शनिवार, 14 जनवरी 2023

एक महीना चार तारीख़ें

 पहली तारीख़ –

प्रभात
आज मैंने अपनी पीएच०डी० थीसिस सबमिट कर दी. मेरी ख़ुशी की कोई इंतिहा नहीं थी लेकिन मेरे गुरु जी, मेरे गाइड, मेरे आदर्श, प्रोफ़ेसर मेहता, मेरे सर, ने अपने चरणों में झुके हुए इस नाचीज़ के कानों में जैसे कोई बम फोड़ते हुए कहा –
‘बरखुरदार, आज से तुम्हारी फ़ेलोशिप बंद हो जाएगी.’
मेरे तो प्राण ही निकल गए. मैं मन ही मन सोच रहा था -
‘अम्मा-बाबूजी ने मुझे इस मुक़ाम तक पहुंचाने में अपनी हर छोटी-बड़ी ज़रुरत की कुर्बानी दी है और अपने तीस बीघा खेत में से दस बीघा खेत बेच दिए हैं. इधर मैं हूँ कि उस नुक्सान को अब और बढ़ाने वाला हूँ.’
लेकिन तभी सर ने मेरे कानों में मिस्री घोलते हुए कहा –
‘कल से तुम हमारे डिपार्टमेंट में एक लेक्चरर की ज़िम्मेदारी सँभाल रहे हो. ये रहा तुम्हारा अपॉइंटमेंट लैटर !’
मेरे कानों में जैसे मंदिर की घंटियाँ बजने लगीं. सर ने इसके आगे क्या कहा, मुझको इसकी कोई खबर ही नहीं हुई.
अम्मा की पैबंद लगी धोती की जगह कोई अच्छी सी साड़ी, उनके शरीर पर मंगल सूत्र के अलावा सभी बेचे गए गहनों में से कम से कम दो-चार की वापसी, बाबू जी के घर में ही रफ़ू किए गए कुर्ते की जगह राजेश खन्ना के स्टाइल वाला कुर्ता और उनकी टूटी-फूटी साइकिल की जगह चमचमाती मोटर साइकिल, बारिश के मौसम में टपकती छत और दरार पड़ी दीवारों वाले हमारे घर का पूर्ण-जीर्णोद्धार, और फिर उसी घर में प्रवेश करती, दुल्हन बनी लजाती-सकुचाती, मुस्काती रजनी !
ये सब के सब अधूरे सपने, एक साथ ही मेरी आँखों में तैरने लगे थे.
सर से विदाई लेकर मैंने जब सबसे पहले यह खुशखबरी जगन चाचा के घर ट्रंक कॉल कर के अम्मा-बाबूजी को सुनाई तो उनकी ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था. पचास रूपये का ट्रंक कॉल करने में जेब हल्की ज़रूर हुई और फिर रजनी के साथ जश्न मनाने में भी पचास रुपयों की एक्स्ट्रा चोट लग गयी लेकिन आज के दिन इन सब का क्या अफ़सोस करना?
अब तो रात के दस बज रहे हैं. हॉस्टल पहुँच कर अम्मा की भेजी हुई मठरियां खाते हुए अपने पहले लेक्चर की तैयारी कर लेता हूँ, क्या मालूम कि बिना कोई नोटिस दिए हुए ही, हमारे सर, कल ही मुझे स्टूडेंट्स को सुपुर्द कर दें !
अब देखिए, फ़िल्म ‘अंदाज़’ के इन राजेश खन्नाओं को !
बिना लाइट जलाए, हवाई जहाज की स्पीड से मोटर साइकिल चलाते हुए इनको न तो अपना कोई ख़याल है और न ही राह चलते किसी और का.
लेकिन ये पलट कर क्यों आ रहे हैं?
हे भगवान ! पीछे बैठे लड़के ने ये क्या निकाला?
हाय ! इन्होने मुझे गोली क्यों मारी?
अम्मा ! अम्मा ! बाबूजी ! रजनी ----------
दसवीं तारीख –
प्रोफ़ेसर मेहता
क्या से क्या हो गया?
अपने टीचिंग प्रोफ़ेशन के तीस साल में मैंने प्रभात जैसा ब्राइट और डेडिकेटेड स्टूडेंट कोई नहीं देखा है.
सच में गुदड़ी का लाल है यह लड़का! कुछ ही वक़्त के बाद इसे हमारे रिसर्च-प्रोजेक्ट के सिलसिले में अमेरिका भी तो जाना है. रजनी से इसकी शादी भी तो होनी है.
इसको लेकर इसके अम्मा-बाबूजी ने क्या-क्या सपने देखे होंगे?
इसकी और रजनी की जोड़ी कितनी अच्छी लगती है? लेकिन अब क्या होगा?
नौ दिन में इसके तीन ऑपरेशन तो हो चुके हैं, इसको 37 बोतल तो खून चढ़ चुका है. तीन दिन तो यह कोमा में रहा है.
कौन लोग थे जिन्होंने इसे गोली मारी?
इसकी तो किसी से दुश्मनी नहीं थी. गाँव का भोला-भाला, सिर्फ़ पढ़ाई से मतलब रखने वाला, गरीब घर का लड़का जो कि ऊंचे स्वर में बोलना तक नहीं जानता. पुलिस कह रही है कि स्टूडेंट यूनियन के किसी नेता के धोखे में इसे गोली मारी गयी है. अब अपराधी पकड़े जाएं और उन से पूछताछ कर के असलियत पता भी चल जाए तो जो अनहोनी प्रभात के साथ हुई है उसकी भरपाई तो नहीं होगी.
वैसे डॉक्टर्स बहुत होपफ़ुल हैं. बहुत जल्दी रिकवर कर रहा है, हमारा ज़ख़्मी शेर.
एक महीना अस्पताल में बिता कर जब प्रभात डिपार्टमेंट में वापस आएगा तो हम सब जश्न मनाएंगे.
यूनिवर्सिटी इसके इलाज का पूरा खर्चा उठा रही है. इसको खून देने के लिए मेडिकल कॉलेज में लड़के-लड़कियों का हुजूम उमड़ पड़ा था. कितनों की दुआएं इस मासूम के साथ हैं !
इसके अम्मा-बाबूजी और रजनी तो हॉस्पिटल से रोज़ मंदिर जाते हैं. मैं बरसों से मंदिर नहीं गया था लेकिन इसकी वजह से मुझ जैसा नास्तिक भी संकट मोचक के दरबार में कई बार हाज़री लगा चुका है.
हे भगवान ! सब मंगल करना !
बीसवीं तारीख़ –
रजनी
आज डॉक्टर मित्तल ने ऐसी खबर सुनाई है जिसका हम सब को पिछले 19 दिनों से इंतज़ार था. अम्मा-बाबूजी का बबुआ और मेरा प्रभात अब एक हफ़्ते में हॉस्पिटल से डिस्चार्ज हो जाएगा.
लखनऊ मेडिकल कॉलेज की हिस्ट्री में यह ऐसा पहला केस होगा जिस में कि इतने ज़्यादा ब्लड-लॉस के बाद किसी की रिकवरी हुई हो.
प्रभात ने तो आज तक किसी चींटी का भी दिल नहीं दुखाया होगा. उस बेक़सूर को भला भगवान जी क्यों सज़ा देंगे?
अब हमारी दुआएं तो क़ुबूल होनी ही थीं.
सब कुछ ठीक हो जाएगा. हाँ, यह ज़रूर है कि इस में काफ़ी वक़्त लगेगा. लेकिन मेरा हीरो लेक्चरर भी बनेगा और अमेरिका भी जाएगा.
प्रभात का सपना कि मैं उसके घर में दुल्हन के भेस में प्रवेश कर रही हूँ और अम्मा मेरी आरती उतार रही हैं, यह भी ज़रूर पूरा होगा.
अभी तो प्रभात की थीसिस तैयार करवाने में अपने रोल का उस से एक ज़बर्दस्त इनाम भी तो मुझे लेना है. उसकी और मेरी फ़ेलोशिप का एक बड़ा हिस्सा तो हमारी रिसर्च की ही भेंट चढ़ जाता था लेकिन अब तो उसकी सेलरी हमारी हसरतें पूरी करने का जरिया बनेगी.
आख़िर कब तक हम पैदल परेड करेंगे या रिक्शे में बैठ कर उस में हिचकोले खाते रहेंगे?
ऑलमोस्ट डॉक्टर प्रभात और उनकी वुड भी डॉक्टर रजनी का जोड़ा एक मोटर साइकिल तो डिज़र्व करता ही है.
हनीमून के लिए प्रभात को मुझे स्विट्ज़रलैंड में आल्प्स की पहाड़ियों में नहीं, तो कम से कम श्री नगर की हसीन वादियों में तो ज़रूर ही ले जाना पड़ेगा.
लेकिन अपने इन तमाम सपनों पर मुझे ब्रेक लगाना पड़ेगा.
मम्मी-पापा तो देहरादून से आकर एक तरह से लखनऊ में ही बस गए थे. दोनों प्रभात पर जान छिड़कते हैं. मैंने ही ज़बर्दस्ती उन्हें वापस देहरादून भेजा है.
प्रभात के पूरी तरह से रि-कवर करते ही मम्मी-पापा हमारी शादी की प्लानिंग कर रहे हैं. अम्मा-बाबूजी की तो यही सबसे बड़ी हसरत है.
सच ! कितना अच्छा लगता है जब किसी लड़की के मम्मी-पापा उसकी पसंद के लड़के को और किसी लड़के के अम्मा-बाबूजी उसकी पसंद की लड़की को अपनी पसंद बनाकर निहाल होते हों !
मैं कितनी लकी हूँ !
तीसवीं तारीख –
अम्मा
जय हो बजरंग बली ! आज मेरा बबुआ अस्पताल से छुट्टी पा जाएगा.
भगवान भला करे डागदर मित्तल का ! वो मेरे बबुआ को मौत के चंगुल से छुड़ा कर लाए हैं.
अब तो बबुआ बिस्तर से खुद उठ कर गुसलखाने चला जाता है और रजनी का हाथ पकड़ के बरामदे में थोड़ा घूम भी लेता है.
मेरा बबुआ राजी-खुसी घर पहुँच जाए तो मैं और बबुआ के बाबूजी चारों धाम की जात्रा करेंगे.
बबुआ और रजनी की जोड़ी तो राम-सीता की जोड़ी लगती है. कितना प्यार है, इनका आपस में !
रजनी का बस करे तो वो बबुआ को छोड़ कर अस्पताल से कभी जाए ही नहीं पर वो तो मैं हूँ जो उसे ढकेल कर उसके हॉस्टल भेजती है.
इत्ते बड़े घर की लड़की, मुझ गंवार को अपनी माँ के जैसा मान देती है और बबुआ के बाबूजी की तो ऐसी सेवा करती है कि पूछो मत !
अब हमको दो-तीन महीने लखनऊ में ही किराए का घर लेकर रहना होगा. डागदर मित्तल कह रहे थे कि बबुआ को अभी वो लखनऊ से बाहर नहीं जानें देंगे.
थोड़ा कर्जा सर पर जरूर चढ़ जाएगा लेकिन अपने बबुआ की सेवा करने में हम कोई भी कोताही नहीं बरतेंगे.
5-10 बीघा खेत और भी बेचनें पड़ें तो क्या चिंता है?
हमारा बबुआ सलामत रहे, हमको और क्या चाहिए !
अब तो मैं बबुआ को घर के घी के बने पकवान खिलाऊँगी, उसे बादाम खिलाऊँगी, उसकी किसी भी दवा का कभी नागा नहीं होने दूंगी और जब तक वो पूरी तरह से तंदुरुस्त नहीं हो जाता, उसे कोई पढ़ाई-वड़ाई भी नहीं करने दूंगी.
धन्य हो प्रभु ! तुम्हारी किरपा से अब अस्पताल से अपना बोरिया बिस्तर बाँधने की सुभ घड़ी आ गयी है.
चलो जी, मंदिर में मत्था भी टिका आए, अब देखें कि हमारा बबुआ क्या कर रहा है !
हाय राम ! बबुआ के कमरे में इतने सफ़ेद कोट वाले काहे को भीड़ लगाए हैं?
कहीं मेरे बबुआ को कुछ हो तो नहीं गया?
हाय ! मेरे मुंह से ये क्या असुभ निकल गया?
हे राम जी ! हे संकट मोचक ! मेरे बबुआ की भली करियो ! वही हमारे जीवन की आस है !
डागदर साहब ! मेरे बबुआ को क्या हो गया?
आप कुछ बोलते क्यों नहीं?
अरे मेरे बबुआ का मुंह क्यों ढांप रहे हो तुम लोग?
इसको तो आज अस्पताल से छुट्टी मिलनी है.
मेरे मंदिर जाने तक तो ये भला-चंगा था.
डागदर साहब, आप मुझे मेरा बबुआ वापस कर दो.
मैं घर में ही उसकी रात-दिन सेवा कर के उसे ठीक कर लूंगी.
अरे ! मुझे छोड़ो ! मुझे बबुआ का मुंह तो देख लेने दो !
बबुआ के बाबूजी ! अपना सर मत पीटो, हमारा बबुआ अभी उठ खड़ा होगा.
ये तो मेरे हाथ से बजरंग बली का परसाद भी खाएगा.
इसकी नाक में रुई मत ठूंसो, इसको छींक आ जाएगी.
रजनी बिटिया ! ये क्या हो गया?
तेरी तपस्या क्या अकारथ चली गयी?
मेरा बबुआ ! मेरा लाल ! मेरा छौना !
मुझे छोड़ कर मत जा बेटा !
लौट आ बेटा ! लौट आ - - - - - !
(हमेशा की तरह प्रभात और रजनी इस कहानी में भी मिल नहीं पाए.
1970 के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय में हुए एक हादसे पर लिखी गयी यह कहानी लिखते समय न जाने कितनी बार मेरी ऑंखें छलक आई होंगी.
इस कहानी को मैंने कहानी के चार मुख्य पात्रों की ज़ुबानी कहलवाया है.)

16 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. मित्र, इस हादसे को याद कर के आज भी मेरा दिल दहल जाता है.

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  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कलरविवार (15-1-23} को "भारत का हर पर्व अनोखा"(चर्चा अंक 4635) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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    1. 'भारत का हर पर्व अनोखा' (चर्चा अंक - 4635) में मेरी कहानी को सम्मिलित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद कामिनी जी.

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  3. मर्माहत संस्मरण या हादसा बस दारुण।

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    1. कुसुम जी, यह कहानी उस हादसे के करीब 46 साल बाद भी मुझे आज तक झकझोरती है.

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  4. पढ़ते समय लग रहा अभी सभी ठीक हो जाएगा और हैप्पी एंडिंग होगी पर अंत तक पहुंचते आँखें भर आयीं! पढ़ते समय सोच रही थी कि पता करूंगी कि प्रभात सर किस डिपार्टमेंट में काम करते हैं कल विश्वविद्यालय जा कर पर अंत में निराशा हाथ लगी!
    चूंकि मैं भी एक गाँव से हूँ और लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा हूँ तो बहुत ज्यादा जुड़ाव महसूस हो रहा था, सारे दृश्य आँखों के सामने नाच रहें थे ऐसा लग रहा था जैसे हमारे डिपार्टमेंट का ही संस्मरण हो!

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    1. मनीषा, इस कहानी में मैंने पात्रों के नाम बदल दिए हैं पर ये हादसा उन सब लोगों को याद होगा जो कि 1970 के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय से सम्बद्ध थे.
      प्रोफ़ेसर मेहता, प्रभात और रजनी के विभाग का नाम भी मैंने जान बूझ कर नहीं बताया है.

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  5. गाँव का गरीब किसान किस तरह अपनी औलाद को उच्च शिक्षा देता है ! कहानी में आपने बखूबी उतारा है, हमारे देश में अभी भी बहुत से बच्चे खेत बेचकर बाहर पढ़ने जाते हैं कहानी का कथानक और पात्रों का सजीव चित्रण कहानी को मर्मस्पर्शी बना गया !

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    1. जिज्ञासा, इस कहानी के सबसे मार्मिक प्रसंग का मैंने उल्लेख नहीं किया है. मृतक की माँ को चाची की कार में हम उसके बेटे से आख़री बार मिलाने मॉर्चरी ले गए थे. कार में वह बेचारी माँ अपनी अर्ध-मूर्छा में जो कुछ बड़बड़ा रही थी, उसी के आधार पर यह कहानी लिखी गयी है.

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  6. मार्मिक हृदय को दहला देने वाला संस्मरण,पढ़ते हुए ऐसा लगा कि सब कुछ आँखों के समक्ष ही घटित हो रहा है।

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    1. मेरी कहानी की ऐसी तारीफ़ के लिए शुक्रिया अभिलाषा जी.
      यह कहानी मेरी अन्य रचनाओं से बिलकुल भिन्न है लेकिन न जाने क्यों, मेरे दिल के बहुत करीब है.

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  7. बेहतरीन रचना,हृदय को छूती हुई

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  8. संस्मरण के आधार पर लिखी गई आपकी इस कहानी ने हृदय को विदीर्ण कर दिया बन्धु गोपेश जी!।... बहुत सुन्दर!

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  9. यह संस्मरण जब भी पढ़ती हूँ सभी घटनाएँ जीवंत प्रतीत होती हैं और मन व्याकुल हो उठता है।

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