भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण दावा करते हैं कि –
जब-जब धर्म का पतन होता है, और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं सज्जनों के कल्याण हेतु और दुष्टों के विनाश हेतु जन्म लेता हूँ.
कलयुग में अपनी व्यस्तता के कारण भगवान जी ने धर्म-संस्कृति के संरक्षण का और उनकी पुनर्स्थापना का दायित्व आंग्ल भाषा के ज्ञान में काला अक्षर, भैंस बराबर, खुलेआम नक़ल कर के परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले, किन्तु लाठियां चलाने में और गालियाँ देने में निपुण, युवा धर्म-संस्कृति रक्षकों को सौंप दिया है.
इन्हीं धर्म-संस्कृति रक्षकों की ठीक 51 साल पुरानी दो साहसिक लीलाएं मुझे याद आ रही हैं.
लखनऊ विश्वविद्यालय में उन दिनों तथाकथित धर्म-संस्कृति रक्षकों ने एक फ़तवा जारी किया था –
‘कोई लड़का अगर किसी लड़की से बात करते हुए पाया गया तो उसकी जम कर तुड़ाई होगी लेकिन अपराधी लड़की को सिर्फ़ गाली-गलौज कर के और आगे से ऐसी कोई हरक़त न करने की हिदायत दे कर छोड़ दिया जाएगा.’
एक बार हमारे विभाग में एम. ए. प्रथम वर्ष का एक मेधावी और बहुत ही भला लड़का कॉरिडोर में लड़कियों से बात करते हुए पाया गया था. हमारे धर्म-संस्कृति रक्षकों के एक दल ने उस लड़के की ऐसी भयंकर पिटाई की कि उसने अस्पताल से छुट्टी मिलते ही लखनऊ विश्वविद्यालय से भी अपनी छुट्टी करा ली.
इस घटना के कुछ दिनों बाद की एक संभावित दुर्घटना का ज़िक्र किया जाना भी ज़रूरी है.
24 साल की उम्र में 1 जनवरी, 1975 को मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के आधुनिक एवं मध्यकालीन इतिहास विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुआ था.
ठीक-ठाक से लगने वाले नौजवान गुरुजन छात्राओं में काफ़ी लोकप्रिय होते हैं.
इस ख़ाकसार को भी ऐसी लोकप्रियता हासिल थी.
कई छात्राएं क्लास ख़त्म होने के बाद विभाग के कॉरिडोर में मुझ से सवाल करने के लिए मुझे घेर लिया करती थीं.
एक बार संस्कृति-रक्षकों के एक दल ने कॉरिडोर में लड़कियों से बातें करते हुए मुझे देख लिया. उस दल के मुखिया ने मुझ से पूछा –
‘ए कन्हैया ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम खुले आम गोपियों के साथ रासलीला रचाओ. क्या तुम्हें हमारे फ़रमान का इल्म नहीं है?’
मैं जब तक कोई जवाब दूं तब तक उस दल में शामिल, मेरे हॉस्टल के एक नामी गुंडे और अब स्वघोषित संस्कृति-रक्षक ने घोषणा की –
‘अरे ये तो अपना गोपू (गोपेश मोहन जैसवाल) है. कुछ दिन पहले ही ये हिस्ट्री में लेक्चरर हुआ है’
जिस शख्स की तमाम नापाक हरक़तों की वजह से मैं उस से बेइंतेहा नफ़रत करता था, उस दिन मेरा मन उसकी आरती उतारने का कर रहा था.
संस्कृति-रक्षकों के कोप से मैं तो बच गया था लेकिन आए दिन कोई न कोई बदनसीब उनके कोप का शिकार तो हुआ ही करता था.
ख़ुद इन संस्कृति रक्षकों द्वारा नियमित रूप से लड़कियां छेड़ी जाती थीं.
संस्कृति-रक्षक दल के कई उत्साही कार्यकर्ता ख़ूबसूरत लड़कों की तलाश में बॉयज़ होस्टल्स के चक्कर भी लगाया करते थे. उनकी दलील थी –
‘जब लड़कियां हमको घास नहीं डालतीं तो फिर हमको शिकार करने के लिए बॉयज़ होस्टल्स के चक्कर ही तो लगाने पड़ेंगे.’
बचपन में हम लोग एक गीत गाते थे – ‘लाठी ले कर भालू आया ----’
आज लाखों पीड़ित लड़के-लड़कियां आर्तनाद करते हैं - ‘लाठी ले कर संस्कृति-रक्षक आया ----’
हमारी जवानी के ज़माने में वैलेन्टाइल डे का तो चलन भी नहीं था लेकिन आज यह युवकों-युवतियों का राष्ट्रीय पर्व बन गया है.
अगर किसी को पाश्चात्य संस्कृति की यह अंधी नक़ल पसंद नहीं है तो वह उसे अपने जीवन में न अपनाए लेकिन उसको इसका हिंसक विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है.
कई प्रांतीय सरकारों ने बेटे-बेटियों को भारतीय संस्कृति को अपने जीवन में अपनाने के लिए एंटी रोमियो स्क्वैड नियुक्त किए हैं.
भारतीय संस्कृति को न अपना कर रोमियो या जूलियट बनने वाले/वाली अपराधियों/अपराधिनियों को तथाकथित संस्कृति रक्षक और एंटी रोमियो स्क्वैड वाले सार्वजनिक स्थानों पर पीट कर और उन से मोटी रक़म वसूल कर ही उन्हें छोड़ते हैं.
दुःख की बात यह है कि विभिन्न सरकारों की ओर से संस्कृति-रक्षण के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी को बेशर्मी के साथ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण और पोषण दिया जा रहा है.
इस विषय में भगवान जी ने शायद साल में चातुर्मासी शयन के बजाय बारहमासी शयन करने का निश्चय कर लिया है.
संकटमोचक हनुमान जी की महिमा का बखान करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं
‘भूत-पिसाच निकट नहीं आवें, महावीर जब नाम सुनावें’
संस्कृति-रक्षकों के अत्याचारों से पीड़ित आज की भयभीत नौजवान पीढ़ी बारहमासी शयन में लीन भगवान जी को जगाने का असफल प्रयास करते हुए प्रार्थना करती है –
‘भूत-पिसाच भले आ आवें, संस्कृति रक्षक पास न आवें’