बुधवार, 8 दिसंबर 2021

'महाभारत'

 (दूरदर्शन पर महाभारत सीरियल प्रसारण के बाद उसके विषय में हमारे बच्चों को अब बहुत कुछ पता है लेकिन उनके स्मृति-पटल पर स्थायी स्थान बनाने के लिए उन्हें इस महाकाव्य के विषय में लिखित सामग्री का अध्ययन करना आवश्यक है. महाभारत के विषय में मेरे इस आलेख का उद्देश्य बच्चों के साथ बड़ों की जानकारी को भी बढ़ाना है.)

‘महाभारत’ -

‘महाभारत’ विश्व इतिहास का सबसे बड़ा महाकाव्य है.
‘महाभारत’ की भाषा संस्कृत है.
‘महाभारत’ का मुख्य सूत्र भरत वंश की कथा है इसीलिए इस ग्रंथ को ‘महाभारत’ कहा गया है. ईसा पूर्व 3000 वर्ष (हड़प्पा संस्कृति काल) से चौथी ईसवी तक भारतीय संस्कृति का जो विकास और प्रसार हुआ, उसका प्रतिबिम्ब ‘महाभारत’ में मिलता है.
इस महाकाव्य में आर्य पूर्व कालीन, वैदिक और उत्तर वैदिक सांस्कृतिक जीवन की झांकी प्रस्तुत की गई है. इसमें वेद-पूर्व काल से चली आ रही वृक्ष, वनस्पति, नदी, पर्वत तथा अन्य पार्थिव पदार्थों की पूजा करने वालों की संस्कृति , यज्ञ प्रधान वैदिक संस्कृति और निवृत्रि प्रधान श्रमण संस्कृति का विस्तार से उल्लेख किया गया है.
‘महाभारत’ को पाँचवां वेद अथवा ‘काण्व वेद’( चार वेदों से भी श्रेष्ठ) कहा गया है. इसे पुराण भी कहा गया है.
‘महाभारत’ का ग्रंथ प्रथमतः कृष्ण द्वैपायन व्यास ने लिखा था. कुछ विद्वानों के अनुसार इस ग्रंथ में 8000 श्लोक व 18 पर्व थे.
इसमें सम्पूर्ण कृष्ण चरित्र नहीं कहा गया था. व्यासजी ने इसे अपने पाँच शिष्यों सुमंतु, जैमिनी, पैल, शुक और वैशंपायन को सुनाया. इन पाँच शिष्यों ने भारत की पाँच संहिताएं प्रकाशित कीं.
आज का जो ‘महाभारत’ महाकाव्य है, वह मुख्यतः वैशंपायन की भारत संहिता पर आधारित है.
जनश्रुति है कि वैशंपायन ने महाभारत की कथा अर्जुन के प्रपौत्र राजा जनमेजय को सुनाई थी.
राजा जनमेजय ने जब महायज्ञ किया तो उसमें पहली बार जनता के समक्ष ‘महाभारत’ का पाठ किया गया था.
समय के साथ-साथ ‘महाभारत’ के पदों की संख्या बढ़ते-बढ़ते एक लाख तक पहुँच गयी.
पहली शताब्दी में दक्षिण भारत का भ्रमण करने वाले यूनानी यात्री ख्रायस्टोन भारत में एक लाख पदों के एक महाकाव्य का उल्लेख किया है.
‘महाभारत’ के परवर्ती संस्करण में ‘भविष्य पर्व’ के साथ ‘हरिवंश चरित्र’ भी जोड़ दिया गया है. ‘हरिवंश चरित्र’ में सम्पूर्ण कृष्ण चरित्र का वर्णन है.
‘महाभारत’ की रचना का उद्येश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारो पुरुषार्थों का संतुलन रखने वाली जीवन पद्धति का विकास करना था. इसमें मुख्य रूप से वैष्णवी विचारधारा का पोषण है पर ‘अनुशासन पर्व’ के ‘उपमन्यु आख्यान’ में श्री कृष्ण द्वारा भगवान शंकर की स्तुति की गई है. भगवान शंकर की स्तुति के अतिरिक्त ‘महाभारत’ के ‘भीष्म पर्व’ में युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने दुर्गा से वरदान माँगने के लिए उनकी स्तुति की है.
गणेशजी को ‘महाभारत’ को लेखनीबद्ध करने का श्रेय दिया जाता है. ‘आदि पर्व’ में उनकी महिमा का वर्णन है.
‘महाभारत’ का मुख्य विषय भरत कुल का और विशेषतः कौरव-पाण्डवों का इतिहास ही है पर इसे भारतीय संस्कृति का विश्वकोश कहना अनुचित नहीं होगा.
महाभारत की मुख्य कथा कुछ इस प्रकार है-
राजा विचित्र वीर्य की मृत्यु के उपरान्त कुरु वंश का राज्य धृतराष्ट्र को मिला. परन्तु धृतराष्ट्र अंधे थे. उनके छोटे भाई पाण्डु को राजा बनाया गया परन्तु एक श्राप के कारण पाण्डु को सपरिवार राज्य छोड़ना पड़ा और धृतराष्ट्र ने सत्ता सम्भाली.
पाण्डु की मृत्यु के बाद उनके पाँच पुत्र अर्थात् पाण्डव युधिष्ठर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों अर्थात् कौरवों के साथ शिक्षा प्राप्त करने के लिए हस्तिनापुर लाए गए.
द्रोणाचार्य से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त करके पाण्डव हर प्रकार से योग्य हो गए. अब कुरुवंश की परंपरा के अनुसार युधिष्ठर को युवराज बनाया जाना था पर यह बात धृतराष्ट्र के बड़े पुत्र दुर्योधन को स्वीकार नहीं थी. उसने षडयन्त्र करके पाण्डवों को हस्तिनापुर छोड़ने के लिए विवश किया. इसी भ्रमण काल में द्रोपदी पाण्डवों की पत्नी बनी.
पाण्डवों की मित्रता श्री कृष्ण से हुई जो आगे चलकर उनके मार्गदर्शक और सहायक हुए.
कुछ समय बाद धृतराष्ट्र ने अपना राज्य कौरवों और पाण्डवों में बाँट दिया. दुर्योधन की राजधानी हस्तिनापुर थी और युधिष्ठर की इन्द्रप्रस्थ. युधिष्ठर ने अपने भाइयों के साथ मिलकर अपने राज्य को बहुत शक्तिशाली बना लिया. पाण्डवों की उन्नति से जलकर दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के साथ षडयन्त्र रचकर द्यूतक्रीड़ा में पाण्डवों का राज्य जीत लिया और उन्हें तेरह वर्ष का वनवास (जिसमें एक वर्ष का अज्ञातवास भी था) दिया गया. तेरह वर्ष के बाद पाण्डवों को अपना राज्य फिर से मिल जाना था पर जब तेरह वर्ष के वनवास के बाद लौटकर पाण्डवों ने अपना राज्य वापस माँगा तो दुर्योधन ने साफ़ इन्कार कर दिया.
भगवान श्री कृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर दुर्योधन के पास गए. राज्य के स्थान पर पाण्डव पाँच गाँव लेने को भी तैयार थे पर दुर्योधन ने पाण्डवों को सूई की नोंक के बराबर ज़मीन देने से भी इन्कार कर दिया.
अब युद्ध आवश्यक हो गया. दोनों पक्षों की ओर से अनेक राजा युद्ध में शामिल हो गए. पाण्डवों को श्री कृष्ण की मित्रता का भरोसा था पर उन्होंने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा कर ली थी. श्रीकृष्ण युद्ध में अर्जुन के सारथी बने. कौरवों की ओर भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण और जयद्रथ जैसे महारथी थे.
अठारह दिन तक यह युद्ध चलता रहा. अन्त में पाण्डवों, अश्वत्थामा और श्रीकृष्ण को छोड़कर कोई महारथी नहीं बचा.
युधिष्ठर सम्राट बने. बाद में युधिष्ठर ने अपना राज्य अर्जुन के पौत्र परीक्षित को सौंपकर द्रौपदी और अन्य पाण्डवों के साथ हिमालय की ओर प्रस्थान किया जहाँ से मेरु पर्वत पहुँच कर उन्होंने स्वर्ग में प्रवेश किया.
महाभारत में मुख्य कथा के अतिरिक्त सैकड़ों कथाएं हैं.
इनमें नल-दमयन्ती की कथा, भीष्म की पितृभक्ति, उनका आजीवन ब्रह्मचारी रहने का व्रत, हस्तिनापुर राज्य के प्रति उनकी निष्ठा, शिखण्डी का उनकी मृत्यु का कारण बनना, कर्ण के जन्म की कथा, उसकी दानशीलता, रणक्षेत्र में उसकी मृत्यु, द्रोपदी का चीर हरण और श्रीकृष्ण द्वारा उसकी सहायता, चक्रव्यूह की रचना और उसके भेदन में अभिमन्यु की वीरता व मृत्यु, अर्जुन द्वारा जयद्रथ वध, भीम द्वारा दुर्योधन का वध, अश्वत्थामा का प्रतिशोध आदि ऐसी अनेक कथाएं और उपकथाएं हैं जो ‘महाभारत’ की रोचकता को प्रारम्भ से अन्त तक बनाए रखती हैं.
‘महाभारत’ में संजय अपनी दिव्य दृष्टि का उपयोग कर धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में हो रहे युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाते हैं.
‘महाभारत’ में की गई इस कल्पना और आज रेडियो में प्रसारित किसी आँखों-देखे हाल में समानता देख कर आश्चर्य होता है.
‘महाभारत’ रूपी महासागर का अनमोल रत्न ‘भगवद् गीता’ है. ‘गीता’ में ‘उपनिषद’ के दर्शन, योग-दर्शन और सांख्य-दर्शन का समन्वय है. ‘गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह उपदेश दिया है कि वह सम्बन्धों के मोह में पड़कर अपने कर्तव्य से डिगे नहीं और कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में कौरव सेना पर अपनी पूरी शक्ति से प्रहार करे.
‘गीता’ में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्म का उपदेश दिया है.
”कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।“ (अर्थात् कर्म कर परन्तु फल की इच्छा मत कर)
‘गीता’ में भगवान यह भी कहते हैं कि वह सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की रक्षा करने के लिए हर युग में जन्म लेते हैं-
”परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्म संस्थापनार्थाय, सम्भवामि युगे-युगे।।“
आत्मा के अमरत्व और शरीर की नश्वरता पर भी ‘गीता’ में विस्तार से चर्चा की गई है. ‘भगवद् गीता’ भारतीय दर्शन के चरमोत्कर्ष को प्रदर्शित करती है.
‘महाभारत’ में धर्म की विस्तृत व्याख्या की गई है.
एक शासक का क्या धर्म है? प्रजापालन के लिए उसके क्या कर्तव्य हैं?
युद्ध के समय और विजय के उपरान्त उसकी क्या नीति होनी चाहिए?
विवाह में पति-पत्नी के एक दूसरे के प्रति और परिवार के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिए?
एक विद्यार्थी का धर्म क्या है?
एक आचार्य का क्या धर्म है?
भक्त का धर्म क्या है?
भगवान का धर्म क्या है?
वर्ण व्यवस्था का क्या औचित्य है?
युद्ध में धर्म का पालन किस प्रकार किया जाता है?
इन सब प्रश्नों पर ‘महाभारत’ में विचार किया गया है.
भारतीय धर्म और संस्कृति के विषय में ‘महाभारत’ का महत्व तो निर्विवाद है ही साथ ही साथ यह प्राचीन भारतीय राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक जीवन पर भी प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराता है.
एक ऐतिहासिक श्रोत के रूप में भी ‘महाभारत’ का अत्यन्त महत्व है. विश्व इतिहास में अन्य कोई ग्रंथ ‘महाभारत’ की विशालता, उसकी साहित्यिक उत्कृष्टता, उसकी दार्शनिक परिपक्वता और उसकी ऐतिहासिक उपयोगिता का मुकाबला नहीं कर सकता.
(शब्दावली
पर्व- अध्याय
कौरव-पाण्डव- धृतराष्ट्र के सौ पुत्र कौरव तथा पाण्डु के पाँच पुत्र पाण्डव कहलाते हैं.
निष्काम कर्म- बिना फल की इच्छा रक्खे हुए कर्म करते रहना.
दिव्य दृष्टि- वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी.
दिव्य दृष्टि से संजय दूर हो रही घटनाओं को देख सकते थे.)

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

जन्मदिन तब और अब

 कल मेरा जन्मदिन था. सबसे पहले आदतन श्रीमती जी ने मुझे बेड टी के साथ बधाई दी. यह बधाई मीठी थी लेकिन इस से बहुत ज़्यादा मीठी बधाइयां थीं – मेरे नाती अमेय की, मेरी दो नातिनों इरा और आसावरी उर्फ़ सारा की.

पौने दो साल की सारा तो पहली बार हमारे घर आई हैं. सारा का बर्थ डे बेबी को बधाई देने का तरीक़ा उसे पुच्ची देने का होता है लेकिन इसके लिए वो सुपात्र के सामने खुद अपना गाल आगे कर देती हैं.
सच में, बच्चों का साथ मिल जाए तो हम खुद को कभी बूढ़ा महसूस नहीं करते.
वैसे भी 71 साल की उम्र में कोई बूढ़ा थोड़ी हो जाता है. कहावत – ‘साठे पर पाठा’ होने की है तो इस हिसाब से मुझे पाठा हुए कुल जमा 11 साल ही हुए हैं. सही ढंग से मेरी मूंछे उगना तो अभी-अभी शुरू हुई हैं.
मेरी जवानी बच्चों के जन्मदिन पर उनको छोटे-छोटे उपहार देने में और मेरी श्रीमती जी की उनके लिए मनपसंद स्वादिष्ट पकवान बनाने में गुज़री है लेकिन अब कमाऊ बच्चों से अपने जन्मदिन पर बड़े-बड़े उपहार मिल रहे थें और घर में ऑनलाइन केक मंगा कर मुझ से कटवाया जा रहा था,फ़ोटो सेशंस हो रहे थे, श्रीमती और बेटियां ही नहीं, नातिनें भी बधाई गीत गा रही थीं.
टीवी पर ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखना हमारे लिए एक फ़र्ज़ सा बन गया है लेकिन कल अमिताभ बच्चन को भी हमने टाटा कर दिया. उधर बिग बी दूसरों के बच्चों के साथ ख़ुश थे तो इधर हम अपने बच्चों के साथ ख़ुश थे.
मेरी याददाश्त में मैंने इस से ख़ूबसूरत और ख़ुशगवार जन्मदिन कभी नहीं मनाया.
अब तो तीन दिसंबर की सुबह है. आज का दिन कल के दिन से बहुत भिन्न है.
प्रातः काल से ही श्रीमती के ताने-उलाहने और बेटियों के प्रवचन प्रारंभ हो गए हैं.
मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा कि कल का सुपर-हीरो इतनी जल्दी आज का खलनायक कैसे बन गया.
यह तो बात हुई अब वाले जन्मदिन की. तब वाले जन्मदिन यानी कि मेरे बचपन वाले जन्मदिन इस अब वाले जन्मदिन से थोड़े अलग हुआ करते थे.
माँ – ‘उठो लाल अब आँखें खोलो’ गाते हुए और मेरे सर पर हाथ फेरते हुए मुझे जगाती थीं (हमारे बचपन में हमारे विक्टोरियन मॉरालिटी के अनुयायी माता-पिता से हमको पुच्चियाँ नहीं मिला करती थीं).
मेरे तकिए के नीचे दो रूपये का एक कड़कड़ाता हुआ नोट रक्खा जाता था (उन दिनों हमारा पॉकेटमनी दो रुपया महीना होता था और जन्मदिन के अवसर पर हमको यह हमारे पॉकेटमनी के अतिरिक्त मिला करता था).
हम बच्चों के जन्मदिनों पर बाज़ार से पकवान मंगाए जाने की परंपरा नहीं थी. माँ ख़ुद हमारे लिए आटे का हलवा बनाती थीं और हमारी पसंद के कुछ अन्य पकवान भी तैयार करती थीं.
पिताजी को तो प्यार का इज़हार करना आता ही नहीं था. अपने जन्मदिन पर जब हम उनके पैर छूते थे तो एक हल्की सी मुस्कान के साथ उनका - ‘ख़ुश रहो !’ कहना हमारे लिए काफ़ी हुआ करता था.
हम भाई-बहन आपसी खुंदकों को याद करते हुए जन्मदिन पर एक-दूसरे को आमतौर पर बधाई नहीं दिया करते थे.
अपने जन्मदिन पर मुझ महा-ऊधमी को कैसी भी शैतानी करने पर माँ की और भाई-बहन की पिटाई और डांट से मुक्ति मिल जाती थी.
यह बात और थी कि जन्मदिन के आने वाले दिनों में अपने जन्मदिन पर की गयी मेरी शरारतों को याद कर के हमारी ममतामयी मातेश्वरी और रहमदिल भाई-बहन मेरी अतिरिक्त पिटाई कर के मेरे पिटाई-मुक्त दिवस की भरपाई कर लिया करते थे.
हाँ, हमारे गांधीवादी पिताजी ज़रूर मेरे जन्मदिन के बाद वाले दिनों में भी अहिंसा का दामन नहीं छोड़ते थे.
हमारे बचपन में हमारा जन्मदिन वह शुभ दिन होता है जिसकी कि हम साल के 364 दिन प्रतीक्षा करते हैं लेकिन हमारे बुढ़ापे में यह हमको इशारा करता है कि हमारा ऊपर का टिकट कटने का दिन अब नज़दीक है.
बचपन में जन्मदिन के बाद वाले दिनों की अतिरिक्त पिटाई और बुढ़ापे में जन्मदिन के बाद के दिनों में अतिरिक्त तानों और उपदेश को भुला दिया जाए तो जन्मदिन मेरे लिए हमेशा से स्पेशल रहा है.
तो एक बार मैं ख़ुद को थोड़ी देर से ही सही – जन्मदिन की बधाई देता हूँ –
जन्मदिन मुबारक हो जैसवाल साहब ! आप स्वस्थ रहें, सपरिवार प्रसन्न रहें ! ईश्वर से प्रार्थना है कि खुद बिना कष्ट पाए और दूसरों को बिना कष्ट दिए आराम से, निर्विघ्न, निर्विवाद, आपका ऊपर का टिकट कटे !

शनिवार, 27 नवंबर 2021

आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

 मैं रौंदूगी तोय -

बीस साल की ख़ूबसूरत और मासूम सी दिखने वाली दिव्या की शादी जब 30 साल के, मोटे कौएनुमा व्यक्तित्व वाले डॉक्टर मनोज कुमार से हुई तो इस जोड़ी को देख कर बहुत से लोगों के दिमाग में एक साथ -
‘कौए की चोंच में अनार की कली’ वाला मुहावरा कौंधने लगता था.
लेकिन इस अनार की कली को अपनी चोंच में दबा कर लाने वाले हमारे डॉक्टर मनोज कुमार कोई मामूली कौए नहीं थे.
विकास नगर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत डॉक्टर मनोज कुमार ने दहेज-मंडी में अपनी ऊंची बोली लगाए जाने के बावजूद सतनाम पुर क़स्बे के एक प्राइमरी स्कूल के गरीब मास्साब की सुन्दर, सलोनी, ठीक-ठाक नंबर ला कर बी० ए० पास और पाक-विद्या में निपुण बेटी, दिव्या को बिना किसी दहेज की मांग के, पहली नज़र में पसंद कर लिया था.
दिव्या को याद आ रहा था कि किस तरह से उसके बाबू जी ने पिछले एक साल से उसके लिए एक सुयोग्य पात्र ढूँढ़ने में अपनी आधा दर्जन जोड़ी चप्पलें घिस डाली थीं लेकिन फिर भी उन्हें हर लड़के वाले के यहाँ से निराश लौटना पड़ा था.
शादी के बाद जब यह जोड़ा विकास नगर पहुंचा तो वहां यह तुरंत टॉक ऑफ़ दि टाउन बन गया.
मनोज कुमार से पहले ‘हाय और हेलो’ तक ही सम्बन्ध रखने वाले और उनकी पीठ-पीछे उन्हें ‘ईदी अमीन’ कहने वाले, अब उनके खासमखास दोस्त बन कर, अपनी-अपनी श्रीमतीजियों के बिना, लेकिन महंगे उपहारों के साथ, उनके घर मंडराने लगे थे.
आए दिन विभाग में मनोज कुमार की खाट खड़ी करने वाले उनके विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर पांडे तो अब रोज़ाना ही दिव्या भाभी जी के हाथ की अदरक वाली चाय पिए बिना यूनिवर्सिटी में क़दम भी नहीं रखना चाहते थे.
प्रोफ़ेसर पांडे फोर्स्ड बैचलर थे. उनके बीबी-बच्चे लखनऊ में रहते थे.
विरह की वेदना में जलते हुए प्रोफ़ेसर साहब को रोज़ाना दिव्या भाभी जी का पल दो पल का रूमानी साथ चाहिए था तो इस में खराबी ही क्या थी?
दिव्या को पढ़ाई-लिखाई से ज़्यादा दिलचस्पी विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने में थी लेकिन अपने पतिदेव के और प्रोफ़ेसर पांडे के कहने पर मरे मन से उसने एम० ए० हिंदी में एडमिशन ले लिया.
मनोज कुमार और प्रोफ़ेसर पांडे उसे हिंदी की विदुषी बनाने के अभियान में जुट गए.
प्रोफ़ेसर पांडे कभी बिना बुलाए दिव्या को पढ़ाने उसके घर आ जाते थे तो कभी उसे ज़बर्दस्ती अपने घर बुला लेते थे.
दिव्या को पढ़ाते समय प्रोफ़ेसर पांडे, तुलसीदास की भक्ति-रचनाओं की अथवा कवि भूषण के वीर रस के छंदों की, व्याख्या करते हुए भी न जाने कैसे विद्यापति या कविवर बिहारी की सम्भोग श्रृंगार की रसभरी कविताओं का जीवंत वर्णन करने लगते थे.
दिव्या ने मनोज कुमार से रसिया प्रोफ़ेसर पांडे की गुस्ताख़ियों की शिक़ायत की तो उन्होंने फ़र्माया –
‘दिव्या अब तुम्हारी पहचान विकास नगर यूनिवर्सिटी के एक लेक्चरर की पत्नी की है न कि सतनाम पुर क़स्बे के एक स्कूल मास्टर की बेटी की ! ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए तुमको मॉडर्न, प्रोग्रेसिव और प्रैक्टिकल तो बनना ही होगा.
वैसे भी प्रोफ़ेसर पांडे तुम्हारे गुरु हैं अगर वो कभी-कभार तुम से थोड़ी-बहुत लिबर्टी ले लेते हैं तो तुम्हें इस से परेशानी क्यों होती है?’
पतिदेव से ऐसा प्रैक्टिकल ज्ञान प्राप्त करने के बाद दिव्या ने प्रोफ़ेसर पांडे की ही क्या, किसी भी रसिया की, किसी भी ओछी हरक़त की, उन से फिर कभी कोई शिक़ायत नहीं की.
मनोज कुमार पर अब प्रोफ़ेसर पांडे इतने ज़्यादा मेहरबान हो गए थे कि अपने हर शोध-पत्र में उनका नाम को-ऑथर के रूप में डालने लगे थे.
वो अगली सेलेक्शन कमेटी में एसोसिएट प्रोफ़ेसर की पोस्ट पर डॉक्टर मनोज कुमार का ही सेलेक्शन कराने लिए वचनबद्ध हो चुके थे.
मनोज कुमार की दो साल की लगातार अनदेखी, कैसी भी बेहूदगी बर्दाश्त करने की दिव्या की रिकॉर्ड-तोड़ सहनशीलता और प्रोफ़ेसर पांडे की दो साल की अथक तपस्या के अलावा इधर-उधर के जुगाड़ के बाद, दिव्या ने एम० ए० में टॉप कर ही डाला.
एम० ए० में टॉप करने के बाद दिव्या ने प्रोफ़ेसर पांडे के निर्देशन में मोटी फ़ेलोशिप के साथ स्लीपिंग शोधार्थी के रूप में तीन साल के अन्दर ही पीएच० डी० भी कर डाली और उसके ठीक चार महीने बाद विकास नगर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रवक्ता के पद पर उसका चयन भी हो गया.
इसी बीच प्रोफ़ेसर पांडे की कृपा से मनोज कुमार का चयन एसोसिएट प्रोफ़ेसर के लिए भी हो गया.
इन महान उपलब्धियों के लिए गुरु-दक्षिणा के रूप में दिव्या को इन पांच साल, चार महीनों में प्रोफ़ेसर पांडे को क्या-क्या उपलब्ध कराना पड़ा, इसकी ख़बर विकास नगर के बाशिंदों तक ही नहीं, बल्कि वहां के पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों तक भी पहुँच गयी थी –
अब तो बात फैल गयी जानें सब कोई - - -
हमारे डॉक्टर मनोज कुमार का ज़्यादातर वक़्त अब घर में आई डबल तनख्वाह को सँभालने में ही खर्च होने लगा था.
पहले की सी भोली, मासूम सी, सहमी सी और लाज-शर्म से सिमटी सी, दिव्या की जगह अब एक अल्ट्रा-स्मार्ट और बोल्ड डॉक्टर दिव्या ने ले ली थी जो कि विकास नगर की हर सभा की परी थी.
विकास नगर विश्वविद्यालय के नए कुलपति महोदय तो रौनक़-ए-महफ़िल डॉक्टर दिव्या पर जी जान से फ़िदा हो गए थे.
प्रोफ़ेसर पांडे के जाल में फंसी चिड़िया अब स्वेच्छा से और भी मज़बूत जाल में फंसने का फ़ैसला कर चुकी थी.
हमारे डॉक्टर मनोज कुमार अपनी चिड़िया के इस जाल-परिवर्तन की प्रक्रिया को बड़े धैर्य से देख रहे थे.
उनके विभाग में प्रोफ़ेसर की एक पोस्ट मानों उन्हीं के लिए खाली पड़ी थी.
कुलपति महोदय की कृपा रहते इस लाटरी का टिकट उनके हाथों में जाने से भला अब कौन रोक सकता था?
दिव्या जी पर कुलपति महोदय की मेहरबानियाँ बढ़ती ही जा रही थीं.
प्रोफ़ेसर पांडे अब डॉक्टर मनोज कुमार से फिर से खार खाने लगे थे लेकिन उनकी तो अब कुलपति महोदय से डायरेक्ट सेटिंग थी. इस सेटिंग की वजह से उन्होंने कुलपति महोदय से जुगाड़ लगा कर प्रोफ़ेसर के लिए होने वाली चयन समिति की तिथि से ठीक सात दिन पहले विभागीय पुस्तकालय के लिए पुस्तकों की ख़रीदारी में हेरा-फेरी की जांच-पड़ताल के लिए अपने विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर पांडे के विरुद्ध एक जांच-समिति बिठवा दी.
अब चयन समिति में विभागाध्यक्ष के रूप में प्रोफ़ेसर पांडे की जगह प्रोफ़ेसर गोयल शोभायमान हो गए.
आख़िरकार प्रोफ़ेसर के पद हेतु इंटरव्यू हो ही गया.
इंटरव्यू में सब कुछ डॉक्टर मनोज कुमार के मन मुताबिक़ हुआ.
मात्र पांच साल के टीचिंग एक्सपीरिएंस वाली डॉक्टर दिव्या ने भी मज़ाक़-मज़ाक़ में प्रोफ़ेसर की पोस्ट के लिए एप्लाई कर दिया था.
खैर, उनका साक्षात्कार तो तीन मिनट में ही ख़त्म हो गया.
अब प्रोफ़ेसर तो डॉक्टर मनोज कुमार को ही बनना था.
जलने वाले मित्रों में मिष्ठान्न वितरण के लिए और एक भव्य पार्टी के लिए उन्होंने एडवांस में व्यवस्था भी कर ली थी.
लेकिन फिर अचानक एक धमाका हो गया.
विकास नगर यूनिवर्सिटी की एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल की बैठक के बाद हिंदी विभाग की नियुक्ति को लेकर सारे प्रान्त में हंगामा खड़ा हो रहा था.
हर कोई पूछ रहा था कि अपने दस सीनियर्स को सुपरसीड कर के कल की लड़की ये डॉक्टर दिव्या, लेक्चरर से सीधे प्रोफ़ेसर कैसे हो गयी?
और तो और, कैरियर में अपने से सात साल सीनियर अपने पति को भी इस दौड़ में उसने पछाड़ दिया था.
त्रासदी इतने पर ही ख़त्म हो जाती तो गनीमत थी पर अभी तो यूनिवर्सिटी में और भी गुल खिलाए जाने बाक़ी थे.
प्रोफ़ेसर पांडे और डॉक्टर मनोज कुमार, दोनों का ही तबादला विकास नगर यूनिवर्सिटी के दूसरे कैंपस, कीर्ति नगर कैंपस के लिए कर दिया गया था.
कुलपति महोदय चाहते थे कि प्रोफ़ेसर पांडे और डॉक्टर मनोज कुमार जैसे अनुभवी व्यक्ति, काला पानी के नाम से कुख्यात कीर्ति नगर जाएं और वहां के मृतप्राय हिंदी विभाग को पुनर्जीवित करें.
इस कथा के अंत में तीन दृश्यों का उल्लेख करना आवश्यक है –
पहले दृश्य में प्रोफ़ेसर पांडे कुलपति महोदय के ऑफ़िस के सामने रोते हुए अपने सर के बाल नोच रहे थे और कुलपति महोदय को खुलेआम कोस रहे थे.
दूसरे दृश्य में कीर्ति नगर जाने की तैयारी में जुटे डॉक्टर मनोज कुमार मातमी चेहरे के साथ, अपनी खिसियानी सी मुस्कान ले कर, घर आए अपने साथियों से, अपनी श्रीमती जी के प्रोफ़ेसर होने की सच्ची-झूठी बधाइयाँ स्वीकार कर रहे थे.
तीसरे दृश्य में कुलपति के बंगले के एक नितांत निजी कक्ष में उन के साथ जाम से जाम टकराते हुए हमारी नई-नई प्रोफ़ेसर बनी नायिका, न्यूयॉर्क में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में विकास नगर विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करने से पहले उन से आवश्यक दिशा-निर्देश ले रही थीं.

गुरुवार, 18 नवंबर 2021

असली मुद्दे कहाँ हैं?

पद्म श्री बहन कंगना के श्री मुख से कब कौन से फूल झड़े, कब उन्होंने अपने धनुषवाण से किस पर तीर चलाए, इस पर नित्य न्यूज़ चैनल्स पर बहस होती है, सीधी तरफ़ के, उल्टी तरफ़ के और बीच के, देशभक्त उनके पक्ष में, उनके विरोध में या फ़िफ्टी-फ़िफ्टी वाले लहजे में अपने गले फाड़ते रहते हैं.
हमारे देश को कब, कैसी और कैसे आज़ादी मिली, इसका फ़ैसला अब कंगना जी का ताज़ातरीन वक्तव्य करेगा.
गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता हैं या फिर हमारे लिए सबसे बड़े खलनायक हैं, यह भी उनके इशारे पर तय होगा.
कंगना जी सुशांत राजपूत आत्महत्या काण्ड में किसी भी जांच-पड़ताल से पहले, किसी भी न्यायिक कार्रवाई से पूर्व, अपना अंतिम निर्णय दे चुकी थीं जो कि कायदे से माननीय सर्वोच्च न्यायालय को भी मान्य होना चाहिए था.
किन्ही मोहतरमा का अंध-भक्त कोई सलमान ख़ुर्शीद अपनी किसी बेकार सी किताब में दो-चार मूर्खतापूर्ण विवादस्पद बातें क्या लिख देता है, हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारा राष्ट्र-गौरव ख़तरे में पड़ जाता है.
फिर हमारे उत्साही देशभक्त लाठियां और मशालें ले कर उस मूर्ख के बंगले में तोड़फोड़, आगजनी, कर के भारत की आन-बान-शान को पुनर्स्थापित करते हैं.
कोई वीरदास परदेस में जा कर अपनी मसखरी वाले कार्यक्रम में इंडिया के लिए दो-चार विवादस्पद, उपहासात्मक जुमले क्या सुना देता है, प्रशांत सागर जैसी शांत भारतीय राजनीति में तूफ़ान उठ खड़ा होता है.
उद्दंड, गुस्ताख, देशद्रोही, वीरदास का सर कलम कर के ही भारत की खोई हुई मान-प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित किया जा सकता है.
कोई मणिशंकर अय्यर माननीय की शान में गुस्ताख़ी करता है तो वतन की आबरू ख़तरे में पड़ जाती है.
किसी तीर्थ में दिए जलाने का कीर्तिमान स्थापित कर दिया जाता है तो भारत दुनिया भर में फिर से सोने की चिड़िया कहलाया जाने लगता है.
वर्ड कप में भारत नापाक पाकिस्तान से भिड़े या नहीं, यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाता है.
आर्यन खान की गिरफ़्तारी और उसकी रिहाई, सेंसेक्स के उतार-चढ़ाव को निर्धारित करती है.
हम भारत को फिर से जगदगुरु बनाने के लिए क्या इन्हीं नुस्खों का इस्तेमाल करेंगे?
देश की अर्थ-व्यवस्था किस संकट से गुज़र रही है?
बेरोज़गारी राक्षसी सुरसा के मुंह की तरह से किस तरह बढ़ती जा रही है?
सांप्रदायिक वैमनस्य किस प्रकार जंगल की आग की तरह फैलता जा रहा है?
आतंकवाद किस तरह भारत के सुरक्षा-चक्र में सेंध लगा रहा है?
स्त्रियों-बालिकाओं का दमन, उनका शोषण और उनके साथ हुई आपराधिक घटनाओं में निरंतर वृद्धि, हमारा लिंगभेदी सामाजिक और राजनीतिक नज़रिया कैसे उनके विकास में बाधक हो रहा है?
तमिल फ़िल्म - 'जय भीम' में उठाए गए दलितों के शोषण पर उठाए गए असली मुद्दे को कैसे एक विशेष जाति के मान-सम्मान का प्रश्न बना दिया जाता है?
राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने आज से 110 साल पहले - 'भारत भारती' में प्रश्न उठाए थे -
'हम कौन थे, क्या हो गए, और क्या होगे अभी ---?'
आज स्वर्ग में बैठे हमारे राष्ट्रकवि को उनके प्रश्नों के उत्तर मिल गए होंगे और भारतीयों को रसातल में जाते हुए देख कर उनका ह्रदय निश्चित ही तड़प रहा होगा.
हमको हमारे असली मुद्दों से हमारा ध्यान भटकाने की सियासती साज़िशें करने वालों को बेनक़ाब करना होगा.
अब चाहे हमको गुमराह करने वाले नेता हों, अभिनेता हों, मसखरे हों, लेखक हों, मीडिया हो, इन सबको इनकी औक़ात पर लाना हमारा फ़र्ज़ बनता है.
इन सबको इनकी औकात पर तभी लाया जा सकता है जब हम इनकी बेसिर-पैर
की बातों पर कोई भी तवज्जो न दें, कोई भी ध्यान न दें.
आज फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ होते तो कहते -
'और भी मुद्दे हैं जमाने में कंगना, आर्यन के सिवा'
अगर हम इस नए सन्देश को अपने राष्ट्रीय-जीवन में अपनालें तो हमको तरक्की की राह पर चलने से, शान्ति और अमन के मार्ग पर चलने से, कोई नहीं रोक सकता.

रविवार, 14 नवंबर 2021

पॉकेटमनी

 (बाल-दिवस पर मेरी एक कहानी प्रस्तुत है.

1990 के दशक के मध्य में लिखी गयी यह कहानी मैंने अपनी बड़ी बेटी गीतिका के मुख से कहलवाई है.
कहानी तो मेरी लिखी हुई है लेकिन इसमें अनुभव एक 12 साल की बच्ची के ही हैं.)
पॉकेटमनी -
पॉकेटमनी का हमने नाम तो बहुत सुना था पर सात साल की उम्र पार करने पर भी हमने उसे छू कर कभी नहीं देखा था.
हाँ ! बुआजी- ताऊजी लोगों के घर कभी हमारा जाना होता था तो वहाँ दीदियाँ और भैया लोग अपने पॉकेटमनी से हम दोनों बहनों को छोटी-मोटी ट्रीट ज़रूर दिया करते थे.
ऋचा दीदी तो कभी प्रज्ञा दीदी अपने छोटे-छोटे पर्सों में से नोट निकालतीं और फूँक मारते ही आइसक्रीम कोन्स हमारे हाथ में होते. कभी तनु भैया हमारे पोइट्री रिसाइटल से ख़ुश होकर हमको रुपये का एक पत्ता देकर हमसे कहते –
हमारे जयंत भैया और तनु भैया तो हमारे बड़े होने से पहले ही कमाऊ हो गए थे और जब-तब इनाम-इकराम से हमको मालामाल करते रहते थे.
हम अच्छे बच्चे बनकर भैयाओं और दीदियों की सेवा में लगे रहते थे.। दीदियों में से अगर कोई भी पानी माँगता तो हम दोनों ही बहनें एक साथ गिलास लेकर हाजि़र हो जाती थीं.
भैया लोगों से भी ट्रीट लेने के लालच में हम लोग उनकी फ़रमाइशें पूरी करने में जुटे रहते थे.
सुना था कि भैया और दीदी लोग अपनी पसन्द के कपड़े भी अपनी पॉकेटमनी से ही खरीदते थे.
पॉकेटमनी की ताकत हमको पता चल चुकी थी पर हमारे मम्मी-पापा को यह ख़बर ही नहीं थी कि उनकी बच्चियाँ बड़ी हो चुकी हैं और उनके हाथ अब उनकी जेब या पर्स तक पहुँचने लायक हो चुके हैं.
यूँ तो मम्मी-पापा हमारे लिए खूब सामान लाते थे.
बाज़ार में भी अक्सर हमारी फ़रमाइशों को पूरा किया जाता था पर उन्हें पूरी किए जाते समय हर बार हमको उपदेश की भारी डोज़ भी हज़म करनी पड़ती थी.
मम्मी कहती थीं –
‘ मिठाई खाने की वजह से फ़ंला-फ़ंला लड़की के दाँतों में कैविटी हो गई. आइसक्रीम खाने से फ़लां-फ़ंला लड़के के टान्सिल्स बढ़ गए.’
ऐसी बातें तो हम बर्दाश्त कर भी लेते पर गोलगप्पे जैसी भोली और मासूम चीज़ को जब भला-बुरा कहा जाता तो हम आपे से बाहर हो जाते थे.
मम्मी-पापा के साथ बाज़ार में घूमते समय हम दोनों बहनों की नज़र दुकानों के शो-केसेज़ पर रहती थी.
विण्डो शॉपिंग में हम माहिर थे. क्या मजाल कि किसी भी दुकान का कोई भी माल हमारी पारखी नज़़रों से छूट जाए.
हमारी शराफ़त थी कि हम सौ-दो सौ आइटम्स में से सिर्फ़ दस-बारह की ही फ़रमाइश करते थे पर फ़ौरन ही पापा के पैट डायलाग्स हमको सुनाई देते थे –
‘ ये तो घर पर पहले से ही मौजूद है. ये तो टोटली अनहाइजिनिक है, वगैरा, वगैरा.’
उधर मम्मी रागिनी के रिमाइन्डर्स से उक्ता कर फ़रमाइशी आइटम की बुराइयाँ बताना शुरू कर देतीं और साथ में उनका मैनर्स, डिसिप्लिन, बजट और बचत पर ज़ोरदार लेक्चर भी शुरू हो जाता.
मम्मी इकॉनामिक्स की स्टूडैन्ट तो कभी नहीं रही हैं पर बजट पर लम्बा भाषण देना उन्हें बहुत अच्छा लगता है.
ऐसा लेक्चर देते समय अगर मम्मी के सर पर पगड़ी और चेहरे पर दाढ़ी-मूँछ लगा दी जाए तो वो बिल्कुल डॉक्टर मनमोहन सिंह लगेंगी (तत्कालीन वित्तमंत्री).
पॉकेटमनी के सपने देखते-देखते मैं पापा की शर्ट की पॉकेट तक और रागिनी उनकी पैन्ट की पॉकेट तक पहुँच गईं पर वो हमारे हाथ नहीं आया.
जन्मदिन हम बच्चों के लिए हज़ार ख़ुशियाँ लेकर आता है.
इस दिन हमको वीआईपी ट्रीटमेंट मिलता है, मम्मी-पापा हमारे लिए अलादीन का मिनी चिराग हो जाते हैं और हमारी बड़ी नहीं तो कम से कम छोटी-मोटी ख़्वाहिशें ज़रूर पूरी करते हैं.
मेरे दसवें जन्मदिन पर मम्मी मेरे और अपने दोस्तों को बुलाकर पार्टी देना चाहती थीं पर मैंने इसके बदले में बच्चों के लिए पॉकेटमनी ग्रान्ट किए जाने की डिमाण्ड कर डाली.
रागिनी ने भी मेरे सुर से अपना सुर मिला लिया. चार महीने बाद उसका भी तो आठवाँ जन्मदिन आना था.
आश्चर्य कि मम्मी ने उस दिन बड़े धैर्य के साथ हम बहनों की डिमाण्ड सुनी.
पापा भी उस दिन बहुत अच्छे मूड में थे.
हुर्रे ! उन्होंने हमारी बरसों से चली आ रही पॉकेटमनी दिए जाने की डिमाण्ड को स्वीकार कर लिया.
पापा चाहते थे कि महीने में पचास-पचास रुपये देकर हम दोनों बहनों को निहाल कर दिया जाए.
पॉकेटमनी में दस-दस रुपयों के एनुअल इन्क्रीमेंट का सुझाव भी रखा गया पर सरप्राइज़िन्गली इस बार मम्मी थोड़ी उदार हुईं और उन्होंने सत्तर-सत्तर रुपये के पॉकेटमनी का ऑफर दे डाला. इधर हमारी डिमाण्ड दो-दो सौ रुपयों से नीचे नहीं आ रही थी उधर पापा मम्मी की दरियादिली के लिए उन्हें डाँट पिला रहे थे.
बहस के दौरान पापा ने शेव करते हुए रेज़र से अपना चार बूँद ख़ून बहा दिया और मम्मी ने गैस पर रखे दूध को उफ़न जाने दिया पर हम थे कि हैण्डसम पॉकेटमनी की डिमाण्ड पर अड़े हुए थे.
आखि़रकार दोनों पक्षों के बीच सौदेबाज़ी शुरू हुई.
काफ़ी हो-हल्ले और हाय-हाय के बाद मामला सौ- सौ रुपये महीने पर तय हुआ.
मम्मी ने दो शानदार पर्स हमको पॉकेटमनी रखने के लिए भेंट किए.
जब मम्मी ने हमारे लिए बर्थ-डे बोनस और एक्ज़ाम्स में अच्छे मार्क्स लाने पर एक्स्ट्रा इन्सेटिव का ऐलान किया तो हमको एहसास हुआ कि ऊपर से बड़ी सख़्त दिखने वाली हमारी घरेलू डॉक्टर मनमोहन सिंह का दिल नारियल की तरह से ऊपर से कड़ा और अन्दर से नरम है.
अपने पर्सों में दस-दस रुपयों के दस-दस नोट देखकर हम फूले नहीं समा रहे थे.
मैं अगर राष्ट्रपति होती तो उसी वक़्त मम्मी-पापा दोनों को ही भारत रत्न की उपाधि से सम्म्मानित कर देती पर फि़लहाल तो उनके गले लग कर और थैंक्यू कह कर हमने काम चला लिया.
अब हम बड़े हो गए थे, अपनी मर्ज़ी के ख़ुद मालिक थे.
‘ पापा प्लीज़ ये दिला दीजिए ! और मम्मी हमको ये लेना है या वो लेना है ’ के दिन बीत गए थे.
अब हम बहनों के पास अपने-अपने अलादीन के चिराग थे जिनमें हर महीने तेल के बदले में सौ-सौ रुपये डाल दिए जाते थे.
हमने पॉकेटमनी को लेकर सुनहरे सपने देखने शुरू कर दिए.
अपनी बर्थ-डे को सेलीब्रेट करने के लिए मैं रागिनी को लेकर फ़ौरन मार्केट
के लिए निकल पड़ी. पर पहली शॉपिंग ही हमको भारी पड़ गई.
दस-दस रुपयों की मिनी चाकलेट्स खरीदकर हमारा तो दिल खट्टा हो गया. आखि़र इन जले दूध की दाँत खराब करने वाली तीस-तीस ग्राम की चाकलेट्स पर हम एक बच्चे अपना तीन दिन का पॉकेटमनी क्यों ख़र्च करें?
इनसे अच्छी तो मम्मी की बनाई घरेलू बर्फ़ी होती है.
आइसक्रीम कोन्स खरीदने में तो हमारे बीस रुपये और खर्च हो गए. हमने फ़ौरन ही अपनी आगे की शॉपिंग रोक दी.
चालीस रुपये फूँक कर भी हमारा न तो पेट भरा था और न ही हमारा मन.
एक घण्टे में ही हम दोनों वापस घर आ गए.
मम्मी-पापा ने हमको इतने जल्दी घर वापस आते देखकर कुछ कहा तो नहीं पर दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने ज़रूर लगे.
हमारा मन तो फ़्यूज़ बल्ब जैसा हो गया था.
हम अगर कवि होते तो इस मौके पर कोई दर्द भरा गीत ज़रूर लिख डालते.
सन्तों ने कहा है -
‘ जब आवै सन्तोस धन, सब धन धूरि समान’
हमने भी अपने-अपने मन को मार कर इस संतोष धन को अपना लिया. हम अपने मन को कुछ इस तरह समझाया करते थे –
‘ गाँधीजी चाकलेट नहीं खाते थे फिर भी राष्ट्रपिता बन गए.
लताजी आइसक्रीम नहीं खातीं फिर भी स्वर-कोकिला कहलाती हैं.
पोटैटो चिप्स खाने से बच्चे मोटे हो जाते हैं.
नैपोलियन को गोलगप्पों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी फिर भी वो इतना बड़ा एम्परर बन गया.
घर के बने सादे और पौष्टिक भोजन के सामने चाकलेट, वैफ़र्स, आइसक्रीम, पिज़्ज़ा, मिठाई, चाट, पकौड़े सब तुच्छ हैं.’
हमको तो अब बाज़ार में नाहक घूमना भी बेवकूफ़ी लगने लगी थी –
‘ विण्डो शॉपिंग करना कहाँ की अक्लमन्दी है?
इससे तो अच्छा है कि हम मदर नेचर की ब्यूटी का आनन्द लें.
अल्मोड़ा कैन्टुनमेन्ट की ठन्डी और एकान्त सड़क पर घूमने का सुख लूटें, साथ में अपनी सेहत भी बनाएँ और छुट्टियों में पापा के साथ डोली डांडा के मन्दिर तक का लाँग वाक करके धर्म-लाभ करें.
अल्मोड़ा से बाहर जाने पर कोई हिस्टारिकल प्लेस देखें या किसी चिल्ड्रेन्स पार्क में घूमें.’
हम दोनों बहनों को मिले इस नए ज्ञान से मम्मी-पापा इम्प्रैस्ड होने के बजाय कभी-कभी तो ही ही करके हँस देते थे तो कभी हमारी भावनाओं को चोट न पहुँचाने का ख़याल करके सिर्फ़ मुस्कुरा देते थे.
हमने कन्जूसी अपनाते हुए अपनी जमा-पूँजी में अच्छी-ख़ासी बढ़ोत्तरी कर ली थी पर मम्मी के आने वाले बर्थ-डे ने हमारी रातों की नींद उड़ा दी थी.
मम्मी के बर्थ-डे के आठ दिन बाद ही पापा का बर्थ-डे भी आता है. पॉकेटमनी पाने वाले ज़िम्मेदार बच्चों को अपने मम्मी-पापा के बर्थ-डे पर अच्छे-अच्छे तोहफ़े तो देने ही चाहिए थे.
रागिनी ने मुझसे पूछा –
‘ दीदी ! मम्मी के मेकअप बॉक्स और पापा के लिए पार्कर का पैन सैट कैसा रहेगा?’
मैंने जवाब दिया –
‘ इसमें तो कमसे कम तीन-चार सौ रुपये का ख़र्चा जाएगा.
बी प्रैक्टिकल रागू !
मम्मी-पापा के लिए हमारा प्यार क्या गिफ़्ट्स की कीमतों से नापा जाएगा?
मम्मी को एक अच्छी सी लिपिस्टिक और पापा को एक अच्छा सा बाल पेन देकर भी अपना प्यार जताया जा सकता है.’
मम्मी अपनी लिपिस्टिक पाकर और पापा अपना बाल पेन का सैट पाकर हमसे बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने रिटर्न गिफ़्ट्स में हमको एक-एक वीडियो गेम देकर हमारी बड़ी पुरानी हसरत पूरी कर दी.
पर मम्मी-पापा के लिए हम बच्चों के जन्मदिनों पर प्रैक्टिकल होने की कोई ज़रूरत नहीं थी.
रागिनी का जन्मदिन पापा के जन्मदिन के दो दिन बाद ही पड़ता है. उसने अपने फ़रमाइशी आइटमों की एक लम्बी लिस्ट पापा को थमा दी.
पॉकेटमनी लेते हुए हमको दो साल बीत गए हैं.
एनुअल इन्क्रीमेंट्स और इन्फ़्लेशन का हिसाब करके हमारा पॉकेटमनी अब एक सौ चालीस रुपया कर दिया गया है.
पर हमारी परचेजि़ंग पावर ज्यों की त्यों है बल्कि कहें तो पहले से थोड़ी कम ही हुई है.
ऊपर से बाज़ार में बच्चों को लुभाने वाले नए-नए हाइटैक गैजेट्स और आ गए हैं जिनकी कि कीमत रुपयों में नहीं बल्कि डालर्स और पोंड में आँकना ज़्यादा आसान पड़ता है.
हर जगह हमारा संतोष धन वाला नुस्खा भी काम नहीं आता है.
आखि़र दिल तो दिल ही है कभी-कभी मँहगी चीज़ों पर भी आ जाता है. अब हमने अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए नए तरीके अपना लिए हैं.
महीने के आखि़री दिनों में मम्मी-पापा को हम अपनी बचत में से ज़बर्दस्ती उधार देते हैं और अगले महीने के शुरू में ही उस पर पापा से मूलधन समेत भारी ब्याज वसूल कर लेते हैं.
बड़े-बूढ़े सिर्फ़ आशीर्वाद देने के लिए नहीं होते हैं.
उन्हें हम बच्चों को गिफ़्ट्स वगैरा भी देनी चाहिए, आखि़र हम उनकी इतनी इज़्ज़त जो करते हैं.
अम्मा, बाबा, नानाजी, नानी कम से कम हमारी विदाई पर ऐसे नियमों का पालन ज़रूर करते हैं पर और बड़े इन मामलों में ज़्यादा पर्टीकुलर नहीं हैं.
हम तोहफ़ों के कम्पैरिज़न में नकद-नारायण को ज़्यादा इम्पौर्टेन्स देते हैं पर ये बात हम मम्मी-पापा और अम्मा-बाबा के अलावा किसी से नहीं कह पाते.
पापा की पॉलिसी है कि स्कूल में या उससे बाहर भी हम कोई प्राइज़ जीत कर लाते हैं तो वो अलग से हमको बोनस के रूप में कुछ न कुछ कैश देते हैं पर हमारे प्राइज़ेज़ जीतने की रफ़्तार उतनी नहीं है जितनी कि हमारे मन चलने की.
आजकल हम रेग्युलरली न्यूज़ पेपर पढ़ने लगे हैं और टीवी न्यूज़ भी देखने लगे हैं, ख़ास कर जनवरी और जुलाई के महीनों में हम ज़्यादा अलर्ट हो जाते हैं.
पापा के डी0 ए0 बढ़ने की ख़बर सबसे पहले हमको ही मिलती है.
पापा के एनुअल इन्क्रीमेंट की डेट तो हमको याद ही है.
मम्मी की फ़ैलोशिप का इनस्टॉलमेंट कब आ रहा है, इसकी जानकारी भी हमको रहती है.
सचमुच ! अपने मम्मी-पापा की तरक्की के लिए जितनी हम दुआएँ करते हैं, उतनी शायद ही कोई बच्चा अपने पैरेन्ट्स के लिए करता होगा.
साफ़ बात है कि इन सब बातों का हमारे पॉकेटमनी से और एक्स्ट्रा बोनस से सीधा सम्बन्ध है.
हमारी हरकतों से लोगों को लगता होगा कि हम पॉकेटमनी के मामले में थोड़े लालची हैं पर ऐसा बिलकुल भी नहीं है.
हमको गवर्नमेंट से शिकायत है कि उसने बच्चों के बैंक अकाउंट्स पर गार्जियन्स का पहरा बिठा रखा है और हमारे लिए एटीएम कार्ड्स की फ़ैसिलिटी भी प्रोवाइड नहीं की है.
हमको उम्मीद है कि जल्द ही गवर्नमेंट इन बच्चा-विरोधी कानूनों में बदलाव लाएगी.
हम भगवान से दुआ करते हैं कि मम्मी-पापा की डिक्शनरी में कम से कम हमारे लिए ‘ ना ’ शब्द गायब हो जाए और हमारे पॉकेटमनी का साइज़ वो इतना बड़ा कर दे कि उसे रखने के लिए पॉकेट्स के बजाए सूटकेसेज़ की ज़रूरत पड़े.