गुरुवार, 23 मार्च 2017

शहीद दिवस



शहीद दिवस पर -
उत्तर प्रदेश राजकीय अभिलेखागार में संरक्षित प्रतिबंधित साहित्य
संग्रहकर्ता शिवदत्त अवस्थी
शमअ वतन के परवाने
सुखदेव भगत सिंह राजगुरु – थे शमअ वतन के परवाने,
जो सोज़ दिलों में उनके था, उस सोज़ को कोई क्या जाने.
इस जंगो-जदल का आयंदा, अहवाल जो लिखने बैठेंगे,
लिक्खेंगे सुनहरी हर्फ़ों से, तारीख में इनके अफ़साने.
यह शौक़-ए-शहादत दिल में था, वह दार पे बोसा देके चढ़े,
मुश्ताक़-ए-अज़ल थे, बरसों से, लैला-ए-वतन के दीवाने.
कातिल की हिला दें बुनियादें, नारों से मिटाया नारों ने,
अब रौब सितम का बाक़ी था, इस वक़्त रुपे में दो आने.
सतलज के किनारे आती है, आवाज़ चिता के ज़र्रों से,
सुखदेव भगत सिंह राजगुरु – थे शमअ वतन के परवाने.

सोज़ – आग
जंगो-जदल – युद्ध,
अहवाल – समाचार  
दार – फांसी
मुश्ताक़-ए-अज़ल – अनादिकाल से अभिलाषी  

शईदों का सेहरा (शायर – मुश्ताक़)

वतन पे जां है गंवानी, रहे रहे न रहे,
अरे ये जिस्म है फ़ानी, रहे रहे न रहे.
फिरेगी रूह वतन में मेरी सदा आज़ाद,
वो ज़ुल्मो-ज़ोर का बानी, रहे रहे न रहे.
हो यादगारे ज़माना, ये अपनी क़ुरबानी,
जहां में और कहानी, रहे रहे न रहे.
खुदा के वास्ते कर दो इसे वतन पे निसार,
जवानों, फिर ये जवानी, रहे रहे न रहे.
वतन पे मार्के बदल लूं मैं जामए-हस्ती,
क़बा ये होके पुरानी, रहे रहे न रहे.
हम अपना खून बहाने को हैं, सदा तैयार,
ये तेग की भी रवानी, रहे रहे न रहे.
असम्बली के शिवालय में शोर बम-बम का,
है भक्त सिंह की बानी, रहे रहे न रहे.
हमारा खून तो है जेबे-दामने कातिल,
अब और कोई निशानी, रहे रहे न रहे.
जलाके वो मेरी मैयत, बहाएं सतलज में,
फिर उनकी तेग में पानी, रहे रहे न रहे.
रहेगी आबो-हवा में ख़याल की बिजुली,
ये मुश्ते-खाक़ है फ़ानी, रहे रहे न रहे.
कहूं जो बात जो दुश्मन के दिल पे काट करे,
कि फिर ये तेज़-ज़ुबानी, रहे रहे न रहे.
वतन के भी ‘मुश्ताक’ चंद लिख डालो,
सदा ये सेहरे बयानी, रहे रहे न रहे.

फ़ानी – नाशवान
जाम-ए-हस्ती – अस्तित्व रूपी वस्त्र
क़बा – वस्त्र
जेबे-दामने क़ातिल – क़ातिल की जेब और उसका दामन
सेहरे-बयानी – सेहरा गाने की कला

5 टिप्‍पणियां:

  1. शमअ वतन शामे वतन नहीं होना चाहिये क्या? सुन्दर पोस्ट। नमन शहीदों को।

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  2. शमअ वतन का अर्थ हुआ - वतन की शमा (जिस पर कि आज़ादी के परवाने अपने प्राण न्योछावर करते हैं.)

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  3. शहीद दिवस पर सुन्दर शब्द रचना

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    1. सावन कुमार जी, इन दो प्राचीन कविताओं को तो मैंने उद्धृत किया है.ये मेरी रचनाएँ नहीं हैं. ये अच्छी लगीं तो सोचा कि मित्रों के साथ मिलकर इनके माध्यम से शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि दे दूं.

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