गुरुवार, 1 अक्टूबर 2020

मस्जिद नाहिं गिरायो

 साहब मोरे मस्जिद नाहिं गिरायो

भोर भये पूजा पर बैठ्यो सुध-बुध सब बिसरायो
प्रभु-भक्ती में लीन रह्यो तब सांझ परे कछु खायो
मैं बालक बहिंयन को छोटो मस्जिद किहि बिधि पायो
भीड़ मुई बेकाबू है गयी चढ़ कर ताहि ढहायो
नीर-क्षीर तू परम बिबेकी इनकी बात न आयो
फिर भी यदि कछु संका होवे जनमत तुरत करायो
बीत गए अट्ठाइस सावन कृपा नाहिं बरसायो
न्यायधीस तब बिहँसि आरोपी दोस-मुक्त ठहरायो

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

कुर्सी बिन सब सून

 वो जो दिन रात रहा करता था  गुलज़ार कभी


गुलो-बुलबुल का हसीं बाग  उजड़ता क्यूं है


जी-हुज़ूरों से जो यशगान सुना करता था


आज बीबी से फ़क़त ताने ही सुनता क्यूं है


किसी अखबार में फ़ोटो भी नहीं दिखती है


फिर भी मनहूस बिना नागा ये छपता क्यूं है  


अब न फ़ीता है न कैंची न कोई माइक है


तालियाँ सुनने को दिल हाय मचलता क्यूं है 


दोस्त तो दोस्त पड़ौसी भी फ़क़र करता था


आज हर कोई मेरे साए से भी बचता क्यूं है


जादू कुछ मुझ में नहीं था तो मिरी कुर्सी में


जान कर दिल ये मुआ फिर भी तड़पता क्यूं है   

शनिवार, 26 सितंबर 2020

धीरज की परीक्षा

 सेठ जी (अपनी धर्मपत्नी से) : प्रिये ! इस लॉकडाउन में मेरा धंधा बिलकुल चौपट हो गया है. मुझे अपने धंधे को फिर से पटरी पर लाने लिए पचास लाख रुपयों की सख्त ज़रुरत है.

तुम्हारे अकाउंट में तो दो करोड़ रूपये फ़ालतू पड़े हैं. तुम अगर पचास लाख रुपयों की मदद कर दो तो मैं बर्बाद होने से बच जाऊंगा.
गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है -
धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
तुम तो धार्मिक भी हो. मेरी मित्र भी हो और एक महान नारी तो हो ही.

मुझे विश्वास है कि तुम मेरे इस आपद काल में मेरी मदद कर के तुलसीदास जी की इस कसौटी पर खरी उतरोगी.

धर्मपत्नी : प्राणनाथ ! तुलसीदास जी ने धर्म, मित्र और नारी से पहले 'धीरज' का उल्लेख किया है.
आप आपदकाल के समय - धर्म, मित्र और नारी को परखना भूल जाइए और केवल अपने धीरज को परखिए.
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बुधवार, 23 सितंबर 2020

सुदामा चरित

कलयुगी सुदामा : मित्र ! मुझे दो लाख रूपये दे दो. अगर मुझे ये रकम नहीं मिली तो तुम समझ

लेना कि तुम्हारा दोस्त मर गया !

कलयुगी श्री कृष्ण : मित्र ! तुम किस से बात कर रहे हो? मैं तो तुमसे भी पहले मर चुका हूँ.

सन्दर्भ :

रहिमन वे नर मर चुके जो कहुं मांगन जाहिंं

उन ते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहिं

शनिवार, 19 सितंबर 2020

आयातित आत्मनिर्भरता

 आयातित आत्मनिर्भरता -


अपनी तो बस, मूंछें ही मूंछें हैं' यह बात भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आज से 136 साल पहले, बलिया में दिए गए अपने भाषण में

कही थी. और - 'फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी' वाली बात शैलेन्द्र ने 1954 में फ़िल्म - 'श्री 420' में कही थी.

और अब हम कह रहे हैं -

टीवी चीनी या जापानी

भाषा ख़ालिस इंगलिश्तानी

मेरे अस्त्र-शस्त्र अमरीकी

फिर भी मूंछे हिन्दुस्तानी

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

हिंदी पखवाड़ा

हिंदी दिवस का जश्न तो जैसे तैसे मना लिया जाता है लेकिन एक पखवाड़े तक हिंदी पखवाड़ा मनाना तो बहुत कष्टकारी है.
हिंदी-भक्त होने की नौटंकी महाभारत की अवधि से मात्र तीन दिन कम के लम्बे समय तक कैसे खेली जा सकती है?
हिंदी पखवाड़ा जिस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में मनाया जाता है, उस घटना का मैं आज खुलासा कर रहा हूँ –
इसी पखवाड़े में कलयुगी राजा रामचंद्र ने माता कौशल्या रूपी हिंदी को निर्वासित कर, कैकयी रूपी अपनी सौतेली माता अंग्रेज़ी को राजभाषा रूपी राजमाता के पद पर प्रतिष्ठित किया था.
एक बार फिर से मेरी पुरानी कविता -
1.
कितनी नक़ल करेंगे, कितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ की, जीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों का, दामन वो थाम लेंगे,
हिंदी दिवस पे ही बस, हिंदी का नाम लेंगे.
2.
जिसे स्कूल, दफ्तर से, अदालत से, निकाला था,
उसी हिंदी को घर से और दिल से भी निकाला है.
तरक्क़ी की खुलें राहें, मिले फिर कामयाबी भी,
बड़ी मेहनत से खुद को, सांचा-ए-इंग्लिश में ढाला है.
3.
सूर की राधा दुखी, तुलसी की सीता रो रही है,
शोर डिस्को का मचा है, किन्तु मीरा सो रही है.
सभ्यता पश्चिम की, विष के बीज कैसे बो रही है,
आज अपने देश में, हिन्दी प्रतिष्ठा खो रही है.
4.
आज मां अपने ही बेटों में, अपरिचित हो रही है,
बोझ इस अपमान का, किस श्राप से वह ढो रही है.
सिर्फ़ इंग्लिश के सहारे, भाग्य बनता है यहां,
देश तो आज़ाद है, फिर क्यूं ग़ुलामी हो रही है.

एक नए छंद का जन्म -

सुश्री सुषमा सिंह ने अपनी टिप्पणी में यह सुन्दर कविता उद्धृत की -
‘कभी तुलसी, कभी मीरा, कभी रसखान है, हिन्दी
कभी दिनकर, कभी हरिऔध की, मुस्कान है हिन्दी.
निराला की कलम से जो, निकलकर विश्व में छाई,
हमारे देश हिन्दुस्तान की, पहचान है हिन्दी.’

मैंने इस पर अपनी आपत्ति जताते हुए कहा है -


निराला को कभी जो एक कुटिया तक न दे पाई,
वही बे-बेबस, भिखारन, बे-सहारा, है मेरी हिंदी !'
जिसे वृद्धाश्रम में, ख़ुद, समूचे दिन बिताने हैं,
किसी के भाग्य को अब क्या संवारेगी, मेरी हिंदी !

 

सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिंदी दिवस

हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा आदि का नाटक हम 1960 के दशक से देखते और सहते आ रहे हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति - 'निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल' को सुन-सुन कर तो हमारे घरों के पालतू तोते भी उसे गुनगुनाने में निष्णात हो गए हैं. हिंदी को भारत के माथे की बिंदी बताने की रस्म आज हिंदी-भाषी क्षेत्र का बच्चा-बच्चा निभा रहा है. अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने की पंक्ति- 'हिंदी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा' का अर्थ समझे बिना आज के दिन हिंदी भक्त उसे दोहराते आए हैं. यहाँ यह बता दूं कि इस पंक्ति में 'हिंदी' का अर्थ है - हिंद का निवासी यानी कि हिन्दुस्तानी यहाँ हिंदी भाषा से इसका कोई लेना देना नहीं है. 

भारतेन्दुकालीन हिंदी नवजागरण में हिंदी के सर्वतोमुखी विकास का सार्थक प्रयास प्रारंभ हुआ. हिंदी को स्थानीय बोलियों और साहित्य की भाषा से कहीं ऊपर शिक्षा, राजकाज, न्यायपालिका और व्यापार की भाषा के रूप में विकसित करने के प्रयास प्रारंभ हुए. फूट डाल कर शासन करने की नीति अपनाने वाले अंग्रेज़ शासकों ने इसे हिंदी-उर्दू तथा हिन्दू-मुसलमान का आपसी झगड़ा बना दिया. कबीर के शब्दों में कहें तो - 'अरे इन दोउन राह न पाई' हिंदी-उर्दू के झगड़े ने, देवनागरी लिपि और अरबी-फ़ारसी लिपि की आपसी टकराहट ने दोनों का नुकसान किया और अंग्रेज़ी भाषा का तथा रोमन लिपि का प्रभुत्व ज्यों का त्यों बना रहा. बहुत कम हिंदी समर्थक यह मानते हैं कि मानक हिंदी उर्दू की ऋणी है. भारतेंदु के युग में जिस खड़ी बोली का विकास किया गया, द्विवेदी युग में जिसका परिष्कार किया गया, उसका पहला पन्ना तो अमीर ख़ुसरो सात सौ साल पहले लिख चुके थे. उन्नीसवीं शताब्दी में उर्दू, हिंदी से बहुत आगे थी और हिंदी का हर प्रतिष्ठित विद्वान उन दिनों उर्दू भाषा तथा उर्दू अदब का जानकार हुआ करता था. स्वतंत्रता के बाद हिंदी का ही क्या, सभी भारतीय भाषाओँ का जिस तरह विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ. हमारी कोई राष्ट्रभाषा नहीं बनी और व्यावहारिक दृष्टि से अंग्रेज़ी ही राजकाज, न्याय और उच्च शिक्षा की भाषा बनी रही. 1960 के दशक के हिंदी आन्दोलन को मुख्य रूप से संभाला अवसरवादी नेताओं ने, जिन्होंने कि अपने बच्चों को अंग्रेज़ी तालीम के लिए विलायत भेजने से कभी परहेज़ नहीं किया. हिंदी का विरोध करने वालों ने भी अपने-अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी भाषाओँ का विकास करने के स्थान पर निजी स्वार्थ और सत्ताग्रहण को वरीयता दी. 

आज़ादी के 73 साल बाद भी हिंदी विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रामाणिक मौलिक ग्रन्थ उपलब्ध कराने में अक्षम है. आज भी न्यायालयों की कार्रवाई आमतौर पर अंग्रेज़ी में ही होती है. हमारी जन-प्रतिनिधि सभाओं में भी अंग्रेज़ी बोलने वालों का दबदबा रहता है. आमतौर पर हम हिंदी भाषी केवल एक भाषा जानते हैं लेकिन अन्य भाषाभाषियों से यह अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी सीखें. मेरी दृष्टि में हिंदी का विकास करने के लिए हमको किसी भी भाषा से कुछ भी अच्छा लेने से परहेज़ नहीं करना चाहिए. सिर्फ़ हिंदी जानने वाले हिंदी का समुचित विकास नहीं कर सकते. भाषा को धर्म से जोड़ने की ग़लती भी हिंदी का नुक्सान कर रही है. हिंदी को सिर्फ़ हिन्दुओं की भाषा नहीं बनने देना चाहिए. उसमें शुद्ध, प्रांजल, संस्कृतनिष्ठ शब्दों का बाहुल्य नहीं होना चाहिए. अगर उसमें उर्दू, पंजाबी, तेलगु आदि भाषाओँ के ही नहीं बल्कि अंग्रेज़ी के शब्द भी आ जाएं तो कोई हर्ज़ नहीं है. ऑक्सीजन को ओशोजन और नाइट्रोजन को नत्रजन कह कर हम हिंदी की सेवा नहीं. बल्कि उसको हानि पहुंचा रहे हैं. आज हमने देवनागरी लिपि में नुक्ते का प्रयोग कम कर के उसे उर्दू से बहुत दूर कर दिया है. हम हिंदी भाषा को और देवनागरी लिपि को अधिक समर्थ बनाने का, उन्हें अधिक लचीली बनाने का प्रयास करें, न कि उन्हें एक सीमित दायरे में बाधें. हिंदी को गंगा की तरह होना चाहिए जो कि सभी नदियों का जल ख़ुद में मिलाने में कभी संकोच नहीं करती है. 

अध्यापन में सारी उम्र बिताने के बाद मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि फ़िलहाल भारत में तरक्की करने के लिए नई पीढ़ी को अंग्रेज़ी तो सीखनी ही पड़ेगी और अगर हो सके तो कोई अन्य भाषा जैसे चीनी या जापानी भी कोई सीख ले तो उसे आगे बढ़ने से फिर कोई नहीं रोक सकता. हिंदी की विशेषता गिनाते समय हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ़ हिंदी का ज्ञान हमको सफल नेता तो बना सकता है लेकिन अन्य क्षेत्रों में हमारा पिछड़ना तय है. हमारे जैसे पढ़े-लिखे हिंदी भाषी शायद ही कोई अन्य भारतीय भाषाएँ जानते हैं. क्या यह हमारे लिए शर्म की बात नहीं है? तमिल और बांगला जैसी महान भाषाओँ के ग्रंथों को मूल रूप में हम हिंदी भाषी पढ़ ही नहीं सकते. हिंदी का विकास हो रहा है पर वह बाज़ार की आवश्यकता है. हिंदी का प्रचार मुम्बैया सिनेमा की बदौलत हो रहा है तो इस पर भी हमको गर्व करने का अधिकार नहीं है. हमने हिंदी को सक्षम बनाने के लिए कुछ नहीं किया है. मुझे हिंदी बोलने में शर्म नहीं आती लेकिन मुझे हम हिंदी भाषियों की काहिली पर, हमारी हठवादिता पर बहुत शर्म आती है. हिंदी दिवस को, हिंदी पखवाड़े को, हम हिंदी युग तो तभी बना पाएंगे जब हम इमानदारी से उसके विकास के लिए प्रयास करेंगे. और जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे तब तक एक दूसरे को हिंदी दिवस की, हिंदी पखवाड़े की, बधाई देकर अपना मन बहला लेंगे और हिंदी की सेवा करने का ख़ुद को श्रेय देकर अपनी पीठ थपथपा लेंगे.