गुरुवार, 26 मई 2022

दुर्गारानी

 (मैंने यह लम्बी कहानी अपनी श्रीमती जी के अल्मोड़ा-प्रवास के प्रारंभिक अनुभव के आधार पर लिखी है. )

दुर्गारानी -
शादी के दो महीने बाद मुझे पतिदेव के साथ अल्मोड़ा जाना था. पहाड़ में प्रवास के नाम पर शादी से पहले मैं सिर्फ़ नैनीताल और मसूरी गई थी.
लखनऊ से काठगोदाम तक का सफ़र तो आराम से ट्रेन में गुज़र गया पर वहाँ से केएमओयू की खस्ताहाल बस से अल्मोड़ा तक का सफ़र तो जानलेवा था. मेरा सर चकरा रहा था, जी घबड़ा रहा था पर पतिदेव थे कि मुझे पूरे कुमाऊँ का भूगोल और इतिहास सुनाए जा रहे थे. राम-राम करते-करते पाँच घण्टे बाद अल्मोड़ा पहुंचे तो मन और भी खिन्न हो गया.
ऊँची-नीची और टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों, डरावनी घाटियों और कँपकपाती ठन्ड बरसाने वाले विशाल और ऊँचे-ऊँचे पहाडों के बीच बसे इस सुनसान से शहर को देखकर मुझे कोई खुशी नहीं हुई. थकी-हारी, सहमी-सहमी, घर-गृहस्थी के कुलजमा बीस अदद के ढेर पर बैठी मैं टैक्सी की प्रतीक्षा में थी पर पतिदेव मेटों की तलाश कर रहे थे. सारा सामान मेटों ने लाद लिया और हम पैदल ही खत्यारी स्थित अपने महल की ओर बढ़ चले. रास्ता खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था. घर पहुंचे तो वहाँ की दुर्दशा देखकर तो मुझे रोना आ गया. दो कमरे का मकान था पर लगता था कि उसका सारा सामान एक अदद बैड पर ही सैट किया गया था. वाह क्या सफ़ाई थी और किस करीने से बिस्तर पर किताबें, सूटकेसेज़, बर्तन और यहाँ तक कि खाने का सामान भी सजाया गया था. किचिन का हाल तो और भी बुरा था. मैं अपनी सारी थकान भूल कर घर-सफ़ाई अभियान में जुटी तो पतिदेव इत्मीनान से बोले-
‘मैडम ! आप तो आराम से लेटकर प्रकृति के नज़ारे देखिए. ये सब काम तो दुर्गारानी देख लेंगी.’
मैंने पूछा-
‘ये दुर्गारानी कौन हैं?’
पतिदेव बोले –
‘अब अल्मोड़ा आई हो तो दुर्गारानी को भी जान जाओगी. बाई द वे गिफ़्ट्स वाली साडि़यों में से हरी वाली साड़ी दुर्गारानी के लिए निकाल देना और एक मिठाई का डिब्बा भी.’
मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि ये दुर्गारानी कौन हैं, रानी हैं तो घर का काम कैसे करेंगी और घर का काम करने वाली हैं तो इन्हें रिश्तेदारों के लिए आई साडि़यों में से साड़ी क्यों दी जाय?
मन में सवाल तो और भी थे जैसे कि इन दुर्गारानी की उम्र क्या है और देखने-सुनने में कैसी हैं?
शिवानी की कहानियाँ पढ़-पढ़ कर कुमाऊँ की कन्याओं के सौन्दर्य का आतंक दिल में छाया हुआ था. पतिदेव से डिटेल्स पूछने की हिम्मत नहीं हुई पर मन ही मन मैंने तय कर लिया कि अगर यह दुर्गारानी कम उम्र और सुन्दर हुईं तो इनकी कल ही छुट्टी कर दूंगी.
रात कब सो गई, पता ही नहीं चला पर सुबह का पता ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा भड़भड़ाने की आवाज़ से चल गया. ये बाथरूम में थे, मजबूरन मुझे ही उठ कर दरवाज़ा खोलना पड़ा. देखा कि एक साढ़े चार फ़ुट की, सत्तर साल की, झुकी पीठ वाली एक पतली-दुबली पर रौबदार बुढि़या चटक नीले रंग की ओढ़नी और घाघरा में सजी, लाठी पकड़े खड़ी है.
मुझे एकटक घूरते हुए बुढ़िया बोली -
‘अच्छा तो बहू आ गया. अच्छा है, हाथ, पैर, आँख, नाक दुरुस्त है पर बाबू से सांवला है, बाल लम्बा है, मेमों की तरह बलकटो नहीं है.’
इससे पहले कि मैं अपने इस मूल्यांकन पर खुश होती या रोती तब तक मुझे एक तरह से ढकेलते हुए अपनी चाँदी की पाज़ेब छमछमाती वह घर में घुस गई. तब तक ये बाथरूम से निकल आए थे. इन्हें देख कर वह बड़े रौब से बोली –
‘बाबू ! मेरी साड़ी लाया, मिठाई लाया?’
बाबू ने साड़ी और मिठाई का डिब्बा उसके हवाले किया तो मुझे बड़ा गुस्सा आया पर साथ ही साथ मैंने राहत की साँस भी ली. इन दुर्गारानी से शिवानी की कहानियों की नायिकाओं वाले खतरे की कोई बात नहीं थी. एक अच्छी बात यह भी हुई कि दुर्गारानी से मुँह दिखाई में मुझे ग्यारह रुपये प्राप्त हुए. इन्होंने उलाहना देते हुए कहा -
‘ये क्या बस ग्यारह रुपये? कैसी सास हो? खुद पाज़ेब पहने हो और बहू के पैर नंगे हैं?’
सासू माँ ने तन्मयता से मिठाई खाते हुए जवाब दिया -
‘पाजेब अपनी पोती को देगा वो भी अपने मरते बखत.’
दुर्गारानी विस्तार से दहेज के सामान का मुआयना कर रही थीं, अचानक बड़े रौब से बोलीं -
‘बहू ! जा मेरे लिए अदरक डाल के कड़क चाय बना ला.’
गुस्से के मारे मेरा खून खौल रहा था, इधर पतिदेव थे कि मुस्कुराकर कर दुर्गारानी से कह रहे थे –
‘दुर्गारानी ! बहू को अच्छी चाय बनाना तो तुम्हीं सिखाओगी. आज तुम चाय बना कर पिला दो, कल से ये बनाएगी.’
मैं अपना सिर धुनने वाली ही थी कि एक और बम फूटा -
‘अब बहू आ गया है. दुर्गारानी बर्तन-झाड़ू नहीं करेगा, बस ऊपर का काम कर देगा.’
यहाँ भी पतिदेव मेरी मदद के लिए आ गए. उन्होंने दुर्गारानी को जैसे-तैसे झाड़ू-बर्तन करते रहने के लिए राज़ी किया.
मैं नौकरानी को दादी-नानी का आदर देने वाले पतिदेव पर हैरान थी. इनसे कहा तो हँसने लगे फिर गम्भीर होकर बोले – ‘दुर्गारानी को कुछ दिन समझ लो फिर बताना कि मैं उसे सिर पर चढ़ा कर ठीक करता हूँ या गलत?’
हफ्ते-दो हफ्ते तक दुर्गारानी पर मेरा गुस्सा बना रहा. मुझे खुद पर पर सास वाला रौब रखने वाली नौकरानी नहीं चाहिए थी. पर अल्मोड़ा में एक महीना बीतते-बीतते इस अनजान शहर में पता नहीं क्यों वही एक मुझे अपनी सी लगने लगी थी. मुझे कभी उदास देखती तो मेरे सिर पर हाथ फेर कर मुझसे पूछती –
‘बहू ! माँ याद आ रहा है?’
बलकटो मेमों के प्रति उसके आक्रोश का ठिकाना नहीं था. उसे मेरे लम्बे-घने बाल बहुत अच्छे लगते थे. मेरे बालों में तेल डाल कर उनकी चोटी गूँथने में उसे बहुत आनन्द आता था. मेरे बाल बनाते-बनाते वह मुझे समझाती –
‘बहू ! अपनी चोटी हमेशा लम्बी ही रखना. चोटी लम्बी रक्खेगा तो बाबू इससे बँधा रहेगा. बलकटो मेम बनेगा तो बाबू कहीं और भाग जाएगा.’
दुर्गारानी की रनिंग कमेन्ट्री हमेशा जारी रहती थी, यह बात और थी कि उसमें से आधी से ज़्यादा बातें मेरे पल्ले ही नहीं पड़ती थी पर उनसे मेरा मन ज़रूर बहला रहता था.
अब मुझे पता चला कि ये कितने सही थे. पहले दिन मुझे खिजाने वाली इस सिर-चढ़ी बुढि़या ने कुछ ही दिनों में मेरा दिल जीत लिया था. मेरी हर पसन्द-नापसन्द का उसे ख़याल रहता था. मुझे तरह-तरह के पहाड़ी व्यंजन खिला-खिला कर उसने मेरी डायट्री हैबिट्स ही बदल दीं.
मुझे संगीत में बहुत रुचि है, कुमाँनी लोकगीत मुझे बचपन से अच्छे लगते थे पर उन्हें सिखाने वाला मुझे अब तक नहीं मिला था. दुर्गारानी को सैकड़ो लोकगीत याद थे. इन गीतों की भाषा तो मेरे पल्ले नहीं पड़ती थी पर उनकी लय-ताल से और दुर्गारानी के सधे गले की बदौलत उनके भाव पूरी तरह से मेरी समझ में आ जाते थे. उससे न जाने कितने कुमाऊँनी गीत मैंने सीख डाले थे. मैंने अपनी संगीत गुरु को ‘ईजा’ कहना शुरू कर दिया था पर बाकी दुनिया के लिए वह दुर्गारानी ही थी.
दुर्गारानी इन पर तो अपनी जान छिड़कती थी. कॉलेज में इन्हें अगर देर हो जाती थी तो वह अपने सवालों से मेरी नाक में दम कर देती थी. खाना बाबू की पसन्द का ही बने, इसकी जि़म्मेदारी तो मेरी थी पर इसकी फ़िक्र करना उसी का काम था.
अब दुर्गारानी का सारा दिन हमारे साथ ही बीतता था.
दर-असल उसे किसी के यहाँ काम करने की ऐसी कोई खास ज़रूरत भी नहीं थी. उसका पति फ़ौज में था, उसकी विडोज़ पेंशन उसके अपने खर्च के लिए काफ़ी थी पर उसका शराबी बेटा कल्लू अपनी बोतल के लिए पैसे जुटाने के लिए बुढि़या माँ से मज़दूरी करवाता था, वही उसकी तनख्वाह भी आकर ले जाता था. नशे में या नशा उतरने के गुस्से में माँ के ऊपर दो-चार हाथ छोड़ना उसके लिए मामूली बात थी.
एक बार तो उसने अपनी माँ का सिर ही फोड़ दिया. ये तो उस दुष्ट को पुलिस में देना चाहते थे पर दुर्गारानी ने ही इनके पैर पड़ कर उसे बचा लिया.
मेरी बड़ी बेटी होने वाली थी. ऐसे वक्त में दुर्गारानी न जाने कब मेरे लिए माँ, डॉक्टर, नर्स न जाने क्या-क्या बन गई.
पहले दिन मुझसे झाड़ू-बर्तन करवाने की ख्वाहिश रखने वाली दुर्गारानी अब मेरा खाना भी बनाती थी, मेरे कपड़े भी धोती थी और तरह-तरह से मेरा मन भी बहलाती थी. मेरी और मेरे होने वाले बच्चे की सलामती के लिए वह पता नहीं कितने अनुष्ठान करती रहती थी. आए-दिन वह मेरे सिर पर चावल और फूल छिड़क, मेरे माथे पर तिलक लगाकर कोई मंत्र पढ़ती फिर मुझे प्रसाद खिलाती थी.
मैं डिलीवरी के लिए मायके गई, वहाँ सब अपने थे पर न जाने क्यों दुर्गारानी की कमी मुझे बहुत खल रही थी.
डिलीवरी के बाद मैं अल्मोड़ा पहुँची तो दुर्गारानी की सारी दुनिया मेरी बेटी में ही सिमट गई थी. उसका हर काम वही करती थी, मैं तो बस बैठे-बैठे उसके कुमाऊँनी गीत सुनती रहती थी. चाहे आँधी हो चाहे तूफ़ान, चाहे बारिश हो चाहे स्नो फॉल, मेरी बेटी को देखे बिना और उसकी सेवा किए बगैर दुर्गारानी का सवेरा नहीं होता था.
दुर्गारानी की ये ख़ुशियाँ उसके बेटे से देखी नहीं गई. इनके कहने पर दुर्गारानी ने उसे बोतल के लिए पैसे देने बन्द कर दिए थे. एक बार पैसे न मिलने के कारण गुस्से में उसने अपनी माँ को मार-मार कर लहू-लुहान कर दिया.
इस बार इन्होंने दुर्गारानी के लाख रोकने के बावजूद कल्लू की पुलिस में रिपोर्ट कर दी. बेचारी बुढि़या इनसे तो कुछ नहीं बोली पर जैसे ही वह कुछ ठीक हुई तो लाठी टेकते हुए थाने पहुँची और कुछ दे-दिवा कर बेटे को लॉकअप से छुड़ा लाई. ये दुर्गारानी पर नाराज़ हुए तो इन्हें पुचकारते हुए बोली -
‘बाबू ! दुर्गारानी का आखरी बखत है, उस पर अब गुस्सा मत कर. बुढि़या जब मर जाए तो तुम और करमजला कल्लू उसको कन्धा देना और मरघट में फूँक कर भी आना.’
दुर्गारानी इस हादसे के बाद हमारे यहाँ काम करने के लिए नहीं आ पाई. दो-चार बार हम ही उसके घर जाकर उससे मिल आए.
इधर कल्लू बाबू की शराबखोरी ने अपने गुल खिलाने शुरू कर दिए थे. भरी जवानी में उसके फेफड़े और जिगर जवाब दे गए थे. हम भगवान से मना रहे थे कि बेटा माँ के सामने न चला जाए पर हमारी प्रार्थना बेकार गई.
कल्लू के मरने पर दुर्गारानी को कोई ताज्जुब नहीं हुआ, शायद वह इस हादसे के लिए पहले से तैयार थी. बेटे की अर्थी उठते समय वह बिलकुल रोई नहीं, बस, इनका हाथ पकड़ कर बोली –
‘बाबू ! कल्लू तो धोखा दे गया. अब बुढि़या को तुम्हीं फूँक कर आना.
कल्लू की मौत के एक महीने बाद ही दुर्गारानी का बुलावा भी आ गया. उसके आखरी वक्त में हमारा परिवार उसके पास था.
मेरी बेटी को अपने सीने पर लिटा कर उसने प्यार किया और एक पोटली में से उसके लिए वही अपनी चिर-परिचित चाँदी की पाज़ेब निकालकर उसके पाँवों में पहना दीं.
दुर्गारानी को कन्धा दे कर और उसके अंतिम संस्कार में भाग ले कर इन्होंने अपने बेटे होने का फ़र्ज़ पूरा किया.
दुर्गारानी की प्यार भरी झिड़कियाँ, उसके अधिकार भरे अनुरोध सुनने के लिए मेरे कान तरसते हैं. लगता है लाठी टेकती, छमछम करती वह अचानक मेरे सामने खड़ी हो जाएगी और अदरक डाल कर कड़क चाय बना लाने का मुझे आदेश देगी.
मैं जब भी अपने बाल बनाती हूँ तो एक पल इन्तज़ार करती हूँ कि वह आएगी और मेरे हाथों से कंघी छीन कर खुद मेरे बाल बनाएगी.
दुर्गारानी की कोई तस्वीर मेरे पास नहीं है, बदकिस्मती से उसके लोकगीतों को भी मै रिकॉर्ड नहीं कर सकी हूँ पर इन निशानियों की मुझे खास ज़रूरत भी नहीं है.
मेरे होठों पर जब तक उसके सिखाए लोकगीत रहेंगे तब तक वह मेरी यादों में बसी रहेगी. उसके सिखाए पहाड़ी व्यंजनों को मैं जब-जब बनाऊँगी तब-तब वह उनमें महकती रहेगी. जब तक मेरी बेटी उसकी दी हुई पाज़ेब पहन कर छमछम करती रहेगी तब तक वह मेरे दिल में ज़िन्दा रहेगी.

रविवार, 22 मई 2022

धन्यवाद बाबा

 धन्यवाद बाबा !

आप प्रकट भए, पेट्रोल, डीज़ल के दाम नीचे सरक गए !
अबकी दाम बढ़ें जो भारी,
मथुरा प्रकटें, कृष्णमुरारी !

गुरुवार, 19 मई 2022

एक सवाल

 टीवी न्यूज़ चैनल्स पर होने वाली लम्बी-लम्बी बहसों में ऊंचे दर्जे के जाहिल और भैंस हांकने वाले लट्ठमार ही क्यों बुलाए जाते हैं?

धर्म-मज़हब के सर-फुटउअल ने
लट्ठमारों के सर पे भार दिया
मौलवी पंडितों वकीलों को
टीवी बहसों में रोज़गार दिया
अब एक दिलचस्प किस्सा -
प्रसिद्द स्वतंत्रता सेनानी हकीम अज़मल खान के पास पेट के दर्द की शिकायत लेकर एक मरीज़ आया.
हकीम साहब ने उसकी नब्ज़ देख कर उस से पूछा -
'तुमने रात में क्या खाया था?'
मरीज़ ने जवाब दिया -
'रात को दाल और जली रोटी खाई थी.
हकीम साहब ने उसको नुस्खा लिख कर दे दिया.
मरीज़ जब दवाखाने में दवा लेने गया तो दुकानदार ने उस से कहा -
'सोने से पहले अपनी दोनों आँखों में इसे लगा लेना.'
पेट के दर्द के लिए आँखों में दवा लगाने वाली बात मरीज़ के समझ में नहीं आई. वह अगले दिन हकीम साहब के पास फिर गया और उसने उन से पूछा -
'हकीम साहब, आपने अपने नुस्खे में मेरे लिए कौन सी दवा तजवीज़ की थी?'
हकीम साहब ने जवाब दिया -
'मैंने तुम्हारे लिए सुरमा तजवीज़ किया था.'
मरीज़ ने पूछा -
'हुज़ूर, पेट का दर्द दूर करने के लिए सुरमा क्यों?'
हकीम साहब ने जवाब दिया -
'जो शख्स खाते वक़्त ये भी न देख पाए कि रोटी सही पकी है या फिर जली हुई है तो उसके पेट के दर्द का इलाज करने से पहले उसकी आँखों का इलाज करना ज़रूरी है.'
तो मेरे जैसे लोग जो कि टीवी बहसों को ले कर दुखी हो रहे हैं, उनके लिए सब से बेहतर यही होगा कि वो टीवी पर होने वाली बहसों को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कह दें नहीं तो अपने दिमाग का इलाज करवाएं. .

मंगलवार, 17 मई 2022

राहुल भट्ट की बेवा को बधाई

(आज से लगभग 35 साल पहले, इस कविता की रचना, देश में बढ़ती हुई आतंकवादी घटनाओं को रोक पाने में असमर्थ सरकार से दुखी हो कर की गयी थी.
पहले यह कविता किसी और की बेवा के लिए लिखी गयी थी और आज इसे राहुल भट्ट के बेवा के लिए कहा जा रहा है.

सवाल यह उठता है कि इतने अर्से बाद भी यह कविता आज भी प्रासंगिक क्यों है.)

अरे मृतक की बेवा तुझको, इस अवसर पर लाख बधाई !

अखबारों में चित्र छपेंगे, पत्रों से घर भर जाएगा,
मंत्री स्वयम् सांत्वना देने, आज तिहारे घर आएगा.
सरकारी उपहार मिलेंगे, भाग्य कमल भी खिल जाएगा,
पिता गए हैं स्वर्ग जान कर, पुत्र गर्व से मुस्काएगा.
विधवा ! रोती इसीलिए क्या, तेरी माँग उजड़ जाएगी?
जल्दी ही सूने माथे की, तुझको आदत पड़ जाएगी.
यह उदार सरकार, दया के बादल तुझ पर बरसाएगी,
थैली भर रुपयों के बदले, तेरी बिंदिया ले जाएगी.
छाती पीट रही क्यों पगली, अभी कर्ज़ यम के बाकी हैं,
यहाँ मौत का जाम पिलाने पर आमादा, सब साक़ी हैं.
बकरों की माँ खैर मना ले, यहाँ भेड़िये छुपे हुए हैं,
कुछ ख़ूनी जामा पहने हैं, पर कुछ के कपड़े ख़ाकी हैं.
मृत्यु सभी की अटल सत्य है, फिर क्यों छलनी तेरा सीना?
बाट जोहने की पीड़ा से मुक्ति मिली, क्यों आँसू पीना?
बच्चों की किलकारी का कोलाहल तुझको कष्ट न देगा,
शांत, सुखद, श्मशान-महीषी, बन, आजीवन सुख से जीना.
अरे मृतक की बेवा तुझको, इस अवसर पर लाख बधाई,
आम सुहागन से तू, बेवा ख़ास हुई है, तुझे बधाई.

मंगलवार, 3 मई 2022

ईद मुबारक

 1988 की बात होगी. हमारे इतिहास विभाग में एक 22-23 साल का एक ख़ूबसूरत नौजवान मेरे पास आया.


उस नौजवान ने मुझे अपना परिचय दिया. सिराज अनवर नाम का यह नौजवान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से मध्यकालीन भारतीय इतिहास के एक विषय पर शोध कर रहा था.

एक अच्छी बात यह थी कि उसे शोध-कार्य के लिए फ़ेलोशिप मिल रही थी पर एक बुरी बात यह थी कि वह पिछले कुछ महीनों से विभागीय राजनीति का शिकार हो गया था. कुछ विभागीय परेशानियाँ और कुछ होम-सिकनेस की वजह से अब वह चाहता था कि वह अपना बाक़ी शोध-कार्य, मेरे निर्देशन में, अल्मोड़ा रह कर करे.

मैंने सिराज अनवर को ख़ुद को नई-नई मुश्किलों में डालने के बजाय पुरानी समस्याओं को सुलझाने की सलाह दी. उसको मेरी दोस्ताना सलाह पसंद आई. दो-तीन महीने के अन्दर ही उसकी एएमयू वाली समस्या का समाधान हो गया.

सिराज अनवर का हमारे विभाग से नाता तो बनते-बनते रह गया लेकिन मेरे भतीजे-भांजे की उम्र का यह लड़का मेरा दोस्त बन गया.

रिफ्रेशर कोर्स के और एक वर्कशॉप के सिलसिले में, एएमयू में मेरे दो प्रवास हुए.

अलीगढ़ में सिराज से मेरी रोज़ाना मुलाक़ात होती थी. हम रोज़ाना शाम को साथ-साथ घूमा करते थे.

सिराज अनवर ने उर्दू पत्रकारिता में सामाजिक चेतना विषयक शोध-सामग्री एकत्र करने में मेरी बड़ी मदद की थी.

हम लोग कई सेमिनार्स और कई कांफेरेंसेज़ में भी साथ-साथ गए थे.

सिराज के वालिद अब्दुल शकूर साहब तहसीलदार के पद पर रानीखेत में पोस्टेड थे. अपने रिटायरमेंट से कुछ साल पहले उन्होंने अपना तबादला अल्मोड़ा के लिए करा लिया और फिर उन्होंने अल्मोड़ा में ही रहने का फ़ैसला कर लिया.

अब्दुल शकूर अंकल से भी मेरी दोस्ती हो गयी थी. हम दोनों को किस्सागोई का शौक़ था. सिराज भी अपनी नफ़ीस उर्दू ज़ुबान में बड़े दिलचस्प किस्से-कहानियां सुनाया करता था.

मेरी श्रीमती जी को और मेरी दोनों नन्हीं-नन्हीं बेटियों को भी सिराज अनवर से मिलना बहुत अच्छा लगता था. मेरी बेटियों को आमिर खान जैसे लगने वाले सिराज अंकल बहुत पसंद थे. सिराज मेरी बेटियों के साथ बिलकुल बच्चा बन जाता था. अपने हर अल्मोड़ा प्रवास में वह हमारे घर कई बार आता था. उसे मेरी श्रीमती जी के हाथ के बने पकवान बहुत अच्छे लगते थे और मेरी बेटियों को उसके लाए हुए चौकलेट्स ! न जाने कितनी बार उसने मेरे परिवार के साथ टीवी पर आ रहे वन डे मैच देखे होंगे.

रमज़ान के दिनों में तीस दिन रोज़ा रखने वाला सिराज खुदा-परस्त लेकिन थोड़ा कट्टर किस्म का मुसलमान था.

होली के एक दिन बाद एक बार सिराज हमारे घर आया. होली तो बीत चुकी थी पर मेरी दोनों बेटियां पानी भरे गुब्बारे ले कर सिराज अंकल की खातिर करने के लिए खड़ी हो गईं.
मुझे पता था कि सिराज होली नहीं खेलता था. मैंने उन्हें रोकते हुए उन्हें समझाया -

'बालिकाओं ! तुम्हारे सिराज अंकल होली-विरोधी हैं. ये तुम्हारे साथ होली नहीं खेलेंगे.'

मेरी छोटी बेटी रागिनी ने एक सवाल कर डाला –

‘तो फिर इन होली-विरोधी अंकल ने हमारी गुझिया क्यों खाईं?’

दो-तीन सेकंड्स में सिराज अंकल पर आधा दर्जन पानी वाले गुब्बारे फोड़े जा चुके थे. और सिराज अंकल थे कि बच्चों की शरारतों में पूरी तरह शामिल होने के लिए हमारे घर के पास की एक दुकान से गुब्बारों का एक और बड़ा पैकेट खरीद कर ले आए थे.

अगले एक घंटे तक पानी के गुब्बारों के पचासों बम फोड़े गए. इस धमा-चौकड़ी में सिराज मेरी दोनों बेटियों से हर हाल में इक्कीस ही साबित हुआ था.

1993-4 में सिराज अपने अल्मोड़ा प्रवास में मुझ से मिलने हमारे विभाग में कुछ ज़्यादा ही आने लगा था. मैंने इसकी वजह पूछी तो वह बात टाल गया . पर मेरे धमकियाने पर उसने कुबूला कि हमारे विभाग की एम० ए० फ़ाइनल की मेरी छात्रा शाहिदा खान से उसकी शादी तय हो गयी है.

सिराज-शाहिदा की शादी में हमारा पूरा परिवार शामिल हुआ. उनकी जोड़ी हमारे परिवार को बहुत ही अच्छी लगती थी. इन दोनों की शादी के बाद हमारी पारिवारिक घनिष्ठता और भी बढ़ गयी.

शाहिदा अपने उस्ताद का, यानी कि मेरा तो बहुत लिहाज़ करती थी पर वह मेरी श्रीमती जी से और मेरी बेटियों से, बहुत घुल-मिल गयी थी. होली-दिवाली पर सिराज-शाहिदा हमारे यहाँ ज़रूर आते थे और हम लोग उनके यहाँ ईद पर ज़रूर जाते थे. सिराज के घर ईद पर मुझ मधुमेह के रोगी के लिए शुगर फ़्री वाली सेवैयाँ ज़रूर बनाई जाती थीं.

एनसीआरटी में लेक्चरर हो कर सिराज अनवर की पोस्टिंग भोपाल हो गयी. उसने मुझे कई बार भोपाल बुलाया पर किसी न किसी कारण से मेरा वहाँ जाना नहीं हो पाया. पांच साल बाद उसकी पोस्टिंग दिल्ली हो गयी.

सिराज भी मेरी तरह डायबिटीज़ का शिकार हो गया था. मीठे के महा-शौक़ीन उस शख्स को मिठाइयों को अलविदा कहना पड़ा पर हमारे घर आ कर वह मेरी श्रीमती जी के हाथ के बने पकवान ज़रूर खाता था.

अपने रिटायरमेंट के बाद जब मैं ग्रेटर नॉएडा में सैटल हो गया तो उसके बाद सिराज से हमारा मिलना सिर्फ़ एक बार हुआ.
तब तक सिराज प्रोफ़ेसर हो गया था. हम दिल्ली में उसके एनसीआरटी वाले फ्लैट में उस से मिलने गए थे.

लेकिन फ़ोन पर हमारी बातें अक्सर होती रहती थीं. मेरी श्रीमती जी और शाहिदा भी तीज-त्यौहार पर एक दूसरे से बातें कर लेती थीं.

सिराज आमतौर पर ईद का जश्न अल्मोड़ा जा कर ही मनाता था. पिछले साल ईद पर, 14 मई को, मैंने उसे मुबारकबाद देने के लिए फ़ोन किया तो उसने फ़ोन नहीं उठाया.

दो घंटे बाद जब मैंने उसे फिर फ़ोन किया तो जवाब शाहिदा ने दिया.

मैंने शाहिदा को ईद की मुबारकबाद दी तो फफक-फफक कर रोते-रोते उसने मुझे शुक्रिया कहा. मैंने घबरा कर उस से परिवार का कुशल-मंगल पूछा तो उसने बताया कि 28 अप्रैल, 2021 को सिराज कोरोना की दूसरी लहर का शिकार हो गया था.

इस बार रमज़ान में सिराज अल्मोड़ा नहीं जा पाया था. वह दिल्ली में ही था.

रोज़े और नमाज़ का पाबन्द सिराज अपने मज़हबी फ़रायज़ निभा रहा था कि इसी दौरान तीन दिन की छोटे से वक्फ़े में उस ने घर से अस्पताल तक का और फिर वहां से कब्रिस्तान तक का सफ़र तय कर लिया.

सिराज को हमसे बिछड़े एक साल से ज़्यादा का वक़्त हो गया है पर ऐसा लगता ही नहीं कि वह अब इस दुनिया में नहीं है. हमारा अज़ीज़ दोस्त हम से बिछड़ ज़रूर गया है पर हमारे दिल में वो आज भी बसा है.

27 अप्रैल को सिराज की बरसी से एक दिन पहले फ़ोन पर शाहिदा से मेरी श्रीमती जी की और मेरी बात हुई थी. हम ने दुनिया भर की बातें कीं पर हर बार बात घूम-फिर कर सिराज की तरफ़ ही मुड़ जाती थी.

आज ईद है . आज मुस्कुराते हुए सिराज की तस्वीर मेरी आँखों के सामने तैर रही है और मुझे रह-रह कर मीना कुमारी का यह शेर याद आ रहा है -

'न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन,
बड़े क़रीब से, उठ कर, चला गया कोई.'

अपने सभी मुसलमान दोस्तों को मैं ईद पर मुबारकबाद देता हूँ . लेकिन सच कहूँ तो पिछले साल ईद पर सिराज को फ़ोन करने के बाद मुझे जो धक्का लगा था उस से मैं आज तक उबर नहीं पाया हूँ. इस बार शाहिदा को ईद मुबारक कहने की न तो मेरी हिम्मत है और न ही मेरी श्रीमती जी की.

इस ईद पर मैं जन्नतनशीन सिराज अनवर को ईद की मुबारकबाद देने के लिए न तो उसके घर जा सकता हूँ और न ही उस से फ़ोन पर बात कर सकता हूँ पर मुझे यकीन है कि मेरे दिल से निकली ईद की मेरी मुबारकबाद उसकी रूह तक ज़रूर पहुँच जाएगी.

तो ऐ मेरे बिछड़े हुए दोस्त ! तुम्हें ईद मुबारक ! 

रविवार, 1 मई 2022

परीक्षक की अग्निपरीक्षा

ऊंची कुर्सी पर एक चश्माधारी महानुभाव गम्भीर मुद्रा में विराजमान हैं। उनके हाथ में लाल स्याही वाला लाल पैन है, सामने टेबिल है, जिस पर उत्तर पुस्तिकाओं का ढेर लगा हुआ है.
जी हां, यह एक परीक्षक हैं जो इस समय किसी भाग्यविधाता से कम नहीं हैं. यह महानुभाव अपने पैन से परीक्षार्थियों का भाग्य लिखने जा रहे हैं.
पहले प्रश्न में सात अंक, दूसरे में बारह, तीसरे में दस, बस इसी तरह से बेचारे परीक्षार्थी की किस्मत बनाई या बिगाड़ी जा रही है.
तीन घण्टे के इस शो के अच्छे या बुरे होने पर उसकी साल भर की मेहनत को आंका जा रहा है.
वाह क्या नज़ारा है ! इन भाग्य- विधाता अर्थात परीक्षक महोदय की किस्मत पर किसे रश्क नहीं होगा? पर लाल स्याही से किसी और की किस्मत लिखने का हक़ क्या इन्हें सेंत-मेंत में मिल गया है?
नहीं ! इन्होंने बरसों दिमागी पापड़ बेले हैं, विद्यार्थी जीवन में तपस्या की है, पीएच० डी० की डिग्री हासिल करने के लिए शोध करते समय पेट से पीठ मिलाकर हज़ारों घण्टे आंखें फोड़ी हैं, फिर एप्लाई, नो रिप्लाई और साक्षात्कार के चक्रव्यूह से निकलकर लेक्चरर का पद प्राप्त किया है. उसके बाद भी दस साल अध्यापन में सर खपाने के बाद ही इन्हें परीक्षक बनने का गौरव प्राप्त हो पाया है.
हम ने भी बरसों तक परीक्षक बनने का सपना देखा था. हमारी भी तमन्ना थी कि हम भी कभी चित्रगुप्त बनकर किसी परीक्षार्थी के बौद्धिक पाप-पुण्य का लेखा-जोखा तैयार करें.
अब वो हसरत पूरी हो चुकी है. हम परीक्षक बन चुके हैं.
उत्तर पुस्तिकाओं का एक बड़ा सा बन्डल हमारे सामने पड़ा है.
हम भी आंखों पर चश्मा चढ़ाए, लाल स्याही वाला पैन हाथ में लेकर ऑपरेशन परीक्षकत्व के लिए तैयार हैं.
हमारी श्रीमतीजी हमारा काम शुरू होने से पहले ही चाय बना कर ले आई हैं.
आदतन उन्होंने हमारी एक्ज़ामिनरशिप का एडवान्स में सदुपयोग कर डाला है.
हमारी बच्चियां भी आजकल नम्रता और आज्ञाकारिता की प्रतिमूर्ति बनी हुई हैं.
उत्तरपुस्तिकाएं जांचे जाने के बाद उनको कपड़े की थैलियों में बन्द करने का दायित्व हमारी श्रीमतीजी का है.
लिफ़ाफ़ों पर और जांची हुई कापियों के बन्डलों पर स्केचपैन से पते लिखने का काम हमारी बड़ी बेटी गीतिका का है और हमारी नन्हीं सी बिटिया रागिनी लाख लेकर लिफ़ाफ़ों पर सील लगाने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती हैं.
अपना कर्तव्य निभाने वाली इस फ़ौज को मुंहमांगा पारश्रमिक मिलता है. पर सबसे पहले हमको कापियां जांचनी हैं, फिर मार्कलिस्ट पर उनके अंक चढ़ाने हैं.
हमारी सहायतार्थ खड़ी फ़ौज को अभी सब्र करना पड़ेगा.
सेवा के बदले मेवा मिलने की कहावत कहीं और सही बैठती है या नहीं, यह तो हम नहीं जानते पर हमारे घर में वह हर साल चरितार्थ होती हुई देखी जा सकती है.
श्रीमती जी की साड़ी और बच्चियों की चाकलेट्स के बाद एक्ज़ामिनरशिप की राशि में से जो दो-चार नोट बचते हैं उन्हें इनकमटैक्स वाले हमसे झटक लेते हैं. अब कोई उन से जाकर पूछे, आधी उम्र किताबें पढ़ने में खपा कर, रात-रात भर जाग-जाग कर, आंखें दुखाकर, अपनी पीठ तोड़ कर, अपनी दसों उंगलियां थका कर, बढि़या टीवी प्रोग्राम्स को भुलाकर और काम हो जाने के बाद महीनों प्रतीक्षा करने के बाद जो मुट्ठी भर रकम हमको हासिल होती है, उस पर उनका क्या हक़ बनता है?
क्या कोई जवाब है उनके पास?
पर हम बेबस चूहे सरकार रूपी इस खूंखार बिल्ली के खिलाफ़ विद्रोह का बिगुल बजाएं तो बजाएं कैसे? खून का घूंट पीकर रह जाते हैं, और हम करें भी तो क्या करें?
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। ठीक है !
‘है इसी में प्यार की आबरू, वो जफ़ा करें मैं वफ़ा करूं.’
अब ओखली में सर दिया है तो ठाठ से मूसलों की मार भी सहेंगे. परीक्षक बनने का सपना देखा था सो सच हो गया.
अब परीक्षकत्व के पारश्रमिक से लखपती बनने की तमन्ना पूरी नहीं हो पाए तो क्या रोने बैठ जाएं?
जो लोग परीक्षकत्व के दर्द से नहीं गुज़रे हैं उन्हें उसकी शिद्दत का गुमान कहां हो सकता है?
देखने वाले को तो यही लगता है कि गुरुदेव शायद आंख मूंद कर धड़ाधड़ कापियां जांचे जा रहे हैं, उन्हें न कोई परेशानी है, न ही उन्हें कोई मेहनत करनी पड़ रही है.
ऐसे आलोचकों के विषय में ही शायद कहा गया है –
‘जाके पैर न फटे बिवाई सो क्या जाने पीर पराई’
परीक्षकत्व के गुरुतर दायित्व को हम बक़ौल जिगर मुरादाबादी –
‘इक आग का दरिया है और डूब के जाना है’ बता सकते हैं.
अब हमने एक्ज़ामिनर के खि़ताब से इश्क किया है तो इसमें यह सब तो होगा ही. चंद रुपयों की ख़ातिर इतनी दिमागी कसरत कौन करना चाहता है? मीरा की तर्ज़ पर हम कहते हैं -
‘हे री! मैं तो परीक्षकत्व दिवानो, म्हारा दरद न जाने कोय !’
जब तक घर में मूल्यांकन हेतु कापियां रहती हैं, हमको अपनी श्रीमतीजी का भरपूर प्यार मिलता है. अख़बार पढ़ने के लिए हम चश्मा मांगते रहें, नहीं मिलेगा पर कापियां जांचने बैठेंगें तो केस सहित चश्मा करीने से वहीं रक्खा हुआ मिलेगा.
मूल्यांकन के काम के दौरान मिलने वाली चाय की प्यालियों का तो हम शुमार ही नहीं कर सकते.
चाय की तलब हुई नहीं कि चाय हाजि़र !
इन दिनों बच्चियों के गलों में बांसुरी फि़ट हो जाती है.
‘जी पापा ! आई पापा !’
के दुर्लभ किन्तु मधुर स्वर घर में जब-तब घर में गूंजा करते हैं.
सवाल उठता है कि जब मूल्यांकन के काम के दौरान हमारी घर में क़दर बढ़ जाती है तो फिर हम इस काम को अपने लिए अग्नि-परीक्षा क्यों मानते हैं.
चलिए, इस काम से जुड़ी हुई परेशानियों की ही चर्चा कर ली जाए.
हमारी मुश्किलों की बोहनी तो उत्तर-पुस्तिकाओं के विश्वविद्यालय परिसर पहुंचते ही हो जाती है.
हमारे हाथ में कापियां का बण्डल देखकर विद्यार्थी हमारी चरणरज लेने को और उस बण्डल को हमारे घर तक पहुंचाने के लिए दौड़ न पड़ें, इसके लिए हम उसे ऑफ़िस से शाम को ही उठा पाते हैं.
नंबर 11 की बस में सवारी करने वाले जैसवाल साहब के लिए घर तक कापियां पहुँचाना एक टेढ़ी खीर है.
इस समय बीस-पच्चीस किलो ज्ञान के इन बिना परखे हीरों को हमारे घर तक पहुंचाने के लिए कोई मेट या चपरासी बड़ी मुश्किल से मिलता है.
पता नहीं हमारे इतिहास के विद्यार्थियों को ढेर सारी कापियां भरने का क्या शौक है ! उनको शायद लुकमान हकीम ने बताया होगा कि तुम जितनी ज़्यादा कापियां भरोगे उतने ज़्यादा नम्बर तुमको मिलेंगे.
पांच-छह कापी भरना तो आम बात है पर कोई-कोई परीक्षार्थी तो बी० आंसर बुक में दस का आंकड़ा भी पार का जाते हैं.
नतीजा यह होता है कि हमारी एक्ज़ामिनरशिप का एक बड़ा हिस्सा कापियों का बण्डल लाने और ले जाने में उड़ जाता है.
कागज़ों के इस अथाह सागर में से ज्ञान की दो चार बूंदे खोजने में हमको कितना श्रम करना पड़ता है यह तो हम ही जानते हैं.
हर परीक्षक को खुद को सिफ़ारिशी पत्रों, टेलीफ़ोनों और सिफ़ारिश हेतु पधारे जाने-अनजाने मित्रों से बचाना पड़ता है. हम तो मूल्यांकन के दिनों में खुद फ़ोन ही नहीं उठाते. हमारी श्रीमती जी और हमारी बच्चियां हमारे बारे में हर पूछने वाले को हमारी अप्रत्याशित लखनऊ यात्रा का समाचार दे देती हैं. अनचाहे मेहमानों से बचने के लिए हम घर में ही नज़रबन्द हो जाते हैं.
खैर, इन कठिनाइयों से निपटना विशेष चिन्ता वाली बात नहीं है.
अभी इश्क के इम्तिहां और भी हैं !
हमारी असली अग्नि-परीक्षा तो मूल्यांकन कार्य करते समय होती है.
पहली उत्तर-पुस्तिका खुली नहीं कि अग्नि परीक्षा प्रारम्भ हुई.
पहले पन्ने के शीर्ष भाग पर – ‘श्री गणेशाय नमः’, ‘दीनदयाल विरद सम्भारी, हरहु नाथ मम संकट भारी’ और – ‘गुरुवे नमः’ लिखा देखने के बाद कौन सा मनुष्य है जो बेरहमी से बच्चों की गल्तियों के नम्बर काट पाएगा?
आखि़र हम भी तो दो बच्चियों के बाप हैं ! पर दया, ममता, करुणा और उदारता के भावों को कुचल कर हमको बेमुरव्वत, बेरहम और पत्थरदिल बन कर इंसाफ़ करना पड़ता है.
इंसाफ़ की देवी के तो मज़े हैं. इंसाफ़ करते वक़्त वो अपनी आंखों पर काली पट्टी जो चढ़ा लेती हैं. पर हम क्या करें? हमको तो अपनी पूरी आंखे खोल कर ही इंसाफ़ के नाम पर छोटी से छोटी गल्ती के बहाने मासूमों की गर्दनों पर छुरी चलानी पड़ती है.
इतिहास के विद्यार्थियों को असली बात पता हो या न हो पर अन्तर्कथाएं ज़रूर याद रहती हैं.
शासक की नीतियां, प्रशासन की बारीकियां, युद्ध की विभीषिकाएं और सुधारकों के सुधार वो भले भूल जाएं पर उन्हें रज़िया-याकूत, बाजबहादुर-रूपमती, सलीम-अनारकली और सलीम-नूरजहां की प्रेमकथाएं हमेशा याद रहती हैं.
अगर सवाल जहांगीर की चित्रकला पर पूछा गया है तो वो उसे घुमा-फिरा कर सलीम-अनार कली की इश्किया दास्तान में तब्दील करके ही दम लेंगे.
विद्यार्थियों का फ़िल्मी ज्ञान बहुत अधिक होता है इसीलिए आमतौर पर इतिहास जानने के लिए भी वो फि़ल्मों और टीवी सीरियल्स पर निर्भर रहते हैं.
अकबर की नीतियों में मुग़ले आज़म के डायलॉग्स या ब्रिटिशकालीन भारतीय इतिहास के लिए – ‘भारत की एक खोज’ टीवी सीरियल के सम्वादों की प्रतिध्वनि उनके उत्तरों में सुनाई देना मेरे लिए आश्चर्य की बात नहीं होती है.
'दे दी हमें आज़ादी, बिना खडग, बिना ढाल' जैसे फ़िल्मी गानों की सहायता से हमको राष्ट्रीय आन्दोलन पढ़ना भी आता जा रहा है. पर कुछ परीक्षार्थी तो कमाल ही कर देते हैं. अगर हम ने प्रश्न पूछा है - अलाउद्दीन खिलजी की बाज़ार नियन्त्रण नीति पर तो जवाब में उसके द्वारा पद्मिनी हासिल करने के लिए किए गए अभियान की चर्चा शुरू हो जाती है.
विद्यार्थी की दलील है कि मैंने जो तैयार किया है वही तो लिखूंगा, यह परीक्षक की गल्ती है कि वह परीक्षार्थी की पसंद-नापसंद की जानकारी नहीं रखता.
परीक्षार्थी कालातीत होता है अर्थात उसे काल की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, अब यदि इसके बाद भी परीक्षक इस बात पर ऐतराज़ करे कि हल्दीघाटी के मैदान में मानसिंह पैटन टैंक क्यों ले आया तो यह उसकी नाइंसाफ़ी है.
यदि अशोक महान ने अपनी प्रजा की सेवा के लिए रेलगाड़ी चलवाई थी तो परीक्षक को इस पर आपत्ति क्यों है?
क्या उस ज़माने में वह मौजूद था? हम ऐसे हज़ारों ओरिजिनल आइडियाज़ का हर साल रसास्वादन करते हैं.
मौलिक लेखन का पुरस्कार जिन लोगों को मिलना चाहिए उन्हें हम लाल गोलगप्पे खिलाने के लिए मजबूर हैं.
जो लोग इतिहास लेखन में और उसके पठन-पाठन में आमूल क्रांति लाना चाहते हैं हम जैसों परीक्षकों द्वारा उनकी प्रतिभा का नाहक गला घोंटा जा रहा है.
नुक्ताचीनी की आदत से परीक्षक बाज़ नहीं आता है.
बच्चों की जिन मासूम अदाओं पर और लोग हँसेंगे उन पर हम खूनी कलम से उनके नम्बर उड़ा देंगे. हद है कसाईपन की !
समझदार परीक्षार्थी जानते हैं कि परीक्षक भी किसी न किसी रिश्ते में बंधा होता है.
अब मातृत्व और पितृत्व के साथ ममता तो जुड़ी होगी ही.
किसी बेटी की शादी सिर्फ़ परीक्षा में फ़ेल होने की वजह से नहीं हो पाएगी, इस आशय का नोट पढ़ कर भी कोई परीक्षक न पसीजे तो उसे पत्थरदिल नहीं तो और क्या कहेंगे?
परीक्षार्थी ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर उसे फ़ेल किया गया तो वह ज़हर खा लेगी.
अब परीक्षक का क्या फ़र्ज़ बनता है?
वैसे मज़े की बात यह है कि उत्तर-पुस्तिका में परीक्षक से याचना केवल लड़की बन कर ही की जाती है.
इतिहास के साथ थोड़ी सी बेवफ़ाई करके हम कन्यादान का पुण्य लूट सकते हैं.
किसे पता चलेगा कि उस मासूम ने सन्त कबीर को मुग़ल बादशाह बताया था?
वैसे दया और उदारता की फ़ीस देने को भी अनेक परीक्षार्थी तैयार रहते हैं.
उत्तर- पुस्तिका के साथ अगर एक सौ का नोट नत्थी किया मिले तो क्या किया जाय? मार दिया जाय या छोड़ दिया जाय, इस ऊहापोह से हमें बार-बार गुज़रना पड़ता है.
हम बेरहम हैं, हम जल्लाद हैं, हम क्रूरसिंह हैं, ज़रा से नम्बर बढ़ाने में हमारा क्या जा रहा था – ‘हाय रे ! देखो लड़की ने बीमारी में इम्तहान दिया है, उस पर कुछ तो रहम करो !’
ऐसी टिप्पणियां तो हमको घर में भी सुननी पड़ जाती हैं, सोचिए, बाहर की दुनिया में हमारी क्या क़द्र होगी?
और हम हैं कि सारी आलोचना, निन्दा प्रस्तावों और प्रार्थनाओं को अनदेखा और अनसुना करते हुए दे-दनादन परीक्षार्थियों को फ़ेल करते जा रहे हैं.
नहीं! अब और नहीं ! अब भोले-भाले बच्चों के भविष्य का खून हम से और नहीं हो सकेगा. क्या अगली बार परीक्षकत्व के इस जल्लादनुमा काम को लेने से हम इंकार कर दें?
इन्कमटैक्स डिपार्टमेन्ट से बची हुई खुरचन खाने के लिए इतना खून-खराबा हम क्यों करें?
यह बार-बार की अग्नि-परीक्षा हमको एक दिन भस्म करके छोड़ेगी.
सीता माता ने एक बार अग्नि-परीक्षा दी थी.
भगवान श्री राम ने जब उनसे दूसरी बार अग्नि परीक्षा देने के लिए कहा तो वह साफ़ इन्कार कर के धरती में समा गयी थीं. पर हम हैं कि हर साल अग्नि-परीक्षा देने के लिए तैयार हो जाते हैं.
आज ही कुलसचिव को लिखकर परीक्षकत्व के भार से हम मुक्ति पा लेते हैं.
पर यह क्या? घंटों तक मेहनत कर के हमारी श्रीमती जी कॉपी के बंडलों को सिल चुकी हैं, बड़ी बिटिया गीतिका अपने सुन्दर हस्त-लेख से कापियों के बंडलों पर और लिफ़ाफ़ों पर पते लिख चुकी है और छोटी बिटिया रागिनी लिफ़ाफ़ों को बन्द करके उन पर लाख पिघला कर सील लगा रही है.
करें तो क्या करें?
चलो, फि़लहाल ऐसी अग्नि-परीक्षाओं से गुज़रते रहना मन्ज़ूर कर लेते हैं.
पर विश्वविद्यालय को ऐसी अग्नि-परीक्षा में खरे उतरने वालों की खातिरदारी में कुछ इजाफ़ा तो करना ही चाहिए.
हम तो शिवजी के भक्त ठहरे ! उन्होंने विश्व के कल्याण के लिए ज़हर का घूंट पी लिया था तो हम भी क्यों पीछे रहें?
पर ठहरिए ! यह चर्चा फिर कभी सही.
अभी-अभी समाचार मिला है कि हमारे लिए कापियां का एक और बण्डल विश्वविद्यालय परिसर में पहुंच गया है.
इस बार लगता है ईश्वर कुछ ज़्यादा ही अग्नि-परीक्षा लेना चाहता है, हम कर भी क्या सकते हैं?
हुइ है वही जो राम रचि राखा !
हे भगवान ! अगले साल भी हमको इस साल की तरह ही जम कर परीक्षक वाली अग्नि-परीक्षा देनी पड़े, इसका इन्तज़ाम तुम ज़रूर कर देना.