शनिवार, 6 जून 2026

शौक़-ए-मुदर्रिसी

 

बादशाह शाहजहाँ की आँखों के सामने ही उसका राज-पाट चला गया, उसके तीन बेटे मौत के घाट उतार दिए गए और उसे आगरे के किले के मुसम्मन बुर्ज में ताज़िंदगी एक क़ैदी की हैसियत से दिन गुज़ारने के लिए मजबूर कर दिया गया. अकेला बूढ़ा, बेबस, लाचार, गमगीन और मायूस क़ैदी करे तो क्या करे?

शाहजहाँ ने एक क़ासिद (सन्देश वाहक) के ज़रिए अपने बेटे बादशाह औरंगज़ेब को संदेसा भिजवाया कि ख़ाली वक़्त गुज़ारने के लिए उसके पास कुछ बच्चे भेज दिए जाएं जिनको कि पढ़ा कर वह अपना वक़्त गुज़ार सके और अपना मन बहला सके. बादशाह औरंगज़ेब ने शाहजहाँ की यह गुज़ारिश ठुकराते हुए क़ासिद से कहा

अब्बा हुज़ूर अब बादशाह तो नहीं रहे पर अब वो उस्ताद बन कर अपने शागिर्दों पर अपना हुक्म चला कर अपनी बादशाहत का शौक़ पूरा करना चाहते हैं.

औरंगज़ेब की तरह मेरी नज़र में भी शौक़-ए-मुदर्रिसी और शौक़-ए-बादशाहत में कोई ख़ास फ़र्क नहीं है.

अपने बचपन से ही डेरोज़ियो जैसा अध्यापक बनने की मेरी तमन्ना हुआ करती थी.

बी० ए० और एम० ए० करने के दौरान अपने ही साथियों का क्लास लेने में मुझे बड़ा मज़ा आता था.

यहाँ डेरोज़ियो के बारे में कुछ बता दूं.

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथमार्ध में कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज के सबसे लोकप्रिय अध्यापक डेरोज़ियो का मुदर्रिसी (अध्यापन) का जुनून (पागलपन) इतना ज़्यादा था कि वो कॉलेज में क्लास रूम्स बंद हो जाने के बाद कॉलेज के वरांडे में क्लास लेने लगता था और कॉलेज का फाटक बंद हो जाने पर इच्छुक छात्रों को अपने घर पर बुला कर पढ़ाने लगता था. 23 साल की अल्पायु में अपने प्राण त्यागने से पहले उस ने बंगाल में जागरूक-प्रगतिशील युवकों की एक बड़ी जमात तैयार कर दी थी.

एक प्रवक्ता के रूप में लखनऊ यूनिवर्सिटी में अपनी पारी शुरू करते समय मेरा भी सपना था कि मैं अपने विद्यार्थियों के मानस-पटल पर डेरोज़ियो की जैसी छाप छोड़ सकूं.

मेरा यह सपना तो कभी पूरा नहीं हुआ लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुझे पढ़ाने में हमेशा बहुत आनंद आया.

डायस पर खड़े हो कर, एकाग्र चित्त विद्यार्थियों को पिन-ड्रॉप साइलेंस के माहौल में पढ़ाने के नशे के सामने किसी शराब का नशा क्या होता होगा?

मेरा यह मानना है कि इतिहास के उबाऊ वृतांतों को ऐतिहासिक अंतर्कथाओं से और समकालीन साहित्य में उनकी अभिव्यक्ति के साथ जोड़ने से, उन्हें रोचक बनाया जा सकता है.

मुझे लेक्चर के लिए 45 मिनट का पीरियड बहुत छोटा लगता था.

समय बचाने के लिए मैं क्लास में अटेंडेंस रजिस्टर लेकर जाता ही नहीं था.

कुमाऊँ विश्विद्यालय के अल्मोड़ा परिसर में एक बार हमारे वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर एम० डी० उपाध्याय मेरे क्लास में इंस्पेक्शन करने आए थे.  

उन्होंने मुझे 5 मिनट तक पढ़ाते हुए देखा फिर मुझे क्लास से बाहर ले जा कर कहा –

 

'जैसवाल, तुम पढ़ाते तो अच्छा हो पर मैंने देखा कि तुम्हारे पास अटेंडेंस रजिस्टर तो है ही नहीं. ऐसा क्यों करते हो भाई?'

मैंने जवाब दिया –

'सर, मैं 5 मिनट अटेंडेंस लेने में खर्च करने के बजाय उसे पढ़ाने में खर्च करता हूँ.'

मेरी पीठ थपथपाने के बाद जाते-जाते कुलपति महोदय ने मुझ से हँसते हुए कहा था

'मेरे कहने से महीने में एकाद बार अटेंडेंस ले लिया करो.'

एक रहस्य की बात बताऊँ – किसी भी विश्वविद्यालय में एक अध्यापक को शौक़-ए-मुदर्रिसी को पूरा करने के मौके बहुत कम ही मिल पाते हैं.

एडमिशन की लम्बी प्रक्रिया, चुनाव, हड़तालें, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, वार्षिक समारोह, कन्वोकेशन, परीक्षा, परिणाम आदि के अलावा वैकेशंस और फिर अल्लम-गल्लम छुट्टियों (प्रिवेलेज लीव, कैज़ुअल लीव, मेडिकल लीव, ड्यूटी लीव, फ़्रेंच लीव, शोक सभाएं आदि).

मुझे याद नहीं पड़ता कि इन घोषित-अघोषित छुट्टियों की कृपा से एक अध्यापक के रूप में अपने 36 साल के कैरियर में कभी एक सत्र में मेरे 100 से अधिक दिन क्लास हुए हों.

(मेरे जो भी साथी मेरे इस पोल-खोल कार्यक्रम से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं और यह दावा करते हैं कि उन्होंने हर सत्र में 150-200 दिन पढ़ाया है, उन्हें मैं झूठाचार्यऔर फेंकाचार्यका ख़िताब देना चाहूँगा.)

अल्मोड़ा परिसर के हमारे इतिहास विभाग के विद्यार्थियों को क्लास से गायब होना बहुत भाता था. उन्हें पढने-लिखने के बजाय - आपस में गुफ़्तगू करना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ज़रुरत से ज़्यादा महत्व देना, छात्र-राजनीति को ही अपना कैरियर बनाना और लैला-मजनूँ, रोमियो-जूलियट की कथा को पुनर्जीवित करना, कहीं ज़्यादा अच्छा लगता था.

क्लासरूम में दीवारों को मैं कब तक पढ़ाता?

कभी उक्ता कर मैं लाइब्रेरी चला जाता तो कभी कविताएँ-कहानी लिख कर अपना मन बहलाता तो कभी किसी दूसरे विभाग में जा कर श्रद्धालु मित्रों की फ़रमाइश पर उन्हें ऐतिहासिक और साहित्यिक किस्से सुनाता.

मुझे पता था कि मैं कोई चाणक्य नहीं था जो मुझे कोई चन्द्रगुप्त मौर्य मिल जाता, न ही मैं कोई समर्थ गुरु राम दास था जो किसी वीर शिवा को छत्रपति शिवाजी बना देता. और मैं स्वामी रामकृष्ण परम हंस तो क़तई नहीं था जिनका कि सन्देश ले कर कोई स्वामी विवेकानंद भारतीय धर्म-दर्शन की पताका समूची दुनिया में फहरा दे.  

फिर भी मुझे तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) की हमेशा सख्त ज़रुरत रहा करती थी.

अवकाश-प्राप्ति से दो साल पहले की बात है.

मैं ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. मेरे सामने की सीट पर एक अपरिचित नौजवान बैठा था. उस नौजवान ने मुझे बड़ी श्रद्धा से नमस्कार किया. फिर मुझ से पूछा

माफ़ कीजिएगा सर ! क्या आप प्रोफ़ेसर जैसवाल हैं?’

मैंने हामी भरी तो उसने बताया कि वह कुमाऊँ विश्वविद्यालय के नैनीताल परिसर से इतिहास में एम० ए० कर चुका है और मुझे नैनीताल में राष्ट्रीय आन्दोलन पर आयोजित एक सेमिनार में सुन कर वह मेरा प्रशंसक बन चुका है.

धन्यवाद की औपचारिकता के बाद उसने मुझ पर एक सवाल दाग दिया-

सर, गांधी जी की डांडी-मार्च को आप कहाँ तक सही मानते हैं?’

मैंने कहा

बालक ! तूने तो मुझे बड़ी मुश्किल में डाल दिया. मेरे तो समझ में ही नहीं आ रहा कि तेरे सवाल का मैं क्या जवाब दूं.

बालक को मेरी मुश्किल क़तई समझ में नहीं आई. डांडी-मार्च पर तो कोई बच्चा भी बोल सकता था फिर जैसवाल साहब - -- -- ?

मैंने उस बालक को अपनी मुश्किल समझाते हुए कहा

मेरे समझ में ये नहीं आ रहा है कि तेरे सवाल का जवाब मैं काठगोदाम से लाल कुआँ तक दूं या रूद्रपुर तक दूं या फिर दिल्ली तक !

बालक ने हंसते हुए मेरे चरण गहे और फिर मेरे जवाब को हद से हद, काठगोदाम से रुद्रपुर तक सीमित करने की प्रार्थना भी कर डाली.

अब मुझे रिटायर हुए पंद्रह साल हो चुके हैं.

ग्रेटर नॉएडा में मेरा शौक़-ए-मुदर्रिसी कुंठित और उदास है.

यहाँ तो कोई परिंदा भी इतिहास में और साहित्य में दिलचस्पी लेने वाला नहीं मिलता.

सुबह-शाम टहलते वक़्त मिलने वाले परिचित सज्जन भी मेरा वाकिंग क्लास अटेंड करने के बजाय मुझे दूर से ही नमस्कार करने में अपनी भलाई समझते हैं.

झक मार कर मैं जब अपनी श्रीमती जी को ही अपना विद्यार्थी बनाने की कोशिश करता हूँ तो वो अचानक से पी. टी. उषा का अवतार बन जाती हैं.

अगर मैं अपनी दोनों बेटियों में से किसी को भी वीडियो चैटिंग के ज़रिए कोई रोचक किन्तु विस्तृत ऐतिहासिक या साहित्यिक क़िस्सा सुनाना चाहूं तो वो अपने बच्चों की काल्पनिक या फिर वास्तविक, पुकार पर मुझ से सॉरी कह कर भाग खड़ी होती हैं.

अंतरात्मा से निकली आवाज़ मुझसे पूछती रहती रहती है –

तू किराए के भी शागिर्द नहीं पाता है  

क्लास लेने को तू फिर भी तड़पता क्यों है

सो जा चाणक्य न अब चन्द्रगुप्त आएगा

खोल कर अपनी शिखा व्यर्थ भटकता क्यों है

मुझ ज़बर्दस्ती के चाणक्य को अगर अपना चन्द्रगुप्त भारत में नहीं मिला तो मैं किसी जंगल में जा कर किसी हिरन को, किसी जंगली बिल्ली को, पढ़ाने लगूंगा.

शौक़-ए-मुदर्रिसी मुझे था, आज भी है और आगे भी यही मेरी बैटरी चार्ज-रिचार्ज करता रहेगा.

भला हो मेरे फ़ेसबुक के और मेरे ब्लॉग के मित्रों का, इन्होंने मेरे शौक-ए-मुदर्रिसी को आज भी ज़िन्दा रखा है.

अपने फ़ेसबुक मित्रों को और अपने ब्लॉग के पाठकों को मैं ज़बर्दस्ती अपना जिज्ञासु विद्यार्थी मानते हुए उनके जब-तब क्लास लेता रहता हूँ.

ऐ बदनसीब शाहजहाँ ! तेरे ज़माने में अगर फ़ेसबुक होता और अपने ब्लॉग पर तुझे कुछ भी अल्लम-गल्लम लिखने की आज़ादी होती तो तू शागिर्दों के लिए इतना न तड़पता.

मुदर्रिसी के बहाने तेरा शौक़-ए-बादशाहत तो शागिर्दों की गैरमौजूदगी में भी पूरा हो जाता.

तो फ़ेसबुक के और मेरे ब्लॉग के मित्रों ! आज का पाठ अब संपन्न हुआ. जल्द ऐसी ही ज़बर्दस्ती आयोजित की गयी कक्षा में मैं आप से फिर मिलूंगा.

 

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

धर्म-संस्कृति रक्षण का एक ऐतिहासिक और अनुकरणीय??? अभियान –

भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण दावा करते हैं कि –
जब-जब धर्म का पतन होता है, और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं सज्जनों के कल्याण हेतु और दुष्टों के विनाश हेतु जन्म लेता हूँ.
कलयुग में अपनी व्यस्तता के कारण भगवान जी ने धर्म-संस्कृति के संरक्षण का और उनकी पुनर्स्थापना का दायित्व आंग्ल भाषा के ज्ञान में काला अक्षर, भैंस बराबर, खुलेआम नक़ल कर के परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वाले, किन्तु लाठियां चलाने में और गालियाँ देने में निपुण, युवा धर्म-संस्कृति रक्षकों को सौंप दिया है.
इन्हीं धर्म-संस्कृति रक्षकों की ठीक 51 साल पुरानी दो साहसिक लीलाएं मुझे याद आ रही हैं.
लखनऊ विश्वविद्यालय में उन दिनों तथाकथित धर्म-संस्कृति रक्षकों ने एक फ़तवा जारी किया था –
‘कोई लड़का अगर किसी लड़की से बात करते हुए पाया गया तो उसकी जम कर तुड़ाई होगी लेकिन अपराधी लड़की को सिर्फ़ गाली-गलौज कर के और आगे से ऐसी कोई हरक़त न करने की हिदायत दे कर छोड़ दिया जाएगा.’
एक बार हमारे विभाग में एम. ए. प्रथम वर्ष का एक मेधावी और बहुत ही भला लड़का कॉरिडोर में लड़कियों से बात करते हुए पाया गया था. हमारे धर्म-संस्कृति रक्षकों के एक दल ने उस लड़के की ऐसी भयंकर पिटाई की कि उसने अस्पताल से छुट्टी मिलते ही लखनऊ विश्वविद्यालय से भी अपनी छुट्टी करा ली.
इस घटना के कुछ दिनों बाद की एक संभावित दुर्घटना का ज़िक्र किया जाना भी ज़रूरी है.
24 साल की उम्र में 1 जनवरी, 1975 को मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के आधुनिक एवं मध्यकालीन इतिहास विभाग में प्रवक्ता के पद पर नियुक्त हुआ था.
ठीक-ठाक से लगने वाले नौजवान गुरुजन छात्राओं में काफ़ी लोकप्रिय होते हैं.
इस ख़ाकसार को भी ऐसी लोकप्रियता हासिल थी.
कई छात्राएं क्लास ख़त्म होने के बाद विभाग के कॉरिडोर में मुझ से सवाल करने के लिए मुझे घेर लिया करती थीं.
एक बार संस्कृति-रक्षकों के एक दल ने कॉरिडोर में लड़कियों से बातें करते हुए मुझे देख लिया. उस दल के मुखिया ने मुझ से पूछा –
‘ए कन्हैया ! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम खुले आम गोपियों के साथ रासलीला रचाओ. क्या तुम्हें हमारे फ़रमान का इल्म नहीं है?’
मैं जब तक कोई जवाब दूं तब तक उस दल में शामिल, मेरे हॉस्टल के एक नामी गुंडे और अब स्वघोषित संस्कृति-रक्षक ने घोषणा की –
‘अरे ये तो अपना गोपू (गोपेश मोहन जैसवाल) है. कुछ दिन पहले ही ये हिस्ट्री में लेक्चरर हुआ है’
जिस शख्स की तमाम नापाक हरक़तों की वजह से मैं उस से बेइंतेहा नफ़रत करता था, उस दिन मेरा मन उसकी आरती उतारने का कर रहा था.
संस्कृति-रक्षकों के कोप से मैं तो बच गया था लेकिन आए दिन कोई न कोई बदनसीब उनके कोप का शिकार तो हुआ ही करता था.
ख़ुद इन संस्कृति रक्षकों द्वारा नियमित रूप से लड़कियां छेड़ी जाती थीं.
संस्कृति-रक्षक दल के कई उत्साही कार्यकर्ता ख़ूबसूरत लड़कों की तलाश में बॉयज़ होस्टल्स के चक्कर भी लगाया करते थे. उनकी दलील थी –
‘जब लड़कियां हमको घास नहीं डालतीं तो फिर हमको शिकार करने के लिए बॉयज़ होस्टल्स के चक्कर ही तो लगाने पड़ेंगे.’
बचपन में हम लोग एक गीत गाते थे – ‘लाठी ले कर भालू आया ----’
आज लाखों पीड़ित लड़के-लड़कियां आर्तनाद करते हैं - ‘लाठी ले कर संस्कृति-रक्षक आया ----’
हमारी जवानी के ज़माने में वैलेन्टाइल डे का तो चलन भी नहीं था लेकिन आज यह युवकों-युवतियों का राष्ट्रीय पर्व बन गया है.
अगर किसी को पाश्चात्य संस्कृति की यह अंधी नक़ल पसंद नहीं है तो वह उसे अपने जीवन में न अपनाए लेकिन उसको इसका हिंसक विरोध करने का कोई अधिकार नहीं है.
कई प्रांतीय सरकारों ने बेटे-बेटियों को भारतीय संस्कृति को अपने जीवन में अपनाने के लिए एंटी रोमियो स्क्वैड नियुक्त किए हैं.
भारतीय संस्कृति को न अपना कर रोमियो या जूलियट बनने वाले/वाली अपराधियों/अपराधिनियों को तथाकथित संस्कृति रक्षक और एंटी रोमियो स्क्वैड वाले सार्वजनिक स्थानों पर पीट कर और उन से मोटी रक़म वसूल कर ही उन्हें छोड़ते हैं.
दुःख की बात यह है कि विभिन्न सरकारों की ओर से संस्कृति-रक्षण के नाम पर ऐसी गुंडागर्दी को बेशर्मी के साथ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण और पोषण दिया जा रहा है.
इस विषय में भगवान जी ने शायद साल में चातुर्मासी शयन के बजाय बारहमासी शयन करने का निश्चय कर लिया है.
संकटमोचक हनुमान जी की महिमा का बखान करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं
‘भूत-पिसाच निकट नहीं आवें, महावीर जब नाम सुनावें’
संस्कृति-रक्षकों के अत्याचारों से पीड़ित आज की भयभीत नौजवान पीढ़ी बारहमासी शयन में लीन भगवान जी को जगाने का असफल प्रयास करते हुए प्रार्थना करती है –
‘भूत-पिसाच भले आ आवें, संस्कृति रक्षक पास न आवें’

रविवार, 17 अगस्त 2025

आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत

 बहुत से नादान वैज्ञानिक ऐसे-ऐसे घातक सिद्धांतों का प्रतिपादन कर देते हैं जिनके कि परिणाम हम जैसे निरीह प्राणियों को ताज़िंदगी भुगतने पड़ते हैं.

हमारी ज़िंदगी में आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत सबसे घातक और पीड़ादायक रहा है.
लखनऊ विश्वविद्यालय में पांच साल पढ़ाने के बाद विभागीय षड्यंत्रों की बदौलत हम बेरोज़गार हो कर सड़क पर आ गए थे.
69 दिनों तक बेरोज़गारी की व्यथा सह कर हमने गवर्नमेंट पी० जी० कॉलेज बागेश्वर में प्रवक्ता के रूप में अपनी दाल-रोटी की फिर से व्यवस्था कर ली थी लेकिन हम इस बात पर खुश होने के बजाय निहायत दुखी और निराश थे.
इस घोर निराशा का और इस अथाह दुःख का कारण आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत था.
बागेश्वर प्रवास के आठों महीने हमने रो-रो कर और सिसक-सिसक कर गुज़ारे थे.
कभी हम लखनऊ विश्वविद्यालय के महलनुमा भवनों की तुलना में बागेश्वर के अपने सात कमरों वाले कॉलेज तो देखते थे, कभी हम लखनऊ विश्वविद्यालय के अपने मेधावी विद्यार्थियों के सापेक्ष बागेश्वर के अक्ल से अक्सर पैदल विद्यार्थियों को देखते थे तो कभी लखनऊ विश्वविद्यालय के स्मार्ट और टिपटॉप गुरुजन के सापेक्ष शेर छाप बीड़ी सुलगाते हुए और आयुर्वेदिक दवाओं के नाम पर देसी ठर्रा (उन दिनों बागेश्वर में मद्य-निषेध लागू था) पीते हुए देखते थे.
हमको निराश और दुखी हो कर अवसादपूर्ण कविताएँ लिखने की प्रेरणा इसी कमबख्त आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से प्राप्त हुई थी.
अल्मोड़ा के 31 साल के प्रवास में भी आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत ने परेशान करने में हमारा पीछा नहीं छोड़ा.
बरसों तक हम टेल ऑफ़ दि डिपार्टमेंट कहलाते रहे.
हमसे चार-चार साल छोटे दो सहकर्मी पूरे 31 साल तक हमारे सीनियर रहे.
विभाग से हट कर बाक़ी ज़िंदगी में भी आइन्स्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत ने हमारा जीना हराम कर रखा था.
अल्मोड़ा में बरसों तक हम छोटे से घुचकुल्ली मकानों में रहे जहाँ अक्सर जलापूर्ति में बाधा आती रहती थी और हम पति-पत्नी सहित हमारी दोनों बेटियों तक को दूर स्थित नौले (प्राकृतिक जल-स्रोत) से या फिर दूसरे घरों से पानी ढो कर लाना पड़ता था.
हमारे सामने हमारे वो भाग्यशाली साथी अपनी मूंछों पर ताव देते थे जो कि विश्वविद्यालय द्वारा आवंटित मकानों में या फिर अपने ख़ुद के अच्छे-खासे घरों में रहते थे और जिन्हें पानी ढो कर लाना सिर्फ़ मेटों-कुलियों का काम लगता था.
1980 में हम जब अल्मोड़ा आए थे तब हमारे साथियों में इक्का-दुक्का लोगों के पास कारें और दर्जन भर के पास दुपहिया वाहन हुआ करते थे लेकिन धीरे-धीरे उन में से ज़्यादातर के पास कारें होने लगीं.
हम और हमारे परिवार के सदस्य गांधी जी की दांडी-मार्च का ही अनुसरण करते रहे.
हमारे कुछ प्रशंसकों ने तो हमारा नाम ही -‘प्रोफ़ेसर आजीवन पैदल’ रख दिया था.
फिर हम रिटायर हो गए और ग्रेटर नॉएडा में अपने ख़ुद के मकान में शिफ्ट हो गए.
‘दुःख भरे दिन बीते रे भैया,
अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया लायो रे.’
अब तो ठाठ थे बाबू जी के.
दो सौ वर्ग मीटर के प्लाट पर बने अपने थ्री बेडरूम हाउस में रहने का हमारा सपना अब जा कर साकार हुआ था.
हमारी दोनों बेटियां भी सेटल हो गईं थीं.
और तो और – ‘प्रोफ़ेसर आजीवन पैदल’कहलाने वाले रिटायर्ड गुरु जी अब शानदार-जानदार आल्टो 800 कार के मालिक भी बन गए थे.
12 दिन के पैकेज टूर पर हम इंग्लैंड, फ्रांस, स्विटज़रलैंड ,ऑस्ट्रिया और इटली की सैर भी कर आए थे.
दुबईवासिनी बेटी गीतिका के सौजन्य से हमने तीन बार यूएई भ्रमण का आनंद भी ले लिया था.
अब तो हमको यह गीत गाना ही था –
‘आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे ----’
लेकिन फिर इस दुष्ट सापेक्षता के सिद्धांत ने हमारे रंग में भंग कर दिया.
हमारे गृहप्रवेश में एक वीआईपी भी पधारे थे. उन्होंने बड़ी देर तक हमारे घर का मुआयना किया फिर एक हिकारत भरी नज़र हम पर डाल कर उन्होंने एक सवाल दाग दिया –
‘इसमें न तो लॉन है और न ही किचन गार्डन और बेडरूम्स तो सिर्फ़ तीन हैं. इतने छोटे मकान में तुम लोग मैनेज कैसे करते हो?’
हमने कुढ़ कर जवाब दिया –
‘बाक़ी तो मैनेज हो जाता है पर घर में स्विमिंग पूल और गोल्फ़ कोर्स न होने की वजह से बड़ी दिक्क़त होती है.’
हमारी विदेश यात्राओं के विवरण देने के साथ हम यह बताना भूल गए कि हमारे सभी भाई-बहन बरसों तक विदेशों में रहे हैं.
एक हज़ार से ऊपर कार वाले हमारे सेक्टर में हमारी आल्टो 800 जैसी छोटी कारें मुश्किल से पांच-छह होंगी.
अपने साइज़ से ट्रकों को और बसों को टक्कर देने वाली कारों के मालिकान हमको और हमारी कार को न जाने क्यूं मक्खी-मच्छर की केटेगरी में रखते हैं.
जुलाई के महीने में हमको इनकम टैक्स रिटर्न भरना था.
हमारे एक वीआईपी शुभचिंतक ने हमसे पूछा –
‘तुम्हारी एनुअल इनकम क्या है?’
हमने निसंकोच उन्हें अपनी वार्षिक आय बता दी.
हमारे द्वारा प्रदत्त सूचना पर उनकी इस टिप्पणी से हमारे तन-बदन में आग लग गयी –
‘अरे ! इस से ज़्यादा तो हमने इस साल इनकम टैक्स भरा है.’
टीवी पर हम सबने यह विज्ञापन हज़ारों बार देखा होगा –
‘उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफ़ेद क्यों?’
छोटी सी पेंशन में, छोटे से मकान में, छोटी सी पुरानी कार, छोटे से फ्रिज, छोटे से टीवी, एकाद पुराने पड़ चुके एसी, साधारण से सोफ़े, सस्ते से कार्पेट के साथ, फाइव स्टार होटल्स-रेस्टोरेंट्स जाए बिना और बिना नौकर-चाकर के हुजूम के, हम आराम से जी तो सकते हैं लेकिन आइन्स्टीन का यह सापेक्षता का सिद्धांत बार-बार हमारे सुख-चैन के आड़े आ कर हमको यह याद दिला देता है कि हमारी कमीज़ से ज़्यादा सफ़ेद कमीज़ें हमारे निकटस्थ-दूरस्थ सम्बन्धियों, पड़ौसियों, दोस्तों और दुश्मनों की हैं.
किराए के टूटे-फूटे मकान में रहते हुए और कभी भी चुकाए न जाने वाले उधार की शराब पीते हुए मिर्ज़ा ग़ालिब ने हमारे जैसे एहसास-ए-कमतरी (हीनता की भावना) में कहा है –
‘रहिए अब ऐसी जगह चल कर, जहाँ कोई न हो.’
और अब हम कह रहे हैं –
'रहिए अब ऐसी जगह चल कर, जहाँ आइन्स्टीन का सापेक्षता का सिद्धांत लागू न हो.’