बचपन में हमको माँ-पिताजी के साथ साल में या तो एक फ़िल्म या फिर दो फ़िल्में देखने का मौक़ा मिल जाता था.
सोमवार, 9 नवंबर 2020
बालकनी
शनिवार, 7 नवंबर 2020
फिर एक बार - उत्तराखंड की लोरी
उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान लिखी गयी मेरी 21 साल पुरानी कविता - 'उत्तराखंड की लोरी'
रविवार, 1 नवंबर 2020
शेर किसी और का, अंदाज़ अपना
चोरी
न करें झूठ न बोलें तो क्या करें
चूल्हे
पे क्या उसूल पकाएँगे शाम को
अदम
गौंडवी
प्रगति-मार्ग
–
चोरी
न करें झूठ न बोलें तो क्या करें
कुर्सी-तलक
यही हमें पहुँचाएं सीढ़ियाँ
इक
बार मौक़ा जो मिले इतना बटोर लो
अम्बानी-अडानी
सी जियें सात पीढ़ियाँ
यहाँ हर शख्स
बस ये चाहता है
मिलाएं सब घड़ी
मेरी घड़ी से
दानिश ज़ैदी
जनतंत्र के
संरक्षकों का सपना –
ये है जनतन्त्र पर दिल चाहता है
मिलाएं सब घड़ी
मेरी घड़ी से
इबादत ही मेरी
काफ़ी नहीं है
मुहब्बत भी करें मेरी छड़ी से
रविवार, 25 अक्टूबर 2020
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से कुछ अलग हट कर
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे -
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020
बिहार-विलाप
कोरोना-संकट के बीच बिहार-चुनाव की धूम मची हुई है.
सोमवार, 19 अक्टूबर 2020
दुरुस्त किए गए अशआर
फ़क़त ज़ंजीर बदली जा रही थी
मैं समझा था रिहाई हो गयी है
विकास शर्मा राज़
नई सरकार से उम्मीदें –
फ़क़त ठग-गैंग बदला जा रहा था
मैं समझा दिन सुहाने आ गए हैं
पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
मीर तक़ी मीर
इंदिरा-युग से आज तक -
क्या घर के क्या बाहर वाले सभी हक़ीक़त जानें हैं
फ़ौरेन हैण्ड विपक्षी साज़िश बस दो यही बहाने हैं