बुधवार, 8 अगस्त 2018

प्रलय - 2

प्रलय – 1 के लिए देखिए https://www.facebook.com/gopeshmohan.jaswal/posts/10210175980475484
प्रलय- 2
बादल फटने के हादसे के अगले दिन बिशनपुर गांव एक उजड़ा हुआ समुद्री टापू लग रहा था. जगह-जगह नाले फूट पड़े थे. मूसलाधार बारिश अब भी अपना कहर बरपा रही थी. खण्डहर हुए मकान मलबे से ढके हुए थे. पहाड़ की मिट्टी भरभरा कर गिरती चली जा रही थी. मलबों से ढके मकानों के अन्दर से उनमें फंसे और दबे हुए ज़िन्दा लोगों की चीख-पुकारें दूर-दूर तक सुनाई दे रही थीं. मातम मनाने वालों का शोर बारिश और तूफ़ान के शोर को भी मद्धम कर रहा था. कुछ मुर्दा जानवर इधर-उधर ज़मीन पर छिटके पड़े थे और कुछ पानी के तेज़ बहाव के साथ बहे चले जा रहे थे. दो-चार कुत्ते गिरे हुए पेड़ों को पुल की तरह से इस्तेमाल करके इधर से उधर जा रहे थे.
पूरे बिशनपुर गांव में बस भानू पंडितजी और ग्राम प्रधान ठाकुर जमनसिंह के पक्के मकान सुरक्षित थे. भानू पंडितजी अपने घर के बरामदे में चिंतित मुद्रा में खड़े होकर हालात का जायज़ा ले रहे थे. पंडितजी मन ही मन हिसाब लगाते हुए सोच रहे थे -
'हे भगवान ! बड़ा बुरा हुआ. किसना दर्जी और भूसन लुहार का तो पूरा कुनबा मिट गया. दोनों पर मेरा करीब तीन हज़ार का कर्ज़ा बाकी था. अब उसकी भरपाई कौन करेगा? बिन्नो की छोटी बहन मुन्नी की शादी में हजार-दो हजार मिलने वाले थे, वो भी डूबे. उसकी अम्मा और खुद मुन्नी तो परलोक सिधार गए. अब तो बिशनपुर गांव में एक साल तक कोई जसन होने से रहा. भानू पंडित ! तुम्हारी साल भर की दान-दक्षिणा समझो गई बट्टे-खाते में.'
सामने से किसना दर्जी की भैंस रस्सी तुड़ा कर भागती हुई आ रही थी. भैंस माता के दर्शन कर भानू पंडितजी की बांछे खिल गईं. अब किसना दर्जी का उधार उसकी भैंस अपने घर बांधकर वसूल हो जाएगा. भूसन लुहार के घर कोई गाय-भैंस तो नहीं थी पर उसके औज़ारों को दूसरे लुहारों को बेचकर हज़ार -पाँच सौ तो इकट्ठे हो ही जाने थे. गांव के दो दर्जन मृतकों के अन्तिम संस्कार का जिम्मा भी तो पंडितजी को ही मिलना था. उसमें भी दान-पुण्य के रूप में उन्हें मोटी रकम हासिल होने वाली थी. अब तक दुखी भानू पंडितजी का चित्त गद्गद हो चुका था. उन्होंने श्रद्धापूर्वक हाथ जोड़ कर इन्द्रदेव को उनकी महती कृपा के लिए धन्यवाद दिया.
शैलनगर और आसपास के गांवों से बिशनपुर गांव में तमाशबीनों की भारी भीड़ जमा हो चुकी थी। आर्मी और एस. एस. बी. के जांबाज़ जवान तेज़ बारिश में, अपनी जान की परवाह किए बग़ैर, मलबे में फंसे हुए लोगों को बाहर निकालने में जुटे हुए थे. आर्मी मेडिकल कोर वाले घायलों की मरहम पट्टी कर रहे थे तो कुछ रोते हुए बच्चों को बिस्किट्स वगैरा खिला-पिलाकर बहलाने की कोशिश में भी लगे थे पर दर्शकों की जमात शोर-शराबा करने के अलावा उनके काम में अड़ंगा डालने का कर्तव्य निभा रही थी.
कुछ दर्शकों के लिए ये हादसा किसी तमाशे जैसा था. खबर उड़ी थी कि बिशनपुर गांव में मरने वालों की तादाद सैकड़ों में है और पूरा गांव श्मशान में तब्दील हो गया है पर तमाशबीनों को सिर्फ बीस-पच्चीस लोगों की मौत और तीस-चालीस मकानों के ज़मीदोज़ हो जाने की ख़बर ने काफ़ी निराश किया. सिर्फ़ तमाशा देखने के लिए इतनी मेहनत करके और इतना खतरा मोल लेकर जो लोग आए थे वो टूटे मकानों, टूटे पेड़ों और मलबे के ढेर पर खड़े होकर फोटो खिंचवा रहे थे. मशहूर फोटोग्राफर राजेश्वर उपाध्याय ने अपने आसपास खड़े दर्शकों की जनरल नॉलिज बढ़ाने के लिए कहा -
'इस नज़ारे को देखकर पुरानी फ़िल्म 'मदर इंडिया' की बाढ़ का सीन याद आ गया. मैंने तो अपने कैमरे में एक से एक सेंसेशनल सीन्स कैद कर लिए हैं. एक चाय-पकौड़ी वाले की दुकान गिरकर एक पेड़ पर टंग गई थी, अब तो वह ज़मीन पर आ गई है पर मैंने इस हैंगिग रैस्त्रां के कई एंगिल्स से स्नैप्स लिए हैं. उत्तरकाशी के भूकम्प के फ़ोटो-फीचर पर मुझे ‘मनोहर टाइम्स’ वालों का इनाम भी मिला था. इस बार भी कोई न कोई अखबार वाला मुझे इनाम दे ही डालेगा. अब नन्द गांव जाता हूँ , वहां भी बादल फटा है और भारी तबाही हुई है. वहां से भी कुछ न कुछ एक्साइटिंग स्नैप्स का जुगाड़ तो हो ही जाएगा.'
इस शेखीखोर राजेश्वर उपाध्याय के कारनामों का घिसा-पिटा किस्सा सुनकर ‘मधुकर समाचार’ के चीफ़ रिपोर्टर मुकुन्द तिवारी मन ही मन हंस रहे थे. उन्होंने मकान के मलबे में अधदबी एक औरत और उस की छाती से चिपट कर दूध पीते उसके बच्चे की कीचड़ में सनी लाशों की ऐसी शानदार तस्वीर खींची थी कि उन्हें इंटर्नेशनल अवार्ड मिलना तय था. अपने कैमरे को चारों तरफ़ घुमाते हुए इस विनाश लीला का हर दिलचस्प मन्ज़र कैद करते हुए दिल ही दिल में वो अपने राइवल उपाध्याय से बात कर रहे थे -
'बेटा राजेश्वर उपाध्याय ! फ़ोटोग्राफी के हुनर में मैं तुम्हारा बाप हूँ. मैं बिशनपुर गांव और नन्द गांव, दोनों जगहों में तुम पर भारी पड़ूंगा. तुमको एक फ़ोटो-फीचर पर नेशनल अवार्ड मिला है तो मुझे चार नेशनल और दो इण्टरनेशनल अवार्ड्स मिल चुके हैं. मण्डल कमीशन के विरोध में किए जाने वाले आन्दोलन के दौरान दो स्टूडेन्ट्स के आत्मदाह का टीवी चैनल्स पर लाइव कवरेज मेरी ही बदौलत आया था।'
ठेकेदार ठाकुर भोला सिंह बड़ी मुस्तैदी से पीड़ितों को चाय, नमकीन और बिस्किट का नाश्ता करवा रहे थे. बिशनपुर गांव की सौ मीटर से भी ज़्यादा टूटी सड़क, दो ध्वस्त पुलिया, मलबे में तब्दील हो चुका पंचायत-घर, प्राइमरी पाठशाला और प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र के पुननिर्माण का ठेका हासिल करने के लिए तीन-चार हज़ार का दान-पुण्य करना घाटे का सौदा नहीं था पर बुरा हो ठेकेदार हरीश पाण्डे का. कम्बख़्त गांव के हर मर्द-औरत को सौ-सौ रूपये और एक-एक कम्बल बांट रहा था और अपने इस महान कार्य की वीडियो फि़ल्म भी बनवा रहा था. भोला सिंह सोच रहे थे -
'अब तो आला अफ़सरों और मन्त्रियों के दरबारों में मोटा चढ़ावा चढ़ाकर ही बिशनपुर गांव के रिकंस्ट्रक्शन का ठेका नसीब हो पाएगा.'
स्थानीय दबंग नेता और पिछले विधान सभा चुनाव में अपनी ज़मानत खो चुके विरोधी पक्ष के ठाकुर बलवन्त सिंह अपने दल-बल के साथ दुर्घटना-स्थल पर मौजूद थे. इस हादसे के पीछे उन्हें सत्ता-पक्ष का नाकारापन साफ़ नज़र आ रहा था. सरकार की प्रशासनिक स्तर पर कमियों और लापरवाहियों पर वो एक ओजस्वी भाषण देना चाहते थे पर इसके लिए उन्हें कोई मौका नहीं दे रहा था पर उनकी खुशकिस्मती से एक टीवी न्यूज़ चैनल का रिपोर्टर उनसे इस हादसे के बारे में सवाल करने की भूल कर बैठा तो उसके कैमरे के सामने उन्होंने भाषण फोड़ने की अपनी पूरी भड़ास निकाल ही डाली. पर अभी अपनी जन-सेवा का उन्हें कोई फड़कता हुआ नमूना भी शैलनगर की जनता के सामने पेश करना था. अपने शिकार उस टीवी रिपोर्टर के कान में कुछ कहकर उन्होंने नोटों का एक बण्डल चुपके से उसकी जेब में डाला, अपने दो समर्थकों को कीचड़ में सनवा कर, भीड़-भाड़ से दूर एक मकान के मलबे में उन्होंने फंसवा दिया और फिर उन्हें अपनी जान पर खेल कर सकुशल निकालने लाने का बड़ा नेचुरल अभिनय किया. नोटों का बण्डल पाकर मगन न्यूज़ रिपोर्टर ने इस रेस्क्यू ऑपरेशन का हर दृश्य अपने वीडियो कैमरे में कैद किया और ठाकुर साहब से उसने वादा किया कि अगले दिन उसका चैनल दिन में दस बार उनका यह महान कार्य प्रसारित करेगा.
सरकारी महकमा, लाल बत्ती वाली सफ़ेद एम्बैसडरों और नीली बत्तियों वाली जिप्सियों में लद-फंद कर बिशनपुर गांव की शोभा बढ़ाने आ पहुंचा था. अधिकारीगण कीचड़ से अपने कीमती जूतों और पोशाकों को इतनी निष्ठा से बचाने की कोशिश कर रहे थे कि उन्हें गांव वालों की तकलीफ़ पर ध्यान देने की ज़्यादा फ़ुर्सत ही नहीं मिल पा रही थी. वैसे भी आज दिन के ग्यारह बजे एक मन्त्री के दौरे के वक्त इस गांव का उन्हें दोबारा चक्कर लगाना था और कल मुख्य मन्त्री के दौरे के समय तीसरा. आज ही अगर गांव वालों की सारी शिकायतें सुनकर उनका समाधान करने की कोशिश शुरू कर दी जाती तो दूसरे और तीसरे दौरे के वक्त मन्त्रीजी और मुख्य मन्त्रीजी के सामने स्थानीय प्रशासन की बड़ी किरकिरी हो जाती. सबॉर्डिनेट ऑफिसर्स को राहत कार्य के लिए कुछ ज़रूरी हिदायतें देकर जिले के शीर्षस्थ अफ़सरान, हादसों के शिकार, दूसरे क्षेत्रों के तूफ़ानी दौरे पर निकल पड़े.
- क्रमशः ...

सोमवार, 6 अगस्त 2018

प्रलय - भाग 1

सितम्बर, 2010 में पहाड़ पर अति-वृष्टि और बादल फटने से बड़ी तबाही हुई थी. ये तबाही 2013 में हुई तबाही से तो बहुत कम थी लेकिन दिल दहलाने को, प्रशासन के निकम्मेपन को जतलाने को और बड़ी से बड़ी आपदा में भी सिर्फ़ अपना मुनाफ़ा देखने वालों का हम से परिचय कराने के लिए काफ़ी थी. मैंने इस त्रासदी को बहुत नज़दीक से देखा है और अपने अनुभव को मैंने एक कहानी की शक्ल देने की कोशिश की है. 'प्रलय' शीर्षक इस लम्बी कहानी के चार भाग हैं. आज प्रस्तुत है इसका पहला भाग.
(कहानी के पात्रों के अनुरूप उनकी भाषा पर आंचलिक प्रभाव है, मेरी प्रार्थना है कि मित्रगण इसमें भाषा की अशुद्धता न खोजें)
पिछले दो महीने से बारिश जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. सितम्बर का आधा महीना बीत चुका था. अब तो इन्द्र भगवान को लम्बी छुट्टी पर चले ही जाना चाहिए था. सबको उम्मीद थी कि कि अब खुले आसमान के रोज़ दर्शन हुआ करेंगे. बरसात के बाद शैलनगर की सुन्दरता देखते बनती है. हिमालय की चोटियां बिलकुल साफ़ दिखाई देती हैं और वो भी ऐसे जैसे आप हाथ बढ़ाकर उन्हें छू सकते हैं. पहाडि़यां और वादियां हरी मखमल की खूबसूरती को समेटे हुए दिखाई पड़ती हैं और जंगलों में फूलों की बहार होती है. पिकनिक, ट्रेकिंग और पर्वतीय तीर्थ-यात्रा के लिए ये मौसम बड़ा खुशगावार होता है. पर इस बार इन्द्र भगवान ने सितम्बर को सितमगर बनाने की ठान ली थी. दस सितम्बर से पानी बरसना शुरू हुआ. लगा कि आखरी बरसात है, हमको थोड़ा-बहुत भिगोकर हमसे विदा ले लेगी पर पानी था कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा था.
बिशनपुर गांव की लछमिया का फौजी बेटा शंकर छुटि्टयों में अपने घर आने वाला था. दो दिन की लगातार बारिश से लछमिया का जी घबराने लगा था. वो भगवान से मना रही थी कि उसका बेटा सही-सलामत उस तक पहुंच जाए. अब बादल कब छटेंगे ये तो पत्रा देखकर भानू पंडितजी ही बता पाएंगे. बीस रूपये का एक नोट,एक थैली में अपने खेत की पैदावार करेले, कद्दू की थैली और गाय के दूध से भरा एक बड़ा लोटा पंडितजी के चरणों में अर्पित करके उसने उनसे पूछा -
'पंडितजी! जरा पत्रा देखकर बताइए कि इन्दर देवता कब अपने घर वापस जाएंगे. मुझे संकर की बड़ी फिकर हो रही है. कल वो रेलगाड़ी से गौरीद्वार पहुंच रहा है पर ऐसी बरखा में शैलनगर कैसे आ पाएगा?'
भानू पंडितजीने काले बादलों को देखा, अपनी उंगलियों पर कुछ गणना की, पत्रा के दो-चार पन्ने पलटे, फिर इत्मीनान से अपने मुहं में गुटके की एक बड़ी डोज़ डाल कर बोले -
'अरे लछमिया तू बेकार में परेशान हो रही है. कहावत है - 'काला बादल जी डरवावे, भूरा बादल पानी लावे.'
अब तो बादलों का रंग भूरे से काला पड़ गया है. अब कोई चिन्ता की बात नहीं है. पत्रा बांचने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि दो-चार घण्टों में तेरी चिन्ता दूर हो जाएगी. मैं मन्तर पढ़ देता हूं. बारिश शर्तिया रूक जाएगी. और हाँ, घर जाकर बाहर की दीवाल के सहारे सींक वाली झाड़ू उल्टी रख देना. इससे बारिश रुक जाएगी.'
लछमिया इस भविष्यवाणी को सुनकर और पंडितजीके मन्तर की शक्ति को जानकर खुश हो गई. उसने पूरी श्रद्धा से पंडितजी को दण्डवत प्रणाम किया और फिर अपने घर जाने के लिए उठने लगी. पंडितजी ने उससे उलाहने के स्वर में कहा -
'अरी भागवान! मेरी दक्षिणा तो देती जा.'
लछमिया के कुछ समझ नहीं आया. बीस का एक नोट, थैली भर करेले-कद्दू और लोटा भर गाय का बढि़या दूध क्या उसने पंडितजी की मुहं दिखाई के लिए दिए थे?
पंडितजी ने लछमिया के कंफ्यूजन को दूर करने के लिए उसे समझाया -
'अरे तेरा चढ़ावा तो पत्रा देखने में खरच हो गया. बरखा रोकने का मन्तर पढ़ने में मेरा जो पुण्य लगा उसका मेहनताना तो और देती जा.'
अपनी साड़ी में उरसा हुआ बीस का आखरी नोट पंडितजी को थमाने में लछमिया को कष्ट तो बहुत हुआ पर बेटे के घर आने की खुशी में उसने लालची पंडित का ये गुनाह माफ़ कर दिया. उसने घर पहुंचते ही देवी मैया का जाप करके दीवाल के बाहर सींक वाली झाड़ू को उल्टा करके रख दिया. अब चिन्ता की कोई बात नहीं थी. उल्टी झाड़ू के टोटके और भानू पंडितजी के मन्तर के चमत्कार से बरसात थमने ही वाली थी और कल उसका लाडला संकर उससे गलबहिंया करने ही वाला था.
पर लगता है भानू पंडितजी का मन्तर और उल्टी झाड़ू का टोटका कुछ असरदार नहीं निकले. बरसात थमने की उनकी प्रार्थना ऊपर इन्द्र भगवान तक नहीं पहुँची. पानी पहले की तरह झमाझम बरसता रहा. बल्कि थोड़ी देर बाद बिजली के कड़कने की आवाज़ें कुछ ज़्यादा ही तेज़ हो गई और बारिश ने भी तूफ़ान का रूप ले लिया. लछमिया का एक कमरे का मकान कई जगह से फ़र्श की सिंचाई करने लगा. लछमिया बेचारी की बाल्टी, थाली और परात सब के सब फ़र्श को सूखा रखने में खर्च हो गए. लछमिया की बहू बिन्नो उसके साथ काम में हाथ बटाने लगी. लछमिया ने बिन्नो को प्यार से कहा -
'बिन्नो ! हम गरीबों की कुटिया में तेरी जैसी लच्छमी आई है. अभी तो तेरी लगन का साल भर भी नहीं हुआ है. मैं तुझ से ये उल्टे-सीधे काम कराऊँगी ? तेरी माँ भग्गो को मैं क्या जवाब दूंगी? तू आराम कर मैं सब कर लूंगी.'
पर बिन्नो उसके साथ सामान बचाओ अभियान में जुटी रही. बिन्नो ने घर के कीमती(?) सामानों को घर की एकमात्र चौकी पर रखकर उन्हें टूटे त्रिपाल के टुकड़ों और पॉलीथीन की थैलियों से ढक दिया. वैसे लछमिया को अपनी जान की कोई चिन्ता नहीं थी और न अपने घर या उसके सामान की. उसका लायक बेटा इस बार मकान की छत और घर के कच्चे फ़र्श को पूरी तरह से पक्का कराने वाला था. उसको चिन्ता थी तो बस बिन्नो की और अपने संकर की. लछमिया अपने संकर की चिन्ता कर सोच रही थी कि वो इस तूफ़ना में कैसे घर पहुंचेगा. उसको भानू पंडितजी पर गुस्सा आ रहा था. इतना चढ़ावा अगर वो सीधे इन्दर देवता को चढ़ाती तो वो खुद बरसात रोक देते पर वो तो पंडितजी के झांसे में आ गई. लछमिया ने अपने हाथ ऊपर जोड़ कर भगवान से अरदास की -
'हे भगवान ! भली करियो. मेरा संकर कुसल से घर आ जाए या ऐसा करो कि उसको गौरीद्वार पर ही रोक दो !'
कड़कड़ की आवाज़ के साथ लछमिया के घर के बगल का तून का पेड़ बिन्नो के मायके वाले घर पर गिर पड़ा. बिन्नो 'हाय अम्मा ! हाय मुन्नी !' का चीत्कार करते हुए उस तरफ़ दौड़ पड़ी. लछमिया भी उसके साथ भागी पर दोनों मकान के मलबे में दबी औरतों की दर्द भरी चीखें सुनने के अलावा कुछ नहीं कर पाईं. उनकी मदद की गुहार सुनकर कोई नहीं आया. सब के सब अपनी जान और अपना-अपना घर बचाने में लगे हुए थे. रोती कलपती बिन्नो का हाथ पकड़ कर लछमिया उसे फिर अपने घर खींच लाई. यहां कम से कम उनकी जान जाने का खतरा तो नहीं था. घर की टूटी खिड़की से दोनों सास-बहू रोती-कलपती अपनी आँखें फाड़-फाड़ कर विनाश लीला देख रही थीं. किसना दर्जी के घर में पनाला सा बह रहा था और वो कुदाली से पानी की निकासी की नाकाम कोशिश कर रहा था पर कुछ देर बाद उसको इस कसरत से छुटकारा मिल गया. उसके घर के ऊपर के टीले पर बना भूसन लुहार का मकान भरभराकर उसके मकान पर गिर पड़ा. बिन्नो अपने दर्द को भूलकर किसना को बचाने के लिए दौड़ पड़ी पर किसना तब तक मलबे में दबकर बिलकुल शांत हो गया था.
कुछ देर बाद बिजली कड़कने के साथ एक दिल दहलाने वाली आवाज़ हुई. लगा कि जैसे आसमान ही फट गया हो. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं था. आसमान कहां फटता है? वो तो धमाके के साथ ज़रा सा बादल फट गया था. अब इस छोटे से हादसे से बिशनपुर गांव में दो मन्जि़ला बाढ़ आ जाए और तीस-चालीस मकान बह जाएं या टूट जाएं तो क्या किया जा सकता है?
- क्रमशः ...

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

राष्ट्रकवि पर हाली तथा टैगोर का प्रभाव


आज राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त की जयंती है. राष्ट्रकवि की पिछली एक जयंती पर मैंने 'गुरु और शिष्य'पर मैंने गुरु और शिष्य शीर्षक से एक आलेख लिखा था जिसमें श्री गुप्त पर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव की चर्चा की गयी थी. आज मैं श्री गुप्त के काव्य पर दो अन्य विभूतियों के प्रभाव की चर्चा कर रहा हूँ.  
आचार्य द्विवेदी की प्रेरणा से गुप्तजी ने साकेत के अतिरिक्त अपनी अन्य रचनाओं में भी उपेक्षित नारी पात्रों को नायिका के रूप में प्रतिष्ठित किया. उन्होंने गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा को- यशोधरामें और चैतन्य महा प्रभु की पत्नी विष्णु प्रिया को- विष्णुप्रियामें नायिका बनाया. गुप्तजी ने गुरुदेव टैगोर की भांति स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे के बराबर और एक-दूसरे का पूरक माना. 1892 में प्रकाशित, गुरुदेव की नृत्य नाटिका चित्रांगदाकी नायिका अपने प्रेमी अर्जुन की न तो आराध्या बनना चाहती है,   उसकी दासी. वह तो उसकी सहचरी और सहयोगिनी बनना चाहती है. यह स्वर जिसका है, वह पौराणिक नारी नहीं, सम्पूर्ण रूप से आधुनिका नारी है.-   
आमि चित्रांगदा.
नहिं आमि सामान्य रमणी,
पूजा करि राखिबे माथाय, से-ओ आमि,
नइ. अवहेला करि पुशिया राखिबे,
पिछे से-ओ आमि नहिं, यदि पार्श्वे राखो,
मोरे संकटेर पथे, दुरूह चिन्तार,
यदि अंश दाओ, यदि अनुमति करो,
कठिन व्रतेर तब सहाय हईते,
यदि सुखे दुखे मोरे करो सहचरी,
आमार पाइबे तबे परिचय
(मैं देवी नहीं हूँ, सामान्य नारी भी नहीं हूँ मैं तो चित्रांगदा हूँ. मैं ऐसी नहीं हूँ जिसको तुम पूज्यनीय बनाये रख सको और न ऐसी हूँ जिसकी तुम अवहेलना कर सको. यदि तुम संकट के मार्ग पर मुझे अपना साथी बनाओ, यदि दुरूह चिंता का कुछ भाग मुझे भी वहां करने दो, यदि अपने कठिन व्रत में सहायता पहुँचाने के लिए मुझे अनुमति दो, यदि तुम अपने सुख-दुःख की मुझे सहचरी बनाओ, तभी तुम मेरा पूर्ण परिचय पा सकोगे.)  
साकेतमें लक्ष्मण अपनी प्रियतमा उर्मिला के प्रति प्रेम-प्रदर्शन में आत्म-सम्मान को भुलाकर कहते हैं
धन्य है प्यारी तुम्हारी योग्यता,
मोहनी सी मूर्ति, मंजु-मनोज्ञता.
धन्य जो इस योग्यता के पास हूँ,
किन्तु मैं भी तो, तुम्हारा दास हूँ.
उर्मिला उनकी चाटुकारिता भरे उदगार सुनकर प्रसन्न होने के स्थान पर खिन्न हो जाती है. पति और पत्नी को एक-दूसरे का पूरक मानने वाली उर्मिला को लक्ष्मण के इन वचनों में दासत्व की भावना परिलक्षित होती है. अर्जुन की प्रिया चित्रांगदा की ही भांति उर्मिला भी लक्ष्मण की स्वामिनी नहीं अपितु उनकी मित्र, समकक्ष, सहचरी और सहगामिनी बनना चाहती है
दास कहने का बहाना किस लिए?
क्या मुझे दासी कहाने के लिए?
देव होकर तुम सदा मेरे रहो,
और देवी ही मुझे रक्खो अहो.
यशोधराखंड-काव्य में भी यशोधराको गुप्तजी एक ऐसी साहसी स्त्री के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो अपने पति के मार्ग में बाधक नहीं अपितु उनकी सहायक बनना चाहती है. अपनी पत्नी यशोधरा और अपने परिवार के अन्य सदस्यों को बिना बताये हुए, राजकुमार सिद्धार्थ जब गृह-त्याग कर देते हैं तो यशोधरा के मन में अपने पति से सदा के लिए बिछुड़ने से भी बड़ी कसक यह है कि उसके पति ने वैराग्य लेने की अपनी योजना उससे छुपाई. अगर वो उसे अपनी इच्छा और अपना संकल्प बताते तो वह उनके धर्म-मार्ग में बाधक नहीं बनती अपितु उन्हें वह वैसे ही विदा देती जैसे कि एक वीर क्षत्राणी अपने पति को रण-क्षेत्र में जाने के लिए विदा करती है
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में,
क्षात्र धर्म के नाते,
सखि, वे मुझसे कहकर जाते.’              
बहुत कम लोग यह जानते होंगे कि गुप्तजी ने उर्दू-साहित्य से भी काव्य-सृजन की प्रेरणा ली थी. उन्होंने दत्तात्रेय कैफ़ी की उर्दू रचनाओं से प्रेरणा लेने की बात स्वीकार की है परन्तु इस क्षेत्र में हम अल्ताफ़ हुसेन हाली को तो एक प्रकार से उनका गुरु कह सकते हैं. उर्दू के पहले प्रगतिशील शायर हाली ने जहाँ एक ओर कौमी इत्तिहाद (सांप्रदायिक सद्भाव) को महत्त्व दिया वहीं दूसरी ओर उन्होंने भारत के आर्थिक उत्थान के लिए भारतीय उद्योग और वाणिज्य को आधुनिक तकनीक पर विकसित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. 1874 में प्रकाशित अपनी नज़्म हुब्बे वतनमें उन्होंने भारतीय मुसलमानों और हिन्दुओं को इस बात के लिए फटकार लगाई कि वे अब भी मिथ्या अभिमान और जातीय गौरव की शान बघारने से बाज़ नहीं आ रहे हैं और इस बात को अनदेखा कर रहे हैं कि वो गुलामी और गरीबी में अपनी ज़िल्लत के दिन गुजार रहे हैं-
 इज्ज़तो-कौम चाहते हो अगर, जाके फैलाओ उनमें इल्मो-हुनर,
जात का फख्र और नसल का गुरूर, उठ गए जहां से ये दस्तूर.
अब न सैयद का इफ्तखार (गौरव) सही, अब न बिरहमन का शूद्र पर तरजीह (वरीयता),
हुई तर्की (परित्याग) तमाम खानों की, कट गयी जड़ से खानदानों की.     
कौम की इज्ज़त अब हुनर से है, इल्म से या कि सीमो-ज़र (सोना-चांदी) से है,
एक दिन में वो दौर आयेगा, बे-हुनर भीख तक न पायेगा.  
हाली ने अपने महाकाव्य मुसद्दसे हालीमें इस्लाम के गौरव शाली इतिहास का गुणगान करते हुए वर्तमान काल में भारतीय मुसलमानों की दुर्दशा का चित्रण किया था और उन्हें अपना वर्त्तमान व अपना भविष्य संवारने के लिए कर्मठता, अध्यवसाय, सहिष्णुता, प्रगतिशीलता और व्यावहारिकता अपनाने का सन्देश दिया था. काला कांकर के राजा रामपाल सिंह और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गुप्तजी को प्रेरित किया कि वो हाली का अनुकरण कर आर्यों व हिन्दुओं के पुनरुत्थान हेतु कोई काव्य-रचना करें. गुप्तजी ने 1911 में भारत भारतीकी रचना की. गुप्तजी के इस खंड काव्य पर भारतेंदु हरिश्चंद्र के काव्य नाटक भारत दुर्दशाका भी प्रभाव पड़ा है किन्तु उन्होंने भारत भारतीकी भूमिका में हाली के मुसद्दसे हालीका प्रभाव अवश्य स्वीकार किया है.
आर्यों के गौरव शाली अतीत का गुणगान करना अब व्यर्थ था, अब तो अपना वर्तमान और भविष्य सुधारने के लिए अनथक प्रयास करने की आवश्यकता थी. भारत भारतीके वर्तमान खंडमें भारतीयों की चारित्रिक दुर्बलता पर खिन्नता प्रकट करते हुए गुप्तजी कहते हैं -  
मन में नहीं बल है हमारे, तेज में चेष्टा नहीं,
उद्योग में साहस नहीं, अपमान में न घृणा कहीं.
दासत्व में न यहाँ अरुचि है, प्रेम में प्रियता नहीं,
हो अंत में आशा कहाँ? कर्तव्य में क्रियता नहीं.’ 
जैसे हाली ने मुसलमानों को कर्मठता का सन्देश दिया है वैसे ही गुप्तजी हिन्दुओं को कर्मठता का सन्देश देते हुए और उन्हें सचेत करते हुए कहते हैं कि यदि वह अपने आलस्य और दासत्व की भाव का परित्याग नहीं करेंगे तो हिन्दू जाति इतिहास में शाश्वत रूप से निंदा और उपहास का पात्र बन जाएगी -
ऐसा करो जिसमें तुम्हारे देश का उद्धार हो,
जर्जर तुम्हारी जाति काबेड़ा विपद से पार हो।
ऐसा न हो जो अन्त मेंचर्चा करें ऐसी सभी,
थी एक हिन्दू नाम की भीनिन्द्य जाति यहाँ कभी।।
हाली की दो नज्मों - मुनाजात-ए-बेवाऔर चुप की दादमें स्त्रियों के त्याग, उनकी ममता, उनमें करुणा का भाव, उनकी सहन शक्ति, उनकी कर्मठता, बुद्धिमत्ता आदि की भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी है. हाली के उपन्यास- मजालिस-उन-निसांमें स्त्री-शिक्षा की पुरज़ोर वकालत की गयी है. अपनी नज़्म- ‘‘चुप की दादमें हाली स्त्रियों के गुणों का बखान करते हुए कहते हैं
ऐ माँओ! बहनों! बेटियों! दुनिया की जीनत (शोभा) तुम से है,
मुल्कों की बस्ती हो तुम्हीं, कौमों की इज्ज़त तुम से है.
नेकी की तुम तस्वीर हो, इफ्फत (पवित्रता) की तुम तदबीर (व्यवस्था) हो,
हो दीन की तुम पासबाँ (संरक्षक) , ईमां की सलावत  (उच्चारण) तुम से है
फितरत तुम्हारी है हया (लज्जा), तीनत (प्रकृति) में है मेहरो-वफ़ा (प्रेम और प्रतिज्ञा पालन),
घुट्टी में है सब्रो-रज़ा (धैर्य और आशा), इंसान की इबारत (हस्तलिपि) तुम से है..’ 
हाली की ही भांति गुप्तजी भी स्त्री-शिक्षा के प्रसार-प्रचार को न केवल स्त्रियों के उत्थान के लिए अपितु देश व समाज के कल्याण के लिए भी आवश्यक मानते हैं. हाली की ही तरह गुप्तजी भी भारतीय नारी के सदगुणों के प्रशंसक हैं. उनको शिक्षित भारतीय नारी की क्षमता पर अटूट विश्वास है -
क्या कर नहीं सकतीं भला यदि शिक्षिता हों नारियाँ,
रण,  रंग,  राज्य,  सुधर्म-रक्षा,  कर चुकीं सुकुमारियाँ।
लक्ष्मी,  अहल्या,  बायजाबाई,  भवानी,  पद्मिनी,
ऐसी अनेकों देवियां हैं, आज जा सकती गिनीं।
सोचो नरों से नारियां, किस बात में हैं कम हुईं,
मध्यस्थ वे शास्त्रार्थ में हैं, भारती के सम हुईं।।
स्त्री की पुरुष पर श्रेष्ठता गुप्तजी के इन शब्दों में भी व्यक्त होती है -
एक नहीं, दो-दो मात्राएँ, नर से भारी नारी.
गुप्तजी प्रत्येक गुणवान व्यक्ति से उत्तम विद्या सीखने के लिए सदैव तत्पर रहते थे. भारतेंदु हरिश्चंद्र, अल्ताफ़ हुसेन हाली, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी और रबीन्द्रनाथ टैगोर को हम उनके गुरु जन में सम्मिलित कर सकते हैं. इन आदर्श गुरु जन के वह आदर्श शिष्य थे. देशोद्धार, स्वदेश प्रेम, नारी-उत्थान, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्वदेशी, राष्ट्र-भाषा हिंदी का का देश-व्यापी प्रचार तथा उसका सर्वतोमुखी विकास, हिन्दू-पुनरुत्थान, किसानों और दलितों के उत्थान हेतु प्रयास तथा उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखना आदि उन्होंने अपने अग्रजों से सीखा और फिर उन्होंने आजीवन सोद्देश्य साहित्य का सृजन किया. अपने अग्रजों की इस समृद्ध परंपरा को उन्होंने सफलतापूर्वक आगे बढ़ाते हुए आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य विरासत छोडी है.

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

प्रेमचंद के साहित्य में विद्रोहिणी नारी


रमा जैसवाल का एक प्रकाशित शोध पत्र
प्रेमचंद के साहित्य में विद्रोहिणी नारी  
(मैंने किंचित परिवर्तन कर इस शोध पत्र को दो भागों में विभाजित कर दिया है. आज प्रस्तुत है इसका द्वितीय और अंतिम भाग.)
बंगला साहित्य में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय और उनके बाद रवीन्द्र नाथ टैगोर व शरत् चन्द्र चट्टोपाध्याय ने बंग महिलाओं की सामाजिक स्थिति का मार्मिक चित्रण किया है. नवजागरण काल में मराठी में एच. एन. आप्टे, गुजराती में नर्मद व गोवर्धन राम त्रिपाठी, तेलगू में गुरजाड और मलयालम में चन्दू मेनन ने अपने-अपने क्षेत्र की महिलाओं की सामाजिक स्थिति को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया है. उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, उर्दू में, मिर्ज़ा हादी रुसवा ने लखनऊ की एक तवायफ़ उमराव जान अदा की जि़न्दगी पर एक मार्मिक उपन्यास लिखा है. अल्ताफ़ हुसेन हाली की नज्मों - 'चुप की दाद' और 'मुनाजात-ए-बेवा' में औरत की त्यागमयी और दुःख भरी कहानी कही गयी है. हिन्दी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपनी रचनाओं में उत्तर भारतीय नारी की दुर्दशा को चित्रित किया है पर प्रेमचंद से पहले किसी और साहित्यकार ने उत्तर भारतीय नारी के जीवन के हर अच्छे-बुरे पहलू को उजागर करने का न तो बीड़ा उठाया और न ही उसके प्रस्तुतीकरण में वह महारत हासिल की जो कि प्रेमचंद को हासिल हुई.
राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने भारतीय नारी में धैर्य, सहनशीलता, सेवाभाव, त्याग, कर्तव्यपरायणता, ममता और करुणा का सम्मिश्रण देखकर कहा है -
‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी.’
परन्तु प्रेमचंद को अन्यायी के सामने नारी का दुर्गा का रूप धारण करना अथवा चंडी का रूप धारण करना बहुत भाता है. प्रेमचंद यह दर्शाते हैं कि ममता, कोमलता, सहनशीलता और त्याग की प्रतिमूर्ति भारतीय नारी आवश्यकता पड़ने पर सिंहनी भी बन जाती है और अगर यह सिंहनी कहीं घायल हुई तो उसके प्रतिशोध की ज्वाला में बड़े से बड़ा दमनकारी भी भस्म हो जाता है.
सामाजिक असमानता की शिकार भारतीय नारी पग-पग पर शोषित और अपमानित होती है इसीलिए प्रेमचंद की विद्रोहिणी नारी दमनकारी सामाजिक परम्पराओं को तोड़ने और उनकी अवमानना करने में सबसे आगे रहती है.
दहेज की प्रथा भारतीय समाज का कलंक है,  इस एक प्रथा के कारण स्त्री जाति को जितना अपमान और यातना झेलनी पड़ती है,  उसका आकलन करना भी असम्भव है. प्रेमचंद की अनेक कहानियों और उपन्यासों में स्त्रियां इस प्रथा के विरुद्ध खड़े होने का साहस जुटा पाई हैं. उनकी कहानी ‘कुसुम’ की नायिका कुसुम, बरसों तक अपने पति द्वारा अपने मायके वालों के शोषण का समर्थन करती है पर अन्त में उसकी आँखे खुल जाती हैं और वह अपने पति की माँगों को कठोरता पूर्वक ठुकरा देती है. अपनी माँ से वह कहती है-
‘यह उसी तरह की डाकाजनी है जैसी बदमाश लोग किया करते हैं. किसी आदमी को पकड़ कर ले गए और उसके घरवालों से उसके मुक्ति-धन के तौर पर अच्छी रकम ऐंठ ली.’
            कुसुम की माँ थोड़े से पैसों की खातिर दामाद को नाराज़ करने की बात को अनुचित कहती है तो वह जवाब देती है-
‘ऐसे देवता का रूठे रहना ही अच्छा ! जो आदमी इतना स्वार्थी, इतना दम्भी, इतना नीच है, उसके साथ मेरा निर्वाह नहीं होगा. मैं कहे देती हूं, वहां रुपये गए तो मैं ज़हर खा लूंगी.’
अनमेल विवाह मुख्य रूप से दहेज की प्रथा का ही परिणाम होता है. प्रेमचंद पुरुषों के बहु-विवाह और विधुरों के क्वारी कन्या से विवाह करने के दुराग्रह को इसका कारण मानते हैं. प्रेमचंद के वे नारी पात्र जिनका कि अनमेल विवाह हुआ है,  कभी सुखी नहीं दिखाए जाते. ‘निर्मला’ उपन्यास की नायिका इसका ज्वलन्त उदाहरण है. निर्मला की अपने से दुगुनी उम्र के पति के प्रति कोई श्रद्धा नहीं है. जब अधेड़ पति अपनी जवानी के दम-ख़म और बहादुरी का झूठा राग अलापते हैं तो उसे या तो उनसे घृणा होती है या उन पर उसे तरस आता है.
‘नया विवाह’ कहानी की युवती आशा का विवाह अधेड़ लाला डंगामल से होता है. आशा, डंगामल के लाए नए-नए कपड़े और आभूषण पहन कर जवान गबरू नौकर जुगल को रिझाती है. जुगल आशा से लाला जी के लिए कहता है कि वह उसके पति नहीं बल्कि उसके बाप लगते हैं तो वह उसे डांटने के बजाय अपने भाग्य का रोना लेकर बैठ जाती है और फिर उससे मज़ाक में कहती है कि वह उसकी शादी एक बुढि़या से करा देगी क्योंकि वह उसको जवान लड़की से कहीं ज़्यादा प्यार देगी और उसे सीधे रस्ते पर लाएगी. इस प्रसंग के बाद जुगल और आशा के संवाद दृष्टव्य हैं-
            जुगल- यह सब माँ का काम है. बीबी जिस काम के लिए है, उसी काम के लिए है.
आशा- आखि़र बीबी किस काम के लिए है?
जुगल- आप मालकिन हैं,  नहीं तो बता देता कि बीबी किस काम के लिए है.
            कहानी के अंत में आशा, अपना आँचल ढरकाते हुए जुगल को लाला जी के जाने बाद अकेले में मिलने के लिए बुलाती है.
प्रेमचंद आशा के व्यवहार को सर्वथा स्वाभाविक मानते हैं,  उनकी दृष्टि में आशा का ऐसा करना कोई पाप नहीं है बल्कि अपने ऊपर हुए सामाजिक अन्याय के प्रति एक विद्रोह मात्र है.
गबन उपन्यास की नायिका जालपा मध्यवर्गीय परिवार की गहनों की शौकीन, ऐसी युवती है जिसे भौतिकवादी सुखों की खातिर पति का रिश्वत लेना भी गलत नहीं लगता है परन्तु जब उसका पति रमानाथ खुद को जेल जाने से बचाने के लिए और रुपयों व ओहदे के लालच में, पुलिसवालों के साथ मिलकर क्रान्तिकारियों के विरुद्ध झूठी गवाही देता है तो वह उसके उपहारों को ठुकराते हुए उसे अपना पति मानने से इंकार कर देती है-
‘ईश्वर करे तुम्हें मुंह में कालिख लगा कर भी कुछ न मिले. --- लेकिन नहीं,  तुम जैसे मोम के पुतलों को पुलिसवाले कभी नाराज़ नहीं करेंगे. ---- झूठी गवाही,  झूठे मुकदमें बनाना और पाप के व्यापार करना ही तुम्हारे भाग्य में लिखा गया. जाओ शौक से जि़न्दगी के सुख लूटो.------ मेरा तुमसे कोई नाता नहीं है मैंने समझ लिया कि तुम मर गए. तुम भी समझ लो कि मैं मर गई.’
 प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कहानी ‘जुलूस’ की मिठ्ठन अपने दरोगा पति बीरबल सिंह द्वारा निहत्थे देशभक्त इब्राहीम अली पर कातिलाना हमला करने के लिए उसे धिक्कारती है. बीरबल सिंह जब उसे अपनी तरक्की होने की सम्भावना बताता है तो वह कहती है-
‘शायद तुम्हें जल्द तरक्की भी मिल जाय. मगर बेगुनाहों के खून से हाथ रंगकर तरक्की पाई तो क्या पाई! यह तुम्हारी कारगुज़ारी का इनाम नहीं,  तुम्हारे देशद्रोह की कीमत है.’
शहीद इब्राहीम के जनाज़े में शामिल होने के बाद मिट्ठन अपने अंग्रेज़ समर्थक पति बीरबल सिंह से अलग रहने का फ़ैसला भी कर लेती है पर जब वह शहीद इब्राहीम अली की बेवा के सामने माफ़ी मांगने के लिए आए हुए बीरबल सिंह को देखती है तो फिर वह उसे क्षमा भी कर देती है.  
प्रेमचंद की कहानी ‘जेल’ की आन्दोलनकारी मृदुला, किसान आन्दोलन में अपनी सास,  अपने पति और अपने पुत्र को गंवाकर स्वयं भी आन्दोलन में कूद पड़ती है. वह शहीदों के सम्मान में आयोजित जुलूस का नेतृत्व करती है और जेल जाती है.
प्रेमचंद के अनेक नारी पात्र साहस और वीरता में पुरुषों से आगे हैं. ओरछा के राजा चम्पत राय की धर्मपत्नी और छत्रसाल की माँ, रानी सारंधा और वज़ीर हबीब का रूप धारण किए हुए तैमूर की बेग़म हमीदा इसका प्रमाण हैं. सत्य के मार्ग पर चलते हुए जब ऐसे नारी पात्र अन्याय का सामना करते हैं तो पाठक उनके चरित्र के प्रति श्रद्धानत हो जाता है.
प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्यम से दो सन्देश देना चाहते हैं - एक तो यह कि पुरुष स्त्री को अपने से कमज़ोर और अयोग्य समझकर उस पर अत्याचार करने का पाप न करे और दूसरा यह कि यदि नारी जाति पर अत्याचार का सिलसिला यूं ही जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब वह विद्रोहिणी बनकर अपने ऊपर ज़ुल्म ढाने वाले पुरुष-प्रधान समाज को ही मिटा देगी.
‘कर्मभूमि’ उपन्यास में सुखदा व नैना हरिजनों के मन्दिर पवेश के अधिकारों की खातिर जेल जाती हैं. उनके इस सामाजिक विद्रोह को सफलता भी मिलती है. इसी उपन्यास में मुन्नी का चरित्र एक विद्राहिणी का चरित्र है. दो गोरे सिपाही मुन्नी का बलात्कार करते हैं. मौका पाकर मुन्नी बीच बाज़ार में बलात्कारी की हत्या कर देती है. अदालत में दोषमुक्त होने के बाद मुन्नी समाजसेवा के कार्य में लग जाती है. अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद बार-बार विद्रोहिणी नारी के साहस और क्रोध को सृजन का मोड़ देना चाहते हैं. समाज सुधार के प्रति समर्पित एक साहित्यकार की नारी उत्थान के प्रति यह एक ईमानदार कोशिश है.
प्रेमचंद ने विद्रोहिणी नारी के उचित कार्यों की स्तुति तो की ही है,  साथ ही उन्होंने उसके सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध व्यवहार का दायित्व भी नारी शोषक पुरुष समाज की लिंग-भेदी सामाजिक मान्यताओं पर रख दिया है. पुरुष प्रधान समाज को प्रेमचंद का सन्देश है कि जब तक लिंग-भेदी अन्याय समाप्त नहीं होगा, नारी विद्रोह करती रहेगी और जब तक उस पर अनाचार होता रहेगा, समाज उन्नति नहीं कर सकेगा. और भारतीय स्त्रियों को उनका सन्देश वही है जो कि उनके प्रिय शायर अल्लामा इकबाल ने किसी और प्रसंग में कहा है –
ख़ुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले,
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है.