  2. धन्यवाद सुशील बाबू. तुम मेरे हर आलेख को पढ़ते हो, यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है.

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    1. जी और लोग भी पढ़ेंंगे उन्हे पता तो चले आप भी मैदान में हैं । आना जाना करिये लोगों के ब्लागों पर टिप्पणियाँ फोड़ कर तो आइये फिर देखिये कैसी आतिशबाती होती है आपके लिखे पर :)

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    2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (06-09-2016) को "आदिदेव कर दीजिए बेड़ा भव से पार"; चर्चा मंच 2457 पर भी होगी।
      --
      सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
      --
      चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
      जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
      --
      सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को नमन।
      शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    3. 6-9-16 के 'चर्चा मंच 2457' मेरा आलेख सम्मिलित करने के लिए धन्यवाद. आप सबको भी शिक्षक दिवस की बधाई और उन सब गुरुजन को नमन जो कि अपने विद्यार्थियों का ज्ञान-वर्धन करने के साथ-साथ उनके चरित्र निर्माण में भी सृजनात्मक भूमिका निभाते हैं.

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    4. वहाँ पर भी आभार व्यक्त कर के आईये ।

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  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति शिक्षक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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    1. 'शिक्षक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन' में मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए धन्यवाद हर्षवर्धनजी. आप के माध्यम से अपनी बात अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचाने में मुझे अत्यंत प्रसन्नता होती है.

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    2. वहाँ पर भी आभार व्यक्त कर के आईये ।

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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