गुरुवार, 9 मार्च 2017

अलविदा मेरी प्यारी बहादुर बहन !



कल अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस था. टीवी, अख़बार, नेताओं के भाषण आदि सबमें नारी-उत्थान पर क्रांतिकारी विचार थे. फेस बुक पर भी मजाज़ की नज़्म - ‘तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही खूब है लेकिन, तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था.’ को बार-बार उद्धृत किया गया. पर आज फिर से ज़िन्दगी पुराने ढर्रे पर आ गई है आज से फिर सड़कछाप मजनूगण लड़कियों को अपनी लैला समझकर छेड़ेंगे या फिर उनके साथ कोई अश्लील चेष्टा करेंगे.
दिसंबर, 2012 में निर्भया ने अपनी बहादुरी की एक नयी मिसाल क़ायम की थी. दरिंदों के सामने उसके मन ने, उसकी आत्मा ने हार नहीं मानी पर उसका शरीर हार गया था. 29 दिसंबर 2012 को निर्भया की मृत्यु का समाचार सुनकर मेरी बेटी गीतिका ने बहुत भावुक होकर, बहुत दुखी होकर इंग्लिश में एक लेख लिखा था. हिंदी पाठकों के लिए मैंने इसका अनुवाद किया है. हो सकता है यह आपको आज भी प्रासंगिक लगे.           
अलविदा मेरी प्यारी बहादुर बहन -
(29 दिसंबर, 2012)  
वह बहादुर थी, वह जी-जान से लड़ी, पर आज वह चली गयी है. हो सकता है कि अब उसे इस दुनिया से बेहतर कोई ऐसी दुनिया मिले जहाँ कि वह शांति से रह सकेगी. पर अब उसके मरते ही फिर से ज़बर्दस्ती के शोक सन्देश, आरोप-प्रत्यारोप, स्पष्टीकरण, झूठे वादे और इस हादसे के राजनीतिकीकरण का तमाशा शुरू हो गया है.
पर सच बताऊँ, मेरे लिए यह सारा नाटक दो कौड़ी का भी नहीं है.   
यह हादसा मेरे लिए एक व्यक्तिगत त्रासदी है. मेरे लिए यह मातम का दिन है और वह इसलिए कि मैंने अपनी एक बहादुर-दिल बहन को खो दिया है. एक ऐसी बहन, जिसका कि मुझे नाम तक नहीं मालूम. उसे दामिनी कहिए या अमानत कहिए या निर्भया कुछ भी कहिए, सच तो यह है कि उसका नाम क्या था, इस से कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता क्योंकि उसकी जगह कोई भी दूसरी लड़की हो सकती थी. उसकी जगह मैं भी हो सकती थी.
वास्तव में ऐसा कुछ न कुछ, कभी न कभी, क्या हम सब के साथ नहीं गुज़र चुका है?  हमारे स्कूल, कॉलेज से लेकर हमारे कार्य-स्थल, यहाँ तक कि किसी भी सार्वजनिक स्थल पर, हम पर कटाक्ष किए जाते थे, हम पर फब्तियां कसी जाती थीं, हमारे चिकोटियां काटी जाती थीं, हमको धकियाया जाता था, हमारे अंगों को छूने की कोशिश की जाती थी, हमारी घेराबंदी की जाती थी, हमारा पीछा किया जाता था. इस प्रकार की सूची का कोई अंत नहीं है और यह सब अत्यंत पीड़ादायक था, अपमानजनक था.
हम सबको यह बात समझनी होगी कि यह हादसा कोई अनहोनी अथवा कोई दुर्लभ घटना नहीं थी. हम सब लड़कियां इस प्रकार के या इस से मिलते-जुलते अपराधों का शिकार होती आई हैं और उनका प्रतिकार करने में हम प्रायः असफल ही होती आई हैं. हमारी इस बेबसी की पीछे शायद यह डर हो कि हम गुंडों को मुंहतोड़ जवाब देकर और भी बड़ी मुसीबत या भयावह स्थिति में फँस सकती हैं.
इस हादसे की क्रूरता और अमानुषिकता ने समस्त राष्ट्र की आत्मा को झकझोर दिया है. पर कब तक हमारे भीतर आक्रोश की यह आग सुलगती रह पाएगी? या फिर यह लड़की हमारे देश की बलात्कार पीड़िताओं में से एक और लड़की या एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगी?
हम खुद से यह वादा करें कि अब हम ऐसा कुछ फिर कभी नहीं होने देंगे. खुद को बचाने के लिए अपने जुझारू संघर्ष में उसे मर्मान्तक चोटें लगीं और उसके शरीर के अनेक अंगों ने अपना काम करना भी बंद कर दिया. पर जाते जाते भी वह हमको एक सबक दे गयी और वह सबक था – ‘हिम्मत मत हारो, और अपनी आखरी सांस तक दरिंदों से लड़ते रहो, लड़ते रहो.’
हम एक संकल्प लें और उस संकल्प पर खुलकर अमल करें. चलिए ! हम सरकार को इस बेशर्म और बे-परवाह नींद से जगाएं !
आइए ! हम इस बात के लिए आन्दोलन करें कि ऐसे मामलों में अपराधियों को निश्चित रूप से दोषी सिद्ध किया जा सके और फिर उनके दोष सिद्ध होने पर उनके जघन्य अपराधों पर उन्हें कड़े से कड़ा दंड दिया जा सके. हम पुलिस की कार्य-प्रणाली में भी ऐसे सुधार करने की मांग करें ताकि कोई लड़की अपने साथ हुए ऐसे किसी अपराध के घटित होने पर उसकी पुलिस में रिपोर्ट करने में क़तई डरे नहीं.
हम मांग करें कि सड़कों को  और गलियों को निरापद बनाया जाय ताकि कोई भी लड़की रात के अँधेरे में भी, किसी भी निर्जन मार्ग पर, सुरक्षित आ-जा सके.
पर इस से भी ज़्यादा आवश्यक है कि हम खुद में इन सबके लिए ज़रूरी बदलाव लाएं.     
अंत में मैं कहूँगी कि अब समय आ गया है कि हम अपनी मानसिकता, अपने विचार, अपने व्यवहार और अपने आचरण में बदलाव लाएं.
आइए ! हम अपनी भाषा में भी बदलाव और सुधार लाएं. हम अब ऐसे आशीर्वाद न दें – ‘सौ सुपुत्रों की माता बनो.’
हम स्त्रियों पर बनाए गए कामुक और अश्लील चुटकुलों और टिप्पणियों पर हँसना बंद कर दें (प्रणव मुखर्जी के साहबज़ादे अभिजीत मुखर्जी की डेंटिंग और पेंटिंग कराकर अपने चेहरों को आकर्षक बनाने वाली आन्दोलनकारी महिलाओं वाली निकृष्ट टिपण्णी),
आइए, हम उन भद्दे आइटम गानों पर नाचना बंद कर दें जिनमें औरत को सिर्फ़ यौन-सामग्री के रूप में परोसा जाता है. हाँ, बहुत हुआ मुन्नी, शीला और उनकी हलकट जवानी !       
 हर लड़की को अब खुद से यह वादा करना होगा कि वह अपने साथ किसी को भी किसी भी प्रकार की ज्यादती या हिंसा नहीं करने देगी. चाहे यह हिंसा शारीरिक हो, मानसिक हो या सामाजिक !
अब हर लड़का खुद से यह वादा करे कि वह लड़कियों के साथ किसी प्रकार की कोई गलत हरक़त नहीं करेगा.
बच्चों के माता-पिता यह वादा करें कि वो अपने बेटों को नारी जाति का सम्मान करना सिखाएंगे और अपनी बेटियों को यह सिखाएंगे कि वो बेटों की तुलना में न तो हीन हैं और न ही कमज़ोर.
हम समाज से यह वादा लें कि यदि किसी लड़की के साथ ऐसा कोई यौन-अपराध होता है तो वह उसे उसकी इज्ज़त का और उसकी लाज का मसला नहीं बनाएगा बल्कि उसे हर प्रकार का संवेदनात्मक समर्थन प्रदान करेगा.
आइए !  हम इस प्रकार के अपराधों के प्रति इतने असहिष्णु हो जाएं कि फिर कभी किसी लड़की को भगवान से यह अरदास न करनी पड़े – ‘अगले जनम मोहे, बिटिया न कीजो.’
क्या यह कुछ ज़्यादा ही मांग लिया गया? क्या हम इस प्रकार का परिवर्तन लाने के लिए एकजुट हो सकते हैं? अगर हम ऐसा कर सकते हैं तो उस बहादुर लड़की के प्रति हमारी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी. वह एक ऐसी लड़की है जिसने कि ख़ुद चिर-निद्रा में सोने से पहले समूचे राष्ट्र को झकझोर कर जगा दिया है.
एक बार फिर अलविदा ! मेरी प्यारी बहादुर बहन !

रविवार, 5 मार्च 2017

तरक्की

पुराने ज़माने में -
जे रहीम ओछो बढ़े, तो अति ही इतिराय,
प्यादे से फर्जी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय.
रहीम का संशोधित दोहा -
जे रहीम ओछो बढ़े, तो अति ही इतिराय,
बाथरूम को भी सदा, वायुयान से जाय.

एक बदतमीज़ दोहा -
निज प्रानन को मोल जब, कोहिनूर सम, पाय,
मधू-यामिनी कक्ष में, अंगरक्षक ले जाय.
 

बुधवार, 1 मार्च 2017

माल्योधरा विलाप

माल्योधरा विलाप (राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से क्षमा-याचना के साथ) -
सखि, वे मुझसे कहकर जाते !
हफ्ते भर का राशन-पानी,
कम से कम, घर, रखकर जाते,
सखि वे मुझसे कहकर जाते !
मुझे भेद, उनके मालुम हैं,
हथकंडे, उनके देखे हैं,
अगर राज़ कुछ, खुल भी जाते,
पैसे के बल, वो दब जाते,
सखि वे मुझसे कहकर जाते !
राज्यसभा की अपनी गद्दी,
सुत के नाम कराकर जाते !
सखि, वे मुझसे कहकर जाते !
स्विस खातों का सारा ब्यौरा,
मुझे सौंप देते, तब जाते
सखि, वे मुझसे कहकर जाते !
चीटिंग, फ्रॉड और घपलों में,
मुझको, खुद से बढ़कर पाते,
सखि, वे मुझसे कहकर जाते !

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

एंड डाटर्स

एंड डाटर्स -
मेरी छोटी बेटी रागिनी ने आमिर खान का 'गुरदीप सिंह एंड डाटर्स' वाला वीडियो पोस्ट किया है और साथ में एक रोचक प्रसंग का उल्लेख भी किया है.
मेरा एक शोध छात्र था. इंग्लिश में उसका हाथ ज़बर्दस्त तरीक़े से तंग था पर वह इस म्लेच्छ भाषा का अभिनव प्रयोग अवश्य करता था. उसने मुझे नव-वर्ष की शुभकामनाओं वाला एक कार्ड भेजा. उसमें लिखा था -
'मिस्टर एंड मिसेज़ जैसवाल सर एंड संस'
मैंने भोलेपन से पूछा -
'बालक, तुझे पता है कि हमारी तो बस दो बेटियां हैं फिर तूने ये 'एंड संस' क्यों लिखा है?'
बालक ने जवाब दिया -
'गुरु जी आपने दुकानों पर देखा होगा - 'रामप्रसाद एंड संस' ,या 'काशीनाथ एंड संस'. बस मैंने भी वैसा ही लिख दिया है.'
हमारे घर में इस प्रसंग को चुटकुले के रूप में सुनाया जाता है.
पर रागिनी ने इस वीडियो को भेजकर यह आशा जताई है कि अब दुकानों या कार्ड्स पर 'एंड डाटर्स' अंकित करने में किसी को परेशानी नहीं होगी.
मेरी बेटियां, गीतिका और रागिनी दोनों मेरी सिर्फ़ सलाहकार ही नहीं हैं बल्कि मेरे सारे तकनीकी कामों में मेरी गुरु हैं. मेरे ब्लॉग को सम्हालना, मेरी पोस्ट पर फोटो डालना, इन्टरनेट पर उपलब्ध कोई जानकारी खोजना, हर प्रकार की ऑन लाइन बुकिंग आदि सारे दुष्कर कार्य मेरी बेटियां ही सम्हालती हैं. हमारी यूरोप यात्रा में भी वो दोनों हमारी एब्सेंटी गाइड की सफल भूमिका निभाती रहीं.
एक मज़ेदार बात बताऊँ -
नुझे मेट्रो के एस्कलेटर्स पर चढ़ना भी मेरी दोनों बेटियों ने सिखाया है.
आज मेरा वह अंग्रेज़ीदां शोध-छात्र अंतर्ध्यान हो गया है पर अब अगर वह कभी मुझे नव-वर्ष की बधाई का कार्ड देगा तो मैं उस से यह लिखने को कहूँगा -
'गीतिका, रागिनी एंड देयर पेरेंट्स.' .

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

फ़िराक गोरखपुरी से क्षमायाचना के साथ

चारण, भाट, मुसाहिब, चाटुकार, दरबारी आदि आज वीर गाथा काल और रीति काल से हज़ारों गुने हैं किन्तु हमारे काल को साहित्य का आधुनिक काल क्यों कहा जाता है?
फ़िराक गोरखपुरी ने कहा है -
गरज़ कि काट दिए ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त,
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में.
देश के सभी होनहार चारणों, भाटों, मुसाहिबों और दरबारियों को अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए मैंने फ़िराक के इस शेर का नवीनीकरण किया है-
गरज़ कि काट दिए ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त,
वो तलुए चाट के गुज़रे, कि दुम हिलाने में.

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

गुरुजी की व्यस्तता



गुरुजी की व्यस्तता –
अल्मोड़ा में पढ़ाते हुए भी मेरा दिल हमेशा लखनऊ में ही रहा करता था. माँ-पिताजी के साथ रहने का कोई मौक़ा मैं अपने हाथ से जाने नहीं देता था. भला हो इन विश्वविद्यालयों का जहाँ और कोई सुविधा हो न हो पर छुट्टियाँ बे-भाव मिला करती हैं. 1993 में पिताजी के स्वर्गवास से पहले हमारी सारी छुट्टियाँ लखनऊ में ही बीता करती थीं. लखनऊ के घर के सारे बड़े कामों की ज़िम्मेदारी मैंने ओढ़ रक्खी थी.
मेरा एक भक्त किस्म का छात्र था. वह हेड कांस्टेबल था और पुलिस लाइन में नियुक्त था, साथ ही साथ इतिहास में व्यक्तिगत छात्र के रूप में वह एम. ए. भी कर रहा था. अक्सर अपनी शंकाओं के समाधान के लिए वह मेरे पास आ जाया करता था पर बार-बार मेरे लखनऊ जाने से उसके अध्ययन में बाधा पड़ जाती थी. एक दिन उसने मुझसे पूछा –
‘गुरु जी ! आपकी छुट्टियों का कोई हिसाब है?’
मैंने उसे जवाब देने के बजाय एक सवाल दाग दिया?
‘ये बता, तेरी ऊपरी आमदनी का कोई हिसाब है?’
उसने शरमाते हुए जवाब दिया – ‘मेरी ऊपरी आमदनी का हिसाब तो सिर्फ़ भगवान जी के पास होगा गुरु जी. ! ’
अब मैंने अपना सीना फुलाकर उसके सवाल का जवाब दिया – ‘मेरी जायज़, हड़ताली और फ़्रेंच, इन सभी छुट्टियों का हिसाब भी भगवान जी ही रखते हैं.’
खैर, यह तो अल्मोड़ा का किस्सा हुआ, अब लखनऊ के प्रवास की बात पर लौटता हूँ.
1989-90 की बात थी. शरदावकाश और इलेक्शन की छुट्टियाँ मिलाकर लगभग 70 दिन की हमारी छुट्टियाँ थीं. आदतन हम सपरिवार लखनऊ पहुँच गए. हमारी माँ को घर के काम से पूरी और हमारी श्रीमती जी को आधी छुट्टी चाहिए थी इसलिए घर का काम करने के लिए एक नौकर का इंतजाम किया गया. वो कोई बीस-बाईस साल का लड़का होगा, नाम था भोला.
भोला और मैं दोनों ही घर के काम में जुट गए. घर में तीन साल से पुताई नहीं हुई थी इसलिए तुरंत पुताई वाले आ गए. पुताई से पहले घर की मरम्मत भी होनी थी. मिस्त्रियों, पेंटरों द्वारा बताया गया सारा सामान आ गया फिर भी रोज़ाना वो मुझे किसी न किसी सामान के लिए बाज़ार दौड़ाते ही रहते थे. वैसे बाज़ार के चक्कर लगाने में परेशानी किसे थी? सब्ज़ी-फल लाने के लिए अलग से चक्कर भी तो नहीं लगाने पड़ते थे.
एक दिन माँ ने भोला से पूछा – ‘क्यों रे भोला, तेरी शादी हो गयी है क्या?’
भोला ने जवाब दिया – ‘का बात करत हो माता राम ! हमरे दुई ठो बच्चा हैं. बिटिया चार साल की है और बिटवा साल भरे का. ’
माता राम बोलीं –
‘तू खुद अभी बच्चा है और तेरे दो बच्चे हो गए? पहले तू अपने पैरों पर खड़ा हो जाता, फिर शादी करता, बच्चे पैदा करता.’
भोला नाम का ही भोला था पर था बड़ा सयाना. उसने माता राम के इस सवाल पर एक करारा जवाब दाग दिया –
‘माता राम ! ई बात आपको भैयाजी को भी समझाय का चही. हम तो फिरऊ कुछ कमाय लेत हैं पर भैया जी तो घर में ही पड़े-पड़े पुताई-सफाई कराय देत हैं, सौदा-सुल्फा लाय देत हैं, कुछ कमाते-धमाते हैं नाहीं, फिरऊ उनकी सादी भी आप कराय दियो हो और उनकी दुई-दुई बिटियाँ भी हुई गईं हैं.’
भोलेनाथ का जवाब सुनकर माता राम तो चीमटा लेकर उसके पीछे दौड़ पडीं पर मैं और पिताजी हंसने लगे.
पिताजी ने अपनी हंसी रोक कर मुझसे कहा –
‘कुछ तो शर्म करो बरखुरदार ! आगे से जब लम्बी छुट्टियाँ हुआ करें तो कुछ दिन लखनऊ के बाहर भी बिता लिया करो.’           

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

शुभाशीर्वाद

शुभाशीर्वाद -
अपने व्यंग्य-वाण के लिए प्रसिद्द, स्वर्गीय प्रतापनारायण मिश्र के आशीर्वचन याद आ गए और एक किस्सा भी -
एक पंडितजी रास्ते में जा रहे थे, उनके पीछे-पीछे शरारती लड़कों की एक टोली चल रही थी जिसमें से कोई न कोई उनके सर पर पीछे से चपत लगाता जा रहा था या उनकी चुटिया खींच रहा था. बेचारे पंडित जी फिर भी चुपचाप चले जा रहे थे. फिर अचानक वो लड़के उनके सामने आकर बोले -
'पंडित जी, पंडित जी, देओ असीस.'
पंडित जी ने तुरंत आशीर्वाद दिया -
'खुसी रहो जजमान, हिये की दोनों फूटें,
घुटनों के बल गिरो, दांत बत्तीसों टूटें.'
हमको पीछे से चपतियाने वाले, हमारी पीठ में छुरा घोंपने वाले और फिर हमारे सामने आकर हमसे वोट मांगने वाले सभी प्रत्याशियों को हमारा ऐसा ही आशीर्वाद.