शनिवार, 10 अप्रैल 2021

सांच कहे तो मारन धावे

 

जहाँ भी तुम क़दम रख दो

वहीं पर राजधानी है

इशारों पर हिलाना दुम

ये पेशा खानदानी है

न ही इज्ज़त की है चिंता

न ही आँखों में पानी है

चरण-रज नित्य श्रद्धा से

हमें मस्तक लगानी है 

तुम्हें दिन में दिखें तारे

तो हाँ में हाँ मिलानी है

भले हो अक्ल घुटने में 

कहो जो बेद-बानी है

अगर कबिरा सा बोलें सांच

तो आफ़त बुलानी है

तुम्हारी हर जहालत पर

हमें ताली बजानी है


गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

स्वयं-मुग्धा नायिकाएं और ख़ुद पे फ़िदा नायकगण

यूं तो हमको टीवी पर, रेडियो पर और समाचार पत्रों में, सदा छाए रहने वाली एक विभूति की छत्रछाया में रहने का सौभाग्य प्राप्त है लेकिन जब उनके अलावा हमको कुछ और हस्तियों को भी दिन-रात देखना-सुनना पड़ता है तो हम अपने इस सौभाग्य से परेशान हो कर इस दुनिया को छोड़ कर भाग जाना चाहते हैं.
फ़ेसबुक पर उन नायिकाओं और उन नायकों से भगवान बचाए जो कि रोज़ाना अपनी एक दर्जन तस्वीरें पोस्ट करती/करते हैं.
छब्बीस जनवरी को तिरंगा लहराते, हुए होली के अवसर पर अबीर-गुलाल से खेलते हुए, ईद पर गोल टोपी धारण किए हुए, रक्षा बंधन पर बहन से राखी बंधवाते हुए या फिर भाई को राखी बांधते हुए, जन्माष्टमी पर कान्हाजी की या फिर राधाजी की भी छवि को मात करते हुए और दीपावली पर फुलझड़ी या अनार जलाते हुए, इनको देखने के बाद, रही-सही कसर इनकी बर्थडे पार्टीज़ पर केक काटते हुए इनकी विभिन्न मुद्राओं वाली फ़ोटोज़ से पूरी हो जाती है.
वैसे इनके फ़ोटो-शूट में दो कमियां फिर भी रह जाती हैं – गुड फ्राइडे पर न तो क्रॉस पर इन्हें चढ़ा हुआ दिखाया जाता है और न ही शहीद दिवस पर इन्हें फांसी के फंदे पर लटका हुआ.
यह आत्म-मुग्धि की पराकाष्ठा दूसरों को कितना कष्ट देती है, इसकी थाह पाना इन मासूम घमंडिनों के और इन भोले-भाले घमंडियों के, बस में नहीं है.
अगर ये देश-विदेश कहीं घूमने जाते हैं तो हमको फ़ेसबुक पर इनकी पचासों तस्वीरें देखनी पड़ती हैं और उनको लाइक भी करना पड़ता है.
अगर ये ताजमहल के सामने खड़े होकर रणवीर कपूर के पोज़ में अपनी तस्वीर खिंचवाते हैं तो इनकी कोशिश रहती है कि ये ताजमहल के गुम्बद से भी बड़े नज़र आएं और अगर ऐसी कोई आत्म-मुग्धा नायिका आलिया भट्ट के स्टाइल में बुलंद दरवाज़े के सामने खड़ी हों तो उनकी कोशिश रहती है कि वो उस से भी ज़्यादा बुलंद नज़र आएं.
और तो और, अगर ऐसी हस्तियाँ किसी मन्दिर में जाती हैं तो ये अपने फ़ोटो-शूट में भगवान को भी ओवर-शैडो करना चाहती हैं.
अपनी शादी के तुरंत बाद का एक क़िस्सा मुझे याद आ रहा है –
हमारे एक बहुत क़रीबी अंकल-आंटी थे.
अंकल उत्तर प्रदेश सरकार में बाक़ायदा एक फ़न्ने खां ओहदे पर तैनात थे.
अंकल-आंटी की मुझ से जब भी मुलाक़ात होती थी तो वो दोनों अपनी लेटेस्ट फ़ोटोज़ सहित गतांक से आगे की आत्म-श्लाघा का कार्यक्रम प्रारंभ कर देते थे.
लेकिन इस बार शादी के बाद मैं अंकल-आंटी से पहली बार मिल रहा था इसलिए मुझे उम्मीद थी कि वो लोग ख़ुद से ज़्यादा तवज्जो नई बहूरानी को देंगे.
दो-चार औपचारिक हाय-हेलो और सवाल-जवाब के बाद अंकल-आंटी ने नई बहूरानी को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया और दोनों ही उस समारोह का विस्तार से ज़िक्र करने लगे जिसमें अंकल तो मुख्य-अतिथि थे और पुरस्कार वितरण का शुभ-कार्य आंटी ने किया था.
आधे घंटे तक हम मियां-बीबी को रनिंग कमेंट्री के साथ इस समारोह का फ़ोटो-एल्बम देखना पड़ा.
सबसे दुखदायी बात तो यह थी कि हम दोनों को इस फ़ोटो-शतक की झूठ-मूठ तारीफ़ भी करनी पड़ी थी.
अंकल-आंटी से नई बहूरानी को कोई मुंह-दिखाई तो नहीं मिली लेकिन हमारी तारीफ़ से ख़ुश होकर उन्होंने स्मृति-चिह्न के रूप में वह फ़ोटो-एल्बम हमको ज़रूर दे दिया.
मेरी श्रीमती जी तो अंकल-आंटी के फीके स्वागत-सत्कार से बहुत दुखी हो गयी थीं लेकिन मेरे पास इस दुखदायी मिलन को सुखदायी समाचार में तब्दील करने का फ़ॉर्मूला था.
मैंने घर जाकर उस शानदार फ़ोटो-एल्बम की सारी फ़ोटोज़ चिंदी-चिंदी कर के आग के हवाले कर दीं और फिर उस ख़ाली एल्बम में अपनी शादी के एल्बम से बची हुई फ़ोटोज़ लगा लीं.
हमारे बहुत से उदीयमान गायक-गायिकाओं को फ़ेसबुक पर अपने वीडियोज़ पोस्ट करने का शौक़ होता है.
आए दिन ऐसे ही वीडियोज़ में बहुत से स्व-घोषित मुहम्मद रफ़ी और स्व-घोषित किशोर कुमार संगीत की हत्या करते नज़र आते हैं.
ऐसा ही अत्याचार लता मंगेशकर, आशा भोंसले या श्रेया घोषाल के साथ भी होता है.
मुझे उच्चारण दोष होने पर भी और क़ाफ़-शीन दुरुस्त न होने पर भी दूसरों के कानों में मच्छरों की तरह भिनभिनाते हुए बेसुरे कलाकार बहुत दुखी करते हैं.
अल्मोड़ा में हमारी एक भाभी जी स्व-घोषित गीता दत्त थीं.
ये बात और थी कि जब वो –
‘वक़्त ने किया क्या हंसी सितम - - - - ’
नग्मा गाती थीं तो वो गाती हुई गीता दत्त कम और मिमियाती हुई बकरी ज़्यादा लगती थीं
ऐसे ही जब वो –
‘न जाओ सैयां छुड़ा के बैयाँ, क़सम तुम्हारी मैं रो पडूँगी’
गाती थीं तो उनकी मधुर तान सुन कर सोते हुए बच्चे जाग कर रोने लगते थे.
भाभी जी से जब भी और जहां भी हमारी मुलाक़ात होती थी तो उनका दीर्घ-गामी गायन हमको बर्दाश्त करना ही पड़ता था.
उन दिनों सी. डी. का नहीं, बल्कि कैसेट्स का ज़माना था.
भाभी जी ने अच्छे-खासे पैसे खर्च कर के अपने गानों के कई कैसेट्स तैयार करवाए थे.
हमारे मना करने पर भी उन्होंने हमको अपने गानों वाले चार कैसेट्स ज़बर्दस्ती भेंट किए थे.
मुझ पापी ने कैसेट्स की दुकान पर जा कर स्व-घोषित गीता दत्त भाभी जी के मधुर गीत इरेज़ करवा कर उसमें असली गीता दत्त के गाने भरवा लिए थे.
हम मधुबाला की ख़ूबसूरती के क़ायल हैं लेकिन मधुबाला की हम रोज़ाना सैकड़ों तस्वीर देखेंगे तो उन से उकता जाएंगे.
हम सब लता जी के कोयल जैसे स्वर के मुरीद हैं मगर एक दिन में लता जी को सुनने का भी हम सबका कोई न कोई मैक्सिमम कोटा तो होता ही होगा.
सयाने कह गए हैं – ‘अति सर्वत्र वर्जयेत !’
किन्तु हमारे ये फ़ेसबुक चैंपियंस इस उक्ति की नित्य धज्जियाँ उड़ाते हैं और अपनी नाना प्रकार की तस्वीरों से, अपने भांति-भांति के वीडियोज़ से, हमारा चैन-ओ-अमन, हमारा सब्र-ओ-क़रार, बेतक़ल्लुफ़ होकर, बेमुरव्वत होकर, लूटते रहते हैं.
इन फ़ेसबुक चैंपियंस को अगर हम अपनी मित्र सूची से हटाएँ तो हम पर आफ़त आ सकती है. इनको फॉलो न करें या इनकी तस्वीरों और इनके वीडियोज़ को अगर हम लाइक न करें तो इनके तक़ाज़े आने लगते हैं.
मजबूरन हमको इन्हें और इनके अत्याचारों को बर्दाश्त करना ही पड़ता है.
क्या कोई क़ानून का जानकार मुझे बता सकता है कि श्रोताओं पर हिचकोले खाती भैंसागाड़ी की – ‘चूं-चरर-मरर, चूं-चरर-मरर’ जैसी आवाज़ में ग़ज़ल, गीत या कविता थोपने के अपराधियों पर और अपनी पचासियों हास्यास्पद-ऊलजलूल तस्वीरों से, अपने दर्जनों उबाऊ वीडियोज़ से, अपने फ़ेसबुक मित्रों को स्थायी सर-दर्द देने वाले इन मुजरिमों पर भारतीय दंड संहिता की कौन-कौन सी धाराएं लगाई जा सकती हैं?

मंगलवार, 6 अप्रैल 2021

मूर्ख-दिवस की बधाई

 आजकल के बच्चों के पेट में मान्यवर की दाढ़ी से भी लम्बी दाढ़ी होती है.

पिछले छह दिनों से हमारी तीन वर्षीया नातिन इरा को 'अप्रैल फ़ूूल' बनाने का चस्का लगा हुआ है.
कभी वो अपने पापा को, तो कभी अपनी मम्मा को, तो कभी अपने भैया को अप्रैल फ़ूूल बना रही हैं. मूर्ख बनाने के बाद वो अपने शिकार को मूर्ख-दिवस की बधाई देना भी नहीं भूलतीं.
इसकी एक बानगी पेश है -
Ira - 'Look mummy ! there is a spider on your back.'
Mummy - 'O my God ! Where is it?'
Ira - 'Fooled you ! Fooled you !
Happy Foolantine Day Mummy !'

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

समुद्र-मंथन

1
समुद्र मंथन की कथा हमारी पौराणिक कथाओं में बहुत प्रसिद्ध है.
‘शठे शाठ्यम समाचरेत्’ अर्थात- ‘दुष्टों के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए’ का सन्देश देने वाली इस कथा का वर्णन अग्नि पुराण में किया गया है.
एक बार मेनका नामक अप्सरा ने महर्षि दुर्वासा को दिव्य सुगंध वाले कल्पक पुष्पों की माला भेंट की. महर्षि दुर्वासा जैसे सन्यासी के लिए इस माला की कोई उपयोगिता नहीं थी. उन्होंने वह माला देवराज इन्द्र को भेंट कर दी.
देवराज इन्द्र ने माला को स्वयम् धारण करने के स्थान पर वह अपने हाथी के मस्तक पर डाल दी.
इन्द्र के हाथी ने भी अपने स्वामी इन्द्र की ही भांति उस माला का तिरस्कार किया और उसे धरती पर पटक दिया.
दुर्वासा ने अपनी भेंट का इस प्रकार तिरस्कार होते हुए देखा तो उन्हें क्रोध आ गया.
उन्होंने देवराज इन्द्र को यह शाप दिया कि देवलोक का सारा यश और वैभव भी माला की तरह ही धूल-मिट्टी में मिल जाए.
इस शाप के प्रभाव से देवलोक का सारा वैभव और यश नष्ट होने लगा.
असुरों ने जब देवताओं की यह दशा देखी तो उन्होंने उसका लाभ उठाकर उन पर आक्रमण कर दिया.
अशक्त देवतागण असुरों का सामना नहीं कर सके.
असुरों के विरुद्ध सहायता माँगने के लिए देवतागण भगवान ब्रह्मा के पास गए किन्तु उनके पास इस समस्या का कोई निदान नहीं था इसलिए उन्होंने देवताओं को भगवान विष्णु से सहायता मांगने की सलाह दी.
भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि वो अमृत पान करके फिर से शक्तिवान होकर असुरों को परास्त कर सकते थे और अमरत्व भी प्राप्त कर सकते थे. भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत प्राप्त करने का मार्ग भी सुझाया -
‘देवगण ! आप लोगों में स्वयम् अमृत प्राप्त करने की शक्ति नहीं है. अमृत प्राप्त करने के लिए आप को अपने परम्परागत शत्रु असुरों की सहायता लेनी पड़ेगी.’
भगवान विष्णु ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन का उपाय बताया था.
यह समुद्र मंथन कोई साधारण मंथन नहीं था, इसमें पहले क्षीर सागर में सृष्टि की समस्त औषधीय वनस्पतियां डाली जानी थीं फिर उसका देर तक मंथन किया जाना था.
इस दुर्गम प्रक्रिया के बाद ही अमृत प्राप्त होना था.
अमृत के लालच में असुरों ने देवताओं का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
असुर दुष्ट और अत्याचारी थे. भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि वे अमृत पान करके शक्तिशाली और अमर हो जाएं. इसलिए उन्होंने ऐसी चाल चली कि अमृत प्राप्त करने में असुरों की शक्ति का उपयोग भी हो जाए पर उन्हें अमृत पान करने का अवसर नहीं मिल पाए.
देवताओं और असुरों ने मिलकर सृष्टि की सारी औषधीय वनस्पतियां क्षीर सागर में डाल दीं.
इसके बाद महामेरु पर्वत को मथनी बनाया गया और इस मथनी को चलाने के लिए वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयुक्त किया गया. मंथन के समय कहीं महामेरु पर्वत क्षीर सागर में डूब न जाए इसके लिए विष्णु ने स्वयं कच्छप का रूप धारण करके उसे अपनी पीठ पर टिका लिया.
अब वासुकि नाग को इस विशाल मथनी को चलाने के लिए प्रयुक्त किया गया पर यहाँ भी विष्णु ने अपनी चतुराई दिखाई. उन्होंने समुद्र मंथन में देवताओं को वासुकि नाग की दुम की ओर का भाग दिलाया और असुरों को उसके फन की ओर का भाग.
वासुकि की ज़हरीली फुफकारों के प्रभाव से असुर काले पड़ गए पर देवताओं पर इसका कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा.
2
समुद्र मंथन में कुल चौदह रत्न प्राप्त हुए । ये रत्न थे -
1. कामधेनु
2. कमल लोचन वारुणि नामक कन्या
3. पारिजात (कल्पवृक्ष)
4. अप्सराएं
5. चन्द्रमा
6. कालकूट विष
7. पाँचजन्य (शंख)
8. कौस्तुभ मणि
9. धनवन्तरि
10. लक्ष्मी
11. उच्चैश्रवा नामक घोड़ा
12. ऐरावत नामक सफ़ेद हाथी
13. मदिरा
14. अमृत
समुद्र मंथन से निकले रत्नों के कारण अनेक समस्याएं खड़ी हो गईं. कालकूट विष के निकलते ही उसके विषैले धुएं और ज़हरीली लपटों से तीनों लोकों के नष्ट होने का संकट उठ खड़ा हुआ.
और कोई उपाय न देखकर भगवान ब्रह्मा ने भगवान शंकर की शरण ली.
उन्होंने शिव जी से प्रार्थना की -
‘भगवन ! आप ही समस्त सृष्टि को कालकूट विष के प्रकोप से बचा सकते हैं.’
भगवान शिव ने कालकूट विष को पी तो लिया पर उन्होंने उसे अपने गले में ही रोक लिया.
विष के प्रभाव से भगवान शंकर का कण्ठ नीला पड़ गया जिसके कारण उनका एक नाम नीलकण्ठ भी हो गया.
विष की गरमी भगवान शंकर के मस्तक तक चढ़ गई थी जिसे शीतल करने के लिए उन्हें अपने मस्तक पर धारण करने के लिए चन्द्रमा प्रदान किया गया.
समुद्र मंथन से निकली और कमल पर विराजमान देवी लक्ष्मी विष्णु को प्राप्त हुईं.
असुरगण लक्ष्मी को स्वयम् प्राप्त करना चाहते थे.
विष्णु को लक्ष्मी का उपहार मिल जाने से असुर नाराज़ हो गए और वो अमृत कलश लेकर भाग खड़े हुए.
3
भगवान विष्णु ने असुरों से अमृत कलश प्राप्त करने के लिए एक अनोखा स्वांग रचा. उन्होंने मोहिनी का रूप धारण किया.
मोहिनी ने असुरों के लोक में जाकर उन पर अपने रूप का जादू चला दिया. सभी असुर मोहिनी से विवाह करना चाहते थे. वह उसके हाथों से अमृत पान करना चाहते थे.
मोहिनी ने असुरों से कहा-
‘मैं आप सबको अमृत पान कराऊँगी और आप में से एक असुर से विवाह भी करूंगी पर इसके लिए आप को मेरी एक शर्त माननी होगी.‘
असुरों मोहिनी से कहा -
‘सुन्दरी तुम जो भी कहोगी वह हम करेंगे. बोलो तुम्हारी क्या शर्त है?’
मोहिनी ने लुभावनी मुस्कान बिखेरते हुए कहा -
‘मैं आप सबको अमृत पान कराऊँगी पर इसके लिए आप सबको अपनी-अपनी आँखें बन्द करनी होंगी. आप में से जो असुर सबसे बाद में अपनी आँखें खोलेगा मैं उसी के हाथ से अमृत पान करूंगी और फिर उसी से विवाह कर लूंगी.’
मोहिनी को प्राप्त करने की होड़ में मूर्ख असुरों ने उसकी शर्त मान कर अपनी-अपनी आखें मूँद लीं. अमृत पान कराने के बहाने मोहिनी ने असुरों से अमृत कलश पहले ही प्राप्त कर लिया था अब उन सबकी मुंदी आँखों का लाभ उठाकर वह अमृत कलश लेकर चुपचाप देवलोक चली आई.
असुरों को जब मोहिनी की इस चाल का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी. असुर मोहिनी का पीछा करते हुए देवलोक पहुंचे जहाँ सूर्य और चन्द्रमा स्वर्ग के द्वार की रक्षा कर रहे थे.
असुर स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर पाए पर उनमें से स्वरभानु नामक असुर भेष बदल कर चुपचाप देवलोक में प्रवेश कर गया. देवताओं में अमृत बाँटे जाते समय उसने भी अमृत पान कर लिया किन्तु उसको वहां सूर्य और चन्द्रमा ने पहचान लिया.
अमृत अभी स्वरभानु के गले तक ही पहुँचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया.
अमृत पान करने के कारण स्वरभानु के सर से गले तक का हिस्सा (राहु) अमर हो गया पर उसका शेष शरीर (केतु) नष्ट हो गया.
राहु ने इस घटना के लिए सूर्य और चन्द्रमा को दोषी ठहराया.
उसने उनसे बदला लेने का निश्चय कर लिया.
तब से अवसर पाकर वह कभी सूर्य को तो कभी चन्द्रमा को निगल लेता है पर वह कुछ ही देर बाद ही उसके कटे हुए गले से बाहर निकल जाते हैं.
इस प्रकार की घटनाओं को हम सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के रूप में जानते हैं.
अमृत पान करने के बाद देवता फिर से सशक्त हो गए और उन्हें अमरत्व भी प्राप्त हो गया. उन्होंने असुरों को युद्ध में पराजित किया.
अमृत पान करके देवतागण महर्षि दुर्वासा के शाप से मुक्त हो गए.
देवलोक और मृत्यु लोक में फिर से शान्ति हो गई और वहाँ सुख-समृद्धि की फिर से स्थापना हो गई.
समुद्र मथन से निकले चौदह रत्नों में से भगवान विष्णु को लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि और पाँचजन्य शंख प्राप्त हुए.
देवराज इन्द्र को उच्चैश्रवा नामक घोड़ा और ऐरावत हाथी प्राप्त हुए.
अप्सराओं को देव-लोक में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए नियुक्त किया गया.
कामधेनु और पारिजात (कल्पवृक्ष) भी देवलोक को प्राप्त हुए.
भगवान धनवन्तरि भी देवताओं के हिस्से में आए. उनके आयुर्वेद शास्त्र का लाभ उठाकर देवता सदैव निरोगी और पुष्ट रहने लगे.
अमृत पान से देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ.
कालकूट विष और चन्द्रमा भगवान शंकर के भाग में आए.
समुद्र मंथन से असुरों को कोई लाभ नहीं हुआ.
स्वयं मूर्ख बनकर उन्होंने देवताओं को अमृत प्राप्त करने में सहायता दी.
असुरों को मिली तो केवल मदिरा मिली. इस मदिरा को निरंतर पीते रहने से उनका रहा-सहा विवेक भी जाता रहा. देवलोक जीतने का उनका स्वप्न सदा के लिए धूल में मिल गया.
भगवान विष्णु ने साम-दाम-दण्ड-भेद से देवताओं को महर्षि दुर्वासा के श्राप से मुक्त करवाया.
उनके इस कार्य को किसी भी प्रकार अनुचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इसका परिणाम बड़ा सुखद रहा.
इससे धर्म की फिर से स्थापना हुई और पाप का तथा पापियों का नाश हुआ.

मेरा अपना निष्कर्ष :
इस कहानी में सिंहासनारूढ़ विष्णु भगवान को समुद्र-मंथन से निकली अधिकांश मलाई मिल जाती है.
शास्त्रोंं-पुराणों के अनुसार धर्म की स्थापना तभी होती है जब बिना हाथ-पैर हिलाए साहब को और उनके खासमखास लोगों को, सारी की सारी मलाई मिलती है और प्रजा को जी-तोड़ मेहनत करने के बावजूद छाछ भी नहीं मिलता हैे.