गुरुवार, 29 सितंबर 2016

मतदाता

महाप्राण निराला की कविता ‘भिक्षुक’ –
‘वह आता.
दो टूक कलेजे के, करके,
पछताता,
पथ पर आता ----’
का नवीन संस्करण –
‘मतदाता,
खुद अपना भाग्य मिटाता,
इस लोकतंत्र की बलिवेदी पर,
स्वयं दौड़, चढ़ जाता,  
सब काम छोड़,
मतदान केंद्र पर आता,
ऊँगली, स्याही से, स्याह करा,
मतदाता-धर्म, निभाता.
वादों पर, कर विश्वास,
वरण छलिया का,
वह, कर आता.
फिर पांच बरस तक,
हर पल, अपने निर्णय पर,
पछताता,
कुछ न कर पाता,
फोड़ता माथा.
ठग, निष्कंटक, बन बैठा,
हा, उसका भाग्य-विधाता,
लुटता, पिटता,
वह रोज़,
पटखनी खाता,
सिसक रह जाता.
गर्दिश से जोड़ा,
उसने खुद ही, नाता. 
दाता से, अगले ही पल में,
वह याचक, क्यूँ बन जाता?
समझ ना पाता,
चकित रह जाता.
फिर उठा कटोरा,
मांगो का, ले,
हाथ पसारे जाता,
कुछ नहीं पाता,
धमकियाँ खाता.
अगले चुनाव तक,
ध्यान न उस पर, जाता,
वोटर-सूची को छोड़,
सभी की नज़रों में, मर जाता,

हाय, मतदाता, हाय, मतदाता.         

3 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. धन्यवाद सुशील बाबू. तू वही मित्र है जो मुझसे रोज़ाना कुछ लिखवाता. तेरा यह नटखट सा प्रयास, बरबस ही मुझको भाता.

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  2. धन्यवाद दिग्विजय अग्रवालजी. महाप्राण निराला के 'भिक्षुक' से भी दयनीय आज का मतदाता 'पांच लिंकों का आनंद में' स्थान पा जाए तो शायद उसकी पीड़ा कुछ कम हो जाए.

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