रविवार, 2 अक्तूबर 2022

आगे बढ़ो बाबा

 एक हाथ में लाठी ठक-ठक,

और एक में,

सत्य, अहिंसा तथा धर्म का,

टूटा-फूटा, लिए कटोरा.  

धोती फटी सी, लटी दुपटी,

अरु पायं उपानहिं की, नहिं सामा,

राजा की नगरी फिर आया,

बिना बुलाए एक सुदामा.

बतलाता वो ख़ुद को, बापू,

जिसे भुला बैठे हैं बेटे,

रात किसी महफ़िल में थे वो,

अब जाकर बिस्तर पर लेटे.

लाठी की कर्कश ठक-ठक से,

नींद को उनके, उड़ जाना था,

गुस्ताख़ी करने वाले पर,

गुस्सा तो, बेशक़ आना था.

टॉमी को, खुलवा मजबूरन,

उसके पीछे, दौड़ाना था,

लेकिन एक भले मानुस को,

जान बचाने आ जाना था.

टॉमी को इक घुड़की दे कर,

बाबा से फिर दूर भगाया,

गिरा हुआ चश्मा उसका फिर,

उसके हाथों में थमवाया.

बाबा लौटा ठक-ठक कर के,

नयन कटोरों में जल भर के,

जीते जी कब चैन मिला था,

निर्वासन ही पाया मर के. 

भारत दो टुकड़े करवाया,

शत्रु-देश को धन दिलवाया,

नाथू जैसे देश-रत्न को,

मर कर फांसी पर चढ़वाया.

राष्ट्रपिता कहलाता था वह,

राष्ट्र-शत्रु पर अब कहलाए,

बहुत दिनों गुमराह किया था,

कलई खुल गयी वापस जाए.

विश्व उसे जानता नहीं है,

देश उसे मानता नहीं है,

उसकी राह पे चलने का प्रण,

अब कोई ठानता नहीं है.

बाबा अति प्राचीन हो गया,

पुरातत्व का सीन हो गया,

उसे समझना मुश्किल है अब,

भैंस के आगे बीन हो गया.

दो अक्टूबर का अब यह दिन,

उसे भुलाने का ही दिन है,

तकली-चरखा जला, आज तो,

मधुशाला जाने का दिन है.

आओ उसकी लाठी ले कर,

इक-दूजे का हम सर फोड़ें,

विघटित, खंडित, आहत, भारत,

नए सिरे से फिर हम तोड़ें.

विघटित, खंडित, आहत, भारत,

नए सिरे से फिर हम तोड़ें.


गुरुवार, 29 सितंबर 2022

भाषणनामा

 1.

ख़्वाब में भाषण तेरा सुन कर मुझे गश आ गया

दिन में भाषण कम रहे क्या रात भी जो, खा गया

2.

त्याग और बलिदान हमेशा भाषण में जपना होता है

कुर्सी पर दम तोड़ सकूं मैं एक यही सपना होता है 

3.

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

दुष्यंत कुमार

हद के पार ग़लतफ़हमी -

वो भाषण सुन के पत्थर को उठाने झुक गया होगा

वो सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

4.

उनको देखे से जो आ जाती है मुंह पे रौनक

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

मिर्ज़ा ग़ालिब

बहरे ही ख़ुशकिस्मत –

उनके भाषण से चली जाती है मुंह की रौनक

जो भी बहरा है यहाँ उसका ही हाल अच्छा है 

रविवार, 25 सितंबर 2022

एक सच्चा स्वतंत्रता सेनानी

 1976 की बात है. माता इंदिरा गांधी की कृपा से तब देश में इमरजेंसी लगी हुई थी.

उन दिनों पिताजी हरदोई में चीफ़ जुडिशिअल मजिस्ट्रेट थे.

1972 में भारत की स्वतंत्रता के 25 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन दिए जाने की घोषणा की गयी थी लेकिन इस योजना का कार्यान्वयन इमरजेंसी के दौरान ही हो पाया था.

एक बार पिताजी अपने रूटीन चेकअप के लिए हरदोई के डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल गए थे जहाँ पर उनकी मुलाक़ात सी० एम० ओ० (चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर) से हो गयी.

पिताजी को चाय पिलाने के लिए सी० एम० ओ० अपने कमरे में ले गए.

कुछ देर बाद गैरिक वस्त्रधारी, त्रिपुंडधारी, त्रिशूलधारी , जटाधारी, दाढ़ीधारी और कमंडलधारी, एक नौजवान बाबा जी उस कमरे में पधारे.

सी० एम० ओ० ने बाबा जी को ससम्मान कुर्सी पर बिठाया और फिर उन

से उनके पधारने का कारण पूछा.

बाबा जी ने पहले सी० एम० ओ० साहब को और पिताजी को हरद्वार से लाया हुआ प्रसाद दिया फिर अपने पधारने का कारण बताए हुए बिना ही देश के लिए, धर्म के लिए और समाज के लिए, अपने त्याग-बलिदान की गौरव-गाथा का बखान करना शुरू कर दिया.

कैसे दिव्य-आत्मबोध के बाद उन्होंने गृह-त्याग किया, कैसे उन्होंने हिमालय की कंदराओं में एक सिद्ध योगी के निर्देशन में तप-साधना की, कैसे वो गांधी जी की पुकार पर स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े और कैसे उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेते समय अपने कंधे पर पुलिस की एक गोली खाई.

इस गौरव-गाथा को सुनने के बाद सी० एम० ओ० ने किंचित आश्चर्य से बाबा जी से पूछा –

आपने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया था? आप तो मुश्किल से 40 साल के लगते हैं बाबा जी.

बाबा जी ने मुस्कुराते हुए रहस्योद्घाटन किया –

बच्चा ! हमने योग साधना से अपने यौवन को स्थायी बना लिया है. वैसे हमारी आयु 60 साल की है.

सी० एम० ओ० ने हाथ जोड़ कर बाबा जी से पूछा –

बाबा जी, आप मुझ से क्या चाहते हैं?’

बाबा जी ने अपने कंधे पर एक गहरी चोट का सा निशान दिखाते हुए कहा –

आप हमको यह प्रमाणपत्र दे दीजिए कि हमने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में गोली खाई है.’

नादान सी० एम० ओ० ने पूछा –

मैं आपको ऐसा प्रमाणपत्र कैसे दे सकता हूँ और ऐसा प्रमाणपत्र मिलने से आपको क्या लाभ हो सकता है?’

बाबा जी ने फ़रमाया –

इस प्रमाणपत्र के आधार पर हमको स्वतंत्रता सेनानी वाली पेंशन मिल जाएगी और आपको धर्म-लाभ मिलेगा.

सी० एम० ओ० ने बाबा जी के कंधे पर उस गहरी चोट के जैसे निशान का बाकायदा मुआयना किया फिर अपनी असमर्थता जताते हुए उन से कहा –

बाबा जी इस घाव के निशान को देख कर न तो यकीनी तौर पर यह कहा जा सकता है कि यह ठीक 34 साल पुराने घाव का निशान है और

न ही यह बताया जा सकता है कि यह निशान गोली लगने से ही हुआ है. हाँ, अगर गोली अभी भी आपके कंधे में अटकी हुई है तो एक्स रे कर के उसका पता लगाया जा सकता है.

वैसे अगर आपको गोली लगी भी हो तो कोई डॉक्टर यह प्रमाणपत्र कैसे दे सकता है कि गोली आपको भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेते वक़्त लगी है?’

फिर सी० एम० ओ० ने पिताजी की तरफ़ इशारा करते हुए बाबा जी से कहा –

ये साहब हरदोई के चीफ़ जुडिशिअल मजिस्ट्रेट हैं. आपके मामले में ये आपको सही सलाह दे सकते हैं.

बाबा जी ने पिताजी की तरफ़ अपना मुंह मोड़ कर उन से कहा –

बच्चा ! तुम ही हमको ऐसा प्रमाणपत्र दिलवा दो.’

बाबा जी के शेखचिल्लीनुमा वृतांत से और अपनी 40 साल की उम्र को बढ़ा कर 60 साल बताने के उनके अंदाज़ से पिताजी पहले ही उनको पक्का फ्रॉड मान चुके थे.

पिताजी को यह भी पता था कि स्वतंत्रता सेनानी वाली पेंशन के लिए लोगबाग कैसे-कैसे झूठे दावे और कैसे-कैसे फ़र्जी प्रमाणपत्र पेश कर रहे थे. उन्होंने फ़ौरन बाबा जी की तफ़्तीश शुरू कर दी –

बाबा जी, आप भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान जेल तो ज़रूर गए होंगे. क्या उसका कोई रिकॉर्ड आपके पास है?

आन्दोलन में गोली लगने के बाद आप इलाज के लिए अस्पताल भी गए होंगे. क्या उस अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट और उसका डिस्चार्ज सर्टिफ़िकेट आपके पास है?’

बाबा जी ने पिताजी को बताया –

हम जेल-वेल नहीं गए और आन्दोलन में गोली लगने के बाद हमारा इलाज भी किसी अस्पताल में नहीं, बल्कि हमारे आश्रम में ही हुआ था.  आश्रम में ही आ कर वैद्य जी ने हमारे कंधे में लगी गोली निकाल दी थी.

लेकिन हमने भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लिया था और उसमें गोली भी खाई थी, इसकी गवाही तो हमारे आश्रम का बच्चा-बच्चा भी दे देगा.

पिताजी ने बेरहमी के साथ कहा –

34 साल पहले हुए वाकए की गवाही, आप अपने आश्रम के बच्चे-बच्चे से दिलवा रहे हैं.

अव्वल तो आपको गोली लगी नहीं है और अगर लगी भी हो तो क्या पता कि वो आपको पुलिस वालों ने तब मारी हो जब आप चोरी कर के या डाका डाल के, भाग रहे हों.

पिताजी की बात सुन कर सी० एम० ओ० तो हंसने लगे लेकिन बाबा जी की भ्रकुटियाँ तन गईं. उन्होंने दहाड़ते हुए कहा –

बाबा के श्राप से डर बच्चा ! बाबा में तुझे भसम करने की ताक़त है.

पिताजी ने व्यंग्य-भरी मुस्कान के साथ बाबा जी से पूछा –

भस्मासुर जी, जब आप इतने ताक़तवर हैं कि किसी को भी भसम कर सकते हैं तो फिर एक अदने से प्रमाणपत्र के लिए इधर-उधर क्यों भटक रहे हैं?

अपनी दिव्य-शक्ति से आवश्यक प्रमाणपत्र भी ले आइए और स्वतंत्रता सेनानी वाली पेंशन भी बनवा लीजिए.

अपनी धमकी को बे-असर होते देख अब बाबा जी ने भसम करने वाले अपने वक्तव्य के लिए पिताजी से माफ़ी मांगी और फिर उन्होंने ख़ुशामद का रास्ता अपना लिया.

सी० एम० ओ० साहब से और पिताजी से उन्होंने अनुरोध किया वो ही उन्हें पेंशन पाने का कोई सही रास्ता दिखाएं.

सी० एम० ओ० साहब तो बाबा जी को इस विषय में कोई राह नहीं दिखा पाए लेकिन पिताजी ने बाबा जी को एक अनमोल सलाह देते हुए कहा –

बाबा जी, इन दिनों इमरजेंसी में सरकार के ख़िलाफ़ कोई कुछ भी बोले या करे तो उसे मीसा (मेंटेनेंस ऑफ़ इंटरनल सीक्योरिटी एक्ट) के तहत जेल में चक्की पीसने के लिए डाल दिया जाता है.

आप चौराहे पर जा कर सरकार के ख़िलाफ़ ऐसा कुछ अनाप-शनाप बकिए कि आपको मीसा के तहत जेल में डाल दिया जाए.

कभी न कभी तो इंदिरा गांधी गद्दी से उतरेगी ही. फिर जब अपोज़ीशन की सरकार बनेगी तो हो सकता है कि मीसा-बंदियों को स्वतंत्रता सेनानियों के जैसी ही कोई पेंशन भी दे दी जाए. तो आप ऐसा करिए कि --- 

पिताजी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि बाबा जी ने कमरे से बाहर भागते हुए अपनी स्पीड से मिल्खा सिंह के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.