शनिवार, 12 सितंबर 2020

काशी क्यों तन तजे कबीरा

जो काशी तन तजे कबीरा, कैसे शोक मनाएंगे? 

 महामहिम भी क्या अर्थी को, कान्धा देने आएँगे? 

 याद में उसके सभी तिरंगे, कुछ दिन क्या झुक जाएंगे? 

 स्वर्ग-गमन के बाद उसे क्या, भारत-रत्न दिलाएंगे? 

 माला फेरन के नाटक का, क्या हम अंत कराएंगे? 
 
कांकर-पाथर से गरीब का, घर क्या कभी बनाएंगे? 

 आपस में जो लड़ते मूए, मर्म समझ क्या पाएंगे? 

 ढाई आखर प्रेम का पंडित, भला कभी पढ़ पाएंगे? 

 माया ठगिनी सत्यानासी, जान कभी क्या पाएंगे? 

 मन्दिर-मस्जिद छोड़ आप क्या, सांचे हिरदे आएँगे? 

 राम-रहीमा साथ बैठ कर, सब में मेल कराएंगे? 

 धरम-दीन के नाम खून का, दरिया नहीं बहाएंगे? 

 अगर नहीं कुछ ऐसा हो तो, मगहर में मरना बेहतर.

 बहुत सादगी पुर-सुकून से, माटी में मिलना बेहतर. 

नहीं जलाओ दफ़न करो मत, उसे भुला दो तो बेहतर, 

 भारत के इतिहास से उसका, नाम मिटा दो तो बेहतर.

बुधवार, 9 सितंबर 2020

भारत-पर्व

दंगाई का भी तो हक़ है, जो जी चाहे करने दो. 

 उसके काम न आड़े आओ, कफ़न सभी का सीने दो. 

 सदियों से उसके पुरखों ने, मुल्क को अपनी ख़िदमत दीं. 

 भेद-भाव के बिना सभी को, लूटा और फ़क़ीरी दीं. 

 उसे देश का दुश्मन कह के, मत उसका अपमान करो. 

 उसके दम पर चले हुकूमत, इस पर थोड़ा ध्यान धरो. 

 कितने मासूमों को उसने, दुनिया से आज़ाद किया. 

 लूटी अस्मत जिनकी उनको, रहने को बाज़ार दिया. 

 धर्म और मज़हब को उसने, लड़ कर जीना सिखलाया. 

 क्या गौतम का क्या गांधी का, प्रवचन काम नहीं आया. 

 कोरोना ने लीले कितने, ये बेकार फ़साना है. 

 सीमा पर दुश्मन मंडराए , मसला बहुत पुराना है. 

 अर्थ-व्यवस्था जीर्ण-शीर्ण पर, भारत स्वर्ग दिखाना है. 

 आज रिया है या सुशांत है, फिर चुनाव भी आना है. 

 कितने घर के दीप बुझ गए, मन्दिर दीप जलाना है. 

 वसुधा को कुटुंब क्यूं मानें, घर-घर सर फुटवाना है. 

 शहर-गाँव श्मशान बनें पर, आगे बढ़ते जाना है. 

 घर-घर क़ब्रिस्तान बनें पर, भारत पर्व मनाना है.

सोमवार, 7 सितंबर 2020

गुरु बिन मिले न ज्ञान

हम अपने बचपन से ही गुरु-वंदना सम्बंधित श्लोक, दोहे और कविताएं सुनते आए हैं. आज की भागदौड़ वाली और गला-काट प्रतियोगिता वाली ज़िंदगी में हमको सुकरात और चाणक्य सदृश गुरुजन तो मिलने से रहे लेकिन आज भी अपने काम के प्रति समर्पित और निष्ठा के साथ ज्ञान की ज्योति का चहुँ-ओर प्रसार करने वाले गुरुजन के दर्शन होना दुर्लभ नहीं हैं. इस संस्मरण में मैं ऐसे गुरुजन का उल्लेख करना चाहता हूँ जिन्होंने हमारे परिवार के सदस्यों के दिलों में एक ख़ास और कभी न मिटने वाली जगह बनाई है. 

सबसे पहले मैं अपने बड़े भाई साहब और हमारी पीढ़ी के गुरु श्री कमल कांत का ज़िक्र करूंगा. 
हमारे कमल भाई साहब की ज्ञान-पिपासा असीमित है. आज भी वो अपने ज्ञान-कोष को अधिक से अधिक समृद्ध बनाने में संलग्न रहते हैं और फिर इस संचित ज्ञान को - दोऊ हाथ उलीचने का आनंद लेते हैं. 
भाई साहब भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयनित होने से पहले भूगर्भ शास्त्र के प्रवक्ता रहे हैं और अवकाश-प्राप्ति के बाद वो 'कॉमन कॉज़' जैसी समाज-सेवी संस्था से सम्बद्ध हैं लेकिन वो एक अध्यापक के रूप में ही मेरे लिए सबसे आदरणीय हैं.

हमारे घर के सदस्यों की भाषा को सुधारने में कमल भाई साहब की प्रमुख भूमिका रही है. हम सब में साहित्य-प्रेम भी उन्होंने ही जागृत किया है. मुझे कक्षा दो तक संयुक्ताक्षर पढ़ना नहीं आता था जिसके कारण मेरी क्लास में खूब कान-खिंचाई होती थी. कमल भाई साहब ने मुझे कक्षा तीन से पहले इतना आलिम फ़ाज़िल बना दिया कि मैं अपनी पाठ्य-पुस्तकें ही नहीं, बल्कि साहित्यिक रचनाएं भी पढ़ने लगा. 

हमारे बचपन में हमारे दो रूपये महीने के जेब खर्च में से भाई साहब हम से महीने में एक रुपया होम-लाइब्रेरी के लिए झटक लेते थे. उन दिनों मैं इसे अपना शोषण समझता था लेकिन छोटी उम्र में ही होम-लाइब्रेरी की बदौलत प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, डेनियल डिफ़ो, चार्ल्स डिकेंस, लुइस कैरोल और न जाने किन-किन के ग्रंथों से उन्होंने मेरा परिचय करा दिया था. 
आज मैं सत्तरवें साल में चल रहा हूँ लेकिन कमल भाई साहब आज भी मेरे विश्वकोश हैं, मेरे गूगल-गुरु हैं. आज भी मेरी तथ्यात्मक और भाषागत कमियों को वो खुलकर बताते हैं ,उनको दूर करते हैं. मुझे कमल भाई साहब से सिर्फ़ दो शिकायतें हैं - 

पहली शिकायत यह है कि वो हमारे सवाल का जवाब कभी सीधा नहीं देते और सवाल के जवाब में सुकरात की तरह हमसे सवालों की झड़ी लगा कर हमारे सवाल का जवाब हम से ही उगलवाना चाहते हैं. बाद में जब हम थक कर चूर हो जाते हैं और अपने ही सवाल का खुद जवाब नहीं दे पाते तो फिर विस्तार से वो उसका जवाब देते हैं. 

भाई साहब से मुझे दूसरी शिकायत यह है कि उनका इतिहास विषयक ज्ञान मुझ से अधिक है जिसके कारण मुझ जैसे भोले किन्तु आराम-तलब इंसान को कई बार मुश्किलों का सामना करना पड़ जाता है. 

अब एक क़िस्सा कमल भाई साहब के जोशी सर का - 

1956 में पिताजी का तबादला बिजनौर से लखनऊ हो गया. कमल भाई साहब ने बिजनौर से 9 वीं कक्षा उत्तीर्ण की थी और अब 10 वीं कक्षा के लिए उन्हें लखनऊ के 'बॉयज़ एंग्लो-बंगाली इन्टर कॉलेज में प्रवेश दिला दिया गया था. 
उन दिनों उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में हाईस्कूल स्तर पर अलग-अलग पाठ्य-पुस्तकें प्रचलित थीं जिन में कक्षा 9 और कक्षा 10 में पाठ्यक्रम के अध्यायों में भी अंतर हुआ करता था. कमल भाई साहब को अब लखनऊ में बहुत से अध्याय ऐसे पढ़ने थे जिनको उन्हें बिजनौर में ही पढ़ा दिया गया था और बहुत से ऐसे थे जिन को उन्हें अपने स्तर पर ही पढ़ना था. 
हिंदी और अंग्रेज़ी, इन दोनों विषयों में तो भाई साहब अपने स्तर पर कुछ भी तैयार कर सकते थे लेकिन बायोलॉजी में उन्हें ऐसी कठिन परिस्थिति का अपने स्तर पर समाधान करने में बहुत कठिनाई हो रही थी. भाई साहब के बायोलॉजी के गुरु जी, जोशी सर ने उनकी इस कठिनाई का अनुभव किया. 
यह नया विद्यार्थी उन्हें बहुत मेधावी तो लगा लेकिन विषय के कई अध्याय समझने में उसे बहुत कठिनाई हो रही थी. जोशी सर ने अपने इस नए विद्यार्थी की समस्या को विस्तार से जाना और फिर उन्होंने उसका निदान भी खोज लिया. 

जोशी सर अपनी साइकिल से हमारे घर पहुंचे और फिर उन्होंने पिताजी के साथ इस समस्या के समाधान के विषय में चर्चा की. उन्होंने भाई साहब को बायोलॉजी में ट्यूशन देने का सुझाव दिया जिसको पिताजी ने तुरंत स्वीकार कर लिया. पिताजी ट्यूशन के लिए भाई साहब को बाहर नहीं भेजना चाहते थे इसलिए जोशी सर ने सप्ताह में तीन दिन हमारे घर आकर उन्हें पढ़ाने का ज़िम्मा ले लिया. 

एक अध्यापक का किसी विद्यार्थी के घर आकर उसे ट्यूशन देना कोई अचरज की बात नहीं थी लेकिन जो बात जोशी सर की महानता की द्योतक थी , वह यह थी कि उन्होंने इस सेवा के लिए किसी भी प्रकार का पारश्रमिक लेने से इंकार कर दिया. एक प्राइवेट इन्टर कॉलेज के अध्यापक को तब क्या वेतन मिलता होगा? अपनी सीमित आय को अतिरिक्त श्रम कर के कौन नहीं बढ़ाना चाहता है? लेकिन जोशी सर दूसरी मिट्टी के ही बने थे. उन्होंने भाई साहब को नियमित रूप से घर आ कर पढ़ाया और गुरु-शिष्य की मेहनत रंग लाई. भाई साहब ने प्रथम श्रेणी में हाईस्कूल उत्तीर्ण किया. 

एक ऐसा ही क़िस्सा मेरे छोटे भाई साहब कानन विहारी का है. 
कानन भाई साहब ने कक्षा 9 इटावा से उत्तीर्ण की और कक्षा 10 में उनका प्रवेश रायबरेली में हुआ. उनकी समस्याएं भी बड़े भाई साहब की सी ही थीं लेकिन गणित विषय में तो यह समस्या भयावह थी क्योंकि काफ़ी दिनों तक उनके कॉलेज में गणित का कोई अध्यापक ही नहीं था. 

सत्र प्रारम्भ होने के लगभग तीन महीने बाद नक़वी साहब गणित के अध्यापक नियुक्त होकर वहां आए. नक़वी साहब को आदि से अंत तक गणित का पाठ्यक्रम पढ़ाना था. नक़वी साहब ने पहले दिन से ही दो-दो घंटे के एक्स्ट्रा क्लासेज़ लेकर विद्यार्थियों के जीवन को गणितमय बना दिया. छह महीनों में ही नक़वी साहब ने गणित में हाईस्कूल का पूरा कोर्स विद्यार्थियों को पढ़ा दिया. 

लहीम-शहीम व्यक्तित्व वाले नक़वी साहब का डंडा उन से से भी ज़्यादा मोटा-तगड़ा हुआ करता था और उसका इस्तेमाल हर असावधान-लापरवाह विद्यार्थी पर करना वो अपना अधिकार समझते थे. ऐसे कर्तव्य-निष्ठ और प्रतिबद्ध किन्तु सख्त अध्यापक को आम विद्यार्थी एक जल्लाद के रूप में ही याद करता था. 

हमारे कानन भाई साहब की बुद्धिमत्ता देख कर नक़वी साहब ने उनके सामने यह लक्ष्य रख दिया कि उन्हें ज़िला रायबरेली में हाईस्कूल में टॉप करना है. भाई साहब ने अपने गुरु की अपेक्षाओं पर खरा उतरते हुए हाईस्कूल में रायबरेली में टॉप किया और उत्तर प्रदेश में मेरिट में 20 वां स्थान प्राप्त किया. 

अंत में मैं अपने पूज्य गुरु जी डॉक्टर भगवानदास माहौर का उल्लेख करूंगा. 

बुंदेलखंड कॉलेज झांसी में बी. ए. में मुझे हिंदी-काव्य पढ़ाने वाले डॉक्टर भगवान दास माहौर एक आदर्श अध्यापक थे. 

चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह के इस क्रांतिकारी साथी ने सोलह साल की उम्र में एक सरकारी मुखबिर पर अदालत के प्रांगण में गोली चलाई थी. बरसों जेल की सज़ा काटने के बाद जेल से निकल कर इस किशोर ने अपनी छूटी हुई पढ़ाई पूरी की और फिर बुंदेलखंड कॉलेज के हिंदी विभाग को एक अध्यापक के रूप में सुशोभित किया. 

माहौर गुरु जी का पढ़ाने का तरीक़ा ऐसा था कि वो खुद कविता में डूब जाते थे और जागरूक विद्यार्थियों को भी उसमें डुबा-डुबा देते थे. 
गुरु जी कविता की व्याख्या और उसके सन्दर्भ को रटने-रटाने के सख्त ख़िलाफ़ थे इसलिए रट्टू तोते उनकी कक्षा में ऊँघते रहते थे लेकिन मेरे जैसे साहित्य-प्रेमी विद्यार्थी मन्त्र-मुग्ध होकर उनके व्याख्यान सुनते थे. 

मेरे लिए तो कॉलेज में गुरुजी के व्याख्यान बहुत कम पड़ते थे. मैं फिर स्टाफ़ रूम में जाकर उनका सर खाता था. स्टाफ़ रूम में मेरे घुसते ही अन्य अध्यापक मुझे वहां से भगाने की कोशिश में लग जाते थे. माहौर गुरु जी ने स्टाफ़ रूम में मेरा ऐसा विरोध देख कर मुझे अपने घर आने की इजाज़त दे दी. 

छुट्टियों के दिनों में मैं गुरु जी के घर जाकर घंटों हिंदी-साहित्य की बारीकियां समझता था और इसके बदले में मुझे उनकी श्रीमती जी की यानी कि हमारी ताईजी के हाथों की बनी मठरियां और लड्डू खाने को मिलते थे. 

हिंदी साहित्य में मेरी अभिरुचि जागृत करने में कमल भाई साहब के बाद अगर किसी का हाथ है तो माहौर गुरु जी का है. 

माहौर गुरु जी का समस्त जीवन अनुकरणीय है. वो एक महान देशभक्त थे किन्तु मेरे लिए वो सबसे पहले एक आदर्श अध्यापक थे. 

मैंने अपने जीवन में बहुत से पैसे कमाने वाले गुरुजन देखे हैं और आज के ज़माने में उन जैसों को ही अपने पेशे में सफल माना जाता है लेकिन ऐसे गुरुजन हमारे दिलों में कभी जगह नहीं बना पाते. 

हमारे दिल में अपना स्थायी निवास बनाने वाले गुरुजन तो वही होते हैं जो कि सादा-जीवन, उच्च विचार में विश्वास करते हुए निरंतर निस्वार्थ भाव से ज्ञान का प्रसार करते हैं. हमको ज्ञान का दीपक दिखाकर सन्मार्ग की ओर ले जाने वाले ऐसे महानुभावों को हम अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हुए कहते हैं - 

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया । 

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

साहिर की नज़्म - ये किसका लहू है, कौन मरा' से आगे

कल कितने मरे,
परसों कितने,
और आज कहाँ की बारी है,
कालीन पड़े, दरियां हैं बिछी,
मातम की सब तैयारी है.
भाषण भी होने वाले हैं,
नारे भी लगने वाले हैं,
मरने वाले की झुग्गी में,
मंत्री जी आने वाले हैं.
इम्दाद बंटेगी, लाखों की,
कुछ घर भी, बनाए जाएँगे,
बेवाओं और यतीमों संग,
फ़ोटो भी, खिंचाए जाएँगे.
है हाथ, विदेशी ताक़त का,
या क़हर, विपक्षी साज़िश का,
सरकार का कोई दोष नहीं,
मुस्तैद पुलिस, मदहोश नहीं,
जो हुआ, बहुत ही बुरा हुआ,
इसे भूल के, आगे बढ़ना है,
कुछ अनजाने चेहरे, खोजो,
सब दोष, उन्हीं पर, मढ़ना है.

शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

आता है याद मुझको



बुढ़ापे में याददाश्त जवाब देने लगती है. 36 साल से भी ज़्यादा वक़्त तक इतिहास पढ़ाने वाले मुझ जैसे शख्स को यह भी ठीक से याद नहीं आ  रहा है कि दिल्ली में क़त्ले-आम 1739 में हुआ था या 1947-48 में या 1984 में या फिर -----!
लेकिन एक क़िस्सा मुझे आज भी बखूबी याद है -
दिल्ली के बाशिंदों की गुस्ताख़ी देख कर नादिरशाह ने गुस्से में पागल होकर अपनी फ़ौज को दिल्ली में क़त्लेआम का हुक्म दे दिया और वह ख़ुद सुनहरी मस्जिद के ऊपर चढ़ कर देखने लगा कि दिल्ली में खून की नदी बह रही है कि नहीं.
मुग़ल बादशाह मुहम्मदशाह (रंगीला) लाल किले में एक क़ैदी की तरह रहने को मजबूर था और किसी दूसरे की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह नादिरशाह के सामने भी आ सके.
तभी बादशाह का वज़ीर नादिरशाह के सामने पंहुचा और उसने उसे अमीर खुसरो का एक शेर सुनाया -
कसे न माद कि दीगर ब तेगे नाज़ कुशी,
मगर कि ज़िन्दा कुनी ख़ल्करा व बाज़ कुशी.
(तेरी नजर की तलवार ने सब का शिकार कर लिया , तेरे गुस्से के क़हर से कोई बचा ही नहीं!
अब अपनी नज़रे-इनायत से तू सबको ज़िन्दा कर दे ताकि उन्हें दोबारा फिर मारा जा सके.)
शेर का असर हुआ और जादू जैसा हुआ.
नादिरशाह ने हुक्म दिया कि क़त्लेआम बन्द किया जाय.

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

सुलग रही क्यूं दिल्ली, फिर-फिर?


कबीर ! तू आज फिर से बहुत याद आ रहा
है !
और
साहिर ! तूने क्या अपनी नज़्म -
'जिन्हें नाज़ है हिन्द पर, वो कहाँ हैं?'
आज लिखी है?
आख़िर में कबीर की बात - 'मरम न कोई जाना'
पर नेता जी का जवाब -
धर्म-मज़हब का मरम, मैंने भले, जाना न हो,
पर सबक़ – ‘कुर्सी-मरम’, मुझको ज़ुबानी याद है.

शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

दोहावली


निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय.
कबीर
दिल्ली-चुनाव का सबक़ -
निंदक नियरे राखिए, आँगन, कुटी छवाय,
मुख से उगले जहर जब, वोट-बैंक बढ़ि जाय
करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय,
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय.
कबीर
संशोधित दोहा -
बोएं पेड़ बबूल के, निस-दिन आम उड़ायं,
जनता की खोदें कबर, जन-सेवक कहलायं.
और एक अपना दोहा -
सदा ट्रम्प को होत है, पत्तन में सत्कार,

स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार.