बादशाह
शाहजहाँ की आँखों के सामने ही उसका राज-पाट चला गया, उसके तीन बेटे मौत के घाट उतार दिए गए और उसे
आगरे के किले के मुसम्मन बुर्ज में ताज़िंदगी एक क़ैदी की हैसियत से दिन गुज़ारने के
लिए मजबूर कर दिया गया. अकेला बूढ़ा, बेबस, लाचार, गमगीन और मायूस क़ैदी करे तो क्या करे?
शाहजहाँ ने एक
क़ासिद (सन्देश वाहक) के ज़रिए अपने बेटे बादशाह औरंगज़ेब को संदेसा भिजवाया कि ख़ाली
वक़्त गुज़ारने के लिए उसके पास कुछ बच्चे भेज दिए जाएं जिनको कि पढ़ा कर वह अपना
वक़्त गुज़ार सके और अपना मन बहला सके. बादशाह औरंगज़ेब ने शाहजहाँ की यह गुज़ारिश
ठुकराते हुए क़ासिद से कहा –
‘अब्बा हुज़ूर अब बादशाह तो नहीं रहे पर अब वो उस्ताद बन कर अपने शागिर्दों पर
अपना हुक्म चला कर अपनी बादशाहत का शौक़ पूरा करना चाहते हैं.’
औरंगज़ेब की
तरह मेरी नज़र में भी शौक़-ए-मुदर्रिसी और शौक़-ए-बादशाहत में कोई ख़ास फ़र्क नहीं है.
अपने बचपन से ही डेरोज़ियो जैसा अध्यापक
बनने की मेरी तमन्ना हुआ करती थी.
बी० ए० और एम० ए० करने के दौरान अपने
ही साथियों का क्लास लेने में मुझे बड़ा मज़ा आता था.
यहाँ डेरोज़ियो
के बारे में कुछ बता दूं.
उन्नीसवीं
शताब्दी के प्रथमार्ध में कलकत्ता के हिन्दू कॉलेज के सबसे लोकप्रिय अध्यापक
डेरोज़ियो का मुदर्रिसी (अध्यापन) का जुनून (पागलपन) इतना ज़्यादा था कि वो कॉलेज में क्लास रूम्स बंद हो जाने के बाद कॉलेज के
वरांडे में क्लास लेने लगता था और कॉलेज का फाटक बंद हो जाने पर इच्छुक छात्रों को
अपने घर पर बुला कर पढ़ाने लगता था. 23 साल की
अल्पायु में अपने प्राण त्यागने से पहले उस ने बंगाल में जागरूक-प्रगतिशील युवकों
की एक बड़ी जमात तैयार कर दी थी.
एक प्रवक्ता
के रूप में लखनऊ यूनिवर्सिटी में अपनी पारी शुरू करते समय मेरा भी सपना था कि मैं
अपने विद्यार्थियों के मानस-पटल पर डेरोज़ियो की जैसी छाप छोड़ सकूं.
मेरा यह सपना
तो कभी पूरा नहीं हुआ लेकिन मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मुझे पढ़ाने में
हमेशा बहुत आनंद आया.
डायस पर खड़े
हो कर, एकाग्र चित्त विद्यार्थियों को पिन-ड्रॉप साइलेंस के माहौल में पढ़ाने के नशे के
सामने किसी शराब का नशा क्या होता होगा?
मेरा यह मानना
है कि इतिहास के उबाऊ वृतांतों को ऐतिहासिक अंतर्कथाओं से और समकालीन साहित्य में
उनकी अभिव्यक्ति के साथ जोड़ने से, उन्हें रोचक बनाया जा सकता है.
मुझे लेक्चर
के लिए 45 मिनट का पीरियड बहुत छोटा लगता था.
समय बचाने के
लिए मैं क्लास में अटेंडेंस रजिस्टर लेकर जाता ही नहीं था.
कुमाऊँ
विश्विद्यालय के अल्मोड़ा परिसर में एक बार हमारे वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर एम० डी० उपाध्याय
मेरे क्लास में इंस्पेक्शन करने आए थे.
उन्होंने मुझे
5 मिनट तक पढ़ाते हुए देखा फिर मुझे क्लास से बाहर ले जा कर कहा –
'जैसवाल, तुम पढ़ाते तो अच्छा हो पर मैंने देखा कि तुम्हारे पास अटेंडेंस रजिस्टर तो है
ही नहीं. ऐसा क्यों करते हो भाई?'
मैंने जवाब
दिया –
'सर, मैं 5 मिनट अटेंडेंस लेने में खर्च करने के बजाय उसे पढ़ाने में खर्च करता हूँ.'
मेरी पीठ
थपथपाने के बाद जाते-जाते कुलपति महोदय ने मुझ से हँसते हुए कहा था –
'मेरे कहने से महीने में एकाद बार अटेंडेंस ले लिया करो.'
एक रहस्य की
बात बताऊँ – किसी भी विश्वविद्यालय में एक अध्यापक को शौक़-ए-मुदर्रिसी को पूरा
करने के मौके बहुत कम ही मिल पाते हैं.
एडमिशन की
लम्बी प्रक्रिया, चुनाव, हड़तालें, खेल-कूद प्रतियोगिताएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम, वार्षिक समारोह, कन्वोकेशन, परीक्षा, परिणाम आदि के अलावा वैकेशंस और फिर अल्लम-गल्लम छुट्टियों (प्रिवेलेज लीव, कैज़ुअल लीव, मेडिकल लीव, ड्यूटी लीव, फ़्रेंच लीव, शोक सभाएं आदि).
मुझे याद नहीं
पड़ता कि इन घोषित-अघोषित छुट्टियों की कृपा से एक अध्यापक के रूप में अपने 36 साल के कैरियर
में कभी एक सत्र में मेरे 100 से अधिक दिन क्लास हुए हों.
(मेरे जो भी साथी मेरे इस पोल-खोल कार्यक्रम से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं और यह
दावा करते हैं कि उन्होंने हर सत्र में 150-200 दिन पढ़ाया है, उन्हें मैं ‘झूठाचार्य’ और ‘फेंकाचार्य’ का ख़िताब देना
चाहूँगा.)
अल्मोड़ा परिसर
के हमारे इतिहास विभाग के विद्यार्थियों को क्लास से गायब होना बहुत भाता था. उन्हें
पढने-लिखने के बजाय - आपस में गुफ़्तगू करना, सांस्कृतिक कार्यक्रमों को ज़रुरत से ज़्यादा
महत्व देना, छात्र-राजनीति को ही अपना कैरियर बनाना और लैला-मजनूँ, रोमियो-जूलियट
की कथा को पुनर्जीवित करना, कहीं ज़्यादा अच्छा लगता था.
क्लासरूम में
दीवारों को मैं कब तक पढ़ाता?
कभी उक्ता कर
मैं लाइब्रेरी चला जाता तो कभी कविताएँ-कहानी लिख कर अपना मन बहलाता तो कभी किसी
दूसरे विभाग में जा कर श्रद्धालु मित्रों की फ़रमाइश पर उन्हें ऐतिहासिक और
साहित्यिक किस्से सुनाता.
मुझे पता था
कि मैं कोई चाणक्य नहीं था जो मुझे कोई चन्द्रगुप्त मौर्य मिल जाता, न ही मैं कोई
समर्थ गुरु राम दास था जो किसी वीर शिवा को छत्रपति शिवाजी बना देता. और मैं
स्वामी रामकृष्ण परम हंस तो क़तई नहीं था जिनका कि सन्देश ले कर कोई स्वामी
विवेकानंद भारतीय धर्म-दर्शन की पताका समूची दुनिया में फहरा दे.
फिर भी मुझे
तालिब-ए-इल्म (विद्यार्थी) की हमेशा सख्त ज़रुरत रहा करती थी.
अवकाश-प्राप्ति
से दो साल पहले की बात है.
मैं ट्रेन से
दिल्ली जा रहा था. मेरे सामने की सीट पर एक अपरिचित नौजवान बैठा था. उस नौजवान ने
मुझे बड़ी श्रद्धा से नमस्कार किया. फिर मुझ से पूछा –
‘माफ़ कीजिएगा सर ! क्या आप प्रोफ़ेसर जैसवाल हैं?’
मैंने हामी
भरी तो उसने बताया कि वह कुमाऊँ विश्वविद्यालय के नैनीताल परिसर से इतिहास में एम०
ए० कर चुका है और मुझे नैनीताल में राष्ट्रीय आन्दोलन पर आयोजित एक सेमिनार में
सुन कर वह मेरा प्रशंसक बन चुका है.
धन्यवाद की
औपचारिकता के बाद उसने मुझ पर एक सवाल दाग दिया-
‘सर, गांधी जी की डांडी-मार्च को आप कहाँ तक सही मानते हैं?’
मैंने कहा –
‘बालक ! तूने तो मुझे बड़ी मुश्किल में डाल दिया. मेरे तो समझ में ही नहीं आ रहा
कि तेरे सवाल का मैं क्या जवाब दूं.’
बालक को मेरी
मुश्किल क़तई समझ में नहीं आई. डांडी-मार्च पर तो कोई बच्चा भी बोल सकता था फिर
जैसवाल साहब - -- -- ?
मैंने उस बालक
को अपनी मुश्किल समझाते हुए कहा –
‘मेरे समझ में ये नहीं आ रहा है कि तेरे सवाल का जवाब मैं काठगोदाम से लाल कुआँ
तक दूं या रूद्रपुर तक दूं या फिर दिल्ली तक !’
बालक ने हंसते
हुए मेरे चरण गहे और फिर मेरे जवाब को हद से हद, काठगोदाम से रुद्रपुर तक सीमित करने की
प्रार्थना भी कर डाली.
अब मुझे
रिटायर हुए पंद्रह साल हो चुके हैं.
ग्रेटर नॉएडा
में मेरा शौक़-ए-मुदर्रिसी कुंठित और उदास है.
यहाँ तो कोई
परिंदा भी इतिहास में और साहित्य में दिलचस्पी लेने वाला नहीं मिलता.
सुबह-शाम
टहलते वक़्त मिलने वाले परिचित सज्जन भी मेरा वाकिंग क्लास अटेंड करने के बजाय मुझे
दूर से ही नमस्कार करने में अपनी भलाई समझते हैं.
झक मार कर मैं
जब अपनी श्रीमती जी को ही अपना विद्यार्थी बनाने की कोशिश करता हूँ तो वो अचानक से
पी. टी. उषा का अवतार बन जाती हैं.
अगर मैं अपनी
दोनों बेटियों में से किसी को भी वीडियो चैटिंग के ज़रिए कोई रोचक किन्तु विस्तृत ऐतिहासिक
या साहित्यिक क़िस्सा सुनाना चाहूं तो वो अपने बच्चों की काल्पनिक या फिर वास्तविक, पुकार पर मुझ
से सॉरी कह कर भाग खड़ी होती हैं.
अंतरात्मा से
निकली आवाज़ मुझसे पूछती रहती रहती है –
तू किराए के
भी शागिर्द नहीं पाता है
क्लास लेने को
तू फिर भी तड़पता क्यों है
सो जा चाणक्य
न अब चन्द्रगुप्त आएगा
खोल कर अपनी
शिखा व्यर्थ भटकता क्यों है
मुझ ज़बर्दस्ती
के चाणक्य को अगर अपना चन्द्रगुप्त भारत में नहीं मिला तो मैं किसी जंगल में जा कर
किसी हिरन को, किसी जंगली बिल्ली को, पढ़ाने लगूंगा.
शौक़-ए-मुदर्रिसी
मुझे था, आज भी है और आगे भी यही मेरी बैटरी चार्ज-रिचार्ज करता रहेगा.
भला हो मेरे फ़ेसबुक के और मेरे ब्लॉग के मित्रों का, इन्होंने मेरे शौक-ए-मुदर्रिसी को आज भी ज़िन्दा रखा है.
अपने फ़ेसबुक
मित्रों को और अपने ब्लॉग के पाठकों को मैं ज़बर्दस्ती अपना जिज्ञासु विद्यार्थी
मानते हुए उनके जब-तब क्लास लेता रहता हूँ.
ऐ बदनसीब
शाहजहाँ ! तेरे ज़माने में अगर फ़ेसबुक होता और अपने ब्लॉग पर तुझे कुछ भी
अल्लम-गल्लम लिखने की आज़ादी होती तो तू शागिर्दों के लिए इतना न तड़पता.
मुदर्रिसी के
बहाने तेरा शौक़-ए-बादशाहत तो शागिर्दों की गैरमौजूदगी में भी पूरा हो जाता.
तो फ़ेसबुक के
और मेरे ब्लॉग के मित्रों ! आज का पाठ अब संपन्न हुआ. जल्द ऐसी ही ज़बर्दस्ती
आयोजित की गयी कक्षा में मैं आप से फिर मिलूंगा.
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