सोमवार, 9 नवंबर 2020

बालकनी

 बचपन में हमको माँ-पिताजी के साथ साल में या तो एक फ़िल्म या फिर दो फ़िल्में देखने का मौक़ा मिल जाता था.

अपने बचपन में फ़िल्में देखने के लिए हम बालकनी से कभी नीचे उतरे ही नहीं.

किसी सिनेमा हॉल की बालकनी में बैठकर हम ख़ुद को शहज़ादा सलीम से कम नहीं समझते थे.
कितने लोगों को यह पता होगा कि फ़िल्म ‘मुगले आज़म’ में जब अनारकली शीश महल में मुजरा करने वाली थी तो उसे मुजरा करने का हुक्म तख़्त पर बैठे बादशाह अकबर के साथ-साथ बालकनी में बैठे शहज़ादा गोपेश मोहन जैसवाल ने भी दिया था.
जवानी में क़दम रखते ही टीवी विहीन ज़माने में फ़िल्में देखने का हमारा जुनून परवान चढ़ने लगा लेकिन अपने जेब-खर्च से बालकनी की टिकट लेकर महीने में एक-दो फ़िल्में ही देखी जा सकती थीं और हमको तो अपने बचपन में देखे जाने से छोड़ी हुई तमाम फ़िल्मों की भरपाई भी तो करनी थी.
बी. ए. , एम. ए. करते समय हमारा यही सपना हुआ करता था कि सिनेमा हॉल में बालकनी में बैठ कर फ़िल्म देखने का मज़ा लिया जाए और साथ में सस्ती टिकटें लेकर नीचे बैठने वालों की तुलना में ख़ुद को अगर मुगले आज़म, नहीं तो कम से कम नवाब वाजिद अली शाह तो ज़रूर समझा जाए.
लेकिन इस ख़ूबसूरत सपने को साकार कर पाना हमारी जेब के बूते की बात नहीं थी.
झांसी में बी. ए. करने के दौरान चोरी से महीने में औसतन चार फ़िल्में और लखनऊ में एम. ए. करने के दौरान महीने में औसतन आठ फ़िल्में देखने वाला हमारे जैसा कोई त्यागी, संयमी, अनुशासित, वीतरागी और आदर्श विद्यार्थी के पंच-लक्षणों से सुशोभित बन्दा अपने इस रईसी ठाठ वाले सपने को कैसे साकार कर सकता था?
1970 के दशक में हॉस्टल के मेस में एक रुपया प्रति डाइट के ज़माने में पांच रूपये की बालकनी की टिकट खरीद पाना तो धन्ना सेठों की संतानों के ही बस में था.
भला हो मात्र एक रूपये पिचहत्तर पैसे की स्टूडेंट क्लास की टिकट का !
उस पर अगर अपना आइडेंटिटी कार्ड दिखा दो तो पच्चीस पैसे की छूट अलग से !
इसी लोक-कल्याणकारी, जनता-जनार्दन वाले क्लास में अंधाधुंध फ़िल्में देखने के साथ-साथ हम पार्टटाइम जॉब के रूप में अपनी पढ़ाई भी करते रहे.
वैसे अपनी तंगहाली में भी जेब पर एक्स्ट्रा बोझ डाले बिना बालकनी में फ़िल्में देखने का शौक़ जब-तब पूरा हो जाता था.
झांसी का छोटे स्क्रीन वाला चित्रा सिनेमा हाफ़ रेट्स पर पुरानी या दूसरे सिनेमा हॉल्स से उतारी गयी नयी फ़िल्में दिखाता था और लखनऊ में घटी दरों पर फ़िल्में दिखाने वाले सिनेमा हॉल्स तो क़रीब आधा दर्जन थे.
हमको लखनऊ के ऐसे कड़का स्टूडेंट-फ्रेंडली सिनेमा हॉल्स में सेवेंटी एम. एम. के स्क्रीन वाला, एक रूपये पिचहत्तर पैसे में बालकनी की टिकट वाला, अलंकार सिनेमा सबसे ज़्यादा पसंद था.
लेकिन नई फ़िल्मों को उनके रिलीज़ होने के पहले दो-चार दिनों के अन्दर ही देखने के हम जैसे शौकीनों को मन मसोस कर बार-बार स्टूडेंट क्लास की शरण में जाना ही पड़ता था.
स्टूडेंट क्लास में फ़िल्म देखने में यह बड़ा ख़तरा था कि बालकनी में बैठा कोई दुष्ट हम पर मूंगफली के छिलकों की पुड़िया न फ़ेंक दे.
इस स्टूडेंट क्लास की एक दुखदायी बात यह थी कि इसमें बैठ कर फ़िल्म देखने पर आँखों पर जोर बहुत पड़ता था और ऐसा भी लगता था कि हम ज़मीन में धंसे जा रहे हैं.
लेकिन इस स्टूडेंट क्लास के पाताल लोक में फ़िल्म देखने के अलावा हमारे पास कोई और ऑप्शन होता ही कहाँ था?
इस फटीचर स्टूडेंट क्लास में फ़िल्में देखने की ज़िल्लत और तकलीफ़ से बचने के हमारे पास बस, दो ही विकल्प थे –
पहला विकल्प यह था कि हम फ़िल्मों को देखने की संख्या में क्रांतिकारी सीमा तक कमी कर दें और फिर ठाठ से बालकनी की टिकट लेकर इक्का-दुक्का ही फ़िल्म देखें.
ज़ाहिर था कि इस महा-त्यागी विकल्प पर अमल कर पाना हमारे बस में नहीं था.
दूसरा विकल्प यह था कि हम ख़ुद अपने पैरों पर शीघ्रातिशीघ्र खड़े हो जाएं ताकि हमको मजबूरन कष्टकारी टिकट-बचत योजना की ज़रुरत ही न पड़े.
इस आत्मनिर्भर अभियान को सफल बनाने के लिए हमारा एम. ए. में टॉप कर के यू जी. सी. फ़ेलोशिप हासिल करना ज़रूरी था.
बी. ए. में हम बुंदेलखंड कॉलेज के टॉपर तो थे ही.
एम. ए. करने के दौरान भी हमने टॉप करने का ही विकल्प चुना.
इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लखनऊ यूनिवर्सिटी की टैगोर लाइब्रेरी की और विभागीय पुस्तकालय की, एक-एक ज़रूरी किताब हमने चाट डाली.
इस मेहनत का परिणाम सुखद रहा. फ़िल्म देखने में डबल सेंचुरी लगाते हुए भी हमने एम. ए. में टॉप किया और फिर यू. जी. सी. फ़ेलोशिप भी हासिल कर ली.
चार महीने की फ़ेलोशिप जब हमको एक साथ मिली तो एक दर्जन सौ के नोटों की भारी गड्डी (हमारी फ़ेलोशिप पहले 300/ प्रति माह थी फिर वह बढ़ कर 400/- प्रति माह हो गयी थी) हम से उठ ही नहीं रही थी.
अब टाटा, बिरला जैसी रईसी करने से हमको भला कौन रोक सकता था?
गुड बाय स्टूडेंट क्लास ! अब हम अपने बचपन के दिनों की तरह फिर से बालकनी में बैठकर –
‘यलगार हो !’ का नारा बुलंद कर पर्दे पर खड़ी अपनी पसंदीदा फ़ौज को दुश्मन की फ़ौज पर टूट पड़ने का हुक्म दे सकते थे.
हमारे संगी-साथियों को हमारे साथ फ़िल्म देखने के वक़्त मिल-बाँट कर खर्च करने का हमारा डच सिस्टम कभी अच्छा नहीं लगता था.
अब अपने कमाऊ दोस्त की जेब पर डाका डालने से उन्हें भला कौन रोक सकता था?
इधर हम भी कम से कम एक बार दानवीर कर्ण के जैसी दानशीलता या फिर हातिमताई के जैसी दरियादिली दिखाने को बेक़रार थे.
आखिरकार चार चिपकू दोस्तों को पहली बार अपनी जेब से हमने फ़िल्म दिखाने की हामी भर दी.
जश्न मनाने के लिए हम यूनिवर्सिटी के पास वाले तुलसी सिनेमा जा पहुंचे.
टिकट विंडो पर बुकिंग क्लर्क ने मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया.
हमने अपना पर्स निकाला फिर यकायक हमारी नज़र टिकट रेट्स पर गयी – स्टूडेंट क्लास, एक रुपया पिचहत्तर पैसे, ड्रेस सर्किल, तीन रूपये और बालकनी, पांच रूपये.
हाय ! पांच गुणा पांच रूपये यानी कि तीन घंटों के फ़ालतू से मनोरंजन के लिए बैठे-ठाले पच्चीस रूपये की बर्बादी?
यह रकम तो हमारे हॉस्टल के मेस के बारह दिनों के दोनों वक़्त की डाइट के कुल चार्जेज़ से भी एक रुपया ज़्यादा थी!
प्रैक्टिकल दिमाग कह रहा था - भाड़ में जाए दानवीर कर्ण की दानशीलता और हातिमताई की दरियादिली !
लेकिन यह तो हमने तय कर लिया था कि अब से फ़िल्म तो बालकनी में ही देखनी है.
दृढ़ निश्चय के साथ हमने टिकट विंडो में हाथ डाला और फिर बुकिंग क्लर्क को सौ का एक नोट देकर उससे कहा –
‘पांच टिकट बा-बा-बा-बाल, ड्रेस सर्किल !’
बुकिंग क्लर्क ने हमारी – ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं’ जैसी डांवाडोल हालत पर हँसते हुए पिच्यासी रुपयों के साथ हमको पांच टिकट ड्रेस सर्किल के पकड़ा दिए.
हमारे दोस्त भी हमारे इस हकलाने पर अपने-अपने पेट पकड़ कर हँसे चले जा रहे थे.
अपनी ख़ुद की बुलाई हुई इस छीछालेदर पर हम मन ही मन सीता जी की तरह धरती माता की गोद में समा जाने की इच्छा कर रहे थे लेकिन साथ में अपने दस रूपये की बचत की खुशी भी थी.
कमाऊ होने के बाद से हमने सिनेमा हॉल्स में स्टूडेंट क्लास को छोड़ ड्रेस सर्किल में बैठना शुरू कर दिया.
रही बालकनी में ही बैठकर फ़िल्में देखने की बात तो अलंकार सिनेमा में जाने से या किसी और सिनेमा हॉल में बालकनी में बैठ कर घटी दर पर फ़िल्म देखने से हमको भला कौन रोक सकता था?
और अब अगर 2020 की बात की जाए तो जैसवाल साहब चाहें तो ख़ुद अपने लिए और अपने सारे दोस्तों के लिए बालकनी की टिकटें खरीद कर उनके साथ फ़िल्म देख सकते हैं
वैसे भी आज ज़माना बदल गया है और अब बालकनी-रहित मल्टीप्लेक्स का ज़माना आ गया है.
लेकिन अब सिनेमा हॉल्स में जाकर हम फ़िल्में देखते ही कितनी हैं?
इंटरनेट से जुड़े हुए इस जाइंट स्क्रीन वाले स्मार्ट टीवी के दौर में घर-घर थिएटर खुल गए हैं.
उस्ताद मुहम्मद इब्राहीम ज़ौक़ के अंदाज़ में अब हम कहेंगे -
कौन जाएगा सिनेमा, घर का टीवी छोड़ कर !
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शनिवार, 7 नवंबर 2020

फिर एक बार - उत्तराखंड की लोरी

 उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान लिखी गयी मेरी 21 साल पुरानी कविता - 'उत्तराखंड की लोरी'

आज उत्तराखंड की स्थापना के 20 साल बाद मेरी कविता की इस पर्वत-वासिनी
माँ की कोई भी आशंका यदि निर्मूल सिद्ध हुई हो तो मैं भारी से भारी जुर्माना देने
को और माफ़ी मांगने को तैयार हूँ.
उत्तराखण्ड की लोरी
बेटे का प्रश्न -
मां ! जब पर्वत प्रान्त बनेगा, सुख सुविधा मिल जाएंगी?
दुःख-दारिद्र मिटेंगे सारे, व्यथा दूर हो जाएंगी?
रोटी, कपड़ा, कुटिया क्या, सब लोगों को मिल पाएंगी?
फिर से वन में कुसुम खिलेंगे, क्या नदियां मुस्काएंगी ?
माँ का उत्तर -
अरे भेड़ के पुत्र, भेडि़ए से क्यों आशा करता है?
दिवा स्वप्न में मग्न भले रह, पर सच से क्यों डरता है?
सीधा रस्ता चलने वाला, तिल-तिल कर ही मरता है,
कोई नृप हो, तुझ सा तो, आजीवन पानी भरता है.
अभी भेड़िया बहुत दूर है, फिर समीप आ जाएगा,
नहीं एक-दो, फिर तो वह, सारा कुनबा खा जाएगा.
चाहे जिसको रक्षक चुनले, वह भक्षक बन जाएगा,
तेरे श्रमकण और लहू से, अपनी प्यास बुझाएगा.
बेगानी शादी में ख़ुश है, किन्तु नहीं गुड़़ पाएगा,
तेरा तो सौभाग्य पुत्र भी, तुझे देख मुड़ जाएगा.
प्रान्त बनेगा, नेता, अफ़सर, का मेला, जुड़ जाएगा,
सरकारी अनुदान समूचा, भत्तों में उड़ जाएगा.
राजनीति की उठा-पटक से, हर पर्वत हिल जाएगा,
देवभूमि का सत्य-धर्म सब, मिट्टी में मिल जाएगा.
वन तो यूं ही जला करेंगे, कुसुम कहां खिल पाएगा?
हम सी लावारिस लाशों का, कफ़न नहीं सिल पाएगा.
रात हो गई, मेहनतकश सब, अपने घर जाते होंगे.
जल से चुपड़ी, सूखी रोटी, नमक डाल, खाते होंगे.
चिन्ता मत कर, मुक्ति कभी तो, हम जैसे पाते होंगे,
सो जा बेटा, मधुशाला से, बापू भी आते होंगे.

रविवार, 1 नवंबर 2020

शेर किसी और का, अंदाज़ अपना

चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें

चूल्हे पे क्या उसूल पकाएँगे शाम को

अदम गौंडवी

प्रगति-मार्ग –

चोरी न करें झूठ न बोलें तो क्या करें

कुर्सी-तलक यही हमें पहुँचाएं सीढ़ियाँ

इक बार मौक़ा जो मिले इतना बटोर लो

अम्बानी-अडानी सी जियें सात पीढ़ियाँ

 

यहाँ हर शख्स बस ये चाहता है

मिलाएं सब घड़ी मेरी घड़ी से

दानिश ज़ैदी

जनतंत्र के संरक्षकों का सपना –

 ये है जनतन्त्र पर दिल चाहता है

मिलाएं सब घड़ी मेरी घड़ी से

इबादत ही मेरी काफ़ी नहीं है

मुहब्बत भी करें मेरी छड़ी से 

रविवार, 25 अक्टूबर 2020

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ से कुछ अलग हट कर

लाज़िम है कि हम भी देखेंगे -

जो झूठे ज़ालिम अहमक हैं
मसनद पे बिठाए जाते हैं
मंसूर कबीर सरीखे सब
सूली पे चढ़ाए जाते हैं
क्यूं दीन-धरम की खिदमत में
नित लाश बिछाई जाती हैं
नफ़रत वहशीपन खूंरेज़ी
घुट्टी में पिलाई जाती हैं
बोली औरत की अस्मत की
हाटों में लगाई जाती है
नारी-पूजन की क़व्वाली
हर रोज़ सुनाई जाती है
बिकता हर दिन ईमान यहाँ
गिरवी ज़मीर हो जाता है
कुर्सी पर जैसे ही बैठे
फिर फ़र्ज़ कहीं सो जाता है
आहें सुनता है कौन यहाँ
फ़रियादों से न पिघलता है
नगरी-अंधेर में सिक्का तो
धोखे-फ़रेब का चलता है
बनवास राम का देखा था
अब रामराज्य का देखेंगे
दोज़ख की आग में जलते हुए
हम हिंदुस्तान को देखेंगे
घुट-घुट कर जी कर देखेंगे
तिल-तिल कर मर कर देखेंगे
फिर अगले जनम भी देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे -----

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2020

बिहार-विलाप

 कोरोना-संकट के बीच बिहार-चुनाव की धूम मची हुई है.

कोई दस लाख युवाओं को रोज़गार देने वाला है तो कोई राम-राज्य की पुनर्स्थापना कर उसकी राजधानी पटना शिफ्ट करने वाला है और कोई अपने दिवंगत पिता के नाम पर सहानुभूति के वोट मांगने वाला है.
लगता है कि अब – ‘ऑल इज़ वेल’ है. बीमारी, बेरोज़गारी, भुखमरी, मंदी और सांप्रदायिक वैमनस्य की समस्याओं का स्थायी समाधान हो गया है.
बिहार क्या था और अब क्या हो गया है इस पर रोने बैठें तो हमारे आंसुओं से गंगाजी समुद्र जितनी विशाल हो जाएंगी.
बिहार में लालू प्रसाद यादव का आगमन एक नए युग का सूचक है. एक अलमस्त, बेफ़िक्र ग्रामीण विदूषक से वो राजनीति में कब चाणक्य और मेकियावेली के भी उस्ताद बन गए, किसी को यह पता भी नहीं चला.
प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के शासनकाल में लालू यादव चारे घोटाले में आरोपित हुए तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी. फिर जो हुआ वो उस से पहले भारतीय इतिहास में कभी नहीं हुआ. लालू ने अपनी जगह अपनी लगभग अंगूठा-छाप पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनवा दिया.
लोकतंत्र की इस खुली हत्या से उस दिन मेरे साथ बिहार का गौरवशाली इतिहास भी रोया था.
महाकवि दिनकर की अमर रचना – ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ से प्रेरित होकर तब मैंने एक कविता लिखी थी.
हो सकता है कि यह कविता आप मित्रों को आज भी प्रासंगिक लगे.
बिहार-विलाप -
हे महावीर औ बुद्ध तुम्हारे दिन बीते
प्रियदर्शी धम्माशोक रहे तुम भी रीते
पतिव्रता नारियों की सूची में नाम न पा
लज्जित निराश धरती में समा गईं सीते
नालन्दा वैशाली का गौरव म्लान हुआ
अब चन्द्रगुप्त के वैभव का अवसान हुआ
सदियों से कुचली नारी की क्षमता का पहला भान हुआ
मानवता के कल्याण हेतु माँ रबड़ी का उत्थान हुआ
घर के दौने से निकल आज सत्ता का थाल सजाती है
संकट मोचन बन स्वामी के सब विपदा कष्ट मिटाती है
पद दलित अकल हो गई आज हर भैंस यही पगुराती है
अपमानित मां वीणा धरणी फिर लुप्त कहीं हो जाती है
जन नायक की सम्पूर्ण क्रांति शोणित के अश्रु बहाती है
जब चुने फ़रिश्तों की ग़ैरत बाज़ारों में बिक जाती है
जनतंत्र तुम्हारा श्राद्ध करा श्रद्धा के सुमन चढ़ाती है
बापू के छलनी सीने पर फिर से गोली बरसाती है
क्या हुआ दफ़न है नैतिकता या प्रगति रसातल जाती है
समुदाय-एकता विघटन के दलदल में फंसती जाती है
फलता है केवल मत्स्य न्याय समता की अर्थी जाती है
क्षत-विक्षत आहत आज़ादी खुद कफ़न ओढ़ सो जाती है
पुरवैया झोंको के घर से विप्लव की आंधी आती है
फिर से उजड़ेगी इस भय से बूढ़ी दिल्ली थर्राती है
पुत्रों के पाद प्रहारों से भारत की फटती छाती है
घुटती है दिनकर की वाणी आवाज़ नई इक आती है
गुजराल ! सिंहासन खाली कर पटना से रबड़ी आती है
गुजराल ! सिंहासन खाली कर पटना से रबड़ी आती है

सोमवार, 19 अक्टूबर 2020

दुरुस्त किए गए अशआर

 

फ़क़त ज़ंजीर बदली जा रही थी

मैं समझा था रिहाई हो गयी है

विकास शर्मा राज़

नई सरकार से उम्मीदें –

फ़क़त ठग-गैंग बदला जा रहा था

मैं समझा दिन सुहाने आ गए हैं

 

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

मीर तक़ी मीर

इंदिरा-युग से आज तक -

क्या घर के क्या बाहर वाले सभी हक़ीक़त जानें हैं

फ़ौरेन हैण्ड विपक्षी साज़िश बस दो यही बहाने हैं  

सोमवार, 12 अक्टूबर 2020

मुनाजात-ए-बेवा (एक विधवा की विनती)

दीर्घ काल से विधवाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाना भारतीय इतिहास का एक कलंकपूर्ण अध्याय है. सती प्रथा को एक विधवा का धार्मिक कर्तव्य माना जाना तो पुरुष-प्रधान समाज की पाशविकता का सबसे बड़ा प्रमाण है.
ब्रिटिश शासन में स्त्री-जीवन से जुड़ी हमारी सामाजिक-धार्मिक कुरीतियों के उन्मूलन के अनेक प्रयास किए गए.
1829 में राजा राममोहन रॉय और उदार ब्रिटिश अधिकारियों के प्रयास से सती प्रथा का उन्मूलन हुआ और 1856 में मुख्यतः ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से विडो रिेमैरिज एक्ट पारित हुआ किन्तु समाज में विधवाएं अभी भी अभिशप्त जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य की जाती रहीं.
एक विधवा का उल्लेख - मनहूस, अभागी. पापन, 'खसमा नूं खानी' जैसी पीड़ादायक गालियों के साथ किया जाता रहा और अभाव, अपमान के साथ एकाकी जीवन बिताने के लिए उसे विवश किया जाता रहा.
घुटन भरी ज़िंदगी बिताने के अलावा एक विधवा के कोई अधिकार नहीं थे.
विधवाओं के साथ किया जाने वाला अमानुषिक व्यवहार किसी भी सहृदय और संवेदनशील व्यक्ति को व्यथित कर सकता था और साथ ही ऐसी अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने के लिए उसे प्रेरित कर सकता था.
‘मुनाजात-ए-बेवा’ (एक विधवा की विनती) विधवाओं के प्रति मानवीय व्यवहार किए जाने की आवश्यकता पर बल देती है.
1884 में अल्ताफ़ हुसेन हाली द्वारा कही गयी इस नज़्म का नारी उत्थान के क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व है.
इस नज़्म की उल्लेखनीय बात यह है कि इसमें शायर ने हिन्दू समाज की सबसे दुखियारी, विपदा की मारी, बाल-विधवाओं की दुर्दशा का ऐसा जीवंत और मार्मिक चित्रण किया है कि किसी भी संवेदनशील-सहृदय पाठक की आँखों से बर्बस ही आंसुओं की बरसात होने लगती है.
हाली अपनी इस नज़्म में विधवाओं के पुनर्वास की या विधवा-विवाह की कोई बात नहीं करते हैं किन्तु समाज से वो यह प्रार्थना अवश्य करते हैं कि उनके साथ मानवीय व्यवहार किया जाए, उन्हें अपनी सभी इच्छाओं, कामनाओं को कुचलने लिए विवश न किया जाए, उन्हें दुनिया भर के सुखों से सर्वथा वंचित न रखा जाए, उनके अपने सगे एकदम से उनके पराए न हो जाएं, उन्हें दाने-दाने के लिए किसी दूसरे का मोहताज न बनाया जाए और उन्हें मनहूस अथवा अभागी कह कर एक निर्वासिनी का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य न किया जाए.
इस नज़्म में हाली बाल-विवाह की प्रथा से उत्पन्न होने वाली अनेक बुराइयों पर भी विस्तार से प्रकाश डालते हैं.
हाली की यह नज़्म अपने अंतिम चरण में मैके और ससुराल, दोनों से ही ठुकराई हुई विधवाओं की स्थिति को नैराश्यपूर्ण और दुखद बताते हुए विधवाओं के एकमात्र सहारे के रूप में ईश्वर-भक्ति की महत्ता दर्शाती है.
मुनाजात-ए-बेवा (एक विधवा की विनती)
ऐ मेरे ज़ोर और क़ुदरत वाले ( हे शक्तिदाता ! हे सृष्टिकर्ता !)
हिक़मत और हुकूमत वाले (हे ज्ञानी ! हे हम पर शासन करने वाले !)
मैं लौंडी तेरी दुखियारी
दरवाज़े की तेरी भिखारी
अपने-पराए की दुतकारी
मैके और ससुराल की मारी
रो नहीं सकती तंग हूँ यां तक (मैं यहाँ तक परेशान हूँ कि रो भी नहीं सकतीँ)
और रोऊं तो रोऊं कहाँ तक
लेटिये गर सोने के बहाने
पायंते कल हैं और न सिरहाने
अब कल हमको पड़ेगी भरकर
गोर (कब्र) है सूनी सेज से बेहतर
आबादी जंगल का नमूना
दुनिया सूनी और घर सूना
आठ पहर का है ये जलापा
काटूँगी किस तरह रंडापा
थक गयी मैं दुःख सहते-सहते
आंसू थम गए बहते-बहते
दबी थी भूमी में चिंगारी
ली न किसी ने खबर हमारी
वो चैत और फागुन की हवाएं
वो गर्मी की चांदनी रातें
वो अरमान भरी बरसातें
किस से कहूं किस तौर से काटीं
रही अकेली भरी सभा में
प्यासी रही भरी गंगा में
खाया तो कुछ मज़ा न आया
सोई तो कुछ चैन न पाया
बाप और भाई चचा भतीजे
सब रखती हूँ तेरे करम से
पर नहीं पाती एक भी ऐसा
जिसको हो मेरी जान की परवा
घर का इक हैरत का नमूना
सौ घर वाले और घर सूना
इसमें शिकायत क्या है पराई
अपनी क़िस्मत की है बुराई
चैन गर अपने बांटे में आता
क्यूं तू औरत जात बनाता
क्यूं पड़ते हम गैर के पाले
होते क्यूं औरों के हवाले
मैं ही अकेली नहीं हूँ दुखिया
पड़ी है लाखों पर यह बिपदा
जली करोड़ों इसी लपट में
पद्मों फुकीं इसी मरघट में
बालियाँ इक इक जात की लाखों
ब्याहियाँ इक इक रात की लाखों
ब्याह से अंजान और मंगनी से
बने से वाकिफ़ और न बनी से (दूल्हा-दुल्हन, दोनों, एक-दूसरे से अनभिज्ञ)
माओं से मुंह धुलवाती थी
रो रो मांग के जो खाती थी
थपक थपक के जिमको सुलाते
घुड़क घुड़क कर जिनको रुलाते
जिनको न थी शादी की तमन्ना
और न मंगनी का था तक़ाज़ा
जिनको न आपे की थी खबर कुछ
और न रंडापे की थी खबर कुछ
भली से वाकिफ़ थीं न बुरी से
बद से मतलब और न बदी से
रुखसत पा ले और चौथी को
खेल तमाशा जानती थीं जो
होश जिन्हें था रात न दिन का
गुड़ियों का सा ब्याह था जिनका
दो दो दिन रह कर के सुहागन
जनम जनम को हुई बैरागन
दूल्हा ने जाना न दुल्हन को
दुल्हन ने न पहचाना सजन को
दिल न तबीयत शौक़ न चाहत
मुफ़्त लगा ली ब्याह की तोहमत
शर्त से पहले बाज़ी हारी
ब्याह हुआ और रही कुंवारी
होश से पहले हुई हैं बेवा
कब पहुंचेगा पार ये खेवा
खर (धूल-मिट्टी) सा बचपन का ये रंडापा
दूर पड़ा है अभी बुढ़ापा
उमर है मंजिल तक पहुंचानी
काटनी है भरपूर जवानी
शाम के मुर्दे का यह रोना
सारी रात नहीं अब सोना
आयी बिलखती गयी सिसकती
रही तरसती और फड़कती
कोई नहीं जो गौर करे अब
नब्ज़ पे उनकी हाथ धरे अब
दुःख उनका आए और पूछे
रोग उनका समझे और बूझे
चोट न जिनके दिल को लगी हो
वो क्या जानें दिल की लगी को
तेरे सिवा यां मेरे मौला
कोई रहा है और न रहेगा
अब न मुझे कुछ रंज की परवा
और न आसाइश (सुख) की तमन्ना
चाहती हूँ इक तेरी मुहब्बत
और न रखती कोई हाजत (अभिलाषा)
घूँट इक ऐसा मुझको पिला दे
तेरे सिवा जो सबको भुला दे
आए किसी ध्यान न जी में
फ़िक़र नहीं कुछ अच्छे बुरे की
तेरे सिवा धुन हो न किसी की
वां (वहां) से अकेली आई हूँ जैसे
वैसे ही यां (यहाँ) से जाऊं अकेली
जी से निशाँ प्यारों का मिटा दूं
प्यार के मुंह को आग लगा दूं
तू ही हो दिल में तू ही ज़ुबां पर
मार के जाऊं लात जहाँ पर