शनिवार, 22 फ़रवरी 2020

दोहावली


निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय.
कबीर
दिल्ली-चुनाव का सबक़ -
निंदक नियरे राखिए, आँगन, कुटी छवाय,
मुख से उगले जहर जब, वोट-बैंक बढ़ि जाय
करता था सो क्यों किया, अब कर क्यों पछिताय,
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से खाय.
कबीर
संशोधित दोहा -
बोएं पेड़ बबूल के, निस-दिन आम उड़ायं,
जनता की खोदें कबर, जन-सेवक कहलायं.
और एक अपना दोहा -
सदा ट्रम्प को होत है, पत्तन में सत्कार,

स्लम के आगे उठ गयी, अब ऊंची दीवार.

14 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में रविवार 23 फरवरी 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


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    1. 'पांच लिंकों का आनंद में मेरी व्यंग्य-रचना को सम्मिलित करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद रवींद्र सिंह यादव जी.

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  2. निशि-दिन आम्र को चूस-चूस, कोसें वृक्ष बबूल।
    खुद तर तो होत ही, तारे साथ सात कुल।....☺️

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  3. विश्वमोहन जी, रिक्त-स्थान की पूर्ति कीजिए अन्यथा हम कुछ का कुछ अर्थ लगा सकते हैं.

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  4. वाह!आदरणीय ,संशोधित दोहा बडा सटीक लिखा है आपने । स्लम के आगे दीवार चुन कर उस पर आकर्षक पेंटिंग भी की गई है ..।

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    1. शुभा जी, राजकुमार सिद्धार्थ को उनके पिता राजा शुद्धोधन ने दारिद्र्य, जरावस्था, रोग और मृत्यु की वास्तविकता से दूर रखने का असफल प्रयास किया था.
      कहीं वास्तविकता से साक्षात्कार करने के बाद विश्व को ट्रम्प के रूप एक और गौतमं बुद्ध तो नहीं मिल जाएगा?

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  5. आपकी व्यंग्य रचनाओं का कोई जोड़ नहीं ।
    लाजवाब ।
    सटीक सामायिक।

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  6. मेरी गुस्ताखियाँ पसंद करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मन की वीणा !

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  7. व्यंग प्रधान रचना हो या संस्मरण..आपके लेखनी का कोई जवाब नही ...लाजवाब लिखते हैं आप ।

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    1. धन्यवाद मीना जी,
      अवकाश-प्राप्ति के बाद पढ़ाने को विद्यार्थी तो मिलते नहीं, इसलिए मित्रों से ही कुछ कह-सुन कर अपन दिल बहला लेता हूँ.

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  8. वाह वाह!!!
    कमाल के दोहे हैं....
    लाजवाब व्यंग।

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    1. प्रशंसा के लिए धन्यवाद सुधा जी.
      प्राचीन काल के अथवा आधुनिक युग के प्रतिष्ठित कवियों की सु-परिचित रचनाओं को, तोड़-मरोड़ कर, नए अंदाज़ में पेश करना, मेरी आदत में शुमार हो गया है.

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