सोमवार, 19 अक्तूबर 2020

दुरुस्त किए गए अशआर

 

फ़क़त ज़ंजीर बदली जा रही थी

मैं समझा था रिहाई हो गयी है

विकास शर्मा राज़

नई सरकार से उम्मीदें –

फ़क़त ठग-गैंग बदला जा रहा था

मैं समझा दिन सुहाने आ गए हैं

 

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

मीर तक़ी मीर

इंदिरा-युग से आज तक -

क्या घर के क्या बाहर वाले सभी हक़ीक़त जानें हैं

फ़ौरेन हैण्ड विपक्षी साज़िश बस दो यही बहाने हैं  

3 टिप्‍पणियां:

  1. फ़क़त ज़ंजीर बदली जा रही थी

    मैं समझा था रिहाई हो गयी है

    वाह!!!

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    1. सधु चन्द्र जी, आपकी इस 'वाह' के हक़दार तो विकास शर्मा 'राज़' हैं.

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