बुधवार, 16 जून 2021

चंदा ओ चंदा !

 1. चंदा की सोलह कलाएं -

हमारे द्वारा दिया गया चंदा
पूर्णमासी वाला चंदा होता है
जो कि खाते तक पहुँचते-पहुंचते
अमावस्या वाले चंदा में बदल जाता है.
2. अत्याखाइयों (नव-गठित शब्द) की कहानी तो अभी शुरू हुई है -
टिप ऑफ़ दि आइसबर्ग है, रोता है क्या,
आगे-आगे देखिए, होता है क्या !
3. पार तो दोनों ने कराया -
राम जी ने बेड़ा पार कराया !
धर्म-रक्षकों ने चंदा पार कराया !

रविवार, 13 जून 2021

नए राजवंश का इतिहास

 अंगने लाल (मुख्यमंत्री) –

प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी ! एक इतिहासकार की हैसियत से तुमने पूरे भारत में नाम रौशन किया है, खास कर के नए-नए राजवंशों का इतिहास लिख कर.
अब तुमको हमारे राजवंश का भी इतिहास लिखना है.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
हुज़ूर, आपके राजवंश ने हमारे प्रदेश की स्वर्ण-युग में फिर से वापसी कराई है. इस सुनहरे दौर की दास्तान लिखने का फ़ख्र अगर मुझे हासिल हो जाए तो मैं इसे अपनी खुशकिस्मती समझूंगा.
अंगने लाल –
ऐसा फ़ख्र तो हम तुमको हासिल करने देंगे पर एक शर्त है –
तुम्हारे बारे में सुना है कि तुम राजवंशों का इतिहास लिखते समय झूठ का बहुत सहारा लेते हो लेकिन हमारे राजवंश का इतिहास लिखते समय तुम कुछ भी सरासर झूठ नहीं लिखोगे.
हाँ, बढ़ा-चढ़ा कर लिखे जाने पर या अर्ध-सत्य लिखे जाने पर हमको कोई ऐतराज़ नहीं होगा.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
अन्नदाता ! आपके खानदान के सारे कच्चे-चिट्ठे मैं आप से ही जानना चाहूँगा.
इस कच्चे-चिट्ठे को मैं इतिहास के पन्नों में अर्ध-सत्य का मुलम्मा चढ़ा कर ऐसे पेश करूंगा कि आपका राजवंश, मौर्य राजवंश, गुप्त राजवंश, और मुगलिया खानदान को भी, महानता की दौड़ में पछाड़ दे.
हाँ तो माई-बाप पहले आप अपने पुरखों के बारे में बताएं.
अंगने लाल –
हमारे पुरखे तो ज़रायम-पेशा (आपराधिक गतिविधियाँ कर अपना जीवन-यापन करने वाले) लोग थे.
सुनसान सड़कों पर काफ़िले लूटने में उन्हें महारत हासिल थी.
अंग्रेज़ी राज में तो ज़रायम-पेशा क़बीलों में हमारा कबीला टॉप टेन में हुआ करता था.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
अगर अंग्रेज़ आपके क़बीले को अपराधी मानते थे तो फिर उसे अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति का बिगुल बजाने वाला राज-परिवार कहने से भला मुझे कौन रोक सकता है?
अंगने लाल –
क्रांतिकारी ! वाह क्या दूर की कौड़ी लाए हो प्रोफ़ेसर !
लेकिन हमारे दादा जी का क्या करोगे?
वो तो बटमारी का अपना खानदानी पेशा छोड़ कर कलेक्ट्रेट में चपरासी हो गए थे.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
दयानिधान ! 'खानसामा' को - 'खानेखाना' में बदलना तो मेरे बाएँ हाथ का खेल है.
आपके दादाजी कलेक्ट्रेट में मुलाज़िम थे तो मैं यह लिख दूंगा कि वो कलेक्टर थे.
इसमें कलक्ट्रेट में काम करने वाली बात तो झूठी नहीं होगी.
अब आप अपने माता-पिता के बारे में बताएं.
अंगने लाल –
अपनी माता जी के खानदान के बारे में तो हमको कुछ ख़ास पता नहीं.
हाँ, इतना पता है कि वो हमारे पिताजी के साथ भागने से पहले तीन-चार अन्य प्रेमियों के साथ भी भागी थीं.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
तो फिर आपकी माता जी को मैं ख्यातिप्राप्त धाविका दिखा दूंगा.
और आपके पूज्य पिताजी क्या करते थे?
अंगने लाल –
हमारे दादा जी तो पिता जी को पंखा कुली की नौकरी दिलवाना चाहते थे लेकिन उनका मन तो सिर्फ़ मन्दिर की चौखट पर रखे हुए जूते-चप्पल चुराने में ही रमता था.
अब बताओ हिस्टोरियन बाबू ! इस सत्य पर तुम अर्ध-सत्य का मुलम्मा कैसे चढ़ाओगे?
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
मालिक ! मैं आपके पिताजी के पेशे के बारे में कुछ नहीं लिखूंगा.
हाँ, इतना ज़रूर लिखूंगा कि वो बिना मन्दिर जाए कभी अन्न-जल ग्रहण नहीं करते थे.
अंगने लाल -
हमारे बारे में क्या लिखोगे? हम तो राजनीति में आने से पहले लाठी लेकर गाय-भैंस हांका करते थे.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
भगवान शंकर को पशुपति कहा जाता है.
कान्हा जी गाय चराते थे और ईसा मसीह, हज़रत मुहम्मद भेड़ें चराते थे.
मैं आपको इन सबका हम-पेशा बता कर आपको भी मसीहाई दर्जा दिला कर रहूँगा.
अंगने लाल – इतिहासकार बाबू ! हम लगभग अंगूठा-छाप हैं. इसका क्या करोगे?
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
मैं आपको कबीरपंथी कहूँगा.
वैसे गुरुदेव कहे जाने वाले रबीन्द्रनाथ टैगोर के पास भी कोई डिग्री नहीं थी.
अंगने लाल –
अपने नालायक लड़के का हम क्या करें? उस कमबख्त को तो राजनीति से ज़्यादा दिलचस्पी स्मगलिंग में है.
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
राजन ! मैं आपके राजकुंवर को आयात-निर्यात व्यापार के उभरते हुए सितारे के रूप में प्रस्तुत करूंगा.
वैसे भी राजनीति में उतरने से पहले इस प्रकार के साहसिक अभियानों का अनुभव तो उनके लिए लाभदायक होगा ही.
अंगने लाल –
ठीक है प्रोफ़ेसर ! लिखो हमारे राजवंश का इतिहास ! पर यह बताओ कि तुम पिछले दिनों किस राजवंश का इतिहास लिख रहे थे?
प्रोफ़ेसर चारण भाट दरबारी –
हुज़ूर, वैसे ये बात टॉप सीक्रेट है पर मैं आपको बता देता हूँ.
पिछले दिनों मैं दाऊद इब्राहीम राजवंश का इतिहास लिख रहा था.

शनिवार, 5 जून 2021

शौक़-ए-मुदर्रिसी

 बादशाह शाहजहाँ की आँखों के सामने ही उसका राज-पाट चला गया, उसके तीन बेटे मौत के घाट उतार दिए गए और उसे आगरे के किले के मुसम्मन बुर्ज में ताज़िंदगी एक क़ैदी की हैसियत से दिन गुज़ारने के लिए मजबूर कर दिया गया.

अकेला बूढ़ा, बेबस, लाचार, गमगीन और मायूस क़ैदी करे तो क्या करे?
शाहजहाँ ने एक क़ासिद (सन्देश वाहक) के ज़रिए अपने बेटे बादशाह औरंगज़ेब को संदेसा भिजवाया कि ख़ाली वक़्त गुज़ारने के लिए उसके पास कुछ बच्चे भेज दिए जाएं जिनको कि पढ़ा कर वह अपना वक़्त गुज़ार सके और अपना मन बहला सके.
बादशाह औरंगज़ेब ने शाहजहाँ की यह गुज़ारिश ठुकराते हुए क़ासिद से कहा –
‘अब्बा हुज़ूर अब बादशाह तो नहीं रहे पर अब वो उस्ताद बन कर अपने शागिर्दों पर अपना हुक्म चला कर अपनी बादशाहत का शौक़ पूरा करना चाहते हैं.’
औरंगज़ेब की तरह मेरी नज़र में भी शौक़-ए-मुदर्रिसी और शौक़-ए-बादशाहत में कोई ख़ास फ़र्क नहीं है.
घर का पांचवां और सबसे छोटा बच्चा होने की वजह से मुझे घर में तो कभी ज़्यादा बोलने नहीं दिया गया.
भाई-बहन की छत्र-छाया से मुक्त होने के बाद झांसी के बुंदेलखंड कॉलेज से बी. ए. करते समय मुझे अचानक ज्ञान प्राप्त हुआ कि मैं पढ़ाई के मामले में अच्छा-ख़ासा हूँ और बोल भी ठीक-ठाक लेता हूँ.
लखनऊ यूनिवर्सिटी में एम. ए. करते समय डेरोज़ियो का अवतार बन कर अपने साथियों का बाक़ायदा क्लास लेने में मुझे मज़ा आने लगा.
(कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज के नौजवान अध्यापक डेरोज़ियो का मुदर्रिसी का जूनून इतना ज़्यादा था कि वो कॉलेज में क्लास रूम्स बंद हो जाने के बाद कॉलेज के वरांडे में क्लास लेने लगता था और कॉलेज का फाटक बंद हो जाने पर इच्छुक छात्रों को अपने घर पर बुला कर पढ़ाने लगता था. 23 साल की अल्पायु में अपने प्राण त्यागने से पहले उस ने बंगाल में जागरूक-प्रगतिशील युवकों की एक बड़ी जमात तैयार कर दी थी.)
एक प्रवक्ता के रूप में लखनऊ यूनिवर्सिटी में अपनी पारी शुरू करते समय मेरा भी सपना था कि मैं अपने विद्यार्थियों के मानस-पटल पर डेरोज़ियो की जैसी छाप छोड़ सकूं.
मेरा यह सपना तो कभी पूरा नहीं हुआ लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुझे पढ़ाने में हमेशा बहुत आनंद आया.
डायस पर खड़े हो कर, एकाग्र चित्त विद्यार्थियों को पिन-ड्रॉप साइलेंस के माहौल में पढ़ाने के नशे के सामने किसी शराब का नशा क्या होता होगा?
मेरा यह मानना है कि इतिहास के उबाऊ वृतांतों को ऐतिहासिक अंतर्कथाओं से और समकालीन साहित्य में उनकी अभिव्यक्ति के साथ जोड़ने से, उन्हें रोचक बनाया जा सकता है.
क्लास में सिर्फ़ नोट्स के भूखे मूर्ख विद्यार्थियों को छोड़ कर मेरे सभी विद्यार्थी मेरे पढ़ाने की इस शैली को पसंद करते थे.
अल्मोड़ा में क्लास में इतिहास-विषयक मेरी क़िस्सागोई के मुरीद एम. ए. फ़ाइनल के मेरे विद्यार्थी एक बार मुझ से अनुमति लेकर तब मेरे एम. ए. पार्ट वन की क्लास में आ कर बैठ गए जब मैं रज़िया सुल्तान वाला अध्याय पढ़ाने वाला था.
पिछले साल के पढ़ाए गए टॉपिक को दुबारा उनके पढ़ने की ललक का रहस्य तुरंत मेरे दिमाग में कौंध गया. मैंने मुस्कुराते हुए उन जिज्ञासु विद्यार्थियों से कहा–
‘मित्रो, तुम सबको एक निराश करने वाला समाचार दे दूं. मैं रज़िया वाले चैप्टर में रज़िया-याक़ूत प्रेम-प्रसंग का ज़िक्र भी नहीं करने वाला हूँ.
और हाँ, मुग़ल इतिहास के तुम्हारे क्लास में जहाँगीर वाले चैप्टर में सलीम-अनारकली वाला अफ़साना भी गायब रहेगा.’
इतना सुनना था कि बेचारे निराश विद्यार्थी मेरे क्लास से भाग खड़े हुए.
एक रहस्य की बात बताऊँ - विश्वविद्यालय में एक अध्यापक को शौक़-ए-मुदर्रिसी को पूरा करने के लिए मौके बहुत कम ही मिल पाते हैं.
एडमिशन की लम्बी प्रक्रिया, चुनाव, हड़तालें, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, वार्षिक समारोह, कन्वोकेशन, परीक्षा, परिणाम आदि के अलावा वैकेशंस और फिर अल्लम-गल्लम छुट्टियों (प्रिवेलेज लीव, कैज़ुअल लीव, मेडिकल लीव, ड्यूटी लीव, फ़्रेंच लीव, शोक सभाएं, नेताओं की जयंतियां और इनके ऊपर – ‘आज पढ़ने-पढ़ाने का मूड नहीं है’ वाली घोषणाएं) की कृपा से एक अध्यापक के रूप में अपने 36 साल के कैरियर में मुझे याद नहीं पड़ता कि कभी एक सत्र में 100 से अधिक दिन क्लास हुए हों.
(मेरे जो भी साथी मेरे इस पोल-खोल कार्यक्रम से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने हर सत्र में 150-200 दिन पढ़ाया है, उन्हें मैं ‘झूठाचार्य’ और ‘फेंकाचार्य’ का ख़िताब देना चाहूँगा.)
इक्कीसवीं सदी आते ही हमारे इतिहास विभाग के विद्यार्थी क्लास से न जाने क्यों गायब होने लगे. उन्हें आपस में गुफ़्तगू करना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ज़रुरत से ज़्यादा महत्व देना, छात्र-राजनीति को ही अपना कैरियर बनाना और रोमियो-जूलियट की कथा को पुनर्जीवित करना, पढ़ने-लिखने की तुलना में कहीं ज़्यादा अच्छा लगने लगा था.
एम ए. के विद्यार्थियों में क्लास में नोट्स लिखाने के बजाय सिर्फ़ लेक्चर देने वाले जैसवाल साहब का जादू अब फीका पड़ गया था.
क्लास में दीवारों को मैं कब तक पढ़ाता?
कभी उक्ता कर मैं लाइब्रेरी चला जाता तो कभी कविताएँ लिख कर अपना मन बहलाता तो कभी किसी दूसरे विभाग में जा कर श्रद्धालु मित्रों का भेजा चाटता.
आख़िरकार अपनी पढ़ाने की ललक को संतुष्ट करने के लिए मैंने बी. ए. के क्लासेज़ लेने शुरू कर दिए.
भला हो इन छोटे बालक-बालिकाओं का जिन्होंने मेरी कक्षाओं में खासी दिलचस्पी ली.
विभाग में अपने कक्ष में ख़ाली समय में मैं अपने विद्यार्थियों की शंका-समाधान के लिए हमेशा उपलब्ध रहता था लेकिन इस सुविधा का लाभ उठाने वाले मेहरबान विद्यार्थियों की संख्या बहुवचन में कम ही हुआ करती थी.
15 अगस्त को और 2 अक्टूबर को आयोजित समारोहों में और हिंदी विभाग के कार्यक्रमों में भाषण देने के बहाने क्लास लेने का मेरा शौक़ थोड़ा-बहुत ज़रूर पूरा हुआ करता था.
आकाशवाणी अल्मोड़ा में वार्ता, कहानी, कविता और परिचर्चा के बहाने मुझे बोलने का ख़ूब मौक़ा मिला.
एक शख्स जो कि अपने खर्चे पर टिम्बकटू जा कर भी बोलने का मौक़ा न छोड़ना चाहता हो, उसे बोलने के पैसे मिलें तो उसके लिए पृथ्वी पर ही स्वर्ग क्यों नहीं बन जाएगा?
मुझे पता था कि मैं कोई चाणक्य नहीं था जो मुझे चन्द्रगुप्त मौर्य मिल जाता, न ही मैं कोई समर्थ गुरु राम दास था जो किसी वीर शिवा को छत्रपति शिवाजी बना देता. और मैं स्वामी रामकृष्ण परम हंस तो क़तई नहीं था जिनका कि सन्देश लेकर किसी स्वामी विवेकानंद ने भारतीय धर्म-दर्शन की पताका समूची दुनिया में फहरा दी थी.
फिर भी मुझे तालिब-ए-इल्म की हमेशा सख्त ज़रुरत रहा करती थी.
अवकाश-प्राप्ति से दो साल पहले की बात है.
मैं ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. मेरे सामने की सीट पर एक अपरिचित नौजवान बैठा था. उस नौजवान ने मुझे बड़ी श्रद्धा से नमस्कार किया. फिर मुझ से पूछा –
‘माफ़ कीजिएगा सर ! क्या आप प्रोफ़ेसर जैसवाल हैं?’
मैंने हामी भरी तो उसने बताया कि वह कुमाऊँ विश्वविद्यालय के नैनीताल परिसर से इतिहास में एम. ए. कर चुका है और मुझे नैनीताल में राष्ट्रीय आन्दोलन पर आयोजित एक सेमिनार में सुन कर वह मेरा प्रशंसक बन चुका है.
धन्यवाद की औपचारिकता के बाद उसने मुझ पर एक सवाल दाग दिया-
‘सर, गांधी जी की डांडी-मार्च को आप कहाँ तक सही मानते हैं?’
मैंने कहा –
‘बालक ! तूने तो मुझे बड़ी मुश्किल में डाल दिया. मेरे तो समझ में ही नहीं आ रहा कि तेरे सवाल का मैं क्या जवाब दूं.’
बालक को मेरी मुश्किल क़तई समझ में नहीं आई. डांडी-मार्च पर तो कोई बच्चा भी बोल सकता था फिर जैसवाल साहब - -- -- ?
मैंने उस बालक को अपनी मुश्किल समझाते हुए कहा –
‘मेरे समझ में ये नहीं आ रहा है कि तेरे सवाल का जवाब मैं काठगोदाम से लाल कुआँ तक दूं या रूद्रपुर तक दूं या फिर दिल्ली तक!’
बालक ने हंसते हुए मेरे चरण गहे और फिर मेरे जवाब को हद से हद, काठगोदाम से रुद्रपुर तक सीमित करने की प्रार्थना भी कर डाली.
मुझे रिटायर हुए दस साल हो चुके हैं. ग्रेटर नॉएडा में मेरा शौक़-ए-मुदर्रिसी कुंठित और उदास है.
यहाँ तो कोई परिंदा भी इतिहास और साहित्य में दिलचस्पी लेने वाला नहीं मिलता.
सुबह-शाम टहलते वक़्त मिलने वाले परिचित सज्जन भी मेरा वाकिंग क्लास अटेंड करने के बजाय मुझे दूर से ही नमस्कार करने में अपनी भलाई समझते हैं.
झक मार कर मैं अपनी श्रीमती जी को ही अपना विद्यार्थी बनाने की सोचता हूँ तो वो अचानक से पी. टी. उषा का अवतार बन जाती हैं. अगर मैं अपनी दोनों बेटियों में से किसी को भी वीडियो चैटिंग के ज़रिए विस्तार से कोई रोचक ऐतिहासिक क़िस्सा सुनाना चाहूं तो वो बच्चों की काल्पनिक पुकार पर मुझ से सॉरी कह कर भाग खड़ी होती हैं.
अंतरात्मा से निकली आवाज़ मुझे निरंतर सम्बोधती रहती है -
अब किराए के भी शागिर्द न तू पाएगा
क्लास लेने को तेरा दिल ये तड़पता क्यों है
सो जा चाणक्य न अब चन्द्रगुप्त आएगा
खोल कर अपनी शिखा व्यर्थ भटकता क्यों है
लेकिन अंतरात्मा की पुकार पर तो नेतागण पार्टियाँ बदलते हैं, उसकी पुकार पर मैं क्यों अपना जीने का अंदाज़ बदलूं?
मुझ चाणक्य को अगर चन्द्रगुप्त भारत में नहीं मिला तो मैं दक्षिणी ध्रुव जाकर किसी पेंगुइन को अपना शिष्य बना लूँगा.
शौक़-ए-मुदर्रिसी मुझे था, आज भी है और आगे भी यही मेरी बैटरी चार्ज करता रहेगा.
भला हो मेरे फ़ेसबुक मित्रों का और मेरे ब्लॉग के अनुगामियों का, जिनका कि मैं आए दिन का क्लास लेता रहता हूँ.
ऐ बदनसीब शाहजहाँ ! तेरे ज़माने में अगर फ़ेसबुक होता और अपने ब्लॉग पर तुझे कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखने की आज़ादी होती तो तू शागिर्दों के लिए इतना न तड़पता.
मुदर्रिसी के बहाने तेरा शौक़-ए-बादशाहत तो बिना शागिर्दों के ही पूरा हो जाता.
तो मित्रो ! यानी कि मेरे शागिर्दों ! आज का पाठ अब संपन्न हुआ.
जल्द ही ऐसी ज़बर्दस्ती आयोजित की जाने वाली कक्षा में आप से फिर मिलूंगा.

रविवार, 23 मई 2021

ह्रदय-परिवर्तन

 (सोमवार की सुबह)

शुक्ल जी – अहा गुप्ता बन्धु ! बहुत दिनों बाद मिले. सब कुशल मंगल?

गुप्ता जी – नमस्कार सुकुल बन्धु ! इधर कुछ अस्वस्थ था. अब ठीक हो गया हूँ तो सोचा कि थोड़ा घूम-फिर लूं.
शुक्ल जी – अच्छा हुआ तुम स्वस्थ हो गए. अब हमको सुबह घूमने के लिए एक साथी मिल जाएगा.
गुप्ता जी – अरे ये तो मेरा सौभाग्य होगा सुकुल मित्र ! चलो सिविल लाइन्स की तरफ़ चलते हैं.
शुक्ल जी – ना भाई ! हम तो ठंडी सड़क पर जाएंगे.
गुप्ता जी – बन्धु, इतने दिनों बाद तो घर से निकला हूँ. आज मेरे कहने से सिविल लाइन्स की तरफ़ ही चल दो.
शुक्ल जी – जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. और सुनाओ क्या हाल-चाल हैं !
गुप्ता जी – बस तुम मित्रों की कृपा है.
अरे वाह, हनुमान-मन्दिर आ गया. चलो, यहाँ माथा टेक के चलेंगे.
शुक्ल जी (कुछ सोचते हुए) – घूमने-फिरने की बीच में भक्ति का क्या काम? तुम हनुमान जी के दर्शन फिर कभी कर लेना.
गुप्ता जी – क्या बात है सुकुल? हनुमान जी से तुम्हारी अनबन कब से हो गयी?
तुम तो उनके बड़े भक्त हुआ करते थे.
शुक्ल जी – अनबन तो नहीं लेकिन अब मन्दिर जाने का मन नहीं करता.
गुप्ता जी – क्या तुम नास्तिक हो गए हो?
शुक्ल जी – नास्तिक तो नहीं लेकिन संत रैदास की बानी का महत्व अब समझ में आ गया है – ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा.’
गुप्ता – यार, तुम यहीं खड़े रह कर अपने चंगे मन में गंगा बहाओ. मैं दो मिनट में बजरंगबली को प्रणाम कर के आता हूँ.
शुक्ल जी – ठीक है. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. मैं यहीं तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ.
गुप्ता जी (मन्दिर से लौट कर) – सुकुल प्रसाद तो ले लो या फिर उसमें भी आपत्ति है?
शुक्ल जी – प्रसाद भी तुम्हीं ग्रहण करो. चलो अब आगे चलते हैं.
गुप्ता जी – समझ में नहीं आ रहा कि हमारे बजरंग बली भक्त को एकदम से क्या हो गया जो उसका ऐसा ह्रदय-परिवर्तन हो गया !
शुक्ल जी – तुम नहीं समझोगे.
(मंगलवार की सुबह)
गुप्ता जी (हनुमान-मन्दिर के प्रांगण में) – अरे सुकुल, तुम बजरंग बली के दरबार में?
शुक्ल जी – सवाल बाद में पूछना. पहले प्रसाद तो ले लो.
गुप्ता जी – ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ का पाठ पढ़ाने वाले संत रैदास के शिष्य हमारे सुकुल आज हनुमान जी का प्रसाद कैसे बाँट रहे हैं?
शुक्ल जी – अमाँ कल की बात भूल जाओ ! प्रसाद ग्रहण करो.
गुप्ता जी – हम प्रसाद तो तभी ग्रहण करेंगे जब तुम इस ह्रदय-परिवर्तन के रहस्य का उद्घाटन करोगे.
शुक्ल जी – प्रसाद ले लो यार ! बड़ी अच्छी बूंदी हैं.
गुप्त जी – पहले तुम इस ह्रदय-परिवर्तन का कारण बताओ. तुम्हें बजरंग बली की कसम !
शुक्ल जी – बड़े धर्म-संकट में डाल दिया तुमने ! बजरंग बली की झूठी कसम तो मैं खा नहीं सकता.
मेरा कोई ह्रदय-परिवर्तन नहीं हुआ है. बजरंग बली का भक्त मैं कल भी था और आज भी हूँ. हाँ मेरा मोज़ा-परिवर्तन ज़रूर हुआ है.
गुप्ता जी – मोज़ा-परिवर्तन? ये क्या बला है सुकुल?
शुक्ल जी – यार, कल मैंने जूते के अन्दर फटे हुए मोज़े पहन लिए थे.
मन्दिर जाने के लिए जूते-मोज़े उतारता तो तुमको ही क्या, दूसरे भक्तों को भी मेरे फटे हुए मोज़े दिख जाते.
आज मोज़ा-परिवर्तन कर मैं फिर से बजरंग बली के दरबार में हाज़िर हो गया हूँ.

मंगलवार, 18 मई 2021

हरी मिर्च

 (यह कहानी मेरे अप्रकाशित बाल-कथा संग्रह – ‘कलियों की मुस्कान’ से ली गयी है.

1990 के दशक की यह कहानी मेरी 10-12 साल की बेटी गीतिका की ज़ुबानी कही गयी है.)
हरी मिर्च -
क्या आपने तीन फ़ीट ऊँची हरी मिर्च देखी है?
एक और सवाल का जवाब दीजिए।
क्या ऐसी कोई मिर्च होती है जिसे आप खा तो नहीं सकते पर जिसका चरपरापन आप जिन्दगी भर भुला नहीं सकते?
ज़ाहिर है कि मेरे दोनों सवालों का जवाब आप ‘ना’ में देंगे और साथ ही मेरे ऐसे अटपटे सवालों को सुनकर आप मुझे बुद्धू या कोई पागल समझेंगे। पर मैं एक ऐसी हरी मिर्च से आपको मिलवा सकती हूँ जिसका कि क़द कुल तीन फ़ीट है और जो हम सबकी कल्पना से भी ज़्यादा चरपरी है। आप उसे खा नहीं सकते पर वो आपका भेजा चाट सकती है, कभी-कभी उसे खा भी सकती है।
ये हरी मिर्च चलती-फिरती भी है, हंसती-बोलती भी है। इस जादुई, आउट ऑफ़ दि वर्ड मिर्च को हम आलोक के नाम से जानते हैं।
आलोक महाशय हमारे लखनऊ वाले माथुर अंकिल के सुपुत्र हैं जिन्होंने अभी कुछ दिन पहले अपना छठा जन्मदिन मनाया था। इस बर्थ-डे पर उन्होंने केक काटकर खुद खाया था, और उसके पीसेज़ अपने कुछ खास दोस्तों को खिलाए थे पर अपने अनचाहे मेहमानों को उन्होंने सिर्फ़ उस केक पर लगी हुई मोमबत्तियों के टुकड़े खिला दिए थे।
आलोक को देखकर कोई भी मेरी बातों पर यकीन नहीं करेगा।
सुन्दर, सलोना, गोलमटोल चेहरे वाला, चमकदार बटन जैसी आँखों वाला आलोक हर किसी को अपना फ़ैन बना लेता है। उसकी लुभावनी मुस्कान, भोली-भाली हंसी, मीठी-मीठी बातें और गज़ब का कान्फि़डेन्स नए-नए दोस्त बनाने में उसके बहुत काम आते हैं।
कभी-कभी तो पहली मुलाकात के बाद दस मिनट के अन्दर ही वो मिलने वाले को अपना दोस्त बना लेता है। पर इस नए बने दोस्त को कुछ देर बाद ही यह पता चल जाता है कि उसका पाला किसी इनोसेन्ट और क्यूट बच्चे से नहीं बल्कि शैतान के नाना से पड़ा है।
हमारी घरेलू बिजली में दो सौ बीस वोल्ट का करेन्ट होता है जो कि काफ़ी खतरनाक होता है पर हमारे आलोक महाशय अपने मित्रों को चार सौ चालीस वोल्ट का झटका देने की काबिलियत रखते हैं।
कहा जाता है कि - ‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ पर हमारे आलोकजी के चीकने पात की जगह नुकीले दांत ज़रूर निकले। पिछले पाँच साल से आलोक अपने नुकीले दांतों का ज़बर्दस्त इस्तेमाल कर रहे हैं। जैसे पोस्ट ऑफिस से कोई भी डाक बिना मोहर लगाए बाहर नहीं जा सकती वैसे ही आलोक के घर से कोई भी मेहमान अपने बदन पर उनके दांतों के गहरे-गहरे निशान लिए बगैर नहीं जा सकता।
मुझे और रागिनी को तो वो अपनी सबसे फ़ेवरिट दीदी कहते हैं पर हम दोनों के शरीर पर उनके दांतों की ग्रोथ का पूरा इतिहास अंकित है। तीन-चार साल पहले तक लोगबाग खुशकिस्मत हुआ करते थे क्योंकि उन्हें आलोकजी के सिर्फ़ दो-चार दांतों का प्रसाद मिलता था पर अब तो उनके दो दर्जन दांत हैं और उनमें अपने शिकारों पर दांत गड़ाने के लिए पहले से ताकत भी ज़्यादा आ गई है। सुनते हैं कि बड़े होने पर पूरे बत्तीस दांत आते हैं। अब अगर आलोक के भी पूरे बत्तीस दांत आ गए तो आगे चलकर हमारा क्या होगा?
आलोकजी की धमा-चौकड़ी और उनके बारे में पड़ौसियों की रोज़ाना आने वाली शिकायतों से परेशान होकर माथुर अंकिल ने उन्हें तीन साल से भी कम उम्र में स्कूल में डाल दिया। अपनी क्लास टीचर का दिल तो उन्होंने फ़ौरन ही जीत लिया। उनकी मिस ने उन्हें अपनी मनपसन्द चेयर पर बैठ जाने को कहा तो वो उन्हीं की चेयर पर विराजमान हो गए। बेचारी मिस ने जब तक उन्हें ढेर सारी टाफियों की रिश्वत नहीं दी तब तक उन्होंने अपनी कुर्सी नहीं बदली।
रोज़ाना स्कूल जाने से पहले आलोक अपने पापा से एक टॉफ़ी और अपनी मम्मी से एक छोटी चाकलेट वसूला करते थे पर स्कूल से लौटते समय उनका लन्च बॉक्स तमाम टॉफ़ी, चाकलेट्स और मिठाइयों से भरा मिलता था। माथुर अंकिल ने समझा कि उनकी टीचर्स उन पर कुछ ज़्यादा ही प्यार बरसा रहीं हैं। माथुर अंकिल उन्हें प्यार में बच्चे को बिगाड़ने से मना करने के लिए एक दिन आलोक के स्कूल पहुंचे तो एक दर्जन बच्चों के पैरेन्ट्स वहां पहले से मौजूद थे। उन सबकी यही शिकायत थी कि कोई शरारती बच्चा अपनी दादागिरी से अपने तमाम साथियों के लन्च बॉक्सेज़ का बढि़या माल झटक कर अपना लन्च बॉक्स भर लेता है। माथुर अंकिल ने चुपचाप वहां से खिसकने में ही अक्लमन्दी समझी। उन्होंने यह जानने की कोशिश नहीं की कि ये शरारती बच्चा कौन है।
माथुर अंकिल की मम्मी यानी हमारी माथुर दादी आलोक को नटखट कन्हैया का दूसरा अवतार मानती हैं। पर कभी-कभी उनको अपने कान्हा की शरारतों की अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। माथुर दादी की कमर में अक्सर दर्द रहता है और अक्सर वो अपनी कमर दबवाने के लिए हम बच्चों की सेवाएं लेती रहती हैं। इन सेवाओं के बदले में हमको फ़ौरन अच्छा-खासा इनाम भी मिल जाता है। एक दिन माथुर दादी ने अपने कान्हाजी से अपनी कमर दबाने की फ़रमाइश कर दी। उनके कान्हाजी ने इस सेवा के बदले आइसक्रीम कोन की फ़रमाइश कर दी। बेचारी दादी को अपनी सेवा कराने के बदले में अपने खिदमतगार को काजू-बादाम वाला आइसक्रीम कोन दिलाने का वादा करना पड़ा। आलोक दादी की कमर दबाने लगे पर तीन-चार मिनट में ही उनके हिसाब से काम पूरा हो गया। उन्होंने दादी से प्यार से पूछा -
‘दादी ! बहुत हो गया। अब बस करूं?’
दादी भी उस्ताद थीं। वो आइसक्रीम कोन के बदले में अभी और सेवा कराना चाहती थीं। अपनी कमर पर उसके हाथ रुकते ही उन्होंने उसे घुड़कते हुए कहा -
‘चुपचाप मेरी कमर दबाता रह । जब तक मैं मना नहीं करूंगी, तू मेरी कमर दबाते रहना। अगर उससे पहले रुका तो तुझे आइसक्रीम नहीं दिलाऊँगी।’
आलोकजी ने दादी से जल्दी ना कराने के लिए एक अनोखा तरीका खोज निकाला। घर के बाहर बजरी पड़ी हुई थी। आलोकजी दादी की नज़रों से छुपकर चुपचाप कुछ महीन कंकडि़यां बीन लाए और उन्हें अपनी हथेलियों में दबाकर दादी की कमर दबाने लगे। हाय हाय करते हुए तुरन्त ही दादी ने आलोक को अपनी कमर दबाने से रोक दिया। अपनी कमर सहलाती हुई दादी आलोक को भला-बुरा कहती रहीं पर उन्हें अपने वादे के मुताबिक आलोक को आइसक्रीम कोन तो दिलाना ही पड़ा।
लखनऊ की मेहमाननवाज़ी के किस्से सारी दुनिया में मषहूर हैं पर आलोकजी अपने मेहमानों की ख़ातिर ज़रा अलग ढंग से करते थे। स्कूल में उन्होंने काउण्टिंग करना क्या सीख लिया, बस मेहमानों की तो शामत आ गई। पेटू मेहमानों की खुराक का हिसाब रखने की जि़म्मेदारी उन्होंने बिना किसी से पूछे सम्भाल ली। धड़ाधड़ रसगुल्ले और समोसे गपागप करने वाले मेहमान के सामने वो अपनी रनिंग कमेन्ट्री कुछ इस तरह शुरू कर देते -
‘अंकिल ! ये आपने चौथा रसगुल्ला खाया। ये आपकी प्लेट में जो समोसा रक्खा है, वो पाँचवां है।’
इसी तरह मोटी आंटियों पर भी वो बहुत मेहरबान रहते थे। जहां ऐसी किसी आंटी ने चिप्स या कोल्ड ड्रिंक उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वो डॉक्टर बन कर जंक फ़ूड के खि़लाफ़ अपना भाषण शुरू कर देते। कभी-कभी तो वेइंग मशीन उठाकर ले आते और आंटियों को फ्री में अपना वेट लेने के लिए कहने लगते।
एक बार एक उनके घर एक ऐसे सज्जन आए जिनके दांत लगातार पान और तम्बाकू चबाने से बिल्कुल काले पड़ गए थे। आलोकजी मेरे कान में फुसफुसाकर बोले –
‘दीदी देखो आइरन मैन आया है। इसके सारे दांत लोहे के हैं।’
मैंने उसे डांटते हुए कहा –
‘हट! ऐसा नहीं है। इनके दांत असली हैं।’
मेरे रोकते-रोकते आलोकजी अपनी बात को सच सिद्ध करने के लिए अपने हाथों में छुपाकर कुछ ले गए और उन अंकिल के पास जाकर कहने लगे –
अंकिल आप ज़रा हंसिए।’
अंकिल ज़रा हंसे तो उन्होंने अपने हाथ में छुपाया हुआ मैग्नेट निकाल कर उनके दांतों पर लगा दिया। मैगनेट जब अंकिल के दांतों पर चिपका नही तो वो निराश होकर मुझसे कहने लगे –
‘दीदी आप ठीक कह रही थीं। अंकिल के दांत लोहे के नहीं हैं, ये तो असली हैं।’
माथुर दादी हर मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करती हैं। अब चाहे वो किचिन में हों या बेडरूम में, या ड्राइंग रूम में, उनका ये पाठ हर जगह चलता रहता है। सबसे मज़दार सिचुएशन तब होती है जब कि दादी टीवी के सामने बैठकर भी अपना पाठ जारी रखती हैं। टीवी पर प्रोग्राम देखने वालों को इससे डिस्टर्बेन्स हो तो हो, पर उनकी भक्ति में कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता। एक दिन वो टीवी के सामने बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ पढ़े जा रही थीं और टीवी पर बच्चों की कोई मज़ेदार कार्टून फि़ल्म चल रही थी। आलोक ने दादी से चुप हो जाने के लिए कहा पर दादी ज़ोर-ज़ोर से अपना पाठ पढ़ती रहीं। उनसे अपनी वोल्यूम कम करने की प्रार्थना की गई पर उन्होंने उसे भी ठुकरा दिया। आलोकजी ने दौड़ कर टीवी का रिमोट अपने हाथ में लिया और दादी को चुप करने के लिए उनके के सामने खड़े होकर उन्होंने रिमोट का म्यूट वाला बटन दबा दिया। टीवी रिमोट का म्यूट वाला बटन दबाने पर भी जब दादी की वोल्यूम पर असर नहीं पड़ा तो वो दुखी होकर माथुर अंकिल से बोले –
‘पापा ! टीवी रिमोट का म्यूट वाला बटन खराब हो गया है, दादी तो इससे म्यूट ही नहीं होतीं।’
एक बार पापा और माथुर अंकिल को अपने एक दोस्त के बच्चे की बर्थ-डे पार्टी में जाना था। उनके साथ हम दोनों बहनें और आलोक भी जा रहे थे। पापा और माथुर अंकिल आपस में ये बात कर रहे थे कि अगर सिर्फ़ टी पार्टी हुई तो एक सौ एक रुपये वाला लिफ़ाफ़ा और अगर वहां डिनर होगा तो दो सौ इक्यावन वाला लिफ़ाफ़ा देंगे। इस हिसाब से दोनों तरह के लिफ़ाफ़े बनाकर दोनों दोस्तों ने अपनी-अपनी जेबों में रख लिए। बर्थ-डे पार्टी में हम पहुंचे तो आलोकजी ने देखा कि वहां तो डिनर का इन्तजाम था। उन्होंने पचास लोगों के सामने अपनी फ़ुल वोल्यूम पर अपने पापा से कहा –
‘पापा यहां तो डिनर का इन्तज़ाम है, आप दो सौ इक्यावन वाला लिफ़ाफ़ा निकालिए।’
आलोकजी ने पिछले साल कुंग फ़़ू क्लासेज़ ज्वाइन किए पर उसकी प्रैक्टिस के लिए उन्होंने अपने पापा को सैण्ड बैग की तरह इस्तेमाल किया। माथुर अंकिल ने आलोकजी के प्रहारों से खुद को बचाते-बचाते कुंग फ़ू के अच्छे-खासे दांवपेच सीख लिए हैं पर इस साल उनका पूरा ध्यान क्रिकेट सीखने पर है। अगला सचिन बनने के लिए वो अभी से तैयारी कर रहे हैं। अब इसके लिए उनकी कॉलोनी के मकानों के दो-चार दर्जन शीशे टूट-फूट जाएं तो चिन्ता की क्या बात है? पर माथुर अंकिल उनके क्रिकेट प्रेम से बहुत परेशान हैं। दो-चार दर्जन शीशे टूटने के हादसे तो अभी उनकी टेनिस वाली बौल से हो रहे हैं पर जब वो कॉर्क की बौल से खेलने लगेंगे तो कॉलोनी के तमामघरों के दरवाज़ों और खिड़कियों के शीशों के साथ अंकिलों, आंटियों, दीदियों और भैया लोगों के सर भी टूटा करेंगे।
मेरे पापा ने कॉलोनी वालों को यह सलाह दी है कि वो सब अपने घरों की बाउण्ड्री वाल्स को बहुत ऊँचा करवा लें और जब भी आलोक बैटिंग कर रहे हों तो वो घर से निकलते वक्त हैल्मेट पहन कर निकलें।
आलोकजी से हमारी मुलाकात अब तक सिर्फ़ हमारे विण्टर वैकेशन्स के दौरान होती है। हम अल्मोड़ा में रहते हुए आलोकजी को बहुत मिस करते हैं। अब माथुर अंकिल ने यह तय किया है कि वो इस साल, गर्मियों की छुट्टियां, सपरिवार हमारे साथ अल्मोड़ा में बिताएंगे। हम दोनों बहनें बेसब्री से आलोकजी से मिलने का इन्तज़ार कर रही हैं और उनके साथ धमाचौकड़ी करने का पूरा प्लान बना रही हैं पर हमारे पापा अपने पडौसियों के घरों की बाउण्ड्री वाल्स को ऊँचा करवाने में बिज़ी हैं। आस-पड़ौस के सभी घरों में हैल्मेट्स और फर्स्ट-एड का पूरा इन्तज़ाम भी कर दिया गया है और पापा ने खुद अपने लिए एन्टिसिपेट्री बेल के लिए अभी से एप्लाई भी कर दिया है।