शनिवार, 20 अप्रैल 2019

राजनीतिक विकृति

जोश मलिहाबादी का एक शेर है -
सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,
जब कोई हमदर्द मिलता है तो, रो देता हूँ मैं.
भारतीय लोकतंत्र के सन्दर्भ में मैंने इस शेर का पुनर्निर्माण कुछ इस तरह किया है -
सब्र की ताक़त जो कुछ दिल में है, खो देता हूँ मैं,
वो इसे जनतंत्र कहते हैं तो, रो देता हूँ मैं.
लेकिन बात मज़ाक़ की नहीं है. आज सवाल यह है कि हमारे देश की राजनीति - गटर-पॉलिटिक्स क्यों बन गयी है. आज राजनीतिक प्रदूषण हमारे औद्योगिक प्रदूषण से भी अधिक विषाक्त क्यों हो गया है? आज हम किसी भी राजनीतिज्ञ की बात पर भरोसा क्यों नहीं कर पाते हैं और किसी भी राजनीतिक दल के मैनिफ़ैस्टो को हम चुनावी-जुमला मानने के लिए क्यों विवश हैं?
आज समस्त विश्व के राजनीतिक पटल पर उच्च से उच्च राजनीतिक आदर्शों की अंत्येष्टि की जा रही है. मत्स्य-न्याय, 'सर्वाइवल ऑफ़ दि फ़िटेस्ट' समरथ को नहिं दोस गुसाईं' के सामने समाजवाद, साम्यवाद, लोक-तंत्र, 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' आदि के सिद्धांत फीके पड़ गए हैं.
समृद्ध पाश्चात्य देशो में भी लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा बेमानी होती जा रही है. उन देशों में कोई भूखा नहीं मरता लेकिन वहां भी गरीब हैं और दूसरे देशों के गरीबों को कम पैसे देकर दास-कार्य का दायित्व भी दिया जाता है. वहां भी अपराध माफ़िया का सियासत में दबदबा चलता है.
रूस, चीन ही क्या, सभी साम्यवादी देशों में साम्यवादी विचारधारा की धज्जियाँ उड़ चुकी हैं.
मुस्लिम देशों में मुस्लिम विश्व-बंधुत्व की अथवा समानता की भावना कब की तिरोहित हो चुकी है.
भारत भी शीघ्र ही लोकतंत्र की कब्रगाह बनने वाला है. धर्म निरपेक्षता की नीति तो पहले ही आंखरी साँसें ले चुकी है. नफ़रत की भीषण आग को सद्भाव के अंजुरी भर शीतल जल से बुझाया नहीं जा सकता.
बीजेपी तो कम से कम खुले आम दक्षिण-पंथी और अनुदारवादी दल है, तथाकथित उदारवादी, समाजवादी, बहुजन समाजवादी और प्रगतिशील दल भी अन्दर से खोखले हो चुके है.और उनका भी किसी सिद्धांत से लेना-देना नहीं है. वंशवाद सब दलों में है, बंदर-बाट सब जगह है, काला धन सब दल लेते हैं, सब दलों में प्रभावशाली अपराधियों का और विभीषणों का स्वागत होता है. राजनीति में स्त्रियों की सहभागिता मुख्य रूप से ग्लैमर बढ़ाने के लिए अथवा वंशवाद की परंपरा का निर्वाह करने के लिए होती है.
लोकतंत्र के इस विकृत वातावरण में हम आम लोग, द्रोपदी के समान बेबस होकर अपने सपनों का चीर हरण होते देखते हैं और हमारे सपनों की लाज बचाने के लिए कोई कान्हा भी कभी नहीं आता. भविष्य में राजनीति का और भी अधिक पतन होगा. हमारी आशाओं पर, हमारी आकाँक्षाओं पर, और भी कुठाराघात होगा. राजनीति का और भी अधिक अपराधीकरण होगा.
हमारी बेबसी, हमारी कुंठा और हमारे नपुंसक आक्रोश (impotent rage) के निवारण के लिए यह ज़रूरी है कि हमको इस बनावटी लोकतंत्र के स्वरुप में आमूल परिवर्तन करने के लिए एक देश-व्यापी आन्दोलन करना होगा और झूठे-मक्कारों को किसी भी मूल्य पर अपना प्रतिनिधि स्वीकार नहीं करना होगा. हमको स्पॉन्सर्ड जन-सभाओं का बहिष्कार करना होगा. हमको नेताओं का जाप करने वालों का विरोध करना होगा, उनका चालीसा लिखने वालों और उन चालीसाओं का पाठ करने वालों का उपहास उड़ाना होगा.
हम अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जाएगी. हमारे लोकतंत्र का महल तो खंडहर हो ही चुका है, फिर तो उसकी नीव भी खोखली हो जाएगी और वह हमारे देखते-देखते भरभराकर धराशायी भी हो जाएगा.
केला तबहिं न चेतिया, जब ढिंग लागी बेर,
अब चेते ते का भया, काँटा लीन्हें घेर.

मंगलवार, 16 अप्रैल 2019

सज़ा-ए-मौन


सज़ा-ए-मौन -'
( 'पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई' गीत की तर्ज़ पर )
पूछो न कैसे, मैंने बैन बिताया,
इक जुग जैसे इक पल बीता, जुग बीते मोहे चैन न आया,
मरघट जैसे सन्नाटे में, रहना हरगिज़ रास न आया.
दाल-ए-सियासत फीकी लागे, गाली का नहिं छौंक लगाया,
मुनि दुर्वासा की संतति को, मधुर बचन, कब कहाँ, सुहाया.
मुंह सिलवाया, कपड़ा ठूंसा, सम्मुख चौकीदार बिठाया,
गाली-गायन रीत पुरानी, मुझ पर ही क्यों सितम है ढाया.
कोयल कुहुक करे तो अच्छा, श्वान जो भोंके, तो वो सच्चा,
मेरी सहज प्रकृति पर बंधन ! ओ निष्ठुर ! तोहे, रहम न आया.
पूछो न कैसे, मैंने बैन बिताया -----

रविवार, 7 अप्रैल 2019

चुनाव परिणाम से पूर्व मातृ-पुत्र संवाद

अपनी 20 साल पुरानी कविता – ‘उत्तराखंड की लोरी’ को नए सांचे में ढालने की एक गुस्ताख़ कोशिश -
चुनाव परिणाम से पूर्व का मातृ-पुत्र संवाद –
बेटे का प्रश्न -
शपथ-ग्रहण के बाद बता मां ! क्या अच्छे दिन आएँगे?
या पंजे की अनुकम्पा से, कष्ट सभी मिट जाएंगे?
गठबंधन के नेता क्या, भारत को स्वर्ग बनाएँगे?
सेहरा में भी फूल खिलेंगे, वन-उपवन मुस्काएंगे?
बंधुआ सब मज़दूर कभी क्या, खुली सांस ले पाएंगे?
क्या गरीब के बच्चे भी अब, स्कूलों में जाएंगे?
रोटी, कपड़ा, कुटिया का क्या, सब आनंद उठाएंगे?
अपनी मेहनत का मीठा फल, क्या हम ख़ुद खा पाएंगे?
माँ का उत्तर -
अरे भेड़ के पुत्र, भेड़ियों से क्यों, आशा करता है?
दिवा स्वप्न में मग्न भले रह, पर सच से क्यों डरता है?
कोई नृप हो, हम सा तो, आजीवन पानी भरता है,
श्रम-कण नित्य बहाने वाला, तिल-तिल कर ही मरता है.
चाहे जिसको रक्षक चुन लें, वह भक्षक बन जाएगा,
मजलूमों का खून चूस कर, अपनी प्यास बुझाएगा.
वन-उपवन श्मशान हो गए, कुसुम कहां खिल पाएगा?
हम सी लावारिस लाशों का, कफ़न नहीं सिल पाएगा.
रात हो गयी, मेहनतकश सब, अपने घर जाते होंगे,
जल से चुपड़ी बासी रोटी, भाग्य समझ, खाते होंगे.
हम भी सोएं, ना जाने कब, ये दुर्दिन, जाते होंगे,
भैंसे पर आरूढ़ देवता, न्योता ले, आते होंगे.

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

एक पवित्र और एक अपवित्र कथा

आदरणीय राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी की वाल से उधार ली गयी महात्मा बुद्ध और उनके शिष्य ‘पूर्ण’ की एक प्रेरक कथा –
बुद्ध का शिष्य था - पूर्ण !
बहुत दिनों तक उनके पास रहा, जब शिक्षा पूरी हो गयी तो बुद्ध ने कहा –
‘शिष्य ! अब तुम मेरे प्रेम और अहिंसा के संदेश को हिंसक लोगों के बीच ले जाओ!’
पूर्ण अपने गंतव्य की ओर जाने को तत्पर हुआ तो बुद्ध ने कहा –
‘वहाँ के लोग तो बहुत उग्र हैं ! वे तुम्हें गाली देंगे तुम्हारा अपमान करेंगे !’
पूर्ण बोला – ‘ कोई बात नहीं , मैं तो ऐसे लोगों को दयालु ही मानता हूँ कि वे गाली ही तो देंगे, अपमान ही तो करेंगे, पत्थर तो नहीं मारेंगे !’
बुद्ध बोले - ‘पूर्ण, वे पत्थर भी मार सकते हैं !’
पूर्ण बोला - ‘कोई बात नहीं, मैं तो ऐसे लोगों को दयालु ही मानता हूँ कि वे पत्त्थर ही तो मारेंगे, जान से नहीं मार डालेंगे !’
बुद्ध बोले – ‘पूर्ण, पर वे तो जान से भी मार सकते हैं !’
पूर्ण ने उत्तर दिया – ‘तब तो वे सचमुच ही दयालु हैं कि मुझे इस जीवन से मुक्त कर देंगे, जिसमें मैं भटक भी सकता हूँ !’
तब बुद्ध ने कहा – ‘वत्स ! अब तुम जाओ , तुम्हारी शिक्षा पूर्ण हो चुकी है !’
इस पवित्र कथा पर आधारित किन्तु मेरे द्वारा संशोधित,गुरुघंटाल और उसके महा-घाघ शिष्य की एक अपवित्र कथा –
ढपोलशंख की वाक्पटुता, मदारी का मजमा इकठ्ठा करने का हुनर, ख़ुद को दूध पिलाने वाले को डसने वाले सांप के गुण और इन्सान को समूचा निगलने के बाद भी डकार न लेने की विद्या सिखाने के बाद गुरु-घंटाल ने अपने शिष्य महा-घाघ से कहा –
‘महा-घाघ! मुझे जो-जो तिकड़म आती थीं वो मैंने तुझे सिखा दीं हैं. अब तू अंधेर-नगरी में राजनीति के रण-क्षेत्र में कूद पड़.’
शिष्य महा-घाघ अंधेर-नगरी में अपनी राजनीति का चक्कर चलाने के लिए तत्पर हुआ.
गुरु-घंटाल ने उसे सावधान किया –
‘अंधेर-नगरी के लोग बड़े खूंख्वार हैं. हर नेता का स्वागत करने के लिए उनके ऊपर जूते बरसाने को वो हमेशा तैयार रहते हैं.
महा-घाघ ने कहा – ‘कोई बात नहीं , मैं पुराने जूतों की एक दूकान खोल लूँगा. वैसे ऐसे लोगों को मैं दयालु ही मानता हूँ कि वे जूते ही तो बरसाएंगे, पत्थर तो नहीं मारेंगे !’
गुरुघंटाल बोले - ‘शिष्य ! वे पत्थर भी मार सकते हैं !’
महा-घाघ बोला - ‘कोई बात नहीं, मैं हेल्मेट और छाती पर पैड वगैरा लगा कर जाऊंगा. वे पत्थर ही तो मारेंगे, जान से तो नहीं मार डालेंगे !’
गुरुघंटाल बोले – ‘शिष्य ! वे तो तुझे जान से भी मार सकते हैं !’
महा-घाघ ने उत्तर दिया – ‘उनसे निपटने के लिए मेरे साथ क्या किराए के गुंडे नहीं होंगे?’ वैसे भी मेरी ए. के. छप्पन के सामने वो कितनी देर टिक पाएंगे?
तब गुरुघंटाल ने कहा – ‘वत्स ! अब तू जा, तेरी शिक्षा पूर्ण हो चुकी है !’
महा-घाघ ने अपने हाथ जोड़ कर गुरुघंटाल से कहा – ‘गुरु जी ! आपकी चरण-धूलि तो ले लूं और यह भी सुनिश्चित कर लूं कि यह महा-घाघ विद्या आप किसी और को न दे पाएं !’
इतना कहकर महा-घाघ ने गुरुघंटाल को उनके पैर से उठाकर, उन्हें पटक दिया और फिर उनका गला दबा, उनको अपना अंतिम प्रणाम कर, वह अंधेर-नगरी जीतने के लिए चल पड़ा.

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

गुरु-शिष्य संवाद




सवाल-जवाब -
गुरु जी - बच्चों ! 'सी. बी. आई.' का फ़ुल फॉर्म क्या होता है?
एक मेधावी छात्र - गुरु जी ! पौने पांच साल पहले तक इसका फ़ुल फॉर्म -
'कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन' था
लेकिन फिर बदल कर -
'सेंट्रल बीजेपी इन्वेस्टीगेशन' हो गया है.
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चलो, आगे बढ़ते हैं -
गुरु जी - बिस्मार्क ने कहा था -
राजनीति में किसी भी बात पर तब तक विश्वास मत करो जब तक कि
उसका आधिकारिक रूप से खंडन न किया जाए.
एक छात्र - तो क्या सरकार के नुमाइंदे जिन-जिन आरोपों का खंडन कर रहे हैं --?
गुरु जी (छात्र को बीच में ही रोकते हुए) -
इस कथन को रहने दो. अब गांधीजी का एक कथन सुनो ---
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स्कूल इंस्पेक्शन -
स्कूल इंस्पेक्टर (विद्यार्थियों से) - बच्चों, बताओ! विधायक और सांसद में कौन बड़ा होता है?
एक विद्यार्थी - सर, विधायक से सांसद बड़ा होता है.
स्कूल इंस्पेक्टर - शाबाश ! बेटा, इसको विस्तार से समझाओ.
विद्यार्थी - सर, सांसद, विधायक को पांच जूते मार सकता है जब कि विधायक उसे सिर्फ़ थप्पड़ लगा सकता है और वो भी केवल दो !
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गुरु जी का विद्यार्थियों से एक पेचीदा प्रश्न -
'कोई एक 15 लाख, हर खाते में डालने का वादा करे,
कोई दूसरा 6000/- हर महीने खाते में डालने का वादा करे,
कोई तीसरा हरेक को एक बंगला देने का वादा करे
और
कोई चौथा उन बंगलों में एक-एक मर्सिडीज़ खड़ी करने का वादा करे ,
तो बताओ -
इनमें से किसका ख़याली पुलाव ज़्यादा स्वादिष्ट होगा?'
एक विद्यार्थी -
'गुरु जी, आपके इस सवाल का जवाब तो 23 मई को सारा देश देगा.'

रविवार, 17 मार्च 2019

क़ौमी फ़साना


सारे जहाँ में चर्चा, होता यही, हमारा.

अब बुलबुलें न दिखतीं, सहरा, वतन हमारा.

रो-रो सिसक रही हैं, इसकी हज़ारों नदियाँ,

परबत भी खौफ़ से अब, है काँपता हमारा. 

मज़हब-धरम सिखाता, आपस में, बैर रखना,

घर उनके,  हम जलाएं, वो फूंके घर,  हमारा.

हर शाख पर कुल्हाड़ा या फिर चलाया, आरा,

नादानियों से ख़ुद की, उजड़ा चमन, हमारा.

क्या बात है, जहालत, मिटती नहीं हमारी,

सदियों पिछड़ गया है, हिन्दोस्तां, हमारा.  

किस्मत ने साथ छोड़ा, रूठा ख़ुदा, हमारा,

अब फिर जनम न लें हम, इसमें कभी, दुबारा.

सारे जहाँ में चर्चा ---

मंगलवार, 12 मार्च 2019

अस्माकं विद्यालय

अस्माकं विद्यालय -
आज से 60 साल पहले पिताजी का लखनऊ से इटावा ट्रांसफ़र हुआ था. तब मेरी उम्र आठ साल की थी. लखनऊ जैसे बड़े शहर से इटावा जैसे कस्बाई जिले में जाना किसी को भी रास नहीं आ रहा था पर किया ही क्या जा सकता था !
लखनऊ में मैं, 'बॉयज़ एंग्लो बंगाली इंटर कॉलेज' में क्लास फ़र्स्ट से क्लास थर्ड तक पढ़ा था. हमारा यह कॉलेज, अच्छा-खासा था. हमारे टीचर्स अच्छे थे, क्लास रूम्स अच्छे थे और उनमें पड़ी लम्बी-लम्बी बेंचें, उनके सामने के डेस्क भी बहुत अच्छे थे.
हमारे लखनऊ के कॉलेज में इंग्लिश, क्लास फ़ोर्थ से पढ़ाई जाती थी इसलिए अपने राम लखनऊ प्रवास में इंग्लिश में सर्वथा पैदल ही थे.
इटावा में मुझे क्लास फ़ोर्थ में नाम लिखाना था. मेरे लिए स्कूल तलाशे गए तो पता चला कि वहां प्राइमरी क्लासेज़ के लिए कोई ढंग का कोई स्कूल ही नहीं है. लड़कियों का एक इंग्लिश स्कूल था जिसमें कुछ लड़के भी पढ़ते थे लेकिन उन में मेरी तरह का इंग्लिश में महा-पैदल कोई नहीं था. हफ़्ते भर की बेकार की क़सरत के बाद मुझे पुरबिया टोले के राजकीय आदर्श विद्यालय (मॉडल स्कूल) में ले जाया गया.
पांच-छह कमरों का छोटा सा स्कूल, छोटा सा कंपाउंड, आधे देहाती से मास्साब लोग और पोस्ट मास्टर साहब के लड़के, सुनील सचदेव के अलावा बाकी महा-देहाती विद्यार्थीगण ! मेरी तो तब जान ही निकल गयी जब यह पता चला कि मुझे दरी-टाट पर बैठना पड़ेगा. क्लास-रूम की एक मात्र कुर्सी मास्साब के लिए सुरक्षित थी.
मेरी टी. सी., मेरा क्लास थर्ड का रिज़ल्ट और फ़ीस के पैसे लेकर पिताजी का स्मार्ट चपरासी बच्चीलाल मेरे साथ राजकीय आदर्श विद्यालय गया था. पांच मिनट में ही मेरा एडमिशन हो गया और फ़ीस के नक़द 10 आने देकर बच्चीलाल, मुझ रुआंसे बालक को कक्षा चार के कक्ष में एक फटहे से टाट पर बिठाकर चल दिया. वैसे हमारे स्कूल में मासिक शुल्क - मात्र तीन पैसे था. पहली फ़ीस के 10 आने में से 8 आने तो कौशन मनी था.
मुझे ज़मीन पर बिछे टाट या दरी पर बैठने की आदत ही नहीं थी. मेरे सहपाठी मेरी दिक्क़त को देख कर ‘खी-खी’ किये जा रहे थे.
हमारे क्लास टीचर तिवारी मास्साब ने बीड़ी नंबर 207 का एक गहरा कश लगाते हुए मुझसे पूछा –
‘हाँ तो बेटा गोपेस मोहन ! तुम लखनऊ से आए हो. लखनऊ के बारे में सबको बताओ.
मैंने भरे गले से सिर्फ़ इतना कहा –
‘मेरा नाम गोपेश मोहन है, गोपेस मोहन नहीं!’
मास्साब ने जवाब दिया –
‘हाँ, हाँ, गोपेस मोहन’ ही तो कह रहा हूँ.’
इसके बाद मैंने फिर कभी तिवारी मास्साब को या अपने किसी सहपाठी को सुधारने की कोशिश नहीं की और स्कूल में सुनील सचदेव के अलावा मेरा नाम जिसने भी पुकारा तो – ‘गोपेस मोहन’ ही पुकारा.
हमारे राजकीय विद्यालय में प्राइमरी क्लास तक सभी विद्यार्थी, लिखने के लिए स्याही-कलम का प्रयोग करते थे जब कि मैं लखनऊ में लिखने के लिए सिर्फ़ पेंसिल का प्रयोग करता था. मेरा जैसा असावधान और बेतरतीब लड़का, कलम से लिखते वक़्त अपने शरीर पर, अपने कपड़ों पर, अपने बस्ते पर और अपने आसन-रूपी टाट पर ख़ूब स्याही गिरा लेता था. घर लौटने पर मुझे ख़ुद को खुरच-खुरच साफ़ करना पड़ता था और मेरे कपड़ों को साफ़ करने में धोबी को डबल मेहनत करनी पड़ती थी.
मेरे सहपाठी मुलायम सिंह यादव जैसी कनौजिया-मिश्रित ब्रज भाषा बोलते थे. एक नज़ीर पेश है –
‘जब हम कच्छा तीन पढ़त हते तो सर्मा मास्साब गणित पढ़ात्ते. 7 का पहाड़ा ना याद होये तो डंडन ते मार-मार के हमाई सगरी देह सुजाय देत्ते.’
मैं शहरी माहौल में पला हुआ, दुरुस्त क़ाफ़ और शीन वाला, बच्चन और नीरज की कविताओं का दीवाना, इन मेधावी छात्रों के बीच में ख़ुद को अभिशप्त समझने लगा था. मैं चाहता था कि मुझे लखनऊ के किसी अच्छे स्कूल में पढ़ने के लिए भेज दिया जाए पर मेरा अंग्रेज़ी का अज्ञान तो इटावा के ही एक मात्र इंग्लिश स्कूल में भी मेरे एडमिशन में बाधक बन गया था. मजबूरन –
‘पचम पच्चे पच्चिस, छक्के तीस, सते पैंतिस, अट्ठे चालिस, नमे पैंतालिस , धम्मा पचास’ का गीत गाने में मुझे भी निष्णात होना पड़ा.
मुझे बैडमिंटन और क्रिकेट खेलना पसंद था पर हमारे स्कूल में खेलों के नाम पर ज़्यादातर कबड्डी, गिट्टी-फोड़ और गेंद-तड़ी ही खेली जाती थीं.
हमारा स्कूल, नार्मल स्कूल से अटैच्ड था. नार्मल स्कूल के प्रिंसिपल मेरी हाज़िर-जवाबी और मेरे बात करने के तरीक़े को देखकर मुझसे बहुत खुश रहते थे. बातों-बातों में प्रिंसिपल साहब को क्रिकेट में मेरी अभिरुचि के बारे में पता चला. प्रिंसिपल साहब भी मेरी तरह क्रिकेट के दीवाने थे. अपने दोस्तों के सामने मुझे बुलाकर वो भारतीय क्रिकेट खिलाडियों पर ‘जनगण मन अधिनायक जय हे’ की धुन पर मेरे बड़े भाई साहब की कविता –
‘विजय हज़ारे, वीनू मनकद, विजय मांजरेकर,
नाना जोशी, नरेंद्र तम्हाने, पौली उम्रीगर,
घोर्पदे, देसाई, गुप्ते, मनहर हार्डीकर,
गायकवाड़, बोर्डे, सुरती, नारी कांट्रेक्टर.’
सुना करते थे और मुझे दालमोठ, मिठाई भी खिलाया करते थे. प्रिंसिपल साहब की नज़रों में मेरी क़दर देखकर, हमारे स्कूल के हेड मास्टर साहब, स्कूल में होने वाले हर इंस्पेक्शन में, हर फंक्शन में, मुझे आगे कर देते थे. धीरे-धीरे मेरे सहपाठियों पर भी मेरा रौब ग़ालिब होने लगा.
कक्षा पांच में हमको टाट की जगह बैठने के लिए लकड़ी के पटरे मिल गए और उनके सामने नीची-नीची मुंशी डेस्क भी मिल गईं. और तो और, लडकियों के स्थानीय इंग्लिश स्कूल में लड़कों का प्रवेश वर्जित हो जाने के कारण चार लड़के उस स्कूल से निकल कर हमारे स्कूल में आ गए. अब मेरी कंपनी अच्छी-ख़ासी हो गयी. फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ का ये नग्मा मेरी खुशकिस्मती का बखूबी बयान कर सकता था-
‘दुःख भरे दिन बीते रे भैया, अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे'

आज अपनी नादानियों पर हंसी आती है. हमारे राजकीय आदर्श विद्यालय में कई विषयों में, पढ़ाई बहुत अच्छी होती थी. हमारे गणित, सामाजिक विज्ञान, हिंदी और ड्राइंग के मास्साब तो कमाल के थे. नार्मल स्कूल के विद्यार्थी भी हमको पढ़ाने आते थे और उन में से भी कई बहुत अच्छा पढ़ाते थे.
अर्ध-ग्रामीण स्कूलों में नितांत शहरी बच्चों की बड़ी क़द्र होती है. दो साल तक मैं अपने राजकीय आदर्श विद्यालय का सुपर हीरो रहा लेकिन क्लास फिफ्थ में अच्छी कम्पनी मिल जाने के बाद भी मेरा मन स्कूल में नहीं लगा.
मेरे दो बड़े भाई, गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, इटावा में पढ़ते थे. उनके साथ मैं कई बार उनके कॉलेज गया था. हाय ! क्या शानदार कॉलेज था ! कितनी बड़ी फ़ील्ड थी ! कितना बड़ा हॉल था ! एक गोल कमरे वाला – ‘सम्पूर्णानन्द शैक्षिक संग्रहालय’ भी था. सबसे ख़ूबसूरत बात यह थी कि सभी छात्रों के बैठने के लिए कुर्सियां थीं. और तो और, वहां छात्रों को लिखने के लिए फाउंटेन पेन का उपयोग करने की अनुमति थी.
राजकीय आदर्श विद्यालय में पढ़ते वक़्त मेरा सिर्फ़ एक सपना होता था कि मैं क्लास सिक्स्थ में गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में एडमिशन पा जाऊं. एंट्रेंस टेस्ट के लिए मैंने बाक़ायदा तैयारी की, कैपिटल और स्मॉल लेटर्स के चील-बिलौए बनाने भी सीख लिए और फिर कक्षा पांच उत्तीर्ण करके मैं गवर्नमेंट इंटर कॉलेज के एंट्रेंस टेस्ट में क्वालीफ़ाई भी कर गया. अलविदा - राजकीय आदर्श विद्यालय !
इस ‘अलविदा – राजकीय आदर्श विद्यालय’ के साथ पुराने सुपर हीरो गोपेश मोहन धरती पर उतर आए थे क्योंकि गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, इटावा के सिक्स्थ क्लास में अधिकतर लड़के उन्हीं तरह शहरी पृष्ठभूमि के थे और कुछ उनमें अंग्रेज़ीदां भी थे. वहां अपने सहपाठियों पर या अपने गुरुजन पर उनका रौब ग़ालिब होने का कोई सवाल ही नहीं उठता था. अब ‘अंधों में काना राजा’ वाली सिचुएशन नहीं थी. अब काने गोपेश मोहन का मुक़ाबला करने के लिए सिर्फ़ काने ही नहीं, बल्कि दो-दो आँखों वाले भी थे. लेकिन उनके लिए नया माहौल निहायत ही ख़ुशगवार था जो कि पिछले दो साल से लगातार देखे जा रहे, उनके ‘हैप्पी एंडिंग’ वाले सपने जैसा था.