हम चार भाइयों के बीच अकेली बहन बारह रक्षाबंधन पर्वों से हमारे बीच मौजूद नहीं है.
मेरे लिए रक्षाबंधन त्यौहार अब बहन से राखी बंधवाने का नहीं बल्कि उसके साथ बिताए हुए खट्टे—मीठे पलों को याद करने भर का रह गया है.
1956 में मैं कक्षा 1 में पढ़ता था. उन दिनों मुझे 2/- प्रति माह जेब खर्च मिला करता था.
ज़ाहिर है कि इस जेब खर्च से रक्षाबंधन पर और भाईदूज पर बहन जी को अपनी तरफ़ से कोई उपहार देने की मेरी हैसियत नहीं थी.
इन दोनों पर्वों पर पिताजी अपने चारों बेटों को दो-दो रुपयों के कड़क-कड़क नोट प्रदान करते थे ताकि हम उन्हें बहन जी को भेंट में दे दें.
अपने भाइयों के दिलों की बात तो मैं नहीं जानता लेकिन मैं ख़ुद अपने दिल की बात आप सबसे साझा करना चाहता हूँ.
राखी और भाई दूज, इन दोनों पर्वों पर, बहन जी को दो-दो रूपये भेंट करते समय मुझे ऐसा लगता था कि इन रुपयों के साथ-साथ कोई मेरे प्राण भी खींच कर ले जा रहा है.
चारों भाइयों से दोनों पर्वों पर कुल जमा सोलह रुपयों की मोटी रक़म और मिठाइयों के डिब्बे पिताजी की जेब से.
वाह ! किस्मत हो तो बहन जी की जैसी !
जन्मदिन पर दो-दो रुपयों की अतिरिक्त भेंट को मिला कर बेटों को एक साल में कुल 26-26 रूपये और बहन जी को राखी पर और भाई दूज पर मिली भेंट को मिला कर कुल 42 रूपये !
उन दिनों गब्बर सिंह नहीं हुआ करते थे वरना वो मेरे न्यायाधीश पिताजी से कहते –
‘बहुत नाइंसाफी है.’
वैसे मैंने ख़ुद गब्बर सिंह की भूमिका निभाते हुए पिताजी को जब उनकी इस नाइंसाफ़ी के बारे में बताया तो उन्होंने अपने आग्नेय नेत्रों से मुझे ऐसे घूरा कि अपनी जान की सलामती के लिए मैंने उनके सामने से खिसकना ही बेहतर समझा.
हमारी बहन जी राखी पर और भाई दूज पर मिली भेंट का सदुपयोग पुराने रेकॉर्ड्स पर पेंटिंग करने के लिए ब्रश और पेंट खरीदने में खर्च कर देती थीं वरना टाटा-बिरला बनने से उन्हें कौन रोक सकता था?
दीवार पर टंगे पशु-पक्षियों में और प्राकृतिक दृश्यों में, भला किस बालक की रूचि हो सकती थी?
भेंट में मिले इन अतिरिक्त 16 रुपयों में से अगर बहन जी एकाद रुपया अपने सबसे छोटे भाई को माल-ताल खिलाने में खर्च कर देतीं तो उनका क्या बिगड़ जाता?
बोनस में भाई का प्यार और कृतज्ञता भी मिलती.
नवम्बर, 1964 में जब बहन जी की शादी हुई तब मैं 14 साल का था.
अपनी शादी के बाद बहन जी की कोशिश रहती थी कि वो हर रक्षाबंधन पर भाइयों को राखी बाँधने के लिए अपने माइके ज़रूर पहुंचें.
हाई स्कूल, इंटर या बी० ए०, एम्० ए०, करने वाले मुझ नॉन-कमाऊ सपूत के पास अपनी बहन को राखी पर भेंट में देने के लिए जो भी होता था वह पिताजी के सौजन्य से ही होता था लेकिन बहनजी अब ख़ुद अपनी तरफ़ से मिठाइयों के और नमकीन के डिब्बे लाया करती थीं.
‘बहुत नाइंसाफी है’ वाली गब्बरी शिकायत न जाने कहाँ उड़न छू हो गयी थी.
रक्षाबंधन पर और भाई दूज पर बहन जी के नफ़े-नुक्सान की बात सोचने में भी मुझे अब शर्म आती थी.
बड़ा होने पर कमाऊ होने के बाद मैंने रक्षाबंधन पर पहली बार (1974 में) जब अपनी जेब से बहन जी को भेंट दी तो मैं बेहद ख़ुश था लेकिन पता नहीं क्यों, मेरे सर पर हाथ फेरते हुए बहन जी की आँखें डबडबा रही थीं.
रक्षा बंधन की शुभकामनाएं |
जवाब देंहटाएंमित्र, तुमको और तुम्हारी 1 दर्जन बहनों को भी रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !
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