शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

अलंकार शिक्षा (मेरी व्यंग्य कथा फिल्माचार्य का एक अंश)


आचार्यों की कई किस्में होती हैं। कुछ आचार्य पठन-पाठन में ही अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ऐसे महापुरुषों को इल्मी आचार्य कहा जाता है। कुछ ऐसे होते हैं जो घरों, विद्यालयों और बाज़ारों में झूमते हुए देखे जा सकते हैं। दम मारो दम मन्त्र का जाप करते हुए, दुनिया वालों की परवाह न करते हुए अपने सारे ग़म मिटाने वालों को हम चिल्माचार्य कहते हैं पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो ऐसा कुछ भी नहीं करते पर फिर भी ज़ालिम ज़माना उनकी हंसी उड़ाता है। ऐसे आचार्यों के लिए फि़ल्में जीवन का परम सत्य होती हैं। उनके लिए फि़ल्में ही गीता, कुरान और बाइबिल होती हैं, फि़ल्में ही उनका भोजन होती हैं और फिल्में ही उनकी निकट सम्बन्धी होती हैं। आप उनसे दोस्ती करना चाहते हैं तो आपको फि़ल्मों की ही चर्चा करने की और उसे सुनने की आदत डालनी होगी। ऐसे फि़ल्म-मय आचार्यों को हम फि़ल्माचार्य कहते हैं।


सन् उन्नीस सौ सत्तर में मैं झांसी के बुन्देलखण्ड कॉलेज में बी. ए. फ़ाइनल का विद्यार्थी था। वहां हमको हिन्दी साहित्य पढ़ाने के लिए एक नए गुरूजी की नियुक्ति हुई थी। इन नए गुरूजी का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था पर उससे ज़्यादा उनका गैटअप जानलेवा था। गुरूजी के लम्बे-लम्बे नखों से लेकर उनकी रेशमी ज़ुल्फ़ों के वर्णन के साथ पूरा न्याय करने के लिए तो एक उपन्यास लिखने की ज़रूरत होगी पर यहां इतना कहना काफ़ी होगा कि उनकी रूप सज्जा के सामने बौलीवुडी हीरो तो क्या, हौलीवुडी हीरो भी पानी भरने वाले नज़र आते थे। इन्द्रधनुष के सभी रंग उनकी पोशाक में देखे जा सकते थे, उनके इम्पोर्टेड गौगल्स में पूरा क्लास एक साथ नज़र आता था, उनके चमकते हुए जूतों में हम अपना चेहरा देख सकते थे। उनके शरीर पर उड़ेले गए सेंट की महक से पूरा क्लास चमन बन जाता था, ख़ासकर हमारे क्लास की तितलियां तो अपनी सीट पर बैठे-बैठे ही थिरकने लगती थीं। हमको अपने गुरुदेव पहली रील से ही भा गए थे। वाह क्या ज़ुल्फ़ें थीं, क्या अदाएं थीं, डायलाग डिलीवरी भी कैसी दिलकश थी।


पहले हिन्दी की जटिल कविताएं और लम्बे उबाऊ निबन्ध हमारे लिए लोरी का काम करते थे पर अब तो हिन्दी की कक्षा का हम बेसब्री से इन्तज़ार किया करते थे और गुरुदेव की हर अदा पर गौर करने के लिए अपनी आंखें खुली रखते थे साथ ही साथ उनके हर डायलाग को ध्यान से सुनने के लिए हम क्लास में पिन ड्रॉप साइलेन्स रखने की पूरी कोशिश भी करते थे।


उन दिनों सभी लोगों पर फि़ल्मी बुख़ार चढ़ा रहता था । सारे ज़माने पर फि़ल्मी जादू छाया था । फिल्मी मैग्ज़ीन्स की अहमियत धर्मग्रन्थों से कम नहीं होती थी। हमारे घर के बुज़ुर्ग हम पर ज़ुल्म ढाते वक्त मुगलेआज़म के अन्दाज़ में और उनके ही जैसी रौबीली आवाज़ में हम पर दहाड़ा करते थे। आम घरों में माँयें अपने बच्चों पर ममता उड़ेलते वक्त सिल्वर स्क्रीन की सुलोचना, लीला चिटनिस और निरूपा राय का रोल अदा करती हुई देखी जा सकती थीं और सासों के लिए ललिता पवार के फि़ल्मी पर्दे पर उतारे गए किरदार हमेशा प्रेरणा स्रोत का काम किया करते थे। लड़कियां, भाभीजियां और यहां तक कि आण्टियां भी अपनी अदाओं में नरगिस, वैजयन्ती माला और हेलेन की नकल करती थीं। रोते वक्त हर लड़की हमको मीनाकुमारी लगती थी और मुस्कुराते वक्त मधुबाला।


हम लड़के इस फि़ल्मी माहौल में पलकर फि़ल्मी बातों के अलावा और क्या सोच सकते थे। हम धर्म के बारे में जो भी जानकारी रखते थे उसका आधार पौराणिक फिल़्में हुआ करती थीं। इतिहास की जानकारी हमको सोहराब मोदी की फिल्मों से मिली थी और देशभक्ति का जज़्बा हमने मनोज कुमार की फि़ल्मों से सीखा था। हमारी निजी जि़न्दगी में भी हीरो-हीरोइन्स छाए रहते थे। हम नौजवान वृक्षारोपण कार्यक्रम में बहुत दिलचस्पी लेते थे क्योंकि हम जानते थे कि यही पेड़ जब बड़े होंगे तो हम इनके इर्द-गिर्द घूम-घूम कर अपनी-अपनी हीरोइनों के साथ गाने गाएंगे। तमाम नौजवान शीशे के सामने खड़े होकर, बोतल में शराब की जगह पानी भरकर, चेहरे पर मायूसी का भाव लाकर, जु़ल्फ़ें बिखराकर, देवदास के दिलीप कुमार की तरह होठों ही में बुदबुदाते हुए लम्बे-लम्बे मोनोलाग्स बोला करते थे। हमारी शरारतों में शम्मी कपूर की उछलकूद की झलक साफ़-साफ देखी जा सकती थी। अपने भोलेपन में हम राज कपूर तक को मात करते थे। पर अपने मां-बाप की डाँट की परवाह न करते हुए जब हम बागी सलीम की तरह मनमानी किया करते थे और उसकी वजह से जब हम बेभाव पीटे जाते थे तो अकेले में मोहम्मद रफ़ी के ‘ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले’ जैसे दर्द भरे गाने गा-गा कर, भगवान को, ज़ालिम ज़माने के जु़ल्मों की दास्तान सुनाया करते थे।


सूरदास का श्रृंगार वर्णन तो हमको हैरान कर देता था। लगता था कि सूरदास और आनन्द बक्शी एक ही गांव के रहने वाले थे। एकबार गुरुदेव सूर के पद- ‘बूझत स्याम कौन तू गोरी’ की व्याख्या कर रहे थे। अपनी शरारत से कान्हा ने पहली मुलाकात में ही राधा का दिल जीत लिया था। गुरुदेव ने हमसे पूछा-
”बताओ फिर क्या हुआ होगा?“


मैंने तपाक से उत्तर दिया-
”जिस का डर था बेदर्दी, वही बात हो गई।“

अलंकारशास्त्र पढ़ने में पहले हमारी जान निकलती थी, उनकी परिभाषाएं याद करने में हमको अपनी नानी याद आती थीं पर उनके उदाहरण याद करने में तो नानीजी बाकायदा स्वर्गलोक सिधार जाती थीं। पर फि़ल्माचार्य ने हमारे सामने अलंकारों के इतने सटीक फि़ल्मी उदाहरण पेश किए कि हमारे लिए उनको समझना बाएं हाथ का खेल हो गया। अब हम धड़ल्ले से अलंकारों के उदाहरण दे सकते थे। हाथ में बोतल लिए किसी महबूबा के आने की आशा कर रहे शराबी देवानंद की भावनाओं को व्यक्त करने वाले अनुप्रास अलंकार के इस उदाहरण को कौन भूल सकता है-

”कभी न कभी, कहीं न कहीं, कोई न कोई तो आएगा।“

फिल्म ‘राज कुमार’ में साधना के रूठ कर चले जाने पर शम्मी कपूर की व्यथा यमक अलंकार का उदाहरण बन जाती है-

”तुमने किसी की जान को जाते हुए देखा है?
वो देखो मुझसे रूठ कर मेरी जान जा रही है।“


शम्मी कपूर हमारे फिल्माचार्य के प्रिय नायक थे. श्लेष अलंकार का उदहारण भी वो उन्हीं की लीलाओं से देते थे. शम्मी कपूर फिल्म ‘जानवर’ में एक लाल छड़ी को संबोधित करके एक गाना गाते हैं जबकि उनका इशारा उनसे झगड़ा कर रही, लाल कपड़ों में सजी राजश्री से है –


‘लाल छड़ी मैदान खड़ी, क्या खूब लड़ी, क्या खूब लड़ी.’


वैसे तो गुरुदेव ने फि़ल्मी अलंकार शास्त्र पर पूरा ग्रंथ तैयार कर डाला था, इसको याद कर पाना हम साधारण मानवों के बस में नहीं था। हां! मुमताज़ और राजेश खन्ना के चुलबुले प्यार की कहानी कह रहा यह गीत रूपाक्तिशयोक्ति अलंकार (इसमें किसी के रूप का बहुत बढ़ा-चढ़ा कर वर्णन किया जाता है) का सुन्दर उदाहरण है जिसे कि मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ -

”छुप गए सारे नज़ारे, ओये क्या बात हो गयी?
तूने काजल लगाया, दिन में रात हो गई।“

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