शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

बैलेंस्ड डाइट

 मेरे बाल-कथा संग्रह ‘कलियों की मुस्कान’ की एक कहानी आपकी सेवा में प्रस्तुत है. इस कहानी को मेरी बारह साल की बेटी गीतिका सुनाती है और इसका काल है – 1990 का दशक ! पाठकों से मेरा अनुरोध है कि वो गीतिका के इन गुप्ता अंकल में मेरा अक्स देखने की कोशिश न करें.

बैलेन्स्ड डाइट -
भगवान ने कुछ लोगों को कवि बनाया है, उन्हें भावुकता अच्छी लगती है.
सुन्दर दृष्य देखकर या किसी ट्रैजेडी के बारे में सुनकर उनके मन में कविता के भाव उमड़ने लगते हैं.
कुछ को नेता का जिगर दिया गया है, इन्हें तिकड़म और जुगाड़ लगाना पसन्द होता है.
जिनको अपराधी का दिमाग मिला है, उनको ठाँय-ठूँ और ढिशुम-ढिशुम का कान-फोड़ संगीत पसंद आता है.
मीरा के नयनों में नन्दलाल बसते हैं, एम. एफ़ हुसेन के दिल में माधुरी दीक्षित रहती हैं पर हमारे गुप्ता अंकिल के प्राण पकवानों में बसते हैं. गुप्ता अंकिल कहते हैं –
‘अब आप ही बताइए इसमें हमारा क्या कुसूर है? भगवान ने हमको ऐसा ही बनाया है. उन्होंने हमको सूंघने की ऐसी शक्ति दी है जो दो मील से पकवानों की खुशबू पकड़ लेती है, आँखें ऐसी दी हैं जिन्हें सिर्फ़ पकवानों की ही फ़िगर और उनका गैटअप लुभाता है और जीभ ऐसी दी है जिसे मीठा, नमकीन, खट्टा, तीख़ा, चरपरा, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, पश्चिम भारतीय, इटालियन, कान्टिनेन्टल, थाई, मैक्सिकन, मंचूरियन, चायनीज़ सब पसन्द है. दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं. एक तो वो जो जीने के लिए खाते हैं और दूसरे वो जो खाने के लिए जीते हैं. हम तो दूसरी कैटेगरी में आते हैं.’
गुप्ता अंकिल के हिसाब से खाने-पीने का शौक़ रखने वाले शख़्स का होशियार होना लाज़मी है.
पकवानों की किस्मों की जानकारी हासिल करने के लिए पता नहीं उसे क्या-क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं.
अब पापड़ की ही बात लीजिए तो क्या आप अमृतसरी, राजस्थानी, सिन्धी और गुजराती पापड़ में फ़र्क कर सकते हैं? नहीं न! पर गुप्ता अंकिल पापड़ों में आँख मूंद कर सिर्फ़ जीभ का इस्तेमाल कर फ़र्क कर सकते हैं.
खाने के मामले में उनका भौगोलिक और ऐतिहासिक ज्ञान बहुत व्यापक है.
कुछ साल पहले पापा हमारे लिए जनरल नौलिज वाला एक इलैक्ट्रो गेम लाए थे, उसमें ख़ास-ख़ास स्थानों से जुड़ी हुई प्रसिद्ध चीज़ें खोजनी होती थीं. अगर आप किसी ख़ास स्थान और उससे जुड़ी चीज़ का सही मैच कर पॉइंट्स पर तार लगाते थे तो लाइट जल जाती थी.
गुप्ता अंकिल भी हमारे इस खिलौने पर अपनी जनरल नौलिज का टैस्ट देने को बेताब रहते थे. गेम में तो अंकिल कई मामलों में पीछे रह जाते थे. उन्हें यह नहीं मालूम होता था कि ताजमहल कहाँ है या विक्टोरिया मेमोरियल कहां है.
पापा ने उसी इलैक्ट्रोगेम के पैटर्न पर गुप्ता अंकिल के लिए एक विशेष पकवान गेम तैयार कर दिया. इसमें आगरा के साथ ताजमहल का मैच मिलाने के बजाय पेठे-दालमोठ का मैच किया गया था.
इसी तरह कलकत्ते को विक्टारिया मेमोरियल की जगह रशोगुल्ला से जोड़ा गया था, लखनऊ को इमामबाड़े की जगह रेवड़ी के साथ और जयपुर को हवामहल की जगह घेवर के साथ मिलाया गया था और कचौड़ियों को बनारस से जोड़ा गया था.
गुप्ता अंकिल इस पकवान गेम में कभी गलत नहीं होते थे और अपने हर अटेम्प्ट में लाइट ज़रूर जलवा लेते थे.
हमारी ही तरह विशुद्ध शाकाहारी होने की वजह से गुप्ता अंकिल को बिरयानी, तन्दूरी मुर्ग या कबाब की पर्याप्त जानकारी नहीं है पर दुनिया भर के तमाम शाकाहारी व्यन्जनों के विषय में उन्हें चलता-फिरता एनसाइक्लोपीडिया ज़रूर कहा जा सकता है.
लोगबाग मथुरा-वृन्दावन भगवान श्रीकृष्ण की लीलास्थली देखने जाते हैं पर हमारे गुप्ता अंकिल वहाँ पेड़े खरीदने जाते हैं.
दिल्ली में उनके लिए सारे रास्ते चाँदनी चौक की पराठेवाली गली से होकर गुज़रते हैं.
लखनऊ में वो आँखें बन्द कर अमीनाबाद की प्रसिद्ध चाट की दुकानों पर और चौक की ठन्डाई की दुकान पर पहुँच सकते हैं.
कितने लोग जानते होंगे कि कलकत्ते में खजूर के गुड़ से बना सबसे बढि़या सन्देश कहाँ मिलता है, बीकानेर में भुजिया की सबसे प्रामाणिक दुकान कौन सी है, जयपुर में घेवर की बैस्ट दुकान तक कैसे पहुँचा जा सकता है, मैसूरी दोसे और मद्रासी दोसे में क्या फ़र्क होता है, मुम्बई में पाव-भाजी कहाँ जाकर खाई जाए, आपको ऐसी तमाम जानकारियाँ गुप्ता अंकिल को दो-चार पकवान खिलाकर तुरन्त मिल सकती हैं.
चाय के बागानों में ऊँची-ऊँची तनख्वाहों पर प्रोफ़ेशनल टी-टेस्टर्स रक्खे जाते हैं लेकिन पता नहीं क्यों मिठाई बनाने वाले और नमकीन या चाट बनाने वालों को ऐसे एक्सपर्ट्स की ज़रूरत नहीं होती.
अगर उन्हें ऐसे एक्सपर्ट् की ज़रूरत होती तो क्या गुप्ता अंकिल कुमाऊँ यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसरी कर अपनी जि़न्दगी किताबों में माथापच्ची करने और स्टूडेन्ट्स को इंग्लिश लिटरेचर पढ़ाने में बरबाद करते?
वो तो ऊँची तनख्वाह लेकर दिन में चौबीसों घन्टे और साल में तीन सौ पैसठों दिन अपने दोनों हाथों की दसो उंगलियाँ घी में और अपना इकलौता सर कढ़ाई में रख लेते.
पकवानों में डूबते-उतराते गुप्ता अंकिल बच्चे से कब बड़े हो गये यह किसी को पता ही नहीं चला. अब वो बड़े हुए तो उनकी शादी का मौसम भी आ गया.
होने वाली दुल्हन के रूप-रंग, शिक्षा-दीक्षा, घर-परिवार के बारे में मालुमात करना तो औरों की जि़म्मेदारी थी पर शादी से पहले उन्होंने लड़की की अर्थात हमारी होने वाली आंटी की सिर्फ़ पाक-विद्या में परीक्षा ली थी. उनकी बनाई फूली-फूली गोल पूडि़यों, सुडौल स्वादिष्ट समौसों और मूँग की दाल के बने सुनहरे हल्वे ने गुप्ता अंकिल का दिल जीत लिया था. गुप्ता आंटी के पाक-विद्या ज्ञान में जो थोड़ी बहुत कमी थी उसे गुप्ता अंकिल ने दूर कर दिया.
शादी के बाद गुप्ता अंकिल का घर प्रामाणिक कलकतिया सन्देश, मद्रासी दोसा, गुजराती ढोकला, देहलवी चाट, पंजाबी छोलों और बनारसी कलाकन्द का निर्माण केन्द्र बन गया.
गुप्ता आंटी पाक विद्या की हर प्रतियोगिता में कोई न कोई पुरस्कार जीत ही लातीं थीं. इन प्रतियोगिताओं से पहले आंटी की तैयारियों में पकवान चखने का जि़म्मा गुप्ता अंकिल का ही होता था.
अगर वो आंटी के बनाए पकवान को अप्रूव कर देते थे तो उनका प्रतियोगिता में पुरस्कार पाना निश्चित हो जाता था.
अपनी शादी के सात साल गुप्ता अंकिल ने किचिन के इर्द-गिर्द घूमते हुए और पकवानों को चखते हुए गुज़ार दिए पर कुदरत को उनका ऐसा सुख मन्ज़ूर नहीं था.
पकवान बनवाने और उन्हें अकेले ही कम से कम आधा हज़म कर जाने के शौक ने कब उनका वज़न सौ किलो तक पहुँचाया, कब उनकी कमर का नाप फ़ोर्टी फ़ोर इंचेज़ तक पहुँचा, कब उनको बिठाने के लिए रिक्शे वाले डबल किराए की माँग करने लगे और कब उनके नाप के इनर वियर्स ख़ास-ख़ास दुकानों के अलावा छोटी-मोटी दुकानों पर मिलना बन्द हो गए, किसी को पता ही नहीं चला.
एक बार गुप्ता अंकल गम्भीर रूप से बीमार पड़े तो उन्हें तमाम टैस्ट्स कराने पड़े. पता चला कि उनको डायबटीज़ हो गयी है. डॉक्टर्स ने उनकी मिठाइयों पर रोक लगवा दी, चाट-पकौडों जैसी भोली-भाली मासूम चीज़ों के घर आने या उन्हें घर पर ही बनाने पर पाबन्दी लगा दी गयी.
डॉक्टर मेहता, गुप्ता अंकिल के बचपन के दोस्त थे पर इस समय उन्होंने गुप्ता अंकिल के सबसे बड़े दुश्मन का रोल निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
उन्होंने गुप्ता अंकिल के घर के सभी सदस्यों को और हम दोनों बहनों को भी उनके ऊपर जासूस बनाकर छोड़ दिया था.
गुप्ता अंकिल के सभी हितैषियों को उनके हाथ से कोई भी पकवान कहीं भी छीनने का अधिकार डॉक्टर मेहता ने दे दिया था.
गुप्ता अंकिल की मुसीबत यह थी कि उनके सभी करीबी बड़े उत्साह से इस नई जि़म्मेदारी को निभाने के लिए बेताब रहते थे. ख़ासकर उनका नन्हा बेटा बंटी और उनके परम मित्र की बेटियाँ यानी कि हम दोनों बहनें आज भी अपने इस अधिकार का धड़ल्ले से उपयोग कर रही हैं.
गुप्ता अंकिल कभी आंटी की खुशामद कर डायटिंग में थोड़ी ढील दिए जाने की नाकाम कोशिश करते हैं तो कभी अपने ऊपर छोड़े गए जासूस, हम बच्चों को चाकलेट-टॉफ़ी की रिश्वत देकर खाने-पीने का प्रोहिबिटेड माल गड़पने का असफल प्रयास करते हैं. लेकिन हम बड़े प्रिंसिपल्स वाले बच्चे हैं, हमको गुप्ता अंकिल से चाकलेट-टॉफ़ी लेने में कोई ऐतराज़ नहीं है पर अपने फ़र्ज़ से बँधे रहने की वजह से वक़्त रहते ही हम उनकी शिकायत गुप्ता आंटी से कर देते हैं.
आमतौर पर होता यह है कि उनके मुँह में पहुँचने से पहले ही लड्डू उनसे छीन लिया जाता है.
शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, बर्थ-डे पार्टी, मैरिज-एनीवर्सरी, प्रमोशन या गृह-प्रवेश किसी की भी पार्टी हो पर गुप्ता अंकिल की किस्मत में भुना हुआ पापड़, सलाद, सूखी रोटी, सब्ज़ी और दाल ही आते हैं.
सबसे ज़्यादा दुख की बात यह है कि चैम्पियन कुक हमारी गुप्ता आंटी अब अपने पतिदेव के खाने में ड्रापर से घी डालने लगी हैं.
गाजर के हल्वे के साथ गर्मा-गर्म मौइन की कचौडि़यां खिलाने वाली उनकी चैंपियन कुक श्रीमती जी पता नहीं कब किसी फैमिली सीरियल की बेरहम और अत्याचारी सास में तब्दील हो गईं.
गुप्ता अंकिल तो आज भी पकवान चुराने तक को तैयार रहते हैं पर आजकल उनके घर में हर तर माल पर ताला लगा रहता है और हर जगह – ‘चाबी खो जाए’ वाला किस्सा सुनाई देता है.
कैलोरी-चार्ट, वेट-चार्ट, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा, लो कैलोस्ट्रोल-डाइट जैसी नितान्त टैक्निकल बातों से गुप्ता अंकिल जैसे लिटरेचर के प्रोफ़ेसर का क्या लेना देना?
वो कैसे मान लें कि एक छोटा सा रसगुल्ला उनके ब्लड शुगर लेवेल पर कहर ढा सकता है.
तली मूँगफली जैसी मासूम और फ्रेंडली चीज़ को कैलोरीज़ और कार्बोहाइड्रेट का भण्डार कैसे माना जा सकता है?
आलू और अरबी जैसी शानदार सब्जियों के बदले में कोई करेले या तोरई की बोरिंग सब्जियाँ क्यों खाए? फलों में अंगूर, आम, केले और चीकू जैसे शाही फलों से नाता तोड़कर वो खीरे, ककड़ी और मूली-गाजर जैसी घटिया चीज़ों को क्यों अपनाएँ?
पुरानी कहावत है - ‘ पतली ने खाया, मोटी के सर आया. ’
अब उनका वज़न नहीं घटता तो क्या इसके लिए उन्हें दोषी ठहराना चाहिए?
पर कौन समझाए दोस्त से दुश्मन बने डॉक्टर मेहता को और पुराने ज़माने में तर माल खिलाने वाली पर अब सिर्फ़ सलाद खिलाने वाली उनकी अपनी ही श्रीमतीजी को?
सचिन या नवजोत सिंह सिद्धू किसी वन-डे मैच में धड़ाधड़ सिक्सर्स लगायें तो जश्न तो बनता है पर ऐसा कोई भी जश्न हमारे बेचारे गुप्ता अंकल यह जश्न एक-दो लड्डू खाकर भी नहीं मना सकते.
गुप्ता अंकिल की साहित्य-सेवा तो इस संतुलित-आहार ने चौपट ही कर दी है.
तीस ग्राम अंकुरित मूँग और दो सूखे ब्रेड स्लाइसेज़ के साथ फीकी चाय लेकर तो सिर्फ़ घाटे का बजट पेश किया जा सकता है, कहानी या कविता नहीं लिखी जा सकती.
गुप्ता अंकिल की काव्य प्रतिभा चाय के साथ पोटैटो-चिप्स और गर्मा-गर्म पकौड़े खाकर ही निखर पाती है.
डॉक्टर मेहता के इस डायटिंग के कानून से साहित्य-सृजन के क्षेत्र में कितनी हानि हो रही है, इसे कौन समझ पाएगा?
सूखी, उबाऊ और उबली जि़न्दगी जीते-जीते गुप्ता अंकिल तंग आ चुके हैं. टीवी पर बहुत से योगिराज भी उन्हें सताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.
पूरी-पराठों की जगह सूखी रोटी, दम आलू की सब्ज़ी की जगह कच्ची लौकी खाने और करेले का जूस पीने का नुस्खा बता-बता कर उन्होंने गुप्ता आंटी को पहले से भी ज़्यादा सतर्क और स्ट्रिक्ट बना दिया है.
पेटुओं के प्रति बाबाजी लोगों द्वारा कहे गए अपशब्दों के खि़लाफ़ तो गुप्ता अंकिल कोर्ट में मानहानि का मुकदमा करने की भी सोच रहे हैं पर क्या करें, कोई वकील उनकी तरफ़ से ऐसा मुकदमा लड़ने को भी तैयार नहीं है.
पिछली दो-तीन ब्लड-रिपोर्ट्स संतोषजनक आ जाने के बाद डॉक्टर मेहता ने तरस खाकर गुप्ता अंकिल को डायटिंग में कुछ छूट दे दी हैं.
अब वो महीने में एकाद बार कुछ मीठा, कुछ नमकीन खा सकते हैं पर फिर सुबह-शाम उन्हें एक्सट्रा कैलोरीज़ जलाने के लिए पाँच-पाँच किलोमीटर ब्रिस्क वाक करना पड़ता है.
इसके बाद योगिराजों के सुझाए आसन उनको अलग से करने पड़ते हैं.
पापा के सजेशन पर अब उन्हें हर बार बदपरहेज़ी करने पर नीम की तीस पत्तियों खानी पड़ती हैं और करेले का एक गिलास जूस भी पीना पड़ता है.
पर इस छूट मिलने के बाद से गुप्ता अंकिल बड़े रिलैक्स्ड रहने लगे हैं. अब उनका थोड़ा वक्त तर माल खाने में और बहुत सारा वक्त एक्सट्रा कैलोरीज़ जलाने के लिए ब्रिस्क वाक करने में खर्च होता है.
पापा सहित तमाम दोस्तों को मालूम है कि गुप्ता अंकिल अब घर पर कम और सड़क पर कैलोरीज़ जलाने के चक्कर में ज़्यादा मिलते हैं.
गुप्ता अंकिल के संतुलित जीवन से डॉक्टर मेहता भी खुश है और हमारी गुप्ता आंटी भी.
गुप्ता अंकिल आजकल सबको अपनी बैलंस्ड डायट और एक्सरसाइज़ के बारे में बताते रहते हैं पर हम जासूसों ने उनकी चालाकी की पोल खोल दी है.
हमने पता कर लिया है कि मॉर्निंग-वाक के बहाने वो घर से दो चार किलोमीटर दूर जाकर किसी छोटी-मोटी दुकान पर चोरी से समौसे और जलेबी पर हाथ साफ़ कर लेते हैं.
गुप्ता आंटी ने पापा से रिक्वेस्ट की है कि मॉर्निंग-वाक में वो अपने मित्र का साथ दें और उनके पेटूपने पर पूरा कन्ट्रोल रखें. पापा मुस्तैदी से अपने दोस्त के प्रति अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं और उनके नियम तोड़ने पर तुरंत उन्हें एक-दो डन्डे भी रसीद कर देते हैं.
गुप्ता आंटी मॉर्निंग-वाक पर जाने से पहले ही अपने पतिदेव की सभी जेबें खाली कर देती हैं.
गुप्ता अंकिल की एक्सरसाइज़ जारी है.
भुने-चने के गिने-चुने दाने चबाते या बेमन से खीरा-ककड़ी, गाजर-मूली-खीरे का आहार लेते हुए गुप्ता अंकिल अपने हितैषियों को अक्सर कोसते हुए सुने जा सकते हैं पर क्या करें सन्तुलित आहार लेने के सिवा उनके पास कोई और चारा भी तो नहीं है.
हमारे गोल-मटोल गुप्ता अंकिल अब काफ़ी दुबले हो गए हैं. रिक्शे वालों ने उनसे डबल किराया माँगना भी बन्द कर दिया है.
अब एक्स्ट्रा लार्ज साइज़ के कपड़ों की खोज में उन्हें खून-पसीना भी एक नहीं करना पड़ता पर हमारे गुप्ता अंकिल फिर भी खुश नहीं हैं.
गुप्ता अंकल के हिसाब से जीवन में बैलंस्ड-डायट लेने से बड़ी कोई सज़ा नहीं है. उनका मन करता है कि वो बगावत कर दें, पेटूपने के खुले आकाश में फिर से उड़ान भरें पर फिर डॉक्टर मेहता के उपदेश, पापा के डन्डे की मार या गुप्ता आंटी की फटकार के डर से वो डिसिप्लिन्ड सोल्जर की तरह सारे निर्देशों को रिलीजसली फ़ालो करते हुए पाए जाते हैं.

शनिवार, 6 अगस्त 2022

इतिहास के पन्नों से

 25 जुलाई, 1997 भारतीय इतिहास की सबसे शर्मनाक तारीखों में से एक है. इसी तारीख को बिहार के बेताज बादशाह लालू प्रसाद यादव की लगभग काला अक्षर भैंस बराबर धर्मपत्नी श्रीमती राबड़ी देवी ने पहली बार बिहार की मुख्यमंत्री की कुर्सी को सुशोभित किया था.

उन दिनों श्री इंद्रकुमार गुजराल भारत के प्रधानमंत्री थे.

भाई लालू प्रसाद यादव ने इस घटना को भारतीय नारी के उत्थान की ज़िन्दा मिसाल के रूप में पेश किया था लेकिन मेरी दृष्टि में यह भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के मुंह पर एक ज़बर्दस्त तमाचा था.

बिहार के गौरवशाली अतीत के बाद बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में बिहार के अधोपतन की इस चरम परिणति को देख कर मुझे महाकवि दिनकर की अमर रचना –

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है

की याद आ गई थी और उसी अमर रचना को आधार बना कर मैंने अपनी कविता – ‘विध्वंस राग की रचना की थी.

इस कविता में बिहार के उत्थान से ले कर उसके पतन की कहानी है और इसके साथ ही इसमें यह आशंका भी व्यक्त की गयी है कि आज लालू यादव की उत्तराधिकारी बनी राबड़ी देवी कल भारत की प्रधानमंत्री भी बन सकती हैं.      

विध्वंस राग

हे महावीर औ बुद्ध, तुम्हारे दिन बीते,

प्रियदर्शी धम्माशोक, रहे तुम भी रीते.

पतिव्रता नारियों की सूची में नाम न पा,

लज्जित, निराश, धरती में, समा गईं सीते.

नालन्दा, वैशाली, का गौरव म्लान हुआ,

अब चन्द्रगुप्त के वैभव का, अवसान हुआ.

सदियों से कुचली नारी की क्षमता का पहला भान हुआ,

मानवता के कल्याण हेतु, मां रबड़ी का उत्थान हुआ.

घर के दौने से निकल आज, सत्ता का थाल सजाती है,

संकट मोचक बन, स्वामी के, सब विपदा कष्ट मिटाती है.

पद दलित अकल हो गई आज, हर भैंस यही पगुराती है,

अपमानित, मां वीणा धरणी, फिर, लुप्त कहीं हो जाती है.

जन नायक की सम्पूर्ण क्रांति, शोणित के अश्रु बहाती है,

जब चुने फ़रिश्तों की ग़ैरत, बाज़ारों में बिक जाती है.

जनतंत्र तुम्हारा श्राद्ध करा, श्रद्धा के सुमन चढ़ाती है,

बापू के छलनी सीने पर, फिर से गोली बरसाती है.

क्या हुआ, दफ़न है नैतिकता,  या प्रगति रसातल जाती है,

समुदाय-एकता, विघटन के,   दलदल में फंसती जाती है.

फलता है केवल मत्स्य न्याय,  समता की अर्थी जाती है,

क्षत-विक्षत, आहत, आज़ादी,  खुद कफ़न ओढ़ सो जाती है.

पुरवैया झोंको के घर से, विप्लव की आंधी आती है,

फिर से उजड़ेगी, इस भय से बूढ़ी दिल्ली थर्राती है.

पुत्रों के पाद प्रहारों से, भारत की फटती छाती है,

घुटती है दिनकर की वाणी, आवाज़ नई इक आती है -

गुजराल ! सिंहासन खाली कर, पटना से रबड़ी आती है,

गुजराल ! सिंहासन खाली कर, पटना से रबड़ी आती है.’

शनिवार, 30 जुलाई 2022

रजिस्ट्रार गुरु जी

 रजिस्ट्रार गुरु जी से मेरा आशय उन गुरुजन से नहीं है जो कि अध्यापक और रजिस्ट्रार का दायित्व एक साथ सम्हालते हैं बल्कि उन विभूतियों से है जो कि क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति दर्ज करने के लिए या तो अपना अटेंडेंस रजिस्टर खोलते हैं या फिर पढ़ाते समय अपने नोट्स वाले रजिस्टर से उनको इमला लिखाते रहते हैं.

ऐसे सभी गुरुजन के लिए रजिस्टर, जीवन-दायिनी ऑक्सीजन के समान होता है.

अपनी ख़ुद की अक्ल को ताक पर रख कर, दूसरों की बुद्धि के सहारे, आजीवन ज्ञान-बांटने वाली ऐसी नमूना विभूतियों को मैं रजिस्ट्रार गुरु जी कहता हूँ.

जो विद्वान गुरुजन कक्षा में अपने रजिस्टर से अथवा अपनी फ़ाइलों से, नोट्स लिखाने के स्थान पर पॉइंट्स लिखी पुर्चियों पर चोरी-छुपे या खुलेआम निगाह डालते हुए, अटक-अटक कर, छोटे-मोटे लेक्चर देते हैं, उन्हें मैं आदरपूर्वक डिप्टी रजिस्ट्रार कहता हूँ.

 अपने छात्र जीवन में मुझे कई रजिस्ट्रार गुरुजन और कई डिप्टी रजिस्ट्रार गुरुजन से ज्ञान (?) प्राप्त हुआ है.

गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, इटावा में मैं कक्षा 6 में पढ़ता था.

हमारे साइंस के मास्साब को ज़बर्दस्ती हमको संस्कृत पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी दे दी गयी.

हमारे इन मास्साब को संस्कृत का ’, ‘’, ‘भी नहीं आता था.

वो बेचारे संस्कृत गद्य का पाठ भी गा कर करते थे और उसका अर्थ बिना किसी झिझक के, एक रजिस्टर में कुंजी से उतारे हुए नोट्स देख कर हमको लिखवाते थे.

इस प्रकार बचपन में ही मुझे एक रजिस्ट्रार गुरु जी मिल गए थे.

अब मैं कक्षा छह से सीधे अपने बी० ए० के दिनों में आता हूँ.

झाँसी के बुंदेलखंड कॉलेज में इतिहास के हमारे विभागाध्यक्ष डॉक्टर बी० डी० गुप्ता प्रसिद्द विद्वान थे. उनके पढ़ाने के अंदाज़ का मैंने आजीवन अनुकरण किया है पर हमारी बदकिस्मती से बी० ए० फ़ाइनल में उनकी जगह कोई गोलमटोल काली माई नहीं, बल्कि ताड़का जैसी कोई महा-खूंखार मिस तिवारी हमको यूरोप का इतिहास पढ़ाने आ गईं.

मिस तिवारी बहन मायावती की तरह हमेशा बोलते समय रजिस्टर अपने सामने रखती थीं और हमको लेक्चर देने के बजाय सिर्फ़ नोट्स लिखाती रहती थीं.

सबसे दुखदायी बात यह थी कि उनके नोट्स '’राजहंस प्रकाशनकी एक मेड इज़ी की हूबहू कॉपी हुआ करते थे.

हम पीड़ित विद्यार्थी बड़ी हिम्मत कर के राजहंस प्रकाशन की यूरोपीय इतिहास विषयक मेड इज़ी और मैडम तिवारी के इमला कराए नोट्स ले कर डॉक्टर गुप्ता के पास उनकी शिकायत करने गए पर गुरु जी ने मेड इज़ी का और मैडम तिवारी के इमला कराए नोट्स का मिलान करने के स्थान पर हमको डांट कर भगा दिया और साथ में हमको ये चेतावनी भी दे डाली कि अगर हमने मैडम के क्लास में कोई भी और कैसा भी हंगामा किया तो वो हमारे खिलाफ़ एक्शन भी लेंगे.

हम बेचारे खून का घूँट पी कर मिस गोलमटोल तिवारी द्वारा बोली गयी इमला को लिखने को मजबूर हो गए.

कुछ समय पहले मैंने रीतिकालीन कवि आलम और उनकी रंगरेजन प्रेमिका द्वारा संयुक्त रूप से रचित प्रश्नोत्तरनुमा यह दोहा पढ़ा था

कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन,

कटि को कंचन काटि के, कुचन मध्य, धर दीन.

(स्वर्ण-दंड सी सुन्दरी हमारी नायिका की कटि अर्थात कमर इतनी पतली क्यों है?

विधाता ने हमारी नायिका की स्वर्ण-कटि का स्वर्ण निकाल कर उसके कुचों में अर्थात उसके स्तनों में, डाल कर उन्हें पुष्ट कर दिया है)

 ताड़का रूपी मिस तिवारी के ज़बर्दस्ती नोट्स लिखाने के अत्याचार के फलस्वरुप मेरे अन्दर का सोया हुआ कवि जाग उठा और मैंने आलम-रंगरेजन के दोहे की तर्ज़ पर एक दोहा लिख मारा

लौह-घटक सी बाम्हनी, काहे को मति हीन,

मेड इज़ी से नोट्स दे, सब फ़ाइल भर दीन.

मित्रों, मेरी इस धृष्टता को रंगभेदी, जातिवादी और ब्राह्मण-विरोधी मत समझिएगा. यह तो एक प्रसिद्द दोहे को एक अधकचरे कवि द्वारा नया मोड़ देने का निहायत बचकाना और शरारती प्रयास मात्र था.

मेरे इस शरारती दोहे की भनक पता नहीं कैसे हमारे डॉक्टर बी० डी० गुप्ता तक पहुँच गयी.

उन्होंने मिस तिवारी की उपस्थिति में अपने कक्ष में मुझे बुला कर मुझ से मेरा दोहा सुना, फिर मुझे कस कर डांटा पर पता नहीं क्यों मुझे डांटते हुए उनकी खुद की हंसी फूट पड़ी.

दुखी, नाराज़ और भौंचक्की खड़ी मैडम तिवारी के सामने - खी, खी, खीकरते हुए गुप्ता गुरुदेव ने मुझ से भाग जाने को कहा तो फिर मैं वहां से मिल्खा सिंह की स्पीड से अपनी जान बचा कर भाग आया.

लखनऊ विश्ववियालय में मध्यकालीन एवं भारतीय इतिहास में एम० ए० करते समय भी एक रजिस्ट्रार गुरु जी ने हमको बहुत दुखी किया था. हम लोगों ने आन्दोलन कर के उनके नोट्स लिखवाने की आदत पर अंकुश लगवा दिया था. यह बात दूसरी है कि हमारे ये गुरु जी बिना नोट्स देखे जब लेक्चर देते थे तो न तो वो बहादुर शाह प्रथम और बहादुर शाह द्वितीय में कोई फ़र्क करते थे, न बाजीराव प्रथम और  बाजीराव द्वितीय में. यहाँ तक कि वो कई बार असहयोग आन्दोलन और सविनय अवज्ञा आन्दोलन को भी आपस में गड्डम-गड्ड कर देते थे.  

कुमाऊँ विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा परिसर के इतिहास विभाग में जब मेरी नियुक्ति हुई तो मैंने पाया कि मेरे अधिकांश सहयोगी रजिस्ट्रार की भूमिका निभा रहे हैं. मैंने अपने साथियों से उनकी रजिस्ट्रार-प्रवृत्ति का पूर्णतया परित्याग करने का अनुरोध किया.

चंद सहकर्मियों ने तो मेरे प्रस्ताव का स्वागत करते हुए उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया पर प्रतिष्ठित रजिस्ट्रार गुरुजन ने मेरे सुझाव को अपनी शान में गुस्ताख़ी समझ, मेरे ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ दिया.

अल्मोड़ा में मेरे एक सहयोगी थे, अगर वो भूल से अपना पढ़ने वाला चश्मा घर पर ही छोड़ आते थे तो उनके अनुरोध पर या तो मुझे उनकी जगह उनका क्लास लेना पड़ता था या फिर वो विद्यार्थियों के बीच उस दिन फ़िल्मी अन्त्याक्षरी करवा देते थे.

उनके रजिस्टर प्रेम की एक कथा बड़ी प्रसिद्द है.

एक दिन हमारे विद्वान रजिस्ट्रार गुरु जी अपने मुगल इतिहास वाले रजिस्टर से बाबर और राणा सांगा के मध्य हुए खनवा के युद्ध के बारे में विद्यार्थियों को लिखवा रहे थे पर कथा उस दिन पूरी नहीं हो पाई थी. अगले दिन मान्यवर गलती से यूरोपियन हिस्ट्री वाला रजिस्टर ले आए और उन्होंने वॉटरलू के मैदान में राणा सांगा को ड्यूक ऑफ़ वेलिंगटन से हरवा दिया.

मुझे आजीवन अपने रजिस्ट्रार गुरुजन के कोप का भाजन होना पड़ा था, ख़ास कर कि तब, जब कि उनमें से कोई मेरा विभागाध्यक्ष बन कर, मेरी छाती पर मूंग दलने के लिए बैठ गया हो.

पर मैं अपनी आदत से मजबूर ख़ुद को कैसे सुधारता?

लाख प्रताड़ना के बाद भी रजिस्ट्रार गुरुजन को मैं काहिल, जाहिल और गुरु के नाम पर कलंक मान कर उनका पुरज़ोर विरोध करने से कभी बाज़ नहीं आया.

अवकाश-प्राप्ति के एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी रजिस्ट्रार गुरुजन के खिलाफ़ मेरी यह मुहिम, मेरी यह जंग, आज भी जारी है.

यह बात और है कि अब यह जंग फ़ेसबुक तक या फिर मेरे ब्लॉग तक ही सीमित रह गयी है और अब इस से मेरी जान जाने का या मेरी पेंशन रोक दिए जाने का, कोई ख़तरा नहीं रह गया है.