मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी-दिवस

हिंदी दिवस, हिंदी पखवाड़ा आदि का नाटक हम 1960 के दशक से देखते और सहते आ रहे हैं. भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति -

'निज भाषा उन्नति अहै , सब उन्नति को मूल'

को सुन-सुन कर तो हमे घर के पालतू तोते भी उसे गुनगुनाने में निष्णात हो गए हैं.

हिंदी को भारत के माथे की बिंदी बताने की रस्म आज हिंदी भाषी क्षेत्र का बच्चा-बच्चा निभा रहा है.

अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने की पंक्ति-

'हिंदी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा'

का अर्थ समझे बिना आज के दिन हिंदी भक्त उसे दोहराते आए हैं.

यहाँ यह बता दूं कि इस पंक्ति में 'हिंदी' का अर्थ है -

हिंद का निवासी यानी कि हिन्दुस्तानी

यहाँ हिंदी भाषा से इसका कोई लेना देना नहीं है.

भारतेन्दुकालीन हिंदी नवजागरण में हिंदी के सर्वतोमुखी विकास का सार्थक प्रयास प्रारंभ प्रारंभ हुआ.

हिंदी को हिंदी की स्थानीय बोलियों और हिंदी साहित्य की प्रचलित भाषा – ब्रज भाषा से कहीं ऊपर – शिक्षा राजकाज न्यायपालिका और व्यापार की भाषा बनाने के सार्थक प्रयास प्रारंभ हुए.

फूट डाल कर शासन करने की नीति अपनाने वाले अंग्रेज़ शासकों ने इसे इसे हिंदी-उर्दू और हिन्दू-मुसलमान का आपसी झगड़ा बना दिया.

हिंदी-उर्दू भाषाओँ के झगडे को देवनागरी लिपि और उर्दू-फ़ारसी लिपि का विवाद भी बना दिया गया.

कबीर के शब्दों में कहें तो –

अरे इन दोउन राह न पाई !

भाषा और लिपि के इस विवाद ने भारत में अंग्रेज़ी भाषा के और रोमन लिपि के आधिपत्य को और भी स्थायी बना दिया.

बहुत कम हिंदी समर्थक यह मानते हैं कि मानक हिंदी, उर्दू की ऋणी है.

भारतेंदु के युग में जिस खड़ी बोली का विकास किया गया, द्विवेदी युग में जिसका परिष्कार किया गया, उसका पहला पन्ना तो अमीर ख़ुसरो सात सौ साल पहले लिख चुके थे.

उन्नीसवीं शताब्दी में उर्दू, हिंदी से बहुत आगे थी और हिंदी का हर प्रतिष्ठित विद्वान उन दिनों उर्दू भाषा तथा उर्दू अदब का जानकार हुआ करता था.

स्वतंत्रता के बाद हिंदी का ही क्या, सभी भारतीय भाषाओँ का जिस तरह विकास होना चाहिए था, वह नहीं हुआ.

हमारी न तो कोई राष्ट्रभाषा बनी और न कोई राष्ट्र-लिपि बनी तथा  व्यावहारिक दृष्टि से अंग्रेज़ी ही आक़ाओं की ज़ुबान बनी रही.

1960 के दशक के हिंदी आन्दोलन को मुख्य रूप से संभाला अवसरवादी नेताओं ने, जिन्होंने कि अपने बच्चों को अंग्रेज़ी तालीम के लिए विलायत भेजने से कभी परहेज़ नहीं किया.

हिंदी का विरोध करने वालों ने भी अपनी-अपनी भाषाओँ के विकास के स्थान पर निजी स्वार्थ और हिंदी विरोध के नाम पर सत्ता हथियाने को ही वरीयता दी.

आज़ादी के 74  साल बाद भी हिंदी विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्रामाणिक मौलिक ग्रन्थ उपलब्ध कराने में अक्षम है.

आज भी हिंदी भाषी क्षेत्रों में न्यायालयों की भाषा आमतौर पर अंग्रेज़ी ही है.

लोकसभा राज्यसभा ही क्या सभी जन-प्रतिनिधि सभाओं में होने वाली कार्रवाई में अंग्रेज़ी बोलने वालों का ही दबदबा रहता है.

हिंदी की इस दुर्दशा के लिए हम हिंदीभाषी ही मुख्यतः ज़िम्मेदार हैं. आमतौर पर हम हिंदी भाषी केवल एक भाषा जानते हैं लेकिन अन्य भाषाभाषियों से यह अपेक्षा करते हैं कि वो हिंदी सीखें.

मेरी दृष्टि में हिंदी का विकास करने के लिए हमको किसी भी भाषा से कुछ भी अच्छा लेने से परहेज़ नहीं करना चाहिए.

सिर्फ़ हिंदी जानने वाले हिंदी का समुचित विकास नहीं कर सकते.

भाषा को धर्म से जोड़ने की ग़लती भी हिंदी का नुक्सान कर रही है.

प्रसाद-पन्त की जैसी शुद्ध-प्रांजल संस्कृत निष्ठ हिंदी को अपना कर हम हिंदी का भला नहीं कर सकते.

अगर हमारी भाषा में उर्दू, पंजाबी, तेलगु, मराठी आदि भारतीय भाषाओँ के ही क्या, अंग्रेज़ी के शब्द भी आ जाएं तो क्या हानि है?

ऐसा करने से हमारी भाषा समृद्ध ही होगी, दरिद्र नहीं !

तकनीकी और वैज्ञानिक शब्दावली में हमको विदेशी भाषाओँ के प्रचलित शब्दों का प्रयोग करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए.

ऑक्सीजन- को ओशोजनऔर -  नाइट्रोजनको नत्रजनकह कर हम हिंदी की सेवा नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसे दुरूह बना कर उसे हानि ही पहुंचा रहे हैं.

आज हमने देवनागरी लिपि में नुक्ते का प्रयोग कम कर के उसे उर्दू से बहुत दूर कर दिया है.

हम हिंदी भाषा को और देवनागरी लिपि को अधिक समर्थ बनाने का, उन्हें अधिक लचीली बनाने का प्रयास करें, न कि उन्हें एक सीमित दायरे में बाधें.

हिंदी को गंगा की तरह होना चाहिए जो कि सभी नदियों का जल ख़ुद में मिलाने में कभी संकोच नहीं करती है.

अध्यापन में सारी उम्र बिताने के बाद मैं तो इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि फ़िलहाल भारत में तरक्की करने के लिए नई पीढ़ी को अंग्रेज़ी तो सीखनी ही पड़ेगी और अगर हो सके तो कोई अन्य भाषा जैसे चीनी या जापानी भी कोई सीख ले तो उसे आगे बढ़ने से फिर कोई नहीं रोक सकता.

हिंदी की विशेषता गिनाते समय हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ़ हिंदी का ज्ञान हमको सफल नेता तो बना सकता है लेकिन अन्य क्षेत्रों में हमारा पिछड़ना तय है.

हमारे जैसे हिन्दीभाषी बुद्धिजीवी भी आमतौर पर कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं जानते.

क्या यह हमारे लिए शर्म की बात नहीं है

तामिल, बांग्ला जैसी महान भाषाओँ के अमर ग्रंथों को हम उनके मूल रूप में तो पढ़ ही नहीं सकते.

यह सही है कि हिंदी का विकास हो रहा है किन्तु वह बाज़ार की आवश्यकताओं के कारण हो रहा है हमारे प्रयासों के कारण नहीं !

हिंदी के विकास में मुम्बैया फ़िल्मों का योगदान भी नकारा नहीं जा सकता. लेकिन इस पर हम हिन्दीभाषी कैसे गर्व कर सकते हैं?

हमने हिंदी को सक्षम बनाने के लिए अपनी तरफ़ से कुछ भी नहीं किया है.

मुझे हिंदी बोलने में शर्म नहीं आती लेकिन मुझे हम हिंदी भाषियों की काहिली पर, हमारी हठवादिता पर बहुत शर्म आती है.

हिंदी दिवस को, हिंदी पखवाड़े को, हम हिंदी युग तो तभी बना पाएंगे जब हम इमानदारी से उसके विकास के लिए प्रयास करेंगे.

और जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे तब तक एक दूसरे को हिंदी दिवस की, हिंदी पखवाड़े की, बधाई देकर अपना मन बहला लेंगे और हिंदी की सेवा करने का ख़ुद को श्रेय देकर अपनी पीठ थपथपा लेंगे.

हिंदी-दिवस पर एक बार फिर मेरी पुरानी रचना –

1.  कितनी नक़ल करेंगेकितना उधार लेंगे,
सूरत बिगाड़ माँ कीजीवन सुधार लेंगे.
पश्चिम की बोलियों कादामन वो थाम लेंगे,
हिंदी दिवस पे ही बसहिंदी का नाम लेंगे.

 

2.  जिसे स्कूलदफ्तर सेअदालत सेनिकाला था,
उसी हिंदी को अबघर से और दिल से भी, निकाला है.
तरक्क़ी की खुली राहेंमिली अब कामयाबी भी,
बड़ी मेहनत से खुद कोसांचा-ए-इंग्लिश में ढाला है.

 

3.  सूर की राधा दुखीतुलसी की सीता रो रही है,
शोर डिस्को का मचा हैकिन्तु मीरा सो रही है.
सभ्यता पश्चिम कीविष के बीज कैसे बो रही है,
आज अपने देश मेंहिन्दी प्रतिष्ठा खो रही है.

 

4.  आज मां अपने ही बेटों मेंअपरिचित हो रही है,
बोझ इस अपमान काकिस शाप से वह ढो रही है.
सिर्फ़ इंग्लिश के सहारेभाग्य बनता है यहां,
देश तो आज़ाद हैफिर क्यूं ग़ुलामी हो रही है.

 

5.    'निराला को कभी जो एक कुटिया तक न दे पाई,
वही बे-बेबसभिखारनबे-सहाराहै मेरी हिंदी !'
किसी वृद्धाश्रम मेंख़ुद उसेअब दिन बिताने हैं,
किसी के भाग्य को अब क्या संवारेगीमेरी हिंदी !

रविवार, 5 सितंबर 2021

आपा मिशन 50 प्रतिशत

शिक्षक दिवस पर अपनी पहली फ़ुल-टाइम विद्यार्थी आपा की याद को एक बार फिर ताज़ा करते हुए -
आपा - मिशन 50 प्रतिशत –
लखनऊ विश्वविद्यालय में मध्यकालीन एवं आधुनिक भारतीय इतिहास में एम० ए० करना मेरे लिए एक सुखद अनुभव था.
इतिहास पढना मुझे बेहद अच्छा लग रहा था.
हमारे विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर नागर मुझे हमेशा बढ़ावा देते थे.
प्रोफ़ेसर नागर के प्रोत्साहन ने ही मुझ में अपने ही साथियों को पढ़ाने की हिम्मत दिलाई थी. पांच-छह साथियों को तो मैं अब बाकायदा पढाने भी लगा था.
हमारे क्लास में एक बुजुर्गवार मोहतरमा थीं.
उनका असली नाम न बता कर उन्हें सिर्फ आपा कह लेते हैं.
मामूली शक्लो-सूरत की आपा के चेहरे से सिर्फ मायूसी और बेबसी बरसती थी. इतिहास ज्ञान के मामले में वो पूरी तरह पैदल थीं.
आपा मुगले आज़म वाली भारी-भरकम उर्दू बोला करती थीं और हिंदी लिखने में उन्हें हमेशा दिक्कत होती थी, अंग्रेजी से तो उनका छत्तीस का आंकड़ा था.
उनका रिकॉर्ड था कि उन्होंने कभी प्रथम या द्वितीय श्रेणी के दर्शन नहीं किए थे.
आपा मेरे सहपाठियों में मेरी सबसे बड़ी प्रशंसक थीं और उनके लिए मैं सुपर हीरो हुआ करता था.
आपा को मुझे रोजाना एक घंटा अलग से पढ़ाना पड़ता था.
मेरे क्लास की लड़कियां इस बात को लेकर मुझ पर खूब ताने कसती रहती थीं. उनकी समझ में नहीं आता था कि इस निरूपा राय किस्म की आपा पर मैं अपना इतना वक़्त कैसे बर्बाद कर लेता हूँ.
लड़कियों ने मुझ से इस रहस्य का उदघाटन किया कि आपा को उनके शौहर ने शादी के सात साल तक औलाद न होने की वजह से तलाक दे दिया था.
अब आपा ने बी०एड० करने के दस साल बाद पढाई फिर से शुरू की थी.
पर इन जानकारियों के बाद मेरे दिल में आपा के लिए इज्ज़त और बढ़ गयी और उनको पढ़ाने में मैं अब और भी ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा था.
आपा गाती बहुत अच्छा थीं, खासकर पुराने दर्द भरे नगमे गाने में तो उनका कोई जवाब ही नहीं था.
खाली पीरियड्स में आयोजित संगीत गोष्ठियों में हमारी फ़रमाइश पर उन्होंने पता नहीं कितने गाने गाए होंगे.
आपा गज़ब की कुक थीं. मेरे लिए बिना लहसुन प्याज़ की कोई न कोई नमकीन डिश और साथ में हलवा या सेवईं या फिर फिरनी बना कर लाना और उसे सबसे बचा कर सिर्फ मुझे खिलाने की आपा की आदत, मुझ जैसे हॉस्टल का बेस्वाद खाना खाने वाले को बहुत पसंद थी.
मेरे हॉस्टल और क्लास के भी साथी, महा बेशरम जनाब खान साहब की नाक बहुत तेज़ थी, वो आपा के पास बैठ कर सिर्फ खुशबू से यह जान लेते थे कि आपा आज क्या माल लेकर आई हैं.
खान साहब आपा पर ताने कसते हुए कहते थे -
‘गोपू बनिए की आये दिन खातिर और अपने बिरादर खान भैया को सिर्फ ठेंगा? आपा, कुछ तो शर्म करो.’
आपा भी ज़ोरदार जवाब देने में माहिर थीं –
‘गोपू मेरा उस्ताद है उसकी खातिर तो मैं ऐसे ही करुँगी और तेरी खातिर तो सिर्फ डंडों से ही करुँगी.
मैंने अब तक तीन-तीन डंडे ही देखें हैं पर चार कभी नहीं, मुझ पर तेरा साया भी पड़ गया तो एम० ए० में मेरे चार डंडे आयेंगे.
गुरु-दक्षिणा में वो चारो डंडे तेरे सर पर ही तो फोडूंगी.’
मैं उत्तर लिखते समय आपा की विस्तृत किस्सागोई की आदत से बहुत त्रस्त रहता था.
आपा की एक और बुरी आदत यह थी कि वो परीक्षा के समय पहले दो-तीन सवालों के जवाब में ही लगभग पूरा निर्धारित समय बर्बाद कर देती थीं.
आपा को आंसर शीट में क्या लिखना है, इससे ज्यादा मैंने यह सिखाया कि उन्हें उसमें क्या नहीं लिखना है और यह भी सिखाया कि उन्हें हर सवाल के जवाब को बराबर तवज्जो देनी है. मैंने उन से यह वचन भी लिया कि वो प्रश्नपत्र में अटेम्ट किए गए पाँचों सवालों के जवाबों के लिए बराबर वक़्त देंगी.
आपा की गाढ़ी उर्दू की जगह अब सरल हिंदी ने ले ली थी.
मेरी और आपा की मेहनत रंग लाई. मेरे एम० ए० पार्ट वन में उच्चतम अंक आए और आपा के आये 49 प्रतिशत.
आपा ने हम दोनों की सफलता की पहली किश्त की क्लास भर में मिठाई बांटी
अब एम० ए० फ़ाइनल में हम दोनों - आपा-मिशन 50 प्रतिशत में जुट गए.
एम० ए० फ़ाइनल में मैंने आपा को पहले से दुगुना पढ़ाया ही नहीं बल्कि उन्हें पहले से दुगुना होम-वर्क भी दिया.
पढ़ते-पढ़ते बेचारी आपा का चश्मे का नम्बर तक बढ़ गया लेकिन उनकी और मेरी मेहनत का नतीजा बड़ा खुशगवार रहा.
मैंने एम० ए० में टॉप किया और आपा के कुल 52 प्रतिशत अंक आए.
आपा के वालिद का एक मुस्लिम कन्या विद्यालय के मैनेजमेंट में काफी दबदबा था.
एम० ए० में 50 प्रतिशत अंक लाने पर आपा की वहां नौकरी पक्की हो जानी थी.
आपा को एम० ए० की सफलता पर नौकरी मिल भी गयी.
आपा-मिशन 50 प्रतिशत की सफलता, उनको नौकरी मिलने की , मेरे टॉप करने की और मुझे यूजीसी फ़ेलोशिप मिलने की, मिली-जुली खुशी में आपा के घर पर दावत रखी गयी.
आपा के वालिद, उनकी वालिदा, सभी परिवार-जन मेरे नाम से, मेरे काम से, अच्छी तरह वाकिफ थे.
मुझे ज़िन्दगी में कभी एक साथ इतनी दुआएं नहीं मिलीं, एक साथ कभी इतना प्यार नहीं मिला.
मेरे सामने तोहफों का अम्बार लगा था लेकिन खुश होने की जगह मेरी आँखें आंसुओं से भरी हुई थीं.
इसके बाद आपा की ज़िन्दगी में सब कुछ अच्छा ही अच्छा हुआ.
कुछ साल बाद दो बच्चों के बाप, खाते-पीते परिवार के एक विधुर से उनकी शादी हो गयी.
आपा शाहजहांपुर चली गयीं. अपने शौहर के रसूख से उन्हें शाहजहांपुर में एक मुस्लिम गर्ल्स इंटर कॉलेज में नौकरी भी मिल गयी.
आपा ने कुछ ही दिनों में अपने शौहर के बच्चों को अपना बना लिया.
इस तरह से उनका माँ बनने का सपना भी पूरा हो गया.
मेरी लखनऊ यूनिवर्सिटी की जॉब छूटी तो फिर मैंने कुमाऊँ यूनिवर्सिटी जॉइन कर ली.
आपा की शादी के तीन-चार साल बाद से मेरी उन से फिर मुलाक़ात नहीं हुई पर मुझे आज भी याद आता है बड़े प्यार और अधिकार से उनका मुझे गोपू कह कर बुलाना, याद आते हैं उनके गाए हुए खूबसूरत नगमे, याद आता है, किसी न किसी बहाने सबके सामने मेरे सर पर हाथ फेरना, याद आते हैं उनके बनाए हुए स्वादिष्ट पकवान, पर सबसे ज्यादा याद आती हैं –
बे-इन्तहा दुलार बरसाती हुई, चश्मे के अन्दर से झांकती हुई, उनकी ममता भरी आँखें.