शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

सुस्वागतम डॉक्टर सुब्रमणियास्वामी -फ़साना-ए-उन्नीस सौ चौरासी की जेएनयू में पुनरावृत्ति?


कली को फूल बनने से, बहुत पहले मसल देंगे,
उठाया सर किसी ने तो, उसे फ़ौरन कुचल देंगे.
फ़साना सन् चौरासी का, हक़ीकत में बदल देंगे,
घरों की बात ही क्या है, ख़यालों में दख़ल देंगे.
विभीषण जो बने घर का, उसे ओहदा, महल देंगे,
वो हाकि़म को ख़ुदा समझे,उसे ऐसी अक़ल देंगे.
नए सांचों में उसको ढाल, मनमानी शक़ल देंगे,
नई पीढ़ी का मुस्तक़बिल, नए आक़ा बदल देंगे.

( जॉर्ज ओर्वेल के उपन्यास ‘नाइनटीन एटी फोर’ का खल-पात्र, तानाशाह ‘बिग ब्रदर’ देशवासियों की न केवल गतिविधियों पर बल्कि उनके विचारों पर भी नियंत्रण रखता है. मैंने यह कविता राजीव गाँधी के शासनकाल में लिखी थी पर लगता है कि उसका भाव आज भी प्रासंगिक है.)

1 टिप्पणी:

  1. यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पहले थी |

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