शनिवार, 3 अप्रैल 2021

समुद्र-मंथन

1
समुद्र मंथन की कथा हमारी पौराणिक कथाओं में बहुत प्रसिद्ध है.
‘शठे शाठ्यम समाचरेत्’ अर्थात- ‘दुष्टों के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए’ का सन्देश देने वाली इस कथा का वर्णन अग्नि पुराण में किया गया है.
एक बार मेनका नामक अप्सरा ने महर्षि दुर्वासा को दिव्य सुगंध वाले कल्पक पुष्पों की माला भेंट की. महर्षि दुर्वासा जैसे सन्यासी के लिए इस माला की कोई उपयोगिता नहीं थी. उन्होंने वह माला देवराज इन्द्र को भेंट कर दी.
देवराज इन्द्र ने माला को स्वयम् धारण करने के स्थान पर वह अपने हाथी के मस्तक पर डाल दी.
इन्द्र के हाथी ने भी अपने स्वामी इन्द्र की ही भांति उस माला का तिरस्कार किया और उसे धरती पर पटक दिया.
दुर्वासा ने अपनी भेंट का इस प्रकार तिरस्कार होते हुए देखा तो उन्हें क्रोध आ गया.
उन्होंने देवराज इन्द्र को यह शाप दिया कि देवलोक का सारा यश और वैभव भी माला की तरह ही धूल-मिट्टी में मिल जाए.
इस शाप के प्रभाव से देवलोक का सारा वैभव और यश नष्ट होने लगा.
असुरों ने जब देवताओं की यह दशा देखी तो उन्होंने उसका लाभ उठाकर उन पर आक्रमण कर दिया.
अशक्त देवतागण असुरों का सामना नहीं कर सके.
असुरों के विरुद्ध सहायता माँगने के लिए देवतागण भगवान ब्रह्मा के पास गए किन्तु उनके पास इस समस्या का कोई निदान नहीं था इसलिए उन्होंने देवताओं को भगवान विष्णु से सहायता मांगने की सलाह दी.
भगवान विष्णु ने देवताओं को बताया कि वो अमृत पान करके फिर से शक्तिवान होकर असुरों को परास्त कर सकते थे और अमरत्व भी प्राप्त कर सकते थे. भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत प्राप्त करने का मार्ग भी सुझाया -
‘देवगण ! आप लोगों में स्वयम् अमृत प्राप्त करने की शक्ति नहीं है. अमृत प्राप्त करने के लिए आप को अपने परम्परागत शत्रु असुरों की सहायता लेनी पड़ेगी.’
भगवान विष्णु ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन का उपाय बताया था.
यह समुद्र मंथन कोई साधारण मंथन नहीं था, इसमें पहले क्षीर सागर में सृष्टि की समस्त औषधीय वनस्पतियां डाली जानी थीं फिर उसका देर तक मंथन किया जाना था.
इस दुर्गम प्रक्रिया के बाद ही अमृत प्राप्त होना था.
अमृत के लालच में असुरों ने देवताओं का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया.
असुर दुष्ट और अत्याचारी थे. भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि वे अमृत पान करके शक्तिशाली और अमर हो जाएं. इसलिए उन्होंने ऐसी चाल चली कि अमृत प्राप्त करने में असुरों की शक्ति का उपयोग भी हो जाए पर उन्हें अमृत पान करने का अवसर नहीं मिल पाए.
देवताओं और असुरों ने मिलकर सृष्टि की सारी औषधीय वनस्पतियां क्षीर सागर में डाल दीं.
इसके बाद महामेरु पर्वत को मथनी बनाया गया और इस मथनी को चलाने के लिए वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयुक्त किया गया. मंथन के समय कहीं महामेरु पर्वत क्षीर सागर में डूब न जाए इसके लिए विष्णु ने स्वयं कच्छप का रूप धारण करके उसे अपनी पीठ पर टिका लिया.
अब वासुकि नाग को इस विशाल मथनी को चलाने के लिए प्रयुक्त किया गया पर यहाँ भी विष्णु ने अपनी चतुराई दिखाई. उन्होंने समुद्र मंथन में देवताओं को वासुकि नाग की दुम की ओर का भाग दिलाया और असुरों को उसके फन की ओर का भाग.
वासुकि की ज़हरीली फुफकारों के प्रभाव से असुर काले पड़ गए पर देवताओं पर इसका कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा.
2
समुद्र मंथन में कुल चौदह रत्न प्राप्त हुए । ये रत्न थे -
1. कामधेनु
2. कमल लोचन वारुणि नामक कन्या
3. पारिजात (कल्पवृक्ष)
4. अप्सराएं
5. चन्द्रमा
6. कालकूट विष
7. पाँचजन्य (शंख)
8. कौस्तुभ मणि
9. धनवन्तरि
10. लक्ष्मी
11. उच्चैश्रवा नामक घोड़ा
12. ऐरावत नामक सफ़ेद हाथी
13. मदिरा
14. अमृत
समुद्र मंथन से निकले रत्नों के कारण अनेक समस्याएं खड़ी हो गईं. कालकूट विष के निकलते ही उसके विषैले धुएं और ज़हरीली लपटों से तीनों लोकों के नष्ट होने का संकट उठ खड़ा हुआ.
और कोई उपाय न देखकर भगवान ब्रह्मा ने भगवान शंकर की शरण ली.
उन्होंने शिव जी से प्रार्थना की -
‘भगवन ! आप ही समस्त सृष्टि को कालकूट विष के प्रकोप से बचा सकते हैं.’
भगवान शिव ने कालकूट विष को पी तो लिया पर उन्होंने उसे अपने गले में ही रोक लिया.
विष के प्रभाव से भगवान शंकर का कण्ठ नीला पड़ गया जिसके कारण उनका एक नाम नीलकण्ठ भी हो गया.
विष की गरमी भगवान शंकर के मस्तक तक चढ़ गई थी जिसे शीतल करने के लिए उन्हें अपने मस्तक पर धारण करने के लिए चन्द्रमा प्रदान किया गया.
समुद्र मंथन से निकली और कमल पर विराजमान देवी लक्ष्मी विष्णु को प्राप्त हुईं.
असुरगण लक्ष्मी को स्वयम् प्राप्त करना चाहते थे.
विष्णु को लक्ष्मी का उपहार मिल जाने से असुर नाराज़ हो गए और वो अमृत कलश लेकर भाग खड़े हुए.
3
भगवान विष्णु ने असुरों से अमृत कलश प्राप्त करने के लिए एक अनोखा स्वांग रचा. उन्होंने मोहिनी का रूप धारण किया.
मोहिनी ने असुरों के लोक में जाकर उन पर अपने रूप का जादू चला दिया. सभी असुर मोहिनी से विवाह करना चाहते थे. वह उसके हाथों से अमृत पान करना चाहते थे.
मोहिनी ने असुरों से कहा-
‘मैं आप सबको अमृत पान कराऊँगी और आप में से एक असुर से विवाह भी करूंगी पर इसके लिए आप को मेरी एक शर्त माननी होगी.‘
असुरों मोहिनी से कहा -
‘सुन्दरी तुम जो भी कहोगी वह हम करेंगे. बोलो तुम्हारी क्या शर्त है?’
मोहिनी ने लुभावनी मुस्कान बिखेरते हुए कहा -
‘मैं आप सबको अमृत पान कराऊँगी पर इसके लिए आप सबको अपनी-अपनी आँखें बन्द करनी होंगी. आप में से जो असुर सबसे बाद में अपनी आँखें खोलेगा मैं उसी के हाथ से अमृत पान करूंगी और फिर उसी से विवाह कर लूंगी.’
मोहिनी को प्राप्त करने की होड़ में मूर्ख असुरों ने उसकी शर्त मान कर अपनी-अपनी आखें मूँद लीं. अमृत पान कराने के बहाने मोहिनी ने असुरों से अमृत कलश पहले ही प्राप्त कर लिया था अब उन सबकी मुंदी आँखों का लाभ उठाकर वह अमृत कलश लेकर चुपचाप देवलोक चली आई.
असुरों को जब मोहिनी की इस चाल का पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी. असुर मोहिनी का पीछा करते हुए देवलोक पहुंचे जहाँ सूर्य और चन्द्रमा स्वर्ग के द्वार की रक्षा कर रहे थे.
असुर स्वर्ग में प्रवेश नहीं कर पाए पर उनमें से स्वरभानु नामक असुर भेष बदल कर चुपचाप देवलोक में प्रवेश कर गया. देवताओं में अमृत बाँटे जाते समय उसने भी अमृत पान कर लिया किन्तु उसको वहां सूर्य और चन्द्रमा ने पहचान लिया.
अमृत अभी स्वरभानु के गले तक ही पहुँचा था कि भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका गला काट दिया.
अमृत पान करने के कारण स्वरभानु के सर से गले तक का हिस्सा (राहु) अमर हो गया पर उसका शेष शरीर (केतु) नष्ट हो गया.
राहु ने इस घटना के लिए सूर्य और चन्द्रमा को दोषी ठहराया.
उसने उनसे बदला लेने का निश्चय कर लिया.
तब से अवसर पाकर वह कभी सूर्य को तो कभी चन्द्रमा को निगल लेता है पर वह कुछ ही देर बाद ही उसके कटे हुए गले से बाहर निकल जाते हैं.
इस प्रकार की घटनाओं को हम सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के रूप में जानते हैं.
अमृत पान करने के बाद देवता फिर से सशक्त हो गए और उन्हें अमरत्व भी प्राप्त हो गया. उन्होंने असुरों को युद्ध में पराजित किया.
अमृत पान करके देवतागण महर्षि दुर्वासा के शाप से मुक्त हो गए.
देवलोक और मृत्यु लोक में फिर से शान्ति हो गई और वहाँ सुख-समृद्धि की फिर से स्थापना हो गई.
समुद्र मथन से निकले चौदह रत्नों में से भगवान विष्णु को लक्ष्मी, कौस्तुभ मणि और पाँचजन्य शंख प्राप्त हुए.
देवराज इन्द्र को उच्चैश्रवा नामक घोड़ा और ऐरावत हाथी प्राप्त हुए.
अप्सराओं को देव-लोक में अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए नियुक्त किया गया.
कामधेनु और पारिजात (कल्पवृक्ष) भी देवलोक को प्राप्त हुए.
भगवान धनवन्तरि भी देवताओं के हिस्से में आए. उनके आयुर्वेद शास्त्र का लाभ उठाकर देवता सदैव निरोगी और पुष्ट रहने लगे.
अमृत पान से देवताओं को अमरत्व प्राप्त हुआ.
कालकूट विष और चन्द्रमा भगवान शंकर के भाग में आए.
समुद्र मंथन से असुरों को कोई लाभ नहीं हुआ.
स्वयं मूर्ख बनकर उन्होंने देवताओं को अमृत प्राप्त करने में सहायता दी.
असुरों को मिली तो केवल मदिरा मिली. इस मदिरा को निरंतर पीते रहने से उनका रहा-सहा विवेक भी जाता रहा. देवलोक जीतने का उनका स्वप्न सदा के लिए धूल में मिल गया.
भगवान विष्णु ने साम-दाम-दण्ड-भेद से देवताओं को महर्षि दुर्वासा के श्राप से मुक्त करवाया.
उनके इस कार्य को किसी भी प्रकार अनुचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इसका परिणाम बड़ा सुखद रहा.
इससे धर्म की फिर से स्थापना हुई और पाप का तथा पापियों का नाश हुआ.

मेरा अपना निष्कर्ष :
इस कहानी में सिंहासनारूढ़ विष्णु भगवान को समुद्र-मंथन से निकली अधिकांश मलाई मिल जाती है.
शास्त्रोंं-पुराणों के अनुसार धर्म की स्थापना तभी होती है जब बिना हाथ-पैर हिलाए साहब को और उनके खासमखास लोगों को, सारी की सारी मलाई मिलती है और प्रजा को जी-तोड़ मेहनत करने के बावजूद छाछ भी नहीं मिलता हैे.

 

8 टिप्‍पणियां:

  1. चलो अच्छा हुआ धर्म की स्थापना हो गयी। वाह।

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    1. मित्र, इस कहानी में सिंहासनारूढ़ विष्णु भगवान को समुद्र-मंथन से निकली सारी मलाई मिल जाती है.
      धर्म की स्थापना तभी होती है जब साहब को सारी की सारी मलाई मिले और प्रजा को छाछ भी न मिले.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (04-04-2021) को   "गलतफहमी"  (चर्चा अंक-4026)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  3. 'ग़लतफ़हमी' (चर्चा अंक - 4026) में मेरी कथा को सम्मिलित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद डॉक्टर रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' !

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  4. पहले महापुरुषों को पथभ्रष्ट करने के लिए अप्सराएँ स्वर्ग से पृथ्वी पर भेजी जाती थी, आज पथ भ्रष्टों को खुश करने निजी स्वार्थ की पूर्ति करवाने हेतू सुंदरियां भेजी जाती है, वहां देव पुरूषों का स्वार्थ था यहां शैतानों का स्वार्थ है पर दोनो जगह चारा या बलि का समान एक है।

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    देवता वर दाता कहे जाते हैं, देवों ने हम पृथ्वी वालों को वर तो पता नही क्या दिया, हाँ अपनी कूटनीतियां तो पुरी दे डाली, इंद्र अपना सिंहासन बचाने के फेर मे येन केन प्रकारेण षड्यंत्रों के द्वारा ( विरोधी दलों से ) महापुरुषों, ऋषि मुनियों को अपने पथ से डिगाता रहा, आज मानव देवों के उस अवगुण को यथा प्रकार उपयोग कर रहा है, उद्येश्य वही साधन भी वही सिर्फ समय के साथ थोडा रूप बदला है, प्रवृति, प्रकृति, आदतें और लालसाऐं नही बदली।

    व्यंग्य की पराकाष्ठा।

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  5. कहानी के उदार आकलन के लिए धन्यवाद !
    देवताओं की कूटनीति के विषय में मन की वीणा के तार वैसे ही बज रहे हैं जैसे कि मेरे मन की वीणा के बज रहे हैं.
    यदि हम इंद्र जैसे विलासी, भ्रष्ट और दूसरे के कंधे पर बंदूक चलाने वाले कायर को अपना राजा बनाते हैं तो हमारा हशर क्या होगा, इसका अनुमान तो कोई बच्चा भी लगा सकता है.

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  6. वाह..अद्भुत प्रस्तुति।

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