शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

गुरुजी की व्यस्तता



गुरुजी की व्यस्तता –
अल्मोड़ा में पढ़ाते हुए भी मेरा दिल हमेशा लखनऊ में ही रहा करता था. माँ-पिताजी के साथ रहने का कोई मौक़ा मैं अपने हाथ से जाने नहीं देता था. भला हो इन विश्वविद्यालयों का जहाँ और कोई सुविधा हो न हो पर छुट्टियाँ बे-भाव मिला करती हैं. 1993 में पिताजी के स्वर्गवास से पहले हमारी सारी छुट्टियाँ लखनऊ में ही बीता करती थीं. लखनऊ के घर के सारे बड़े कामों की ज़िम्मेदारी मैंने ओढ़ रक्खी थी.
मेरा एक भक्त किस्म का छात्र था. वह हेड कांस्टेबल था और पुलिस लाइन में नियुक्त था, साथ ही साथ इतिहास में व्यक्तिगत छात्र के रूप में वह एम. ए. भी कर रहा था. अक्सर अपनी शंकाओं के समाधान के लिए वह मेरे पास आ जाया करता था पर बार-बार मेरे लखनऊ जाने से उसके अध्ययन में बाधा पड़ जाती थी. एक दिन उसने मुझसे पूछा –
‘गुरु जी ! आपकी छुट्टियों का कोई हिसाब है?’
मैंने उसे जवाब देने के बजाय एक सवाल दाग दिया?
‘ये बता, तेरी ऊपरी आमदनी का कोई हिसाब है?’
उसने शरमाते हुए जवाब दिया – ‘मेरी ऊपरी आमदनी का हिसाब तो सिर्फ़ भगवान जी के पास होगा गुरु जी. ! ’
अब मैंने अपना सीना फुलाकर उसके सवाल का जवाब दिया – ‘मेरी जायज़, हड़ताली और फ़्रेंच, इन सभी छुट्टियों का हिसाब भी भगवान जी ही रखते हैं.’
खैर, यह तो अल्मोड़ा का किस्सा हुआ, अब लखनऊ के प्रवास की बात पर लौटता हूँ.
1989-90 की बात थी. शरदावकाश और इलेक्शन की छुट्टियाँ मिलाकर लगभग 70 दिन की हमारी छुट्टियाँ थीं. आदतन हम सपरिवार लखनऊ पहुँच गए. हमारी माँ को घर के काम से पूरी और हमारी श्रीमती जी को आधी छुट्टी चाहिए थी इसलिए घर का काम करने के लिए एक नौकर का इंतजाम किया गया. वो कोई बीस-बाईस साल का लड़का होगा, नाम था भोला.
भोला और मैं दोनों ही घर के काम में जुट गए. घर में तीन साल से पुताई नहीं हुई थी इसलिए तुरंत पुताई वाले आ गए. पुताई से पहले घर की मरम्मत भी होनी थी. मिस्त्रियों, पेंटरों द्वारा बताया गया सारा सामान आ गया फिर भी रोज़ाना वो मुझे किसी न किसी सामान के लिए बाज़ार दौड़ाते ही रहते थे. वैसे बाज़ार के चक्कर लगाने में परेशानी किसे थी? सब्ज़ी-फल लाने के लिए अलग से चक्कर भी तो नहीं लगाने पड़ते थे.
एक दिन माँ ने भोला से पूछा – ‘क्यों रे भोला, तेरी शादी हो गयी है क्या?’
भोला ने जवाब दिया – ‘का बात करत हो माता राम ! हमरे दुई ठो बच्चा हैं. बिटिया चार साल की है और बिटवा साल भरे का. ’
माता राम बोलीं –
‘तू खुद अभी बच्चा है और तेरे दो बच्चे हो गए? पहले तू अपने पैरों पर खड़ा हो जाता, फिर शादी करता, बच्चे पैदा करता.’
भोला नाम का ही भोला था पर था बड़ा सयाना. उसने माता राम के इस सवाल पर एक करारा जवाब दाग दिया –
‘माता राम ! ई बात आपको भैयाजी को भी समझाय का चही. हम तो फिरऊ कुछ कमाय लेत हैं पर भैया जी तो घर में ही पड़े-पड़े पुताई-सफाई कराय देत हैं, सौदा-सुल्फा लाय देत हैं, कुछ कमाते-धमाते हैं नाहीं, फिरऊ उनकी सादी भी आप कराय दियो हो और उनकी दुई-दुई बिटियाँ भी हुई गईं हैं.’
भोलेनाथ का जवाब सुनकर माता राम तो चीमटा लेकर उसके पीछे दौड़ पडीं पर मैं और पिताजी हंसने लगे.
पिताजी ने अपनी हंसी रोक कर मुझसे कहा –
‘कुछ तो शर्म करो बरखुरदार ! आगे से जब लम्बी छुट्टियाँ हुआ करें तो कुछ दिन लखनऊ के बाहर भी बिता लिया करो.’           

8 टिप्‍पणियां:

  1. नीचे से 11वीं लाईन भोला कर लें भोया को । बहुत सुन्दर वाकया :)

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    1. धन्यवाद, सुधार कर लिया. हम-सब की ज़िन्दगी में ऐसे दिलचस्प वाक़ए होते हैं. मुझे तो अपने ऊपर हुए हादसे भी सबके साथ बांटने में मज़ा आता है.

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  2. कितनी यादें जब-तब मन में आकर हलचल मचाकर झिझोड़ती हैं
    बहुत सुन्दर

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    1. प्रशंसा के लिए धन्यवाद कविता जी. मुझे तो अपनी यादों के साए में जीने में, और उन्हें औरों के साथ साझा करने में बहुत आनंद आता है.

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  3. छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूंढती आपकी सुंदर रचना गोपेश जी।

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    1. धन्यवाद राही जी. इन खट्टी-मीठी यादों के सहारे ही खुद को और अपने मित्रों को गुदगुदाने की कोशिश कर लेता हूँ.

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "युद्ध की शुरुआत - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. 'ब्लॉग बुलेटिन' में मेरी रचना को शामिल करने के लिए धन्यवाद. इस से मेरी रचना और अधिक लोगों तक पहुँच सकेगी.

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