शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

साहिर की नज़्म - ये किसका लहू है, कौन मरा' से आगे


कल कितने मरे,
परसों कितने,
और आज कहाँ की बारी है,
कालीन पड़े, दरियां हैं बिछी,
मातम की सब तैयारी है.
भाषण भी होने वाले हैं,
नारे भी लगने वाले हैं,
मरने वाले की झुग्गी में, 
मंत्री जी आने वाले हैं.
इम्दाद बंटेगी, लाखों की,
कुछ घर भी, बनाए जाएँगे,
बेवाओं और यतीमों संग,
फ़ोटो भी, खिंचाए जाएँगे. 
है हाथ, विदेशी ताक़त का, 
या क़हर, विपक्षी साज़िश का,
सरकार का कोई दोष नहीं,
मुस्तैद पुलिस, मदहोश नहीं,
जो हुआ, बहुत ही बुरा हुआ,
इसे भूल के, आगे बढ़ना है,
कुछ अनजाने चेहरे, खोजो,
सब दोष, उन्हीं पर, मढ़ना है.

12 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय सर सादर प्रणाम 🙏
    आपकी कलम तो जैसे झकझोर रही है और चीख चीख कर बता रही कि अंधभक्तों होश में आओ और देखो तुम्हें आपस में भिड़ाने की साज़िश आखिर थी किसकी। अफ़सोस सर राजनीति जीत रही है और देश हार रहा है। धर्म के आगे झुकी मानवता का सिर कलम कर दिया गया और हम सब बस रिमोट लिए न्यूज चैनल ही बदलते रहे। अब इस मातम का जश्न मनेगा। और जैसा की आपने कहा कुछ और ताहिर हुसैन और कपिल मिश्रा ढूँढ़कर उनपर दोष लगाकर,कुछ भाषण और कुछ सहायता बाँटते हुए लीपापोती की जायेगी और हमारा देश सब भूल आगे बढ़ेगा।
    आदरणीय सर कोटिशः नमन आपकी इन पंक्तियों को जो वास्तविकता से परदा हटाने की समय की माँग को पूरा कर रही है। बस नारायण से यही प्रर्थना है कि भविष्य में ऐसा कुछ लिखने की आवश्यकता ना पड़े और देश में अमन पताका फहरे।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. जो दुखद हालात दिल्ली में हो रखे हैं उसके पीछे की सियासी तस्वीर का पूरा चित्र खींच रही आपकी रचना।

      हटाएं
    2. सच्चे दिल से निकली तारीफ़ के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद आंचल! तुम लोगों का प्यार मेरी रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है. हम सब इस जन्नत कहे जाने वाले भारत की हक़ीक़त समझते हैं लेकिन ख़ुद को बेवकूफ़ बनाने और बनवाने की हमको आदत पड़ चुकी है. अब वक़्त आ गया है कि हम अपनी ये आदत बदलें और हिम्मत करके अपने धोखेबाज़ लीडरान को भी बदलें.

      हटाएं
  2. वाह! अनजान चेहरों की तलाश जल्द पूरी हो!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. विश्वमोहन जी, अभी बहुत काम होना बाक़ी है !
      पहले अनजान चेहरों को खोजा जाएगा, फिर उनको पुलिस कस्टडी में लिया जाएगा, फिर आधी रात के बाद उन्हें मौक़ा-ए-वारदात पर ले जाएगा. वहां से वो भागने की कोशिश करने के साथ पुलिस वालों पर हमला कर देंगे और आत्म-रक्षा हेतु पुलिस उनको मार गिराएगी.
      एक समारोह कर, इस सफल एनकाउंटर के बाद वीर पुलिस-कर्मियों को सम्मानित और पुरस्कृत भी किया जाएगा.

      हटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(०१ -0३-२०२०) को 'अधूरे सपनों की कसक' (चर्चाअंक -३६२७) पर भी होगी
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का
    महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    **
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अधूरे सपनों की कसक' (चर्चा अंक - 3627) में मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद अनीता.

      हटाएं
  4. आपकी रचनाओं पर बहुत ही कम आप आती हूँँऔर जब भी आती हूं तो प्रभावित हुए बिना नहीं जा पाती.. समसामयिक घटनाओं पर ज्यों का त्यों खाका खींच देना वाकई में आपकी कलम की बहुत बड़ी ताकत है.. कहीं अंदर ही अंदर इन्हीं सब बातों को महसूस कर रही हूँ जो कुछ भी आपने लिखा" कुछ अनजान चेहरे खोजो सारा दोष उन्हीं पर मड़ो"
    ये वही सच है जिस पर अभी काम होना बाकी है..!
    कब आंखें खुलेगी लोगों की पता नहीं तब तक बहुत देर ना हो जाए इतनी शानदार रचना के लिए आपको बधाई और धन्यवाद..।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अनु जी, आपकी प्रशंसा मेरे लिए अमूल्य है.
      आप जैसी कवि-ह्रदय तो मेरा इशारा समझ सकती है लेकिन सियासती भेड़िये उसे जानकर भी न समझने का नाटक करते रहेंगे.
      जांच-कमीशन चाहे जितने बैठाओ, उन्हें लीपा-पोती ही तो करनी होगी.
      इस देश का भला तो तभी हो सकता है, जब यहाँ सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो.

      हटाएं
  5. शानदार , निशब्द, साहिर ने कभी सोचा भी नहीं होगा जो उनको उस समय इतना भयावह दिखता था वो कितने गुणा बढ़ जायेगा ।
    साहिर की सोच को आगे बढ़ाते हुवे आपने आज का जीवंत खाका खींचा है ।
    लाजवाब।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. ऐसी प्रशंसा का किन शब्दों में आपको धन्यवाद दूं मन की वीणा?
      साहिर ने मक्कार बहुत देखे होंगे लेकिन आज के से मक्कार देख पाने की सज़ा से वो बच गए.
      साहिर हों, मजाज़ हों, फ़ैज़ हों, दिनकर हों, दुष्यंत कुमार हों, इन सबने कबीर से बहुत कुछ सीखा होगा.
      हम भाग्यशाली हैं कि कबीर से लेकर दुष्यंत तक की रचनाएँ हमारा मार्ग-दर्शन करने के लिए उपलब्ध हैं.

      हटाएं
  6. जमाना मक्कारों का है खुश रहिये :)
    लिखने के लिये मसाला दे रहे हैं
    किसने कहा चुप रहिये?

    जवाब देंहटाएं