रविवार, 28 फ़रवरी 2021

स्वयं सिद्धा

 

बेटी हूँ पत्नी हूँ माँ हूँ



यह मेरी पहचान नहीं है



जीवन भर छाया बन रहना



यह मेरा अरमान नहीं है



उड़ने की है कब से चाहत



पंख कटे संज्ञान नहीं है



पिंजड़े में रह कर क्या जीना  



आंसू हैं मुस्कान नहीं है



जगदगुरु कहते हो ख़ुद को



पर इसका भी ज्ञान नहीं है



किसी अहल्या जैसी बेबस

 

अब उसकी संतान नहीं है

 

कृपा-दृष्टि को क्यूँ कर तरसूँ

 

भिक्षा में सम्मान नहीं है



जब तक ख़ुद को सिद्ध न कर लूं



पल भर का विश्राम नहीं है

बुधवार, 24 फ़रवरी 2021

अजंता

 (आज से लगभग 15 साल पहले मैंने यह आलेख इतिहास के विद्यार्थियों के लाभार्थ लिखा था. अवकाश-प्राप्ति के बाद विद्यार्थियों से तो मेरा संपर्क पूरी तरह टूट गया है इसलिए फ़ेसबुक पर और अपने ब्लॉग पर ही मैं यदाकदा क्लास ले लिया करता हूँ. अपने मित्रों से मेरा अनुरोध है कि वो इस जानकारी को बच्चों के साथ ज़रूर साझा करें.)

अजंता -
1
मानव सभ्यता के प्रारम्भिक काल में मनुष्य हज़ारों साल तक प्राकृतिक गुफ़ाओं में रहता रहा है. अपने निवास को सजाने-सँवारने की उसकी स्वाभाविक अभिरुचि ने इन गुफ़ाओं में भाँति-भाँति के चित्र बनाने के लिए प्रेरित किया. आगे चलकर ऐसी गुफ़ाओं में उसने मूर्तियाँ भी बनाईं. जब मनुष्य ने छैनी और हथौड़ी का प्रयोग करके पत्थर काटना और तराशना सीख लिया तो उसने पहाड़ों और चट्टानों को काटकर कृत्रिम गुफ़ाएं बनाईं. इन गुफ़ाओं को भी उसने चित्रों और मूर्तियों से सजाया और सँवारा. गुफ़ाओं के अन्दर उसने बड़े-बड़े भवन और पूजा-स्थल भी बनाए. संसार के अनेक देशों में ऐसी गुफ़ाएं हैं.
भारत में ऐसी प्राकृतिक और मानव निर्मित गुफ़ाओं की संख्या हज़ारों में है जहाँ कि मनुष्य ने अपनी कला से उन्हें सजाया और सँवारा है.
भारत में मानव-निर्मित गुफ़ाओं का निर्माण ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में प्रारम्भ हुआ था.
मौर्य काल में अशोक और उसके उत्तराधिकारियों के संरक्षण में बिहार की बराबर और नागार्जुनी पहाडि़यों में कृत्रिम गुफ़ाएं खोदने का कार्य प्रारम्भ हुआ. ये गुफ़ाएं बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए बनाई गई थीं.
जैन और बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ गुफ़ाएं बनाने की प्रथा का भी प्रसार होता चला गया.
ईसा पूर्व की दूसरी और पहली शताब्दी में अर्थात् शुंग-काण्व काल में उड़ीसा की खण्डगिरि और उदयगिरि पहाडि़यों में जैन साधुओं के निवास के लिए पैंतीस गुफ़ाएं खोदी गईं.
इसी काल में और इसके बाद की कुछ शताब्दियों में महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में भी बौद्ध भिक्षुओं के रहने और पूजा करने के लिए बड़े पैमाने पर गुफ़ाएं खोदी गईं.
इन मानव-निर्मित गुफ़ाओं के निर्माण को हम शैल-स्थापत्य कला (चट्टानों को काट-काट कर गुफ़ा, मन्दिर आदि बनाने की कला) के अन्तर्गत लेते हैं.
महाराष्ट्र में भाजा, अजंता, पितलखोरा, नासिक, कान्हेरी, एलीफ़ैण्टा, एलोरा, कोलाबा तथा अन्य क्षेत्रों में ऐसी सैकड़ों गुफ़ाएं खोदी गईं.
इन मानव-निर्मित गुफ़ाओं में कलात्मक दृष्टि से अजंता की गुफ़ाएं अद्वितीय हैं.
महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित अजंता की गुफ़ाएं औरंगाबाद नगर से 106 किलोमीटर तथा जलगाँव रेल्वे स्टेशन से 61 किलोमीटर की दूरी पर हैं. ये गुफ़ाएं दक्खिनी पठार को ख़ानदेश के मैदान से पृथक करने वाली पर्वतमाला को काटकर बनाई गईं हैं.
अजंता समुद्रतल से 460 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और इसकी गुफ़ाएं 76 मीटर ऊँची, सीधी और खड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई हैं. ये गुफ़ाएं अर्धवृत्ताकार कगार में खोदी गई हैं. चट्टान के सामने बाघोरा नामक नदी बहती है जिसके नाम पर इस क्षेत्र को प्राचीन काल में व्याघ्रपुर कहा जाता था और इन गुफ़ाओं की खोज से पहले इन गुफ़ाओं को बाघों का घर कहा जाता था.
अजंता का एक प्राचीन नाम अजितजंय भी था. अजितजंय नाम से ही ‘अजंता’ शब्द निकला है.
अजंता की गुफ़ाएं ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर सातवीं शताब्दी के बीच में बनाई गई हैं.
हर्षवर्धन के काल में अर्थात सातवीं शताब्दी में भारत-प्रवास के लिए आए हुए चीनी यात्री ह्नेनसांग ने इन गुफ़ाओं का उल्लेख किया है. बौद्ध धर्म की अवनति के बाद इन गुफ़ाओं का सार्वजनिक महत्व कम होता चला गया और धीरे-धीरे इनके बारे में लोगों की जानकारी कम होती चली गई.
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक यह क्षेत्र पूरी तरह से जंगली क्षेत्र बन चुका था. यहाँ शेर आदि जंगली पशु खुले-आम घूमते थे और स्थानीय गरडि़ए कभी-कभी विश्राम करने के लिए यहाँ की गुफ़ाओं में ठहर जाते थे.
28 अप्रैल, सन् 1819 को 28 वीं घुड़सवार सेना के अधिकारी जॉन स्मिथ ने इन गुफ़ाओं की फिर से खोज की.
सन् 1829 में ‘जर्नल ऑफ़ रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ में जे. ई. एलेक्ज़ेण्डर के एक लेख ने इन गुफ़ाओं की कलात्मक श्रेष्ठता को दुनिया के सामने रक्खा.
जेम्स फ़र्ग्यूसन ने सन् 1843 में इन गुफ़ाओं के ऊपर एक दीर्घ निबन्ध लिखा.
आज अजंता की गुफ़ाएं विश्व भर में अपनी कला के लिए प्रसिद्ध हैं.
विश्व की सांस्कृतिक धरोहरों में अजंता का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है.
2
अजंता की सभी तीसों गुफ़ाएं स्थापत्य, शिल्प तथा चित्रकला की दृष्टि से बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं.
इन गुफ़ाओं में चैत्य (पूजा-स्थल) तथा विहार (निवास) दोनों हैं.
इन गुफ़ाओं में शैल-स्थापत्य कला और मूर्तिकला का उत्कर्ष देखने को मिलता है परन्तु अजंता की मुख्य ख्याति उसके भित्ति चित्रों (दीवालों पर बने चित्र) के कारण है.
अजंता के भित्ति चित्रों में विषयों की इतनी अधिक विविधता है कि लगता है चित्रकारों की दृष्टि से जीवन का कोई भी पहलू छूटा ही नहीं है.
इन चित्रों में सबसे अधिक चित्र जातक कथाओं (भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्त करने से पूर्व के जीवन की तथा उनके पूर्व जीवन की घटनाओं पर आधारित 547 कथाओं का संग्रह) पर आधारित हैं.
अजंता में भगवान बुद्ध के जीवन चरित्र और उनके पूर्व जन्मों से सम्बद्ध घटनाओं को तो चित्रित किया ही गया है साथ ही साथ इनमें शासक वर्ग और जन सामान्य के जीवन से जुड़ी हुई घटनाओं का चित्रण भी किया गया है.
किसानों, तपस्वियों, भिक्षुकों, पशु-पक्षियों आदि का चित्रण अजंता की कला को धर्म निर्पेक्ष स्वरूप प्रदान करता है.
इन चित्रों में चित्रकारों ने पात्रों की शारीरिक रचना, उनकी वेशभूषा पर विशेष ध्यान दिया है पर इन चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता पात्रों के मनोभावों का सजीव चित्रण है.
इन गुफ़ाओं में से 6 का सम्बन्ध बौद्ध धर्म के हीनयान सम्प्रदाय से है और शेष का बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय से (हीनयान तथा महायान सम्प्रदाय बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं जिनमें आचार-विचार की दृष्टि से थोड़ा अन्तर है. इनमें हीनयान सम्प्रदाय पुराना है पर लोकप्रियता महायान सम्प्रदाय को अधिक मिली है).
अजंता में कुल तीस गुफ़ाएं मिली हैं जिनमें कि 29 गुफ़ाओं में आसानी से आया-जाया जा सकता है.
हीनयान सम्प्रदाय से सम्बन्धित विहारों में पत्थरों को काटकर शैया बनाई गई हैं जबकि महायान सम्प्रदाय से सम्बन्धित विहारों में ऐसा नहीं है.
गुफ़ा-1 कलात्मक दृष्टि से अत्यन्त उत्कृष्ट है.
इस गुफ़ा का सभा-मण्डप साठ फ़ुट लम्बा और साठ फ़ुट चौड़ा है.
इस मण्डप में बीस स्तम्भ हैं और चार कुड्य स्तम्भ हैं.
इस गुफ़ा की छत पर पशु, फल और पुष्प का चित्रण किया गया है.
इस गुफ़ा में बोधिसत्व (महात्मा बुद्ध के बोधज्ञान से पूर्व का तथा उनके पूर्वजन्मों का जीवन) पद्मपाणि का चित्र है जो कि अजंता का सबसे प्रसिद्ध चित्र है.
इसी गुफ़ा के भित्ति चित्रों में शिवि जातक कथा का भी चित्रण है.
राजा शिवि ने बाज से कबूतर के प्राण बचाने के लिए अपने शरीर का माँस दिया था. इस कथा को चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है.
इसी गुफ़ा में गौतम बुद्ध के सौतेले भाई नंद की दीक्षा को भी चित्रित किया गया है. इसके अतिरिक्त अन्य जातक कथाओं को भी चित्रित किया गया है.
गुफ़ा-2 के गर्भ गृह में धर्म-चक्र प्रवर्तक बुद्ध का चित्र अत्यन्त मनोहर है. इसी गुफ़ा में एक सुन्दरी का चित्र भी बड़ा आकर्षक है.
गुफ़ा-4 का विहार अपूर्ण है किन्तु यह अजंता का सबसे बड़ा विहार है. इसका सभामण्डप 87 फ़ुट लम्बा और 87 फ़ुट चौड़ा है. इस गुफ़ा में एक संस्कृत अभिलेख मिला है.
गुफ़ा-9 तथा गुफ़ा-10 में शुंग और सातवाहन काल के चित्र हैं. गुफ़ा-9 में सात फनों वाले नागराजा का एक चित्र है.
गुफ़ा-10 में स्त्रियों से घिरे एक राजा का चित्रण है. इसी गुफ़ा में हाथी पर सवार एक राजा का बड़ा सुन्दर चित्र है.
सोलहवीं और सत्रहवीं गुफ़ाएं गुप्तकाल की हैं.
गुफ़ा-16 का मरणासन्न राजकुमारी का चित्र चित्रकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरणों में गिना जाता है.
कला मर्मज्ञ ग्रिफि़थ ने इसे कलात्मक इतिहास की सर्वश्रेष्ठ कृति माना है.
इसी गुफ़ा में सुतसोम की कथा का चित्रण है.
गुफ़ा-17 के बरामदे में संसार-चक्र का चित्रण है. इसमें दो हाथ संसार रूपी विशाल चक्र को थामे हुए दिखाए गए हैं. इस चित्र में पशु-पक्षी और मनुष्यों का चित्रण तो है ही साथ में मानव-जीवन के हर पहलू का भी चित्रण है. बाज़ार का दृश्य, उद्यान गोष्ठी, किसानों की बस्ती, राजसी जीवन के दृश्य, प्रेमी युगल, ध्यानस्थ ऋषि का चित्रण आदि इस चित्र की विषय-सामग्री हैं.
इसी गुफ़ा में यशोधरा द्वारा अपने पुत्र राहुल को भगवान बुद्ध को सौंपने का बड़ा करुण दृश्य प्रस्तुत किया गया है.
एक चित्र भगवान बुद्ध और उनके शिष्य आनन्द का भी है.
इस गुफ़ा में जातक कथाओं पर आधारित चित्रों का बाहुल्य है.
विश्वंभर जातक, षडदन्त जातक, महाकपि जातक, हरित जातक, हंस जातक, सुतसोम जातक, शरभ जातक, मातृ पोषक जातक, मत्स्य जातक, श्याम जातक और महिष जातक का चित्रण इसी गुफ़ा में किया गया है.
इसी गुफ़ा में एक प्रसाधिका का चित्र है जिसमें दो सेविकाओं और एक कुबड़े सेवक के बीच में त्रिभंग मुद्रा में झीने परिधान में लिपटी, आभूषणों से युक्त सुन्दरी युवती अपने बाएं हाथ में एक गोलाकार दर्पण लेकर उसमें अपना मुख निहार रही है.
इस चित्र को अजंता की सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों में गिना जाता है.
3
अजंता के चित्रकारों ने चित्राकंन करने के लिए पहले दीवार को छेनी से काट-काट कर समतल किया है फिर मिट्टी, वनस्पति के रेशे, धान के छिलके, घास, रेत, पत्थरों के चूरे, गोंद, सरेस और चूने के लेप से दीवाल पर पलस्तर किया है. इसके बाद ही चित्रांकन सम्भव हो पाया है.
इन चित्रों में चित्रकार ने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया है,सफ़ेद रंग के लिए चूना और जिप्सम, काले रंग के लिए काजल, लाल के लिए गेरू, पीले रंग के लिए पीली मिट्टी, हरे रंग के ग्लेकोनाइट का प्रयोग किया गया है.
अजंता के चित्रकारों ने पुरस्कार के लालच में या नाम कमाने के लिए इन चित्रों की रचना नहीं की है. उन्होंने तो अपने अन्दर के कलाकार को कल्पना की ऊँची उड़ान देने के लिए और भगवान बुद्ध के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए इनकी रचना की है.
अजंता की गुफ़ाओं में मूर्तिकला की छटा भी दिखाई पड़ती है.
भगवान बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित अनेक मूर्तियां यहाँ मिली हैं.
ध्यानस्थ बुद्ध की मूर्तियां,चैत्यों के गर्भ गृहों (गर्भ-गृह - मन्दिर में मुख्य देवी-देवताओं को प्रतिष्ठित किए जाने वाला स्थान) में स्थापित की गई हैं.
बोधिसत्व की मूर्तियों का यहाँ बाहुल्य है.
इनमें बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्तियां सबसे अधिक हैं.
नाग, यक्ष, देवी-देवता, गंधर्व, किन्नर आदि की मूर्तियां भी प्रचुर मात्रा में मिलती हैं.
अजंता में दीवाल को उकेर कर भी शिल्पकार ने अपनी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन किया है.
आसनस्थ बुद्ध, सिद्धार्थ के जीवन के प्रसंग, एक शीर्ष और चार काया वाला हिरण, बुद्ध का महापरिनिर्वाण (भगवान बुद्ध की मृत्यु), जातक कथाएं, बुद्ध, राहुल और यशोधरा आदि इनकी विषयवस्तु हैं.
अजंता में अनेक अभिलेख भी मिलते हैं जो प्रायः शैल-गृहों के निर्माण और दान-कर्ताओं की सूचना देते हैं. कुछ अभिलेख चित्रों के विषयों के बारे में हैं. इन में कुछ चित्रित अभिलेख हैं और कुछ दीवालों पर खोदे गए हैं.
गुफ़ा-2 के सभी अभिलेख चित्रित हैं, इनकी भाषा संस्कृत और लिपि ब्राह्मी है, केवल एक अभिलेख कन्नड़ भाषा में है.
गुफ़ा-4 में बुद्ध की प्रतिमा पर विहार के दान-कर्ता का नाम उत्कीर्ण है.
गु़फ़ा-6, 7, 10, 11, 12, 16, 17, 20, 21, 22, 26 और 27 में भी चित्रित और कहीं-कहीं खुदे हुए अभिलेख मिलते हैं.
इन अभिलेखों से तत्कालीन इतिहास की जानकारी मिलती है.
अजंता की गुफ़ाएं भारतीय कला के चरमोत्कर्ष को प्रदर्शित करती हैं. आज विश्व के सभी कला-समीक्षक अजंता की कला की प्रशंसा करते हैं. पाश्चात्य देशों के निवासी भारत को असभ्य और बर्बर कहते थे किन्तु अजंता की कला ने उनकी आँखें खोल दीं. सारी दुनिया में उन्हें अजंता की इन गुफ़ाओं के गुमनाम चित्रकारों के जोड़ के चित्रकार नहीं मिले.
अजंता की कला ने हम भारतीयों को अपनी संस्कृति और कला पर गर्व करना और सर उठाकर जीना सिखाया है.
हमको तन-मन-धन से अपनी इस सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करनी चाहिए.

रविवार, 21 फ़रवरी 2021

अमीर ख़ुसरो

 अमीर खुसरो उन महान विभूतियों में से थे जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक एकता के लिए आजीवन सार्थक प्रयास किए थे। उन्होंने राष्ट्रीय और सामाजिक एकता का स्वप्न देखा था । उनकी दृष्टि में वो पहले हिन्दुस्तानी थे बाद में कुछ और। अमीर खुसरो का वास्तविक नाम अबुल हसन था । उनका जन्म उत्तर प्रदेश में एटा जिले के एक गाँव पटियाली में सन् 1254 में हुआ था । उनके पिता सैफ़ुद्दीन लचिन मध्य एशिया के रहने वाले उन तुर्कों में से थे जिन्होंने चगेज़ खाँ के खदेड़े जाने पर भारत में शरण ली थी । उनके नाना इमादुलमुल्क सुल्तान बलबन के आरिज़े-मुमालिक (युद्धमन्त्री) थे ।

अमीर खुसरो के जन्म के कुछ समय बाद ही उनके पिता उन्हें एक सूफ़ी फ़कीर का आशीर्वाद दिलाने के लिए उनके पास ले गए । इस नन्हें शिशु को देखकर उन फ़कीर ने यह भविष्यवाणी की कि यह बच्चा आगे चलकर महान साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त करेगा ।
अमीर खुसरो बचपन से ही वह कविता करने लगे थे । वह बलबन के बड़े पुत्र सुल्तान मुहम्मद की सेवा में मुल्तान में उसके दरबार में रहे । इसी दरबार में एक और मशहूर शायर अमीर हसन उनके साथ रहे ।
सुल्तान कैकुबाद के दरबारी साहित्यकार के रूप में खुसरो को पर्याप्त आदर-सम्मान मिला । यहीं उन्होंने अपनी पहली मसनवी ”किरानुस सदाई“ लिखी ।
कैकुबाद के पतन के बाद वह सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी के दरबार में कुरान के परिचारक के पद पर नियुक्त हुए । जलालुद्दीन खिलजी की विजयों पर आधारित उनका फ़ारसी ग्रंथ ”मिफ़तउल फ़ुतूह“ इसी काल में लिखा गया । जलालुद्दीन की हत्या के बाद वह सुल्तान अलाउद्दी खिलजी के दरबार में रहे । अमीर खुसरो की अधिकांश रचनाएं इसी काल की हैं । ”मजनू लैला“, ”आइन-ए-सिकंदरी“, ”खजै़नुल फ़ुतूह“ और ”देवलरानी खि़ज्र खाँ“ ग्रंथ इसी काल में लिखे गए है ।
खिलजियों के पतन के बाद अमीर खुसरो सुल्तान गि़यासुद्दीन तुगलक के दरबार में रहे और उसके सम्मान में उन्होंने अपना अंतिम ग्रंथ ”तुगलकनामा“ लिखा जोकि एक ऐतिहासिक ग्रंथ है ।
फ़ारसी के शायर के रूप में अमीर खुसरो की ख्याति देश-विदेश में फैल गई । प्रसिद्ध इतिहासकार और अमीर खुसरो का मित्र जि़याउद्दीन बरनी अपने ऐतिहासिक ग्रंथ ”तारीख़-ए-फि़रोज़शाही“ में उन्हें अपने काल का सर्वश्रेष्ठ शायर कहता है । ग़ज़ल, मसनवी, कसीदा और रुबाई आदि सभी में अमीर खुसरो को महारत हासिल थी । उनके द्वारा लिखे गए अशआर की संख्या पाँच लाख तक आँकी जाती है ।
अमीर खुसरो ने फ़ारसी गद्य को भी समृद्ध किया । ”इजाज़-ए-खुसरवी“ उनकी गद्य रचना है । अमीर खुसरो ने फ़ारसी ग्रंथों का साहित्यिक और ऐतिहासिक महत्व है । उनके ग्रंथों का अध्ययन करके हम तेरहवीं और चौदहवीं शताब्दी के राजनीतिक, सैनिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की प्रामाणिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं परन्तु उनका सबसे बड़ा योगदान सांस्कृतिक क्षेत्र में था ।
अमीर खुसरो भारतीय संस्कृति के अनन्य भक्त थे । उन्हें अपनी भारतीयता पर गर्व था । उन्हें अपनी ”तोतए हिन्द“ उपाधि पर बड़ा गर्व था । उन्होंने अपने भारत वर्णन में अपने मुल्क की प्राकृतिक शोभा, उसके तीज-त्यौहार, उसके खान-पान, उसकी विभिन्न-विभिन्न क्षेत्रों में पहनी जाने वाली वेशभूषाएं, उसके उद्योग धन्धे और अलग-अलग अवसरों पर गाए जाने वाले गीतों की विस्तार से चर्चा की है ।
काश्मीर के विषय में उनका कहा गया यह फ़ारसी शेर बहुत प्रसिद्ध है-
”अगर फ़िरदौस बररूए ज़मीनस्त ।
हमीनस्तो, हमीनस्तो, हमीनस्त ।।“
(अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है ।
तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है )
अमीर खुसरो चिश्ती सिलसिले के प्रसिद्ध सूफ़ी सन्त शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य थे। औलिया साहब की दृष्टि में हिन्दू और मुसलमान, अमीर और गरीब सब एक बराबर थे । उनका जीवन, करुणा, प्रेम, त्याग और भातृत्व का उदाहरण था । उनके सम्पर्क में आने से अमीर खुसरो की विचारधारा समन्वयात्मक और मानवतावादी हो गई थी । सूफ़ी सन्तों को राज दरबार और राज परिवार से ज़्यादा फि़क्र आम जनता की हुआ करती थी। वह जनता से उन्हीं की भाषा में बात किया करते थे । अमीर खुसरो भी आम लोगों में घुलमिल कर रहना चाहते थे और अपने काव्य में उनके जीवन, उनके विचारों को उतारना चाहते थे । इस उद्येश्य से उन्होंने हिन्दवी (यह खड़ी बोली की हिन्दी और उर्दू भाषा का प्रारम्भिक रूप है) में और ब्रजभाषा में अनेक कविताएं लिखी हैं । आज उनकी ख्याति का मुख्य आधार हिन्दवी में कही गई उनकी सूफ़ी भक्तिधारा में डूबी हुई धार्मिक कव्वालियां और आम जनता के मनोरंजन के लिए हिन्दवी में ही लिखी गई मुकरियां, पहेलियां और गीत हैं ।
अमीर खुसरो आशुकवि थे अर्थात् किसी बताए गए विषय पर वह तुरन्त कविता कर सकते थे । इसके बारे में उनका एक किस्सा बड़ा मशहूर है। एक बार वह कहीं जा रहे थे । रास्ते में उन्हें ज़ोर की प्यास लगी । उन्होंने देखा कि कुछ दूर पर चार ग्रामीण स्त्रियां कुएं से पानी भर रही हैं । अमीर खुसरो ने उनसे पीने के लिए पानी माँगा तो उन्होंने उनसे उनका पेशा पूछा । यह पता लगने पर कि वह कवि हैं, उन चारो स्त्रियों ने उन्हें पानी पिलाने से पहले अपनी-अपनी पसंद के विषय पर कविता सुनाने के लिए कहा । पहली स्त्री ने उन्हें कविता करने के लिए विषय दिया- खीर, दूसरी ने चरखा, तीसरी ने कुत्ता और चौथी ने ढोल । अब चार विषयों पर कविताएं सुनाते-सुनाते तो अमीर खुसरो प्यास के मारे मर ही जाते । उन्होंने चारो विषयों पर एक ही कविता बनाकर उन्हें सुना दी-
”बड़े जतन से खीर बनाई, चरखा दिया जलाय ।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजाय ।।
ला पानी पिला !“
अमीर खुसरो की हिन्दवी अर्थात् खड़ी बोली में लिखी पहेलियां बहुत प्रसिद्ध हैं और आज भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है । आकाश पर लिखी गई पहेली बहुत प्रसिद्ध है-
”एक थाल मोती से भरा, सब के सर पर औंधा धरा ।
चारो ओर वह थाली फिरे, मोती उसका एक न गिरे ।।“
दिया-बाती पर कही गई उनकी पहेली बहुत सुन्दर है-
”एक नार ने अचरज किया, साँप मार पिंजड़े में दिया ।
जो-जो साँप ताल को खाए, सूखे ताल साँप मर जाए ।।“
( यहाँ बाती को साँप और दिए में रक्खे तेल को ताल कहा गया है )
दर्पण पर कही गई एक पंक्ति की पहेली भी सुन्दर है-
”अरथ जो इसका बूझेगा, मुँह देखी तो सूझेगा ।“
घर में पर्दा करने के लिए दरवाज़े पर टाँगी जाने वाली चिलमन पर कही गई उनकी यह पहेली भी बड़ी प्रसिद्ध़ है-
”चालीस मन की नार रखावै, सूखी जैसे तीली ।
कहने को परदे की बीबी, पर है वो रंग रंगीली ।।“
अपनी कव्वालियों में अमीर खुसरो ने सूफ़ी भक्ति धारा को जन-जन तक पहुँचा दिया । इन कव्वालियों को सुनकर शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया भाव-विभोर हो जाते थे । शेख़ साहब के दरबार में उन्होंने सैकड़ों कव्वालियां लिखीं । इन कव्वलियों में भारतीय संस्कृति की अमिट छाप है, ये किसी धर्म के बन्धन में बँधी नहीं हैं । इन में एक ओर हज़रत मोहम्मद का गुणगान है तो दूसरी ओर राधा-कृष्ण की प्रेम लीला का वर्णन है । इनमें एक ओर भारतीय लोकगीतों की मधुरता और सादगी है तो दूसरी ओर इनमें ईरानी संगीत का झरना बहता है । -
”छाप तिलक सब छीनी, तोसे नैना मिलाय के ।“
और
”बहुत कठिन है डगर पनघट की ।
कैसे मैं भर लाऊँ, मधुवा से मटकी ।।“
तथा
”काहे को ब्याही बिदेस रे, लखि बाबुल मोरे ।“
उनकी प्रसिद्ध कव्वालियां हैं । ये कव्वालियां वैसे तो सांसारिक प्रेम में रंगी दिखाई देती हैं पर वास्तव में इनका उद्येश्य भाँति-भाँति प्रकार से ईश्वर का गुणगान करना होता है । इनमें आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के रूप में दिखाया जाता है । अमीर खुसरो की कव्वालियां भारतीय संस्कृति की धरोहर हैं । उनके कलाम को हिन्दू और मुसलमान, सिक्ख आदि सभी झूम-झूम कर सुनते हैं।
अमीर खुसरो महान संगीतकार भी थे । कहा जाता है कि उन्होंने मृदंग और पखावज वाद्यों को मिलाकर तबला बनाया था । सितार का आविष्कारक भी अमीर खुसरो को ही बताया जाता है । उन्होंने सैकड़ों राग-रागनियों का भी आविष्कार किया था । हिन्दुस्तानी संगीत के वह अमर गायक हैं ।
अमीर खुसरो की मृत्यु सन् 1325 में हुआ था । उनकी मृत्यु की कथा उनकी अनन्य गुरुभक्ति का उदाहरण है । शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया की मृत्यु के समय अमीर खुसरो उनके पास नहीं थे । जब उन्हें अपने पीर-ओ-मुर्शिद की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने यह दोहा पढ़कर अपने प्राण त्याग दिए-
”गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डाले केस ।
चल खुसरो घर आपने, सांझ भई चहुँ देस ।।“
अमीर खुसरो ने समन्वयात्मक हिन्दुस्तानी संस्कृति के विकास में अमूल्य योगदान दिया । उन्होंने उर्दू और राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रारम्भिक रूप को सजाया और सँवारा । उन्होंने उत्तर भारत के जन-साहित्य को समृद्ध किया और हिन्दुस्तानी संगीत को एक नई दिशा दी पर भारतीय इतिहास को उनकी सबसे बड़ी देन यह थी कि उन्होंने धर्म, जाति, क्षेत्र, धन-दौलत की सभी दीवारों को तोड़कर भारतीयों को आपस में हिलमिल कर रहने का सन्देश दिया और उन्हें अपने भारत पर तथा अपनी भारतीयता पर गर्व करना सिखाया ।





Comments

बुधवार, 17 फ़रवरी 2021

कांकर-पाथर जोरि कै

 निदा फ़ाज़ली का यह मक़बूल शेर, मन्दिर-मस्जिद से कहीं ज़्यादा तवज्जो इंसानियत को देता है -

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए


भव्य गगनचुम्बी मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारे आदि देख कर मुझे श्रद्धा कम और कोफ़्त ज़्यादा होती है.

ऐसे पूजा-स्थलों के निर्माण में भक्ति की शक्ति से अधिक धन-शक्ति का प्रयोग होता है.
इनके साथ किसी न किसी सम्राट, बादशाह, राजा, सेठ या ज़मींदार का नाम जुड़ा रहता है.
आम आदमी के लिए तो इन में प्रवेश करना तक वर्जित होता है और अगर जैसे-तैसे किसी को इनमें प्रवेश करने का अवसर मिल भी गया तो फिर जल्द ही उसे जानवर की तरह बाहर हांक दिया जाता है.
आजकल पूजा-स्थलों में ख़ासुल-ख़ास लोगों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था होती है.
पुराने ज़माने में शासकगण धार्मिक अनुष्ठानों के लिए और पूजा-स्थलों के निर्माण आदि के लिए अपनी प्रजा से अतिरिक्त कर लिया करते थे लेकिन क्या कभी किसी पूजा-स्थल में, किसी पाषाण-स्तम्भ पर, किसी ताम्र-पत्र पर अथवा किसी ऐतिहासिक ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि इसके निर्माण में कितना योगदान प्रजा की खून-पसीने की कमाई का था?
साहिर ने ताजमहल के लिए कहा है –
‘इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
--- मेरे महबूब कहीं और मिला कर मुझ से –----‘
मुझे साहिर से यह शिकायत है कि उन्होंने किसी भव्य रत्न-जटित मन्दिर या संगमरमर की बनी शानदार किसी मस्जिद को देख कर यह क्यों नहीं कहा –
‘इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर
हम ग़रीबों की इबादत का उड़ाया है मज़ाक़
--- मेरे भगवान कहीं और मिला कर मुझ से –-----’
1985 में मैं आबू के विश्वविख्यात दिलवाड़ा जैन मन्दिर देखने गया था. हमने अपने साथ एक गाइड किया. बातों-बातों में मैंने उस गाइड को बताया कि मैं कुमाऊँ विश्वविद्यालय में इतिहास का अध्यापक हूँ.
गाइड अब कुछ ज़्यादा ही उत्साह से और बारीक़ी के साथ मुझे हर मन्दिर की विशिष्ट कला के बारे में बताने लगा.
मुख्य-मन्दिर देख कर तो हमारी आँखे जुड़ा गईं . कैसे इतने ऊंचे दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में लाद-लाद कर संगमरमर लाया गया होगा, कैसे मंदिरों को बनाया गया होगा और फिर कैसे उनमें नक्काशी और जाली का काम किया गया होगा.
मुख्य मन्दिर से नीचे उतरते समय हमारा गाइड हमको एक छोटे से मन्दिर में ले गया. गाइड ने मुझ से कहा –
‘गुरु जी, इस मन्दिर को बहुत गौर से देखिए और मुझे बताइए कि इसमें आपको कुछ ख़ास लगा?’
मैंने बहुत गौर से मन्दिर का मुआयना किया.
छोटे आकार का यह मन्दिर संगमरमर के बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों से तैयार किया गया था.
कलात्मकता की दृष्टि से इसमें कुछ भी ख़ास नहीं था.
आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों की विश्वविख्यात कला का तो इसमें शतांश भी नहीं था.
मैंने गाइड से कहा –
‘भाई, मुझे यह मंदिर न तो भव्य लगा और न ही ख़ास सुन्दर.
अब तुम बताओ कि तुम मुझे यह मंदिर क्यों दिखाना चाह रहे थे?’
मेरे सवाल का जवाब देते हुए गाइड की आँखों में चमक आ गयी. उसने मुझे बताया –
‘यह छोटा सा मन्दिर मुख्य मन्दिर बनाने वाले कारीगरों-मज़दूरों ने मंदिरों के निर्माण से बचे हुए और फेंके हुए संगमरमर के टुकड़ों से बनाया था.
राजा से ज़मीन का एक टुकड़ा लेकर, उसकी अनुमति से, अपनी रातों की नींद हराम कर, मशालों की रौशनी में, बिना कोई मज़दूरी लिए हुए, उन्होंने भक्ति-भाव से इसे बनाया था.’
यह सब सुन कर श्रद्धा से मेरा सर झुक गया लेकिन उस मंदिर में विराजे भगवान के लिए कम और उस मंदिर को बनाने वाले उसके सच्चे भक्तों के लिए ज़्यादा.
आम तौर पर पूजा-स्थलों का निर्माण ऐसी जगहों पर ही ज़्यादा होता है जहाँ कि पहले से ही ऐसे दर्जनों भवन बने हुए होते हैं.
हम जैन मतावलंबी गुजरात के पल्लीताना में और मध्य प्रदेश के सोनागिरि में सैकड़ों की संख्या में मन्दिरों को देख कर आश्चर्य-चकित रह जाते हैं.
हर दस क़दम पर एक मन्दिर लेकिन अधिकतर टूटे-फूटे जीर्ण-शीर्ण ! कोई भक्त इनके जीर्णोद्धार की फ़िक्र नहीं करता बल्कि एक और मन्दिर का निर्माण करवा देता है.
इस भक्ति-प्रदर्शन में इन तथाकथित भक्तों की फूहड़ प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है.
मेरे प्रतिद्वंदी ने यदि सौ फ़ीट ऊंचा मन्दिर बनवाया है और उसमें भगवान की तीस फ़ीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की है तो फिर मैं एक सौ बीस फ़ीट ऊंचे मन्दिर का निर्माण करवा कर उसमें भगवान की चालीस फ़ीट ऊंची प्रतिमा स्थापित करवाऊँगा.
सबसे दुःख की बात यह है कि हमारे पूजा-स्थलों के आस-पास स्वच्छता का कोई ध्यान नहीं रक्खा जाता.
अजमेर शरीफ़, पुष्कर जी, काशी विश्वनाथ, महावीर जी, सम्मेद शिखर आदि तीर्थों-इबादतगाहों में सबसे बड़ी कमी रख-रखाव की है.
तीर्थ-स्थलों में सर्वत्र गन्दगी का साम्राज्य रहता है.
हमारे देश के ही क्या सारी दुनिया के पूजा-स्थलों की बात करें तो उसमें से अधिकांश पाप की कमाई से ही बनाए गए हैं.
क्या कभी किसी पूजा-स्थल के निर्माण में किसी घूसखोर को आर्थिक योगदान देने से रोका गया है?
क्या किसी डाकू को मन्दिर में भगवान को सोने का मुकुट चढ़ाने से मना किया गया है?
आज तो राम-जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण भक्ति से कम और राजनीति से अधिक प्रेरित दिखाई देता है.
निष्काम भाव की निश्छल भक्ति के दर्शन होना दुर्लभ हो गया है.
अब किसी सुदामा को या किसी विदुर को भगवान का स्नेह और उनकी अनुकम्पा मिलना असंभव प्रतीत होता है.
अब तो भगवान ख़ुद भी किसी वीवीआईपी की अगवानी में व्यस्त दिखाई पड़ते हैं.
हम में से शायद ही कोई कबीर की तरह सांचे हिरदे में 'आप' (भगवान) को खोजने की कोशिश करता होगा.
लेकिन हम इतना तो कर ही सकते हैं कि हम भगवान के रहने के लिए जो कांकर-पाथर जोड़ें वो कम से कम काली कमाई से तो न जोड़ें और वहां तो कोई पूजा-स्थल या इबादतगाह न बनाए जहाँ पहले से ही ऐसा कोई ढांचा खड़ा हो.
भले ही हमारी सच्ची कमाई से बनने वाला पूजा-स्थल आकार-प्रकार और अलंकरण में साधारण होगा किन्तु उसमें ईश-वन्दना का हमको भरपूर संतोष मिलेगा और मन को शांति भी प्राप्त होगी.
संत रैदास की उक्ति –
‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’
को हमको आत्मसात करने की ज़रुरत है.

हम नए पूजा-स्थलों के निर्माण के बजाय वृहद् वृक्षारोपण अभियान चला सकते हैं, बड़े अथवा छोटे स्तर पर जल-संरक्षण का कोई कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं, निशुल्क चिकित्सालय खोल सकते हैं, वृद्धाश्रम, अनाथालय का निर्माण और संचालन कर सकते हैं, गरीब किन्तु प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को आर्थिक अनुदान दे सकते हैं.
प्राकृतिक अथवा मानव-निर्मित आपदा के समय किसी एक पीड़ित की मदद करना, सैकड़ों पूजा-स्थलों के निर्माण से कहीं अधिक बड़ा पुण्य-कार्य है.
ढोंग-प्रपंच, पाखण्ड, धन-शक्ति का प्रदर्शन, प्रतिस्पर्धा आदि को यदि हम राजनीति-सियासत तक ही सीमित रखें और उसे भगवान के घर तक न पहुँचने दें तो इस से दुनिया का और इंसानियत का बहुत भला होगा.




Comments